Thursday, February 13, 2014

किस्सा लडकी से परी बन जाने का ।


यह जादुई किस्सा उस समय का है जब मैं शायद सातवीं कक्षा में थी और किशोर भैया (मेरे मौसेरे भाई ) आठवीं या नौवीं में । वे बचपन से ही बडे सफाई पसन्द और कलात्मक रुचि वाले थे । वे कम बोलते थे लेकिन सटीक बोलते थे । उनका हर काम बडा व्यवस्थित और कलात्मक होता था । अपने नाम को वे बडे तरीके से सजा कर लिखते थे । किसी के बीडी पीने पर और तम्बाखू खाकर पिच्च-पिच्च करने पर वे उन्हें बडी चिढ होती थी । वे बडे कोमल विचारों वाले थे । छोटी-मोटी तुकबन्दियाँ करने और कल्पना से कहानियाँ गढने में खूब कमाल करते थे । और हाँ ..सबसे ज्यादा नैतिक आदर्शों के घोर हिमायती ।  
उन दिनों हम एक ही स्कूल में पढते थे इसलिये दूसरे भाई-बहिनों ( चचेरे-मौसेरे) की तुलना में हमें एक दूसरे के साथ ज्यादा समय बिताने का अवसर मिलता था । हमारी रुचियाँ भी लगभग समान थीं । जाहिर है कि इससे हमारे बीच निकटता भी अपेक्षाकृत अधिक थी । इसी निकटता के कारण वे मुझे ही अपने विचारों व सिद्धान्तों से अवगत कराते रहते थे । अवगत ही नही कराते बल्कि व्यवहार में लाने का दबाब भी बनाए रखते थे । जैसे कि उन्होंने मुझे स्पष्ट समझा दिया था कि 'मैं कक्षा में लडकों से कुछ दूर बैठा करूँ । किसी लडके से खुद ही कापी माँगने की बजाय उनसे कहा करूँ । और हाँ---'बतादूँ क्या लाना...' ,जैसे गीत हरगिज न गाया करूँ । ये 'पिया' 'सैंया' जैसे शब्दों वाले गाने लडकियों को नही गाने चाहिये ।" 
"लेकिन भैया इनमें क्या बुराई है ।"--मुझे बडी हैरानी होती थी । 
"तू नही समझेगी । पर मैंने कह दिया न !"--भैया मास्टर जी की तरह कहते---"तुझे गाना ही है तो 'सबेरे वाली गाडी से...' या 'बडी देर भई नन्दलाला...', जैसे गीत गाया कर । समझी !"   
भैया के ऐसे सिद्धान्त मेरे पल्ले नही पडते थे पर उनकी बात न मानने का तो सवाल ही नही था ।  
उन्ही दिनों की बात है । मैंने भैया में एक अजीब सा बदलाव देखा । जो किशोर भैया एक चित्र बना लेने या सब्जी में मिर्च ज्यादा लगने के कारण भूखे रह जाने तक की बात सबसे पहले मुझे बताते थे वे अक्सर अकेले और खोए-खोए नजर आने लगे थे । पहले से ज्यादा खामोश होगए थे और डाँट का जल्दी बुरा मान जाते थे । जरूरत न होने पर भी बंसल-स्टोर पर कुछ न कुछ खरीदने चले जाते थे । जैसे एक दिन उन्होंने स्याही खत्म होजाने की बात कह कर स्याही लेने चले गए । मैंने देखा था कि स्याही की शीशी आधी से ज्यादा भरी थी । यही नही भाभी ने बताया कि उनकी 'दरवेश-स्नो' और 'ब्राह्मी आँवले' के तेल की शीशी जादुई तरीके से खाली हो रही है । यह तो सिर्फ मैं जानती थी कि आजकल किशोर भैया क्यों महकते रहते हैं । पर इससे आगे सोचने और पूछने की अक्ल कहाँ थी मुझे । पर भैया तो जैसे लबालब भरे बर्तन की तरह छलकने बैठे थे । सो एक दिन छलक ही पडे । वैसे भी घर भर में मुझसे बेहतर उनका कोई हमराज़ नही था ! 
"तू किसी से कहेगी तो नही ?" एक दिन स्कूल जाते समय उन्होंने बडी संजीदगी से कहा । मैंने वचन दिया तो बोले --" देख वो सामने पीला वाला मकान है न ,बंसल-स्टोर के ऊपर , उसमें एक लडकी आई है ।"        
