रविवार, 28 अक्टूबर 2012

सबरस

( यह पोस्ट पढने से पहले---
25 अक्टूबर को सलिल जी ( चला बिहारी ब्लागर बनने  ) ने अपने ब्लाग पर ध्रुवगाथा को लेकर एक विस्तृत समीक्षा लिखी है । ऐसी समीक्षा जो एक साधारण कृति को विशिष्ट बनाती है । उसे यहाँ देना अनावश्यक ही है क्योंकि सलिल जी का ब्लाग जहाँ सुविशाल मैदान की तरह  है वही यह ब्लाग घनी बस्ती के बीच गली का एक हिस्सा है । सलिल जी द्वारा समीक्षा लिखी जाना और अपने ब्लाग पर देना दोनों बातें ही मेरे लिये हितकर हैं क्योंकि पुस्तक बहुत सारे सुधी पाठकों की जानकारी में आगई है । यहाँ ग्वालियर में तो विमोचन में सामिल हुए लोगों के अलावा किसी को अभी तक खास जानकारी नही (रुचि कहाँ से होगी )। इसमें मेरी निष्क्रियता भी एक कारण है । निस्सन्देह सलिल जी  धन्यवाद कहना उनकी सहृदयता भरी परख व संवेदना  का अवमूल्यन होगा । उसे केवल अनुभव किया जासकता है ।यहाँ यह सूचना इसलिये कि कहीं किसी कारण यदि वह समीक्षा न पढ पाए हों तो कृपया यहाँ http://chalaabihari.blogspot.in/  अवश्य पढें )
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माला जीजी जेठजी को, जो गंभीर रूप से बीमार हैं ,देखने आईं हैं । वैसे यहाँ आने के लिये उन्हें किसी खास कारण की आवश्यकता नही है । जेठानी की बडी बहन होने के साथ-साथ काफी अनुभवी व्यवहार-कुशल और दुनियादारी का ज्ञान रखतीं हैं । बेबाक बोलने के लिये जानी जाने वाली माला जीजी अब लगभग सत्तर साल की हैं । छत्तीस-सैंतीस वर्ष पहले जब मैंने उन्हें देखा था पूरे घर पर उनका वैसा ही प्रभाव था जैसा किसी सभा में मुख्य अतिथि का होता है । कानों में सोने की चेन से सम्हाले भारी-भारी झुमके झुलाती वे कोई भी बात कहतीं सब हाथ बाँधे उनके श्रोता बन खडे रहते थे । सब्जी छौंकने से लेकर त्यौहार ,विवाह और जापे की रस्मों व परम्पराओं में उनका दखल था । उन्हें किसी को भी रोकने टोकने या समझाने का पूरा अधिकार मिला हुआ था । दरअसल ऐसे लोगों को कोई अधिकार दे न दे वे खुद ही हासिल कर लेते हैं बिल्कुल निर्विरोध विजयी हुए उम्मीदवार की तरह ।       
अब उनका शरीर भले ही उतना साथ नही देता और त्वचा दुबले होने पर ढीले होगए कपडों जैसी होगई है । जीजाजी ( उनके पति) रिटायर होने के छह माह बाद ही चल बसे थे । पति का साथ छूट जाने पर वैसे ही स्त्री बिना छत वाले घर जैसी हो जाती है वह भी अगर वह निःसन्तान हो तो  मुश्किलें और भी बढ जातीं हैं । जो भी हो जीजी की आवाज में आज भी वैसी ही मजबूती ,और अभिव्यक्ति उतनी ही बहुरंगी और प्रभावशाली है । 
 क्या फर्क पडता है कि जीजी के बारे में कुछ लोग अलग तरह की बातें करतेरहते  हैं । भला पीछे बोलने वालों को कौन रोक सकता है ? वे तो दबी जुबान में यहाँ-वहाँ कोने में तम्बाकू की पीक की तरह पिचकते ही रहते हैं कि यह (माला जीजी)किसी की मीत नही । नम्बर एक की कंजूस है । दाँत से काट कर एक-एक पैसा निकालती है । मास्टर (जीजी के पति) अकूत दौलत छोड कर गया है पर मजाल है कि कोई थाह तो लेजाए । देवर-जेठ को तो पासंग पानी नही पीने देती । जो कुछ है ,अपनी बहनों और अपने भाई-भतीजों को ही देकर जाएगी । अब इन अकल के दुश्मनों से पूछो कि आदमी उसी को तो अपना धन-सर्वस्व सौंपेगा जिस पर अपनी सेवा-सुरक्षा का भरोसा किया जा सके । और भरोसा करना भी क्या कम साहस का काम है ??...
खैर वह एक अलग बात है ।  
मैंने बताया कि माला जीजी अपनी बहन (मेरी जेठानी) से मिलने व बहनोईजी को देखने आईं है । अब वे मथुरा से यहाँ तक आएं और कोई उनसे मिलने भी न जाए तो अव्यावहारिकता से अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्हें बुरा लगेगा । तुरन्त शिकायत करेंगी कि , "भैना दो कदम चल के तू  मिलने भी न आ सकै !!" सो उनके आने की खबर जैसे ही मुझे मिली ,समय निकाल कर उनसे मिलने गई ।
