गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

३१ दिसम्बर का उपहार


31 दिसम्बर 2010
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सन् 1985 जाते--जाते मयंक (सबसे छोटा बेटा) के रूप में एक उपहार हमें देगया था । मुझे याद आता है कि इसी तरह बुआ या जीजी घर से जब विदा होतीं थीं तो जाते-जाते हमारी हथेली पर रुपया-दो रुपया जरूर रखतीं थीं और वह राशि हमारे बड़ी यादगार और अनमोल हुआ करती थी ।
यों तो हर माँ को अपनी हर सन्तान विशिष्ट ही लगती है ।लेकिन मयंक की कई बातें हैं जो सचमुच विशिष्ट हैं ।वह बहुत छुटपन से ही रोना तो जैसे जानता ही नही था मानो ,मम्मी को कोई परेशानी न हो इसे वह जन्म से ही सीख आया था । जब वह दो ही साल का था चाक से आँगन में चित्र बनाता था, इतनी फुर्ती से कि देखने वाले चकित रह जाते थे ।
जब वह ढाई साल का था तभी वह उसने अक्षरों के बारे में अपने मौलिक अनुसन्धान (, कि र से स,य थ, श कैसे बन सकते हैं और ट से ही ठ,ड ढ द ह बनाए जा सकते हैं । च को उल्टा जोडो तो ज बनता है और प ष, म भ,घ ध में तो जरा सा ही अन्तर है ...आदि,) ने मुझे विस्मित कर दिया था । मैं हैरान थी कि इसने वर्णमाला कब , कैसे सीखली । सीख ही नही ली उसे इतनी सूक्ष्मता से समझ भी लिया ।
पहली कक्षा में उसने यह कविता भी लिख डाली थी ----

मेरे पास थी एक पतंग ।
चटक लाल था उसका रंग ।
फर्..फर्..फर्..फर् उडती थी ।
साथ हवा के चलती थी ।
पतंग में एक हाथी था ।
वह तो मेरा साथी था ।
जाने कहाँ वो चली गई ।
संग हवा के चली गई ।
मेरे पास थी एक पतंग।

बहुत अच्छा परिवेश व परवरिश न मिलने के कारण मयंक की प्रतिभा को निश्चित रूप से सही दिशा नही मिल पाई ।वह भी बेंगलुरु में ही इंजीनियर है । सब जानते हैं कि आज इंजीनियर बनना और किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी पाना युवाओं के लिये बड़ी बात नही रह गई है । फिर भी मयंक जहाँ भी है-----जो कुछ है उससे बेहतर चाहिये---का संकल्प उसके साथ है ।
इस समय वह बर्फवारी से घिरे न्यूयार्क शहर में है । पिछले साल जब वह न्यूजर्सी में था ,पहली बार वहाँ के वैभव ,बर्फीले सौन्दर्य और हडसन नदी के वैभव-विस्तार को देख उत्साहित होने के साथ उदास भी था ।बोला -मम्मी सब कुछ अच्छा है पर कमी यह है कि यह सब भारत में नही है । अपने देश , अपनी धरती के लिये उसके भाव-विचार मुझे आश्वस्त करते हैं ।
कल बातों-बातों में ही उसने कहा ---माँ , मुझमें ऐसी कोई बात ही कहाँ है जो मेरे लिये कुछ लिखा जाए । सच तो यह है कि वह सबसे छोटा व प्यारा होने के साथ कई बातों में इतना बड़ा व समझदार भी है कि जो भी लिखती हूँ प्रयोगवादी कविता के युग में भारतेन्दु-युग की रचना सा लगता है । उसके मना करने पर भी मैं केवल एक प्रसंग यहाँ दे रही हूँ जो बहुत छोटेपन में ही आगए उसके बड़ेपन को दर्शाता है ---- मयंक को एक दोस्त राहुल के साथ मेला जाना था । महीने का पहला सप्ताह होने के कारण भी और सबसे छोटे के लिये उदार भाव होने के कारण मैंने उसे पचास रुपए दिये ।कहा कि कुछ अच्छा खा-पीलेना । कुछ खरीदने लायक बजट था भी नही। शाम को जब लौटा तो उसके हाथ में गोर्की का उन्यास (माँ) था । मैने हैरान होकर इस खरीददारी का कारण पूछा तो उसने बताया कि पिछले साल आपने पैसे कम होने के कारण यह किताब लेते--लेते छोड़दी थी । इसलिये ....
पर यह तो 63 रुपए की है --मैंने कहा तो बोला कि तेरह रुपए राहुल से उधार ले लिये थे ।
पर बेटा ,पहले तो यह कि किताब खरीदना जरूरी नही था । किसी और दिन ले आते ।
माँ, रूसी किताबों की दुकान कल जाने वाली है । खाना -पीना तो फिर भी हो जाएगा ।
पर उधार केवल तेरह रुपए ही क्यों , ज्यादा ले लेता । यानी कि तुमने कुछ खाया पिया भी नही .यह बुरी बात है । मैंने पैसे इसलिये तो नही दिये थे ।
मेरी बात के उत्तर में उसने कहा --सॅारी मम्मा लेकिन , जब तक बहुत जरूरी न हो तब तक उधार नही लेना चाहिये न । फिर क्या कहती मैं ।
कुछ पंक्तियाँ मयंक के लिये---