"लडकी ?"---मुझे अचम्भा हुआ । और लडकी  आई है तो इसमें छुपाने वाली क्या बात है । छुपाई तो चोरी जाती है । मुझे याद है एक दिन हमने डाक-बँगला से गुलाब का फूल चुराया था और यह बात कभी किसी को नही बताई । रमा और सुमन अम्मा से छुपाकर इमलियाँ खातीं थीं क्योंकि हमें इसकी सख्त मनाही थी । लडकी का होना तो चोरी नही है न ?  
" वह सब छोड ।--भैया तत्परता से बोले--"तूने कहानियों में परी का जिक्र सुना है न ?" --वो आगे बोले---"वह वैसी ही है । बेहद खूबसूरत । देख तू गलत मत समझना । वह है ही ऐसी । मुस्कराकर देखती है तो गुलाब खिल जाते हैं । हँसती है तो झरने फूट पडते हैं और बोलती है तो जलतरंग सी....।"
अब मैं सचमुच हैरान थी । नवमीं में पढने वाले किशोर भैया बिल्कुल उपन्यासों वाली भाषा बोल रहे थे । यह गुलशन नन्दा के उपन्यासों का असर था जिन्हें वे ताऊजी के बक्से में से निकालकर चोरी से पढा करते थे । और हम लोगों को उनके कथानक बताया करते थे । 
"भैया यह 'कटी पतंग' से याद किया या 'झील के उसपार ' से ?"--मैंने हँसकर कहा तो वे बुरा मान गए ।
"मैं जानता था कि तू भी नही समझेगी मेरी बात..।" मैंने उनकी बात को गंभीरता से लिया और आगे बताने का आग्ह किया ।
"उसका नाम विभा है ।"--वे उल्लसित हो कहने लगे---"वनस्थली में पढती है । यहाँ अपने मामा के यहाँ आई है । क्या सलीका है बोलने का ! तू देखेगी ना ,तो देखती रह जाएगी । मैंने जब स्टोर पर उसका गिरा हुआ पैकेट उठाकर दिया तो वह थैंक्यू कहकर मेरी तरफ ऐसे मुस्कराई जैसे वह मेरे अन्दर झाँक रही हो । यही नही मेरा नाम भी पूछा --"क्या नाम है तुम्हारा ?..किशोर ?..वाह ! बडा प्यारा नाम है..."---आखिरी शब्द बोलते समय तो मुझे लगा कि भैया के होठों से शहद टपकने वाला है । 
अब भैया के लिये मैं और भी खास होगई । वो मौका पाते ही मुझे बताते कि आज विभा ने नीला सूट पहना था कि वह छत पर बाल सुखा रही थी ..कि वह आज भी मुझे देखकर मुस्कराई ..। 
कुछ दिन यों ही बीत गए । अब मैं भी उसे देखने उत्सुक थी । यह कोई मुश्किल काम न था । यों भैया तो इसे रहस्य-रोमांच की तरह खास तौर से प्रस्तुत करना चाहते थे लेकिन वह एक दिन अचानक मिल गई ।
स्कूल से लौट रहे थे तब वह भी 'पत्र-पेटी' में चिट्ठी डालकर आ रही थी । भैया ने मेरे पीछे होकर छुई-मुई की तरह सिकुडते हुए बताया कि यही है विभा । 
"अरे किशोर ! तुम लोग क्या स्कूल से आ रहे हो ?"---एक खरखरी सी आवाज हम तक पहुँची जैसे चक्की में कंकड आजाने पर आती है तो मैं हैरान रह गई । 
एक गेहुँआ-साँवले रंग की, मोटी कद-काठी और छोटी-छोटी सी आँखों वाली एक लडकी हमारे सामने खडी थी । भैया से दो-चार साल बडी ही होगी । छोटे सुनहरे और रूखे बालों की पोनीटेल उसे और भी विरूप बना रही थी । भैया के वर्णन को ध्यान में रखने के बाद कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगा । पर यह सब कह कर भैया के उस भाव को चोट नही पहुँचाना चाहती थी ।
कुछ दिन बाद विभा अपने घर चली गई और जैसा कि उस उम्र की भावनाओं का होता है ,एक ही धुलाई में उतरे कच्चे रंग की तरह भैया का स्वप्न-लोक भी विलुप्त होगया । अब जब कभी हम मिलते हैं उस प्रसंग को एक परिहास के रूप में याद करते हैं । 
लेकिन उस इन्द्रधनुषी इन्द्रजाल को एकदम नज़रअन्दाज भी तो नही किया जासकता जो कभी भी और कहीं भी एक 'विभा' को 'परी' बना दिया करता है । 

