Thursday, July 9, 2015

कुछ तो बात हुई है


चौराहे पर भीड़ लगी है ,
कुछ ना कुछ तो बात हुई है .
कैसे ये खिड़कियाँ खुली हैं ,
कुछ ना कुछ तो बात हुई है .
सूखा कहीं तबाही भीषण ,
कैसी तो बरसात हुई है .
उगता सूरज कैसे लिखदूँ ,
दिन में ही जब रात हुई है .
निकली कहाँ ,कहाँ गुम होगई ,
एक नदी जज़बात हुई है .
अपनेपन के दाम बढ़ गए
मँहगी हर सौगात हुई है .
हार जीत का खेल बनी जब
राजनीति बदजात हुई है .
जो समझा था, धोखा छल था
सच्चाई अब ज्ञात हुई है .

6 comments:

  1. यही अहसास हारी हुई संभावनाओं को और ज्‍यादा डरा रहे हैं।

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  2. निकली कहाँ ,कहाँ गुम होगई ,
    एक नदी जज़बात हुई है .
    बहुत खूब..गिरिजा जी
    आज के हालातों को बयाँ करती सुंदर रचना..

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (11-07-2015) को "वक्त बचा है कम, कुछ बोल लेना चाहिए" (चर्चा अंक-2033) (चर्चा अंक- 2033) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. वर्तमान हालात वयां करती सुन्दर रचना !

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  5. जो समझा था, धोखा छल था
    सच्चाई अब ज्ञात हुई है ....
    आज के हालात पर जीवंत तप्सरा ... हर छंद हकीकत हर रहा है जिससे रोज मर्रा में सब रूबरू होते रहते हैं ...

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  6. वाह..बेहतरीन !

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