Sunday, July 4, 2010

जमीन

कर्नाटक एक्स. में द्वितीय श्रेणी का वातानुकूलित,शानदार और सर्वसुविधायुक्त डिब्बा ।कोई भीड-भाड या शोर -शराबा नही ।ठाठ से बैठो,लेटो गाने सुनो ,किताब पढो या कोई भी मनपसन्द काम करो। मैं डायरी लिखते हुए सोच रही हूँ कि सफर से ज्यादा आरामदेह घर,--वाली बात अब पीछे चली गई है ।अब तो घर से ज्यादा आराम सफर में रहता है ।कम से कम अभी तो मुझे यही लगता है ।
बाजू में कोई ट्रेन खडी है ।मेरे सामने जनरल बोगी है।लोग थैले में ठूँसे गये कपडों की तरह भरे हैं । कुछ लोगों ने जैसे गर्मी को लाल झण्डी दिखाने के लिये ही अपने कपडे उतार रखे हैं ।मक्खियाँ उड रही हैं ।कई जगह खिडकियों से नीचे तक उल्टियों के निशान हैं ।नीचे दो-तीन लडके पानी पाउच, पुडिया, बडापाव और चनामसाला बेच रहे हैं ।खिडकियों के पास ( सीट पर बैठे लोग भी ) भाग्यशाली हैं कि थोडी बहुत हवा के साथ खाने-पीने की चीजें प्राप्त कर पा रहे हैं ।अन्दर गर्मी पसीने और बदबू के भभकों से जूझते हुए लोग चीजों के लिये खिडकियों के पास बैठे लोगों की मिन्नतें कर रहे हैं कि ,ओ भैया ,ओ लल्ला ,भैन जी जरा एक बडापाव ले लेना बच्चा भूखा है ।धैर्य के अभ्यास के लिये ऐसा प्रशिक्षण कही और नही मिल सकता ।आगे उसी ट्रेन में वातानुकूलित डिब्बे हैं जिनमें मेरी तरह ही आराम बैठे लोग किसी ऐसी ही जनरल बोगी की एकदम अलग दुनियाँ को निरपेक्षता और हेयता के साथ देख रहे होंगे ।
लेकिन मैं हेयता से नही देख रही ।ना ही मन में निरपेक्षता का भाव है। मैं उनकी परेशानी व पीडा को गहराई से महसूस कर रही हूँ ।क्यों कि अभी कुछ साल पहले ही मैं भी इसी भीड का हिस्सा हुआ करती थी । स्टेशन पर ट्रेन आने से लेकर ,सामान व बच्चों के साथ डिब्बे में पहुँच जाने की दुर्लभ जीत के बाद घंटों तक मैंने खडे रह कर सीट खाली होने का इन्तजार किया है ।बच्चों के लिये पानी या फल-बिस्किट लाने किसी भैया की मिन्नतें की हैं ।उमस और बदबू सहते हुए अखबार या रूमाल से हवा करके गर्मी को टक्कर दी है ।यह बात अलग है कि उस समय परेशानियों का अहसास न था। इसलिये वे परेशानियाँ इतनी कष्टकर व असहनीय प्रतीत नही होती थी । हमारे सुख-दुख प्रायः सापेक्ष होते हैं ।आराम और फुरसत में हम विगत व्यथाओं व कठिनाइयों को आसानी व विस्तार से याद कर सकते हैं ।
जनरल बोगी की यात्रा अब (बच्चों की मर्जी के चलते) भले ही मेरे लिये दूसरी दुनिया बन चुकी है ,पर मैं कभी निरपेक्ष नही हो सकती ।उसकी अनुभूति ,उसमें बैठने वाले हर व्यक्ति की पीडा सदा मेरे साथ है ।क्यों कि वह मेरी जमीन है, मेरा यथार्थ, ।

1 comment:

  1. Kuch aisa hi ehsaas meine bhi kiya h kayi bar.. Padkar bahut hi achchaa sa laga pata ni kyun :) :)

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