Wednesday, November 6, 2013

भैया-दौज----भाई-बहन के अटूट स्नेह की कथा

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भाई दौज की सुबह से ही हमें याद करा दिया जाता था कि दौज की कहानी सुने बिना और भाई को टीका किए बिना पानी भी नही पीना है । जब हम नहा-धोकर तैयार होजातीं तब दादी या नानी तुलसी के चौरा के पास आसन डाल कर ,घी का दिया जलाकर हमारे हाथ में घी-गुड देकर दौज की कहानी शुरु करतीं । कहानी के दौरान कई बार उनका गला भर आता था और कहानी के अन्त में जब वे कहतीं कि जैसा प्रेम उनमें था वैसा भगवान सबमें हो, वे अक्सर पल्लू से आँखें पौंछती मिलतीं थी । बहुत छोटी उम्र में तो हमें नानी--दादी की वह करुणा पल्ले नही पडती थी पर उम्र के साथ कहानी में समाए भाई बहन के स्नेह की तरलता की अनुभूति भिगोती गई । पता नही ये लोककथाएं किसने लिखीं । कैसे लिखीं लेकिन हमारे जीवन से जुडीं हैं । जड की तरह संवेदनाओं का पोषण करती हुई । तभी तो अलिखित होते हुए भी ये पीढी-दर-पीढी हस्तान्तरित होती रहीं हैं । इसे यहाँ देने का उद्देश्य भी यही है ।
हर भाई को हदय से शुभकामनाएं देते हुए उस कहानी को ,जिस रूप में मैंने सुनी है ,यहाँ दे रही हूँ । (यों तो स्थानीय प्रभाव से निश्चित ही थोडा--बहुत अन्तर तो होगा ही )
    