सागर में लहर तू है
नदिया में भँवर तू है ।
ऊबी थकीं ---तिमिर से
आँखों को सहर तू है ।

खिल-खिल हँसी जो निकली
क्यों आँसुओं में बदली ।
तुझको पता नदी कब
किन घाटियों ने निगली ।
टकराने , जीत जाने की
पहली खबर तू है ।

सपनों के नीड छोड़े
रुख अँधेरे के मोड़े
बिखरे जो चिन्दियों में
संकल्प तूने जोड़े ।
पर्दों के पार देखे
वह तीखी नजर तू है ।

लगने लगा मुझे तो
छोटा दुआ का दामन
आकाश आ समाया
छोटे से अपने आँगन ।
है कही भी मरुस्थल
तो उसमें नहर तू है ।
असीम स्नेह व शुभ-कामनाओं के साथ
माँ

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

छोटे दिन---दो कविताएं

22 दिसम्बर वर्ष का सबसे छोटा दिन माना जाता है । यानी दस घंटे का दिन और चौदह घंटे की रात ।यों खान-पान पहनावा,स्वाद व स्वास्थ्य ,सभी तरह से अच्छी होने के बावजूद मुझे शीतऋतु जरा कम ही अच्छी लगती है । इसके पीछे कई कारणों में से एक यह भी है कि इस ऋतु में दिनों का वही हाल हुआ लगता है जो हाल सस्ते डिटर्जेन्ट की धुलाई से शिफॅान की साडी का हो जाता है । दिन की चादर को खींच कर रात आराम से पाँव पसार कर सोती है । सूरज जैसे अपनी जेब से बडी कंजूसी से एक-एक पल गिन-गिन कर देता है । यहाँ छोटे दिनों पर दो कविताएं हैं । दोनों ही कविताएं दस-बारह वर्ष पहले लिखी गईं । दूसरी कविता बाल--पाठकों के लिये लिखी गई है ।
(1)
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मँहगाई सी रातें
सीमित खातों जैसे दिन ।
हुए कुपोषण से ,
ये जर्जर गातों जैसे दिन ।

पहले चिट्ठी आती थीं
पढते थे हफ्तों तक
हुईं फोन पर अब तो
सीमित बातों जैसे दिन ।

वो भी दिन थे ,
जब हम मिल घंटों बतियाते थे
अब चलते--चलते होतीं
मुलाकातों जैसे दिन ।

अफसर बेटे के सपनों में
भूली भटकी सी ,क्षणिक जगी
बूढी माँ की
कुछ यादों जैसे दिन ।

भाभी के चौके में
जाने गए नही कबसे
ड्राइंगरूम तक सिमटे
रिश्ते--नातों जैसे दिन ।

बातों--बातों में ही
हाय गुजर जाते हैं क्यों
नई-नवेली दुल्हन की
मधु-रातों जैसे दिन ।

(2)
(बाल कविता)
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दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं
चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन

लम्बी और उबाऊ,
जटिल सवालों सी रातें
उछल-कूद और मौज-मजे की
छुट्टी जैसे दिन

जाने कब अखबार धूप का
सरकाते आँगन
जाने कब ओझल होजाते
हॅाकर जैसे दिन

जल्दी-जल्दी आउट होती
सुस्त टीम जैसे
या मुँह में रखते ही घुलती
आइसक्रीम से दिन

ढालानों से नीचे पाँव उतरते हैं जैसे
छोटे स्टेशन पर ट्रेन गुजरते जैसे दिन।

कहीं ठहर कर रहना
इनको रास नहीं आता
हाथ न आयें उड-उड जायें
तितली जैसे दिन ।

पूरब की डाली से
जैसे-तैसे उतरें भी
सन्ध्या की आहट से उडते
चिडिया जैसे दिन ।

रविवार, 12 दिसंबर 2010

दो लघुकथाएं
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(1) --सन्दिग्ध
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देखो, ऐसा करना-----चलते--चलते कनक ने पत्नी को समझाया ----अगर मुझे ऑफिस में जरूरी काम न होता तो राजन जी को मैं खुद ही अटेण्ड करता । अब तुम्हें ही करना होगा इसलिये कुछ न हो तो पडौस से टीनू या बबलू को ही बुला लेना कुछ तो मदद मिलेगी ही । और फिर.....कहते-कहते कनक रुक गया ।और सोनिया का चेहरा देखने लगा जिस पर हैरानी के भाव थे ।
राजन सोनिया के भाई का दोस्त है और सोनिया का सहपाठी भी । यहाँ विभाग के किसी काम से आया है। कनक से अनायास ही भेंट होगई तो औपचारिकतावश घर आने को कहना ही पडा ।अब उसकी ट्रेन शाम सात बजे है। और कनक छह बजे से पहले नही लौट पाएगा । तब तक सोनिया को अकेले ही सब देखना होगा और फिर......कनक आगे कहते-कहते रुक गया ।
पर इतने छोटे बच्चे भला क्या मदद करेंगे ---सोनिया ने हैरानी से पति को देखा । वैसे भी कोई खास काम नही है । बाजार से कुछ लाना नही है । खाना बन ही चुका है । बस परोसना ही तो है । टीनू--बबलू को बुलाने की क्या जरूरत ।
जरूरत है-------कनक ने जोर देकर कहा--- हर बात को अपने हिसाब से मत देखा करो । तुम घर में अकेली हो और.......सोनिया , लोगों को बात बनाते देर नही लगती ।बच्चे रहेंगे तो..........।
सोनिया कनक के आशय को समझ कर आहत होगई । बोली-----कनक , राजन मेरे भाई जैसे हैं ।
पर भाई तो नही है न । कनक ने तपाक से कहा और बाहर निकल गया । सोनिया अवाक् सी पति को देखती रह गई

( 2 ) फर्क
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माँ ,विनीता को साकेतनगर जाना है ।
सुनील की बात सुनकर मेरे मन में हल्का सा विरोध जागा और साथ में कई सवाल भी । साकेतनगर यानी अपनी माँ के घर । पर क्यों ....आज ही तो सुबह दोनों पूना से आए हैं वह भी सिर्फ हफ्ताभर के लिये । अभी बैग, सूटकेस खुले तक नही हैं । इसके अलावा विनीता की माँ अभी कुछ दिन पहले ही महीनाभर पूना रह कर लौटी हैँ । मुझे तो फिर भी दोनों छह माह बाद मिल रहे हैं । वैसे भी मेरी अपनी कोई बेटी नही है । विनीता ही मेरी बहू भी है और बेटी भी । कबसे उसके आने का इन्तजार था । उसके आने से घर कैसा भरा-भरा लगरहा है ।पहले कितनी सारी बातें सोच रखी थी मैंने । दोनों को --क्या बना कर खिलाऊँगी । कहाँ-कहाँ चलेंगे । कितनी सारी बातें करेंगे । और भी कितना कुछ । पर यह क्या ..विनीता ने आते ही माँ के पास जाने की योजना बना ली । मुझे बताए बिना ही .....।
ये सारी बातें सोचते हुए मैंने स्नेह व कुछ अधिकार से कहा ---
बेटी अभी तो हम लोग ठीक से मिले बैठे भी नहीं हैं । साकेत नगरभी चली जाना । पहले मेरे साथ तो....
आपके साथ तो रहूँगी ही-----विनीता ने मेरी पूरी बात सुने बिना ही कुछ उदासी के साथ कहा-----पर मम्मी अकेली हैं । भाभी मायके चली गईं हैं ।...मम्मी की तबियत भी ठीक नही है । इसलिये मैं सोच रही थी कि ....।
बातें सहज-स्वाभाविक होते हुए भी मुझे झिंझोड गईँ ।मायके जाने के पीछे विनीता के तर्क नही , वह आत्मीयता व संवेदना प्रमुख थी जो एक बेटी की माँ के लिये होती है । ये सारी समस्याएं मेरी भी हो सकतीं थीं यदि विनीता मेरी बेटी होती । पहली बार मुझे बेटी की कमी खली । बहू और बेटी के इस फर्क को स्वीकार करते हुए मैंने विनीता के जाने को सहज रूप में ले लिया । मेरे पास और कोई चारा भी तो नही था ।