"अरे ,लाली आगई!"--मुझे देखते ही जीजी फुलझडी की तरह चमक उठीं । मैंने देखा ,सदा की तरह चमचमाते दाँतों का मजबूत घेरा जीजी के गालों को धँसने से बचाए है। आँखें भले ही कुछ और छोटी लग रहीं थीं पर उनमें मानो ऐक्सरे और अल्ट्रा मशीनें आज भी फिट है आदमी के अन्दर के मांस-मज्जा और हड्डियों को परखने में सक्षम ।
"आप कैसी हैं जीजी ?"
"अरे लाली कैसी का हैं ,बस दिन पूरे करनौ समझौ ।(रुआँसी होकर) जे देखौ लला की हालियत..देखी ना जा सकै। गले से कौर नीचे ना उतरै । रात के दो-दो बजे तक नींद ना आवै..। राम ने ना जाने माथे पै का लिख दीनौ है..।" --बोलते-बोलते लगा कि उनका गला बैठ गया है ।आँसू हैं कि बस निकल ही नही रहे हैं ।
"सो तो है ..। लेकिन जीजी ईश्वर की कृपा से सब ठीक होजाएगा आप चिन्ता न करें ..।"
मैंने उनके दुख को कम करने की नीयत से कहा पर वे ओज भरी आवाज में मुझे लगभग ललकारते हुए बोली--"अरे ऐसौ कहीं हो सकै लाली ,कि अपने आदमी की चिन्ता न होवै ? ऐसे में कही ध्यान भी लग सकै का ? तेरे जीजाजी (उनके पति) बीमार थे ढाई महीने बिस्तर पर टट्टी-पेसाब कराया (नाक एकदम ऊपर खींचते हुए) । दाग ना लगने दियौ बदन पर । पूरा गाँव कहै कि सेवा करौ तो माला भाभी जैसी नही तो नही । का मजाल कि उधर एक मक्खी तक झाँके । अब उन ने भी का कम सुख कराए जब तक वे ठीक रहे मेरे पाँव मैले ना होने दिये । एक दिन मायके नही जाने देते थे लाली । सब कहते कि राम-सीता जैसी जोडी है (गहरी साँस)..बजार में हर मौसम और फेसन की चीज पहले हमारे घर आती थी । पर दिन एकसे तो रहने से रहे बिटिया । अब हाथ-पाँव ना चलै किसी का सहारा तो लेना पडेगा लाली ,सो मंटू (जीजी के भाई का बेटा) और उसकी बहू को पास रखा है । इतना बडा दो मंजिला मकान और जमाना है खराब ,भैन मेरी, अकेले कोई भी आकर डुकरिया का गला दबा कर(घबराते हुए) माल-मसाला ले चम्पत होजावै कौन को पतौ चलैगौ ! पर भैना ऐसे ही कोई किसी के घर रह सके है ? कुछ तो उम्मीद दिखै । तभी तो कोई अपना घर छोडकर रहने तैयार होगा । सो एक मकान मंटू के लिये बनवा दिया है हाथरस में और पचास हज्जार की एफ.डी करा रक्खी है । मंटू कभी जे ना कह सकै कि कंजूस बुआ ने सेंतमेंत ही इतनी सेवा करवा ली । लाली , भगवान का दिया सब कुछ है बस एक सन्तान नही दी । सो अब तो एकई उम्मीद है कि बाँकेबिहारी की किरपा से मंटू की बहू की गोद हरी होजावै तो घर में किलकारियाँ गूँजै । पर आजकल की छोरियाँ हैं न ,अपने मन की करे हैं ।(आवेश के साथ) ऊपर से जे टी.वी. वालों की बेसरमी देखो, कैसी-कैसी चीजें दिखाते हैं । छोरियन कों खुल्लेआम घूमना -फिरना और अच्छा पहनना-ओढना तो खूब चइये पर ससुराल के नाम से दूर भागें हैं । घर-गिरस्ती के लच्छन तो जानै ही नाइ ।का घर सम्हालेंगी और का सेवा करेंगी । ब्याह  भी करलें पर बच्चा पैदा करने की जहमत ना उठा सके हैं । अपनों दूध ना पिला सकैं हैं । फिर भला ब्याह करने की भी जरूरत का है ।
कोई कैसी भी हो पर मंटू की बहू तो आपकी सेवा करती है न जीजी
अर् रे ...सो तो सेवा जीजान लगा कर करे है । कोई काम ना करने देवै । पर लाली वही बात है न कि  तीन साल होने को आए...
तो तीन साल कोई ज्यादा नही हैं ---मैंने अपने प्रगतिसील होने का प्रमाण देना चाहा तो वे बुरा मान गईं । जोर देकर बोलीं---नही लाली तुम जेई तो नही जानौ, बाल-बच्चा तौ सुरू में होजाए तो ठीक नही लगाओ डाक्टरों के चक्कर......।"
मुझे वहाँ से जल्दी जाना था वरना जीजी  समझ के कलश  में से  कोई और भी रस निकाल कर टेस्ट करातीं तीं...। बाकी फिर कभी ।
        