अपनी माँ की आँखों का तारा और बहन का इकलौता दुलारा भाई था 'निकोसी पूत' ( जिसे किसी ने कभी कोसा न हो अभिशाप न दिया हो कहते हैं ऐसे व्यक्ति को बुरी नजर जल्दी लगती है काल भी जैसे उसके लिये तैयार रहता है ) । भाई दौज आई तो वह माँ से बोला --"मैं बहन से टीका कराने जाऊँगा ।" माँ कैसे भेजे । बहुत ही प्यारा और बूढी माँ का इकलौता सहारा । ऊपर से रास्ता बडे खतरों से भरा । 
"बेटा ना जा । बहन परदेश में है । तू अकेला है रस्ता बियाबान है । तेरे बिना मैं कैसे रहूँगी ।"
"जैसे भी रह लेना मैया। बहन मेरी बाट देखती होगी । "
बेटा आखिर चल ही दिया । पर जैसे ही दरवाजे से निकला दरवाजे की ईँटें सरकीं । 
"तुम्हें मुझे दबाना है तो ठीक है पर पहले मैं बहन से टीका तो कराके आजाऊँ फिर मजे में दबा देना..।" निकोसी ने कहा तो दरवाजा मान गया । एक वन पार किया तो शेर मिला । निकोसी को देखते ही झपटा ।
"अरे भैया ठहरो । मेरी बहन टीका की थाली सजाए भूखी बैठी होगी । पहले मैं बहन से टीका करा के लौट आऊँ तब मुझे खा लेना ।" शेर मान गया । आगे बियाबान जंगल के बीच एक नदी मिली । निकोसी जैसे ही नदी पार करने लगा नदी उमड कर उसे डुबाने चली ।
"नदी माता ,मुझे शौक से डुबा लेना पर पहले मैं बहन से टीका तो करवा आऊँ ।" वह मेरी बाट देखती होगी । नदी भी शान्त होगई ।
भाई बहन की देहरी पर पहुँचा । बहन अपने भाई के आंवडे-पाँवडे( कुशलता की प्रार्थना) बाँचती चरखा कात रही थी कि तागा टूट गया । वह तागा जोडने लग गई । अब न तागा जुडे न बहन भाई को देखे । भाई खिन्न मन सोचने लगा कि मैं तो इतनी मुसीबतें पार कर आया हूँ और बहन को देखने तक की फुरसत नही । वह लौटने को हुआ तभी तागा जुड गया बहन बोली--अरे भैया मैं तो चरखा चलाती हुई तेरे नाम के ही आँवडे-पाँवडे बाँच रही थी । 
बहन ने भाई को बिठाया । दौडी-दौडी सास के पास गई ,पूछा--"अम्मा-अम्मा सबसे प्यारा पाहुना आवै तो क्या करना चाहिये ?" सास ने कहा कि करना क्या है गोबर माटी से आँगन लीपले और दूध में चावल डालदे ..। बहन ने झट से आँगन लीपा ,दूध औटा कर खोआ--खीर बनाई । भाई की आरती उतारी टीका किया । पंखा झलते हुए भाई को भोजन कराया ।
दसरे दिन तडके ही ढिबरी जलाकर बहन ने गेहूँ पीसे । रोटियाँ बनाई और अचार के संग कपडे में बाँधकर भाई को दे दीं । भाई को भूख कहाँ । आते समय सबसे कितने--कितने कौल वचन हार कर आया था । मन में एक तसल्ली थी कि बहन से टीका करवा लिया । 
उधर उजाला हुआ । बच्चे जागे । पूछने लगे---"माँ मामा के लिये तुमने क्या बनाया । बच्चों को देने के लिये बहन ने बची हुई रोटियाँ उजाले में देखीं तो रोटियों में साँप की केंचुली दिखी । कलेजा पकडकर बैठ गई -- "हाय राम ! मैंने अपना भाई अपने हाथों ही मार दिया ।"
बस दूध चूल्हे पर छोडा ,पूत पालने में छोडा और जी छोड कर भाई के पीछे दौड पडी । कोस दो कोस जाकर देखा ,भाई एक पेड के नीचे सो रहा है और 'छाक' ( कपडे में बँधी रोटियाँ) पेड से टँगी है । बहन ने चैन की साँस ली । भाई को जगाया । भाई ने अचम्भे से बहन को देखा । बहन ने पूरी बात बताई । भाई बोला---"तू मुझे कहाँ-कहाँ बचाएगी बहन ।" बहन बोली--"मुझसे जो होगा मैं करूँगी  पर अब तुझे अकेला नही जाने दूँगी ।"
भाई ने लाख रोका पर बहन न मानी । चलते-चलते रास्ते में वही नदी मिली । भाई को देख जैसे ही उमडने लगी । बहन ने नदी को चुनरी चढाई । नदी शान्त होगई । शेर मिला तो उसे बकरा दिया । शेर जंगल में चला गया । दरवाजे के लिये बहन ने सोने की ईँट रख ली । चलते-चलते बहन को प्यास लगी ।
भाई ने कहा--"बहन मैंने पहले ही मना किया था । अब इस बियाबान जंगल में पानी कहाँ मिलेगा ? बहन बोली-- "मिलेगा कैसे नही ,देखो दूर चीलें मँडरा रहीं हैं वहाँ जरूर पानी होगा ।" 
"ठीक है ,मैं पानी लेकर आता हूँ ।"
बहन बोली--- " पानी पीने तो मैं ही जाऊँगी ? अभी पीकर आती हूँ । तब तक तू पेड के नीचे आराम करना ।"  
बहन ने वहाँ जाकर देखा कि कुछ लोग एक शिला गढ रहे है । 
"भैया ये क्या बना रहे हो ?"
"तुझे मतलब ? पानी पीने आई है तो पानी पी और अपना रस्ता देख ।"
एक आदमी ने झिडककर कहा तो बहन के कलेजे में सुगबुगाहट हुई । जरूर कोई अनहोनी है । बोली- "भैया बतादो ये शिला किसके लिये गढ रहे हो ? मैं पानी तभी पीऊँगी ।"
"बडी हठी औरत है । चल नही मानती तो सुन । एक निकोसी पूत है । उसी की छाती पर सरकाने के लिये ऊपर से हुकम हुआ है ।"
बहन को काटो तो खून नही । माँ-जाए के लिये हर जगह काल बैरी बन कर खडा है । 
"उसने ऐसी क्या गलती करी है जो....?"
"तुझे आम खाने कि पेड गिनने ? तू पानी पी और अपना रास्ता देख ।" दूसरा आदमी चिल्लाकर बोला पर वह नही गई । वही खडी गिडगिडाने लगी --"सुनो भैया ! वह भी किसी दुखियारी माँ का लाल होगा । किसी बहन का भाई होगा । तुम्हें दौज मैया की सौगन्ध । बताओ ,क्या उसे बचाने का कोई उपाय नही है ?"
"हाँ उपाय तो है ।--आदमी हार मानकर बोला--- उसे किसी ने कभी कोसा नही है । अगर कोई कोसना शुरु करदे तो 'अलह' टल सकती ।" 
बस बहन को कैसी प्यास ! कहाँ का पानी ! उसी समय से उसने भाई को कोसना चालू कर दिया और कोसती-कोसती भाई के पास आई---"अरे तू मर जा । 'धुँआ सुलगे' ...'मरघट जले'...।"
"मेरी अच्छी--भली बहन बावली भी होगई । मैंने कितना मना किया था कि मत चल मेरे संग । नही मानी ।"---भाई ने दुखी होकर सोचा । जैसे-तैसे घर पहुँचे तो माँ हैरान । अच्छी भली बेटी को कौनसा प्रेत लग गया है कौनसे भूत-चुडैल सवार होगए हैं, जो भाई को कोसे जा रही थी । लडकी तो बावरी होगई ? 
"माँ कोई बात नही । बावरी है भूतरी है, जैसी भी है तो मेरी बहन । तू नाराज मत हो ।"
माँ चुप होगई बहन रोज उठते ही भाई को कोसती और दिन भर कोसती रहती । ऐसे ही कुछ दिन गुजर गए । एक दिन भाई की सगाई आई । बहन आगे आ गई---"इस जनमजले की सगाई कैसे होगी ?"
सबको बहुत बुरा लगा पर भाई ने कहा --"मेरी बहन की किसी बात का कोई बुरा मत मानो । वह जैसी भी है मेरी बहन है ।" 
फिर तो हर रस्म पर बहन इसी तरह भाई को रोकती रही टोकती रही और कोसती रही । भाई का ब्याह होगया ।
अब आई सुहागरात । बहन पहले ही पलंग पर जाकर लेट गई ।
"यह अभागा सुहागरात कैसे मनाएगा ? मैं भी वही सोऊँगी ।"
और सब तो ठीक पर सुहागरात में कैसे क्या होगा । ऐसी अनहोनी तो न देखी न सुनी । पर भाई ने कहा -कोई बात नही । मेरी बावरी बहन है । मैं उसका जी नही दुखाऊँगा ।हम जैसे भी रात काट लेंगे । फिर कोई क्या कहता ।
बहन रात में भाई और भौजाई के बीच लेट गई । पर पलकों में नींद कहाँ से आती । सोने का बहाना करती रही । आधीरात को भगवान का नागदेवता को हुकम हुआ कि फलां घर में एक नया-नवेला जोडा है उसमें से दूल्हा को डसना है । नागदेवता आए । पलंग के तीन चक्कर लगाए पर जोडा नही वहाँ तो तीन सिर और छह पाँव दिख रहे थे । जोडा होता तो डसता । बहन सब देख-समझ रही थी । चुपचाप उठी । तलवार से साँप को मारा और ढाल के नीचे दबा कर रख दिया । और भगवान का नाम लेकर दूसरे कमरे में चली गई । 
सुबह उसने सबको मरा साँप दिखाया और बोली--"मैं बावरी आवरी कुछ नही हूँ । बस अपने भाई की जान , मैया की गोद और भौजाई का एहवात ( सुहाग) बचाने के लिये यह सब किया । जो भूल चूक हुई उसे माफ करना ।"
भाई-भौजाई ने बहन का खूब मान-पान रखा । बहन खुशी-खुशी अपने घर चली गई । 
जैसे इस बहन ने भाई की रक्षा की और भाई ने बहन का मान रखा वैसे ही सब रखें । जै दौज मैया की । 