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

क्या लिखूँ





26 नवम्बर 2010---ग्वालियर
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प्रशान्त



अगर कोई तीस-बत्तीस साल का सुन्दर युवक चिडियों--गिलहरियों ,पिल्लों या छोटे बच्चों की हरकतों पर मुग्ध होता हो, खुद से ज्यादा दूसरों की परेशानी से परेशान होता हो ,दूसरों की भावनाओं का खास ख्याल रखता हो , आक्रोश व आरोपों को शान्त रह कर सुनता हो ,झूठ ,छल, बेईमानी व भ्रष्टाचार के प्रसंग पर बेहद संजीदा हो जाता हो , जो परिवार से आगे समाज राष्ट्र विश्व और फिर ब्रह्माण्ड तक सोचता हो पर माँ से वांछित स्नेह न मिलने की शिकायत छोटे बच्चे की तरह करता हो तो वह निस्सन्देह गुल्लू ही होगा । गुल्लू यानी प्रशान्त, बडा बेटा ,भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान केन्द्र( इसरो) बैंगलुरु में एक वैज्ञानिक । मेरे लिये वह केवल एक बेटा ही नही है । मेरे खाने-पीने , दवा लेने ,समय से सोने जागने के लिये एक पिता की तरह निर्देश देता है ,मेरी अनियमितताओं पर नाराज होता है । और मेरे सिरदर्द तक की बात सुन कर एक माँ की तरह ही चिन्तित भी होता है । और अपनी बहुत सारी बातें मैं उसे मित्र की तरह ही सुना सकती हूँ ।सन् 1978 के नवम्बर की 26 तारीख को सुबह 5.45 पर गुल्लू का जन्म सचमुच सूरज उगने जैसा ही हुआ था । गर्भ में उम्मीदों के सूरज को सहेजे दो-रातों की पीडा के पश्चात् हुई सुबह कई अर्थों में जीवन की एक अपूर्व-अनौखी सुबह थी ।
गुल्लू के बारे में लिखने को बहुत कुछ है ।पहली सन्तान होने के नाते स्नेह के साथ--साथ उससे कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं और आकाँक्षाएं, और इसीलिये पाबन्दियाँ भी खूब रहीं हैं ।पर इन सबसे जकडे उसके बचपन के लिये वेदना भी अपेक्षाकृत अधिक रही है। कई बातों के लिये उसके प्रति मन में एक अपराध-बोध सा आज भी है । पलाश ( शैक्षिक पत्रिका राज्य शिक्षा केन्द्र भोपाल) के फरवरी 2002 अंक तथा जनवरी 2007 के अंक में प्रकाशित दो कहानियाँ--छोटी सी बात तथा पहली रचना --विशुद्ध रूप से गुल्लू पर ही केन्द्रित हैं ।
आज गुल्लू ने बत्तीस वर्ष पूरे कर लिये हैं । वह --सुन्दर समझदार और सी.डॅाट में इंजीनियर--सुलक्षणा का पति ही नही ,चार साल की मान्या का पिता भी है ,पर मेरे लिये वह अभी तक गुल्लू बना हुआ है । बच्चों सा ही निश्छल , सच्चा , संवेदनशील । मैं कभी उसे प्रशान्त कहती हूँ तो टोक देता है----क्या मम्मी ... । रोज फोन पर भी सबसे पहले यही सुनाई देता है --मम्मी मैं गुल्लू बोल रहा हूँ ।
और तब मुझे लगता है , ...लगता है .....पर कैसे लिखूँ कि क्या लगता है क्यों कि इस अहसास के लिये तो मेरे पास कोई उपमा ही नही है ।बस है तो उसके दीर्घायु , प्रसन्न ,ऊर्जावान्, स्वस्थ व सक्रिय बने रहने की कामना व प्रार्थना । यहाँ उसके लिये बहुत पहले लिखी गईं दो कविताएं हैं ।

क्या लिखूँ --1
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क्या लिखूँ आज तेरे लिये
मेरे प्रथम कोमल गीत
मेरे वत्स
मेरे मीत ।
अवाक् है ह्रदय
फिसल रहे हैं शब्द
पारे की बूँदों की तरह
मेरी उँगलियों से ।
व्यक्त करना चाहती हूं
वह अहसास
जो होता है
तेरी सस्मित आँखों को देख कर
लौटाऊँ तुझे वे सारी खुशियाँ
जो मुझे दी हैं तूने
अनवरत,अविकल
हर दिन, हर पल
पर, कितनी अकिंचन मैं,
दे न सकी आज तक तुझे
एक शब्द भी .
शब्द ,जो बन जाता
तेरे पाँव तले एक ठोस धरातल ।
शब्द , जो बन जाता
एक स्नेहमय हाथ
तेरे सिर पर
करता तुझे आश्वस्त ..निश्चिन्त
तू ही तो देता रहा मुझे
कितना कुछ
अकथ्य, असीम ...
छलक कर जो
ह्रदय की गहराइयों से
सींचता रहा है
एक रेगिस्तान को
मेरे वत्स , मेरे मीत
मैं भला क्या दूँ तुझे
मेरे प्रथम कोमल गीत ।
( 26 नवम्बर 1996 को रचित)






तुझसे दूर --2
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भूल गई हूँ मैं
जैसे रख कर कहीं
अपना चश्मा
मेरी नजरों के नूर
तुझसे दूर .
उतर आतीं थीं शाखों से
कितनी गिलहरियाँ..
खुशियाँ---इस आँगन में
उठाने मूँगफली के दाने
मेरी हथेली से ।
फिरतीं थीं आगे--पीछे
ऊपर-नीचे
अब चलीं गईं हैं जाने कहाँ
जैसे हवा में जैसे कपूर
तुझसे दूर ।


मयंक, प्रशान्त और विवेक





नीम अमरूद की टहनियों पर
छत की मुँडेर पर
आँगन में ..हर कहीं
चहकती--फुदकती रहती थी
गौरैया--तेरी मुस्कान
नही दिखाई देती अब
कही भी अभिराम
सुबह,दोपहर, शाम ।
और ताव खाकर
कच्चे अमरूद कुतरता
नोंच-नोंच कर पत्ते गिराता
मिट्ठू--तेरा गुस्सा
ठहर कर नही रहता था कभी
एक जगह देर तक
अब हैं सूनी शाखें
खाली आँखें
रहीं हैं बस
आसमान को घूर
तुझसे दूर ।
झाडू लगे आँगन में
बार--बार सूखे पत्ते बिखरात
हवा का शरारती झौंका--तेरा तरीका
नहीं आता किसी खिडकी--दरवाजे से
हर चीज ठहरी है अपनी जगह
अब क्या सँवारूँ..
क्या समेटूँ ।
कुछ भी तो नहीं है करने को
फिर भी हाथ--पाँव
थक कर हैं चूर
तुझसे दूर ।
रातों--रात गुलाब की टहनियों पर
जब खिलते जाते थे
कितने फूल---मेरे गीत
दिखाती थी तुझे सुबह--सुबह
अब तो जाने कबसे
खिला नही एक भी फूल
नही निकली एक कली तक
सूना पौधा खामोश खडा है
करके जैसे कोई कसूर ।
तुझसे दूर ।
26 नवम्बर 2002
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रविवार, 14 नवंबर 2010

मान्या का जन्मदिन

बैंगलोर--14 नवम्बर


मान्या होगई चार साल की ।
बातें करती है कमाल की ।
साँसों को ताजी बयार सी ,
खुशबू है मेरे रूमाल की

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बाल-दिवस यानी 14 नवम्बर को नेहरू जी के जन्मदिन के रूप में ही जाना जाता है । पर मेरे लिये आज का दिन और भी बहुत खास दिन है । क्यों न हो आज के दिन
ही तो मान्या हमारे जीवन में आई और प्रशान्त--सुलक्षणा को पिता--माता के साथ मुझे भी एक नई पदवी मिली---दादी । यहाँ (बैंगलोर ) के सेन्ट फिलोमिना हास्पिटल में रात-भर की प्रतीक्षा के बाद एक नर्स ने कोमल और आत्मीय मुस्कराहट के सा
थ जब यह नन्ही परी मेरी गोद में दी थी तब मुझे लगा कि मैं अचानक काफी बडी और
ज्यादा खास होगई हूँ । मान्या को पाकर ही महसूस हुआ कि दादी बनने का सुख सचमुच जीवन की प्यारी और खूबसूरत उपलब्धि है । उसके लिये मैंने समय--समय पर कई कविताएं लिखी हैं जिनमें कुछ गुल्लक, पलाश व चकमक में छपीं भी हैं। इसी ब्लाग में 15 जून को प्रकाशित-- मान्या को लिखना तो देखो--कविता आप पढ ही चुके हैं । नही , तो अवश्य पढें । भाई रवि ने अपने ब्लाग -सरस पायस में भी दो कविताएं लीं हैं । उन्ही में से कुछ कविताएं आप यहाँ भी पढें और मान्या को अपना आशीर्वाद दें---

( 1 )
नाजुक चंचल है
नन्ही कोंपल है
पत्तों पर शबनम सी निर्मल
झिलमिल-झिलमिल है
फुलबगिया सी मेरी गुडिया
कोमल--कोमल है ।

रेशम सी गभुआरी अलकें
पलकें हैं पंखुडियाँ
कोई आहट सुनती है तो
झँपकाती है अँखियाँ ।
विहगों के कलरव जैसी वह
हँसती खिलखिल है ।
फुलबगिया सी ...।

किलक-किलक कर पाँव चलाती
चप्पू दोनों हाथ चलाती
पंखुडियों से होंठ खोल कर
आ.आ..ऊँ..ऊँ..ऊँ बतियाती ।
नदिया की धारा बहती ज्यों
कलकल कुलकुल है ।
फुलबगिया सी...।

नन्हे नाजुक हाथ
हथेली नरम नवेले पत्ते
शहतूती सी हैं अँगुलियाँ
गाल शहद के छत्ते ।
फूलों की टहनी पर जैसे
चहके बुलबुल है । 
फुलबगिया सी .मेरी गुड़िया 
कोमल कोमल है ।
( 2 )
मान्या होगई कितनी खब्बड.
लोहा लक्कड माटी मक्कड
रोटी बिस्किट कागज कक्कड
जो कुछ भी हाथों में आए,
सीधा मुँह में जाए ।

कितने नखरे हैं हमसे
खाती--पीती थोडा ही ।
अपने हाथों से खाना चाहे
हाथी--घोडा भी ।

पेन सम्हालो छुन्नू जी
अखबार किताब उठालो ।
अपना चश्मा ,घडी बचाना चाहो
अभी बचालो ।

लगती है हर चीज उसे तो
टॅाफी रंग-बिरंगी ।
जैसे हनुमान ने समझा
सूरज को नारंगी ।
(3)
जाग गई है नन्ही मान्या,
गहरी निंदिया सोकर ।
जैसे हवा अभी आई है,
अपनी आँखें धोकर ।

नींद होगई है पूरी
अब जीभर कर खेलेगी ।
फुर्ती से हर चीज तुम्हारे
हाथों से ले लेगी ।
(4)
डु्ड्..डू...डुड्.ड्...आहा..
होगई अपने आप खडी
हुई पहले से जरा बडी ।

रुपहली बाल बाजरा की
दूधिया दानों से है जडी
मटर की बेल सजाए खडी
श्वेत पुष्पों की जैसे लडी ।

खींचती पल्लू ,पकडे हाथ
छुडाएगी अब मेरी घडी ।
हुई पहले से जरा बड़ी ।
(5)