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

एक कविता अपनों के लिये


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बुझने को है अब हर शिकायत  
तेल खत्म होते दीपक जैसी
शिकायत कि ,
अब क्यों नही मिलते हो तुम
उस तरह, 
जिस तरह तय था हमारे बीच 
मिलते रहने का ,
बाँटते हुए वह सब जो 
सह्य नही होता कभी अकेले ही ।
शिकायत कि ,
तुम अब कभी-कभार 
सडक पर ही मिल गए 
परिचित की तरह निभाते हो
अपनेपन की रस्म ,
व्यस्तता के सुनिश्चित बहानों के साथ ।
साथ बैठ कर चाय पीते हुए भी 
करते हो हमेशा इधर-उधर की बातें
हवा में उडते रेशों की तरह 
नही बताते कि पिछली शाम 
तुम क्यों थे इतने परेशान 
पूछते भी नही कि क्या है वह बात जो 
चलने नही दे रही मुझे दो कदम भी आगे 
महीनों से ...। 
शिकायत कि , 
क्यों नही सोचते तुम  
मेरे लिये वैसा ही
जैसा सोचती रही हूँ मैं तुम्हारे लिये
हमेशा तुम्हें साथ रखते हुए...।
शिकायत कि ,
तुम अनजान बन रहे हो 
एक पारदर्शी दीवार से 
जो बन रही है हमारे बीच अनजाने ही ।
तुम्हें परवाह नही है जरा भी कि 
महसूस नही कर सकते हम 
एक दूसरे को छूकर ।
क्या तुम कभी समझ पाओगे कि 
यूँ शिकायतों का बुझ जाना 
स्वीकार लेना है रिश्तों की दूरियों को
जैसे स्वीकार लिया है लोगों ने 
कार्य-व्यवहार में,
भ्रष्टाचार को ।
दुखः तो यह है कि 
तुम्हें दुख नही है,
फिक्र भी नही है 
यूँ शिकायतों के मिट जाने की 