10 comments:

  1. दी कहानी पढ़ कर मैंने भी पल्लू से आँखों की कोर पोंछी.....
    बहुत सुन्दर कहानी.
    शुभकामनाएं!
    सादर
    अनु

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  2. Didi,
    Kahte hain hamara desh iklauta aisa desh hai jisme har din koi n koi parv-tyauhar hota hai.. Waise hi har parv se judi kathayen.
    Ye kathayen vaastav mein PRAVACHAN ya UPADESH ko kinare kar, paroksha roop se sandesh dene ka kaam karti hain. Isiliye ye saral bhi hoti hain aur prabhavshali bhi.
    Hame to amma Chitragupta pooja mein laga deti thi aur ye wali katha sunane nahin deti thi.. Fir bhi suna hai maine. Bilkul yahi katha hai. Aaj aapse sunkar sab yaad ho aaya aur man bhar aaya.
    Jaise sone ke gahne banane ke liye khare sone me milawat karani padti hai, wsise hi bhai bahan ke nishchhal pyar me bhi abhishap ka hona anivaarya hai.
    Bahut achchhi post!!

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  3. बहुत ही प्रेरणादायी और रोचक कहानी। अत्‍यन्‍त अच्‍छी लगी।

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  4. अत्यंत मार्मिक कथा...बहुत अच्छा लगा पढ़कर।

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  5. कथा पढ़ते पढ़ते आँखों से आँसू टपकते रहे लगातार....राखी के धागे कच्चे हो गए थे, भाईदूज का टीका झूठा हो गया था और काल भाई को छीन ले गया था....
    कल की सी बात लगती है....सादर ।

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