15 comments:

  1. शानदार किस्सा है.… इश्क होता है बड़ा खूबसूरत है। जिस पर दिल आ जाये वो परी ही लगती है।

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  2. वाह !!!!
    ये हुई सही वैलेंटाइन डे पोस्ट !!! :-)

    सादर
    अनु

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  3. दीदी! एक पूरा कालखण्ड सिनेमा की तरह गुज़र गया सामने से. वो उमर जिस उमर में हम मान लिया करते थे कि 'वो' मेरी है. और फिर किसी ने उसका ज़िक्र भी किया तो बात ख़ून ख़राबे तक पहुँच जाती थी! उम्र में बड़ी लड-अकियाँ अक्सर आकर्षण का केन्द्र होती थीं. ख़ुद मेरा पहला प्यार टूँडला में मेरी मॉंटेसरी टीचर थीं, जो आज भी मुझे याद आती हैं.
    किशोर भैया का सजना सँवरना, गीत गुनगुनाना, आवाज़ में बेइंतिहाँ मुलायमियत बस भुलेटन बाबा (वैलेंटाइन) की किरपा है. वो कहावत है ना दिल लगे दीवार से तो...!
    दिल खुश कर दिया इस किस्से ने!

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    1. सच कहा आपने । समय मिले तब इस कहानी को भी पढें । http://katha-kahaani.blogspot.in/2012/02/blog-post.html

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  4. मन सुन्दरता के आयाम गढ़ता है, कल्पनाशीलता क्या न करा ले।

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  5. वेलेंटाइन डे पर बेहद खुबसूरत सा किस्सा...इश्क में कुछ ऐसा ही जादू है...

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  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 15/02/2014 को "शजर पर एक ही पत्ता बचा है" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1524 पर.

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  7. बचपन का इश्क बड़ा मासूम होता है ..!

    RECENT POST -: पिता

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  8. जो मन को भा जाए वही सबसे सुन्दर !

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  9. सुन्दर और बहुत ही प्यारा किस्सा सादर धन्यवाद।।

    नई कड़ियाँ : भारत कोकिला सरोजिनी नायडू

    क्या हिन्दी ब्लॉगजगत में पाठकों की कमी है ?

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  10. शायद उस तरह् से मान लेना उस उम्र का तकाजा था ...... सादर !

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  11. वो उम्र ही कुछ ऐसे होती है
    मजेदार किस्सा सुनाया :)
    आभार आपका !

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  12. अनजाने ही वलेंटाइन जीवन के कुछ पलों में साथ आ जाती है और उसी तरह वापस भी चली जाती है पर नए वेलेंटाइन का रास्ता नहीं रोकती ... जीवन में प्रेम कभी बाधा नहीं बनता ... मस्त मजेदार किस्सा ...

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  13. ऐसे दिन भी क्‍या दिन होते थे। रोचक संस्‍मरण।

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  14. Bahut achcha chitran kiya hai. Bade bhai ka protection aur dostana vyavahaar bakhoobi jahalak aaya hai. Fir kahani kaa mukhya vishay, kisee khoobsurat kavi ki kalpana ki bhaanti jo chitran kiya hai, wo kaafee interesting hai, aur saath saath ekk chhotee bahan kee apane bhai ke liye, jo aalochanatmak pravrtti bhee ekk aankahe roop main maoujood hai...pathakon ko sochone ke liye kafee kuchh chood diya hai

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