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

लोकार्पण---एक रपट


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1 अक्टूबर 2012 को 'ध्रुवगाथा' और 'अपनी खिडकी से' का लोकार्पण होना था सो होगया । इसकी सूचना तथा अखबार से लिया गया छायाचित्र मयंक ने और बाद में सुश्री कुन्दा जोगलेकर ने पहले ही फेसबुक पर डालकर मेरा काम पूरा कर दिया ।  वही सूचना यहाँ भी है ।
लोकार्पण में जो विशेष बात थी वह यह कि मुझे कुछ विशेष नही करना पडा । फोन सूचना से ही शहर के अनेक सहृदय साहित्यकार  जो थोडा बहुत मुझे जानते थे ,आगए थे । सारी व्यवस्था आदरणीया श्रीमती अन्नपूर्णा जी  ने की थी । उसमें अंजेश मित्तल जी ,भाई लोकेन्द्र सिंह (ब्लाग 'अपना पंचू' ) और मेरे पुत्रतुल्य मोनू व हनी का विशेष सहयोग रहा । पुस्तकों का लोकार्पण  डा.पूनम चन्द तिवारी( पूर्व हिन्दी विभागाध्यक्ष जी.वि.वि.) ,डा. जगदीश तोमर( वरिष्ठ साहित्यकार एवं निदेशक प्रेमचन्द सृजन-पीठ उज्जैन) डा. दिवाकर विद्यालंकार जी(प्रकाण्ड विद्वान एवं शिक्षाविद्)डा.अन्नपूर्णा भदौरिया(हिन्दी विभागाध्यक्ष जी.वि.वि.) एवं श्री प्रकाश मिश्र जी ( कविता के सशक्त हस्ताक्षर ) ने किया । इन विद्वान साहित्यकारों ने जिस तरह दोनों पुस्तकों की विस्तार से समीक्षा व प्रशंसा की , मुझे विश्वास नही हो रहा था कि यह सब मेरी रचनाओं के विषय में और मेरे लिये कह रहे हैं । डा. विद्यालंकार जी ने ध्रुवगाथा पर एक विस्तृत वक्तव्य देते हुए कहा कि ध्रुवगाथा को उन्होंने एक ही बैठक में पढ डाला । बिना रुके बिना ऊबे । जब किसी लेखक और पाठक की अनुभूतियाँ एकाकार होजातीं है उसे रचना का साधारणीकरण (जनरलाइजेशन) कहते हैं । ध्रुवगाथा पढते समय उन्हें यह तीव्रता से महसूस हुआ और कई बार उनकी आँखें नम हुईं । डा. जगदीश तोमर ने 'अपनी खिडकी से' कहानी संग्रह को एक अद्भुत और अरसे बाद सामने आया एक पठनीय कहानी-संग्रह बताया साथ ही पतंग ,आज्ञा का पालन, बिल्लू का बस्ता आदि कहानियों की विस्तार से चर्चा की । श्री प्रकाश मिश्र जी व डा. अन्नपूर्णा दीदी ने भी मुक्त-कंठ से दोनों पुस्तकों को अत्यन्त रोचक स्तरीय व स्वागत योग्य कृति बताया ।
इस बीच कुछ कमियाँ भी अखरीं । जैसे कि बैंगलोर से तीनों भाई शिकायत कर रहे थे कि कार्यक्रम  इतनी जल्दी में क्यों रखा गया कि हममें से कोई न आ सका । मेरे पास कैमरा था लेकिन पर्स से निकालने का ध्यान ही न रहा । यह फोटो मैंने कहीं से माँग कर लिया है ।  जिन्हें अध्यक्षता करनी थी वे एक हडताल में फँसे रहे और अन्त तक न आ सके । लोकार्पण के लिये रखी गई पुस्तकें रंगीन पेपर में लपेट कर रखी जातीं हैं यह मुझे मालूम ही नही था । अन्नपूर्णा दीदी ने मुझे अचरज से देखते हुए कहा -- "अरे गिरिजा , तुम्हें आज तक यह भी नही मालूम !" 
वह  तो  ऐन मौके पर भाई  लोकेन्द्र सिंह व मोनू के प्रयासों से बात सम्हाल ली गई ।और एक कमी यह भी लगी कि ग्वालियर  में हिन्दी भाषा व साहित्य जगत के  भीष्म पितामह कहे जाने वाले डा. पूनमचन्द तिवारी जी को बोलने का अवसर नही दिया गया । 'खजुराहो' के रचयिता डा. तिवारी जी नब्बे साल से ऊपर के हैं ( दाँए से दूसरे )पर उनमें जितना हिन्दी के प्रति समर्पण भाव है उतनी ही सक्रियता भी है । वे जब बोलने खडे होते हैं सबसे पहले पूछते हैं --"आपकी माँ कौन है ? हिन्दी या अंग्रेजी ?"  और फिर एक लम्बा व्याख्यान शुरु । कार्यक्रम कोई भी हो अगर तिवारी जी बोलेंगे तो देश में हिन्दी की दुर्दशा पर जरूर बोलेंगे । अब हाल यह है कि किसी कार्यक्रम में तिवारी जी आते हैं तो आयोजक पहले ही कहदेते हैं, " क्या !! तिवारी जी का भाषण ??,ना भैया भूल कर भी ऐसा न करना । आधा -पौन घंटा खा जाएंगे ।" पर मेरा विचार है कि इतने वयोवृद्ध विद्वान को हमें जरूर सुनना चाहिये । उनकी सन्तुष्टि  के लिये ही सही । वे तो कगार पर खडे हैं । आँखों में बच्चों की सी लालसा व भोलापन है । पता नही कब वह आवाज कहीं खोजाए । वे हर जगह पहुँच जाते हैं यह क्या कम है । मुझे भी आपाधापी में ख्याल न रहा वरना संचालिका कादम्बरी जी से  जी से कह ही देती । सम्मान ग्रहण करके वे जब बिना बोले चले गए तब मुझे अहसास हुआ कि शायद वे बोलने का अवसर न मिलने के कारण रुष्ट होगए । मुझे कुछ ठीक नही लगा पर कुछ लोगों ने कहा --"अरे ठीक है  सब समय से निपटगया । वरना अभी आधा पौन घंटा जाता ।"
खैर कार्यक्रम के लिये मैं जैसा सोच रही थी उससे कुछ ठीक ही होगया । 