मान्या स्कूल चली
गुंजा सी खिली--खिली ।
सजधज दरवाजे पर
ज्यों भोर खडी उजली।

बस ढाई साल की है यह
नटखट कमाल की है यह
चंचल है मनमौजी है
अपने खयाल की है यह ।

बस्ता में भर कर सपने
मन में ले जिज्ञासाएं ।
चलती है उँगली पकडे
कल खुद खोजेगी राहें ।

जो पाठ आज सीखेगी
कल हमको सिखलाएगी
खुद अपना गीत रचेगी
अपनी लय में गाएगी ।

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

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लघुकथा --बचत

लंच-टाइम था ।स्टाफ की सभी महिलाएं चाय-नाश्ते के साथ अपने परिजनों ,रिश्तेदारों, तथा घर की बातों द्वारा अपनी ,प्रोग्रेस और ,स्टेटस ,जताने में बढ-चढ कर हिस्सा ले रही थीं ।यह समय आपस की महत्त्वपूर्ण सूचनाओं के आदान-प्रदान का होता है ।---पूनम की

बेटी हनीमून के लिये बैंकाक गई है ।अरुणा के बेटे ने इनोवा खरीद ली है ।नीतू के मिस्टर ने मैरिज-ऐनिवर्सरी पर डायमण्ड का सेट दिया है ।तो निर्मला साडी के नाम पर शिफॅान, काँजीवरम् ,या मैसूर-सिल्क से नीचे बात ही नही करती । सरोज जी सफर के लिये सेकण्ड ए.सी. या फ्लाइट से नीचे बात नही करती तो नीलम की शॅापिंग मॅाल या सुपर-मार्केट में ही हो सकती है । अगर उमा जैसी निम्न-मध्यम वर्ग की महिला कह बैठे कि ,मॅाल में चीजें मँहगी भी मिलतीं हैं और उतनी वैरायटीज भी नही मिलतीं , तो फिर नीलम शुरु होजाती है---फिर शायद तुम कभी गई ही नही हो वहाँ । सब बडे और पढे-लिखे लोग मॅाल से ही खरीददारी करते हैं ।...हर चीज ए-वन जो होती है । हाँ पैसा तो लगता है पर हम क्वालिटी के नाम पर कम्प्रोमाइज नही करते ..आज कल हजार-पाँच सौ की कीमत ही क्या है ।

उस दिन भी बहस व तनाव के साथ इसी तरह की बातें चल रहीं थीं । तभी वहाँ एक महिला आई ।कई थैलों से लदी-फदी ,पसीने से नहाई, और हाँफती हुई सी ।चेहरे से कुलीन, सुशिक्षित और सौम्य दिखती थी ।स्टाफ की महिलाएं उसे ऐसे देख ही रहीं थी जैसे वातानुकूलित डिब्बे में बैठे यात्री गीत गाकर पैसा माँगने वाले बच्चे को देखते हैं, वह बोल पडी---

नमस्ते मेम, मेरे पास आपके लायक सेवइयों, नूडल्स, पास्ता, मैक्रोनी, और पापडों की अच्छी वैराइटीज हैं।

अच्छा , दिखाओ --अरुणा जी ने उत्सुकता दिखाई तो अन्य शिक्षिकाएँ भी पैकेटों को उलट-पलट कर देखने लगीं ।

बेम्बिनो की हैं मेम, आपको पसन्द आएंगीं ---अच्छी बिक्री की सम्भावना देख कर वह महिला उत्साहित होकर बोली ।और थैले में से और सामान दिखाने लगी ।

एक-दो पैकेट सेवइयों के लेने तो थे----चल, पास्ता के भी दो पैकेट ले लूँगी --अरुणा जी ने ऐसे कहा मानो सामान लेकर वे उस महिला पर अहसान कर रहीं हों । फिर तो एक साथ कई माँगें उठी---मेरे लिये एक नूडल्स का पैकेट...मेरे लिये पापड का , और मेर लिये मैक्रोनी....।

पहले कीमत तो तय करवा लो---नीलिमा ने कहा तो महिला चतुराई से मुस्कराई---

आपसे ज्यादा थोडी लूँगी मे,म ।

फिर भी तय करना ठीक रहता है --पूनम ने समर्थन किया तो उसने सेवइयों के पैकेट उठा कर कहा---मेम रोस्टेड पैकेट तास का है और सादा पच्चीसका ..।

और, फिर भी कह रही है कि आपसे ज्यादा न लूँगी -नीलम व्यंग्य से मुस्कराई ।पूनम अनुभवी चातुर्य के बोली---मार्केट में रोस्टेड सत्ताइस का और सादा बाईस का मिल रहा है । कितने लादूँ ।

अर् रे यार ये तो बेचने वालों के हथकण्डे हैं । तुझे लेना है तो ले नही तो....।

मेम, ये सारी चीजें कम्पनी की हैं ।--महिला कुछ परास्त स्वर में बोली पर उसके आगे बोलने से पहले ही अरुणा जी ने उसे आडे हाथों लिया ---तो तुझे पता नही , कि हम हमेशा ब्राण्डेड चीजें ही खरीदते हैं हमारे घर आकर देख....।हमारे यहाँ लोकल नही चलता ।

लो यह तो शुरु होगई----सरोज नीलम के कानों में फुसफुसाई फिर जोर से बोली ---अरे जाने दे... हाँ ,बहन तू बता सही-सही दाम क्या लेगी ।या कि सारा मुनाफा हमी से कमाएगी ।

इस बात पर एक ठहाका बुलन्द हुआ ।वह महिला कुछ आहत हुई । आँखों में नमी सी आगई ।

मेम, ऐसे तो कोई भी ज्यादा नही देता । मैं ऐसे ही सामन बेचने नही निकली । मैं भी अच्छे घर की हूँ ।पर मजबूरी है । मिल बन्द होगया । एकदम से कोई काम-धन्धा नही है सो...अब एक-दो रुपया भी न मिले तो कोई काहे दर-दर भटके...।

अब काम तो सभी कर रहे हैं बहन ।-पूनम निस्संगता से बोली ।पर इतना फालतू पैसा किसके पास है कि, कही भी डालदे ।सारी दुनिया सयानी है ।

चलिये ,आपके लिये रोस्टेड अट्ठाइस का और सादा तेईस का लगा देती हूँ । ले लो मेम । बोनी हो जाएगी ।--महिला ने जैसे पूरी सामर्थ्य लगा कर आग्रह किया । हालाँकि कीमत कम करने की खींचतान उसके चेहरे पर दिख रही थी ।

हाँ...बडे कम लगा रही है ---रमा व्यंग्य भरी हँसी के साथ बोली---अरी ,सयानी बहन दूसरे लोग भी तो कुछ अक्कल रखते होंगे ...।

तुझे देना ही है तो बाजार के भाव में दे जा नही तो .....। हाल यह कि लाखों-करोडों की बातें बहसें करने वाली वे सभ्रान्त, कुलीन महिलाएं दो-तीन रुपए कम करवाने उसी तरह एकमत थीं जैसे संसद में वेतन-भत्तों के मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष एकमत हो जाता है ।

कोई बात नही मेम--पूरी तरह नाउम्मीद होने पर वह महिला अपना सामान समेट कर चली गई ।कुछ पल को वहाँ सन्नाटा सा रहा जिसे नीलम ने तोडा---

वो समझती है कि हम तो बुद्धू हैं ।जो माँगेगी दे देंगी ।

और क्या रोज का वास्ता पडता है इन चीजों से ।मार्केट में देखो एक से बढ कर एक चीज है ।

और नही तो क्या....।

सबके चेहरों पर कुछ पैसे बचा लेने का सन्तोष चिपका था ।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

एक गीत

बरसों हुए मिटे, अब
जागी कराह क्यूँ है ।
जर्जर हुए वसन में ,
पैबन्द आह क्यूँ है ।

अब भूलना ही बेहतर
अपना कि क्या पराया ।
जो भी करीब आया,
प्रतिरूप साथ लाया ।
विश्वास और छल में ,
ऐसी सलाह क्यूँ है ।
बरसों हुए......
कुछ और जो ठहरता ,
मौसम हरा-भरा सा ।
हर पेड यूँ न लगता ,
सहमा डरा-डरा सा ।
बेवक्त ही हवा की
बदली निगाह क्यूँ है ।
बरसों हुए.....
गिर गिर सम्हाला खुद को
कैसे भी जब डगर में ।
टुकडे सम्हाल मन के ,
अनजान इस शहर में ।
गुजरे भी हम जिधर से ,
यह वाह--वाह क्यूँ है ।
बरसों हुए......