सोमवार, 24 सितंबर 2012

'अपनी खिडकी से'--एक समीक्षक की नजर से


बड़ों के लिए किस्से बचपन के
- लोकेन्द्र सिंह
गिरिजा कुलश्रेष्ठ का पहला कहानी संकलन है 'अपनी खिड़की से'। भले ही यह उनका पहला कहानी संग्रह है लेकिन उनकी लेखनी की धमक पहले से मौजूद है साहित्यकारों के बीच। हाल ही में अपने स्थापना के तीन सौ साल पूरे करने वाली बाल जगत की पत्रिका 'चकमक' में उनकी कहानियां प्रकाशित होती रही हैं। झरोका, पाठक मंच बुलेटिन  और सोशल मीडिया भी उनकी रचनाओं को लोगों तक पहुंचा चुका है। 'अपनी खिड़की से' में १५ बाल कहानियां हैं। हालांकि परंपरागत नजरिए से ये बाल कहानियां हैं लेकिन मेरे भीतर का मन इन्हें सिर्फ बाल कहानियां मानने को तैयार नहीं। इन १५ कहानियों का जो मर्म है, आत्मा है, संदेश है वह न सिर्फ बच्चों के लिए आवश्यक है बल्कि उनसे कहीं अधिक जरूरी बड़ों के लिए है। भाग-दौड़ के जीवन में अक्सर हमारा मन इतना थक जाता है कि हम अपने बच्चों की आवाज भी नहीं सुन पाते, उनकी संवेदनाओं को महसूस करना तो दूर की बात है। ऐसे में गिरिजा कुलश्रेष्ठ की कहानियां हमें ये सोचने पर मजबूर करती हैं कि अनजाने में ही सही कहीं हम अपने लाड़ले के बचपन के साथ नाइंसाफी तो नहीं कर रहे। हालांकि 'अपनी खिड़की से' की कहानियां खुलेतौर पर बड़ों को उनकी गलतियां नहीं बतातीं लेकिन कहानियों का मर्म यही है। ये कहानियां गुदगुदाती हैं, जिज्ञासा जगाती हैं, चाव बढ़ाती हैं, मुस्कान लाती हैं और हौले से जीवन की अनमोल सीख दे जाती हैं।
संग्रह का शीर्षक पहली कहानी के शीर्षक से लिया गया है। पहली कहानी में साधारण परिवार का बालक वचन अपने घर की खिड़की से पड़ोस में रहने वाले अमीर परिवार के बालक नीलू की गतिविधियां देखकर अपना मन उदास करता रहता है। नीलू के कितने मजे हैं। उसके पास कितने खिलौने हैं। इकलौता होने के कारण मम्मी-पापा के प्रेम पर भी अकेले का अधिकार। लेकिन, जिस दिन वह मौका पाकर नीलू के घर उसके साथ खेलने जाता है और वहां उसकी जिंदगी से बावस्ता होता है तब उसे पता चलता है कि मजे तो नीलू के नहीं उसके हैं। उसके मां-पिता कहीं भी जाते हैं तो सब भाई-बहनों को लेकर जाते हैं। वह जी भरकर साइकिल चला सकता है। कपड़े मैले होने का डर नहीं, वह मैदान में खेल सकता है। लेकिन नीलू की मां तो कितनी रोक-टोक करती है। चुपके से यह कहानी बड़ों को भी समझाइश देती है कि बच्चों के मन को समझो और उन्हें तितली की तरह आजाद रहने दो। तमाम तरह की बंदिशों में बचपन को बांधकर उन पर जुल्म न किया जाए। बच्चों को महंगे खिलौनों से अधिक अपनों का स्नेह चाहिए होता है। इसलिए दुनियादारी के बीच से अपने मासूमों के लिए थोड़ा-सा वक्त तो निकाला जाए। दूसरी कहानी 'पतंग' बड़ी महत्वपूर्ण है। माता-पिता कई बार जबरन और कुतर्क के साथ अपने विचार अपने बच्चों पर थोप देते हैं। बच्चे की खुशी जाए भाड़ में। माता-पिता की यही गलतियां कई बार उन्हें और बच्चों को असहज स्थितियों में लाकर खड़ा कर देती हैं। अब इसी कहानी के पात्र सूरज को लीजिए, वह ईमानदार, सच बोलने वाला और माता-पिता का आज्ञाकारी बालक है। उसके पिता का मत है कि पतंग उड़ाने वाले लड़कों का भविष्य निन्यानवे प्रतिशत खराब है। वे सबके सामने यदाकदा घोषणा भी करते रहते हैं कि हमारा बेटा सूरज कभी पतंग नहीं उड़ाएगा। उसे तो एक अच्छा विद्यार्थी बनना है। अब भला पतंग न उड़ाने और अच्छे विद्यार्थी बनने का क्या विज्ञान है? सूरज का मन तो पतंगों के रंगीन ख्वाब सजाता है। एक दिन पतंग उड़कर खुद ही उसके करीब आ जाती है। अब वह पिता के डर से उसे छिपाता है, झूठ भी बोलता है, इस चक्कर में वह गिरकर चोटिल भी हो जाता है। हालांकि अंत में पिता को पता चल जाता है और बेटे की खुशी को भी वो समझ लेते हैं। 'रद्दी का सामान, इज्जत वाली बात, मां, बॉल की वापसी और आंगन में नीम' बेहद रोचक कहानियां हैं। ये बड़ों और छोटों के मनोविज्ञान को उकेरती हैं। बड़ों और छोटों के बीच किन बातों को लेकर उठापटक, खटपट और अनबन रहती है और इन्हें कैसे दूर करके दोनों एक-दूसरे के नजदीक आ सकते हैं, दोस्त बन सकते हैं, इन कहानियों में बेहद खूबसूरती से इसका शब्द चित्रण किया गया है।
'कोयल बोली' निश्चित ही आपको भावुक कर देगी। आपको आपका छुटपन और छुटपन के खास दोस्त की याद दिला देगी। 'बिल्लू का बस्ता' स्कूल के शुरुआती वर्षों की यादों का पिटारा खोल देगा। स्कूल जाने की कैसी-कैसी शर्तें होती थी। मां-पिता भी कितने प्रलोभन देते थे स्कूल भेजने के लिए। हमारे बस्ते में किताबें कम खिलौने ज्यादा मिला करते थे। विद्या के नाम पर किताबों में किसी पक्षी के रंगीन पंख और पौधे की पत्तियां। कंचे, डिब्बे-डिब्बियां, किताबों से काटे गए कार्टून और फूल के चित्र न जाने क्या-क्या। उस वक्त तो यही हमारे लिए कुबेर का खजाना होता था। सबसे छिपाकर रखना पड़ता था अपना खजाना।
'सूराख वाला गुब्बारा' और 'बादल कहां गया' बड़ी मजेदार कहानियां हैं। सूराख वाला गुब्बारा का आशय चंद्रमा से है। यह धरती, सूरज और चंद्रमा के संबंध में है। मनुष्य की गलतियों की वजह से 'बादल का अपहरण' हो गया है। हवा बालक बादल को अपने साथ ले गई है। उसने फिरौती के रूप में मांगे हैं पेड़, पौधे, जंगल और बगीचे। बादल चाहिए तो हमें धरती को हरी साड़ी से सुशोभित करना पड़ेगा। प्रकृति के संवद्र्धन का संदेश देती कहानी है यह।
तो मित्रो गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने अपने पहले ही कहानी संग्रह में हमें एक भरी-पूरी फुलवारी सौंपी है। जिसके १५ पुष्पों से उठती तरह-तरह की भीनी खुशबू बेहतरीन है। लेखिका प्रस्तावना में उम्मीद व्यक्त करती हैं उनकी ये बाल-कहानियां बाल पाठकों में ही नहीं वरन् प्रबुद्ध पाठकों के बीच में भी अपना स्थान बनाएंगी। मेरा मत है कि कहानियां प्रबुद्ध पाठकों द्वारा निश्चित ही सराही जाएंगी। अपने मकान की 'अपनी खिड़की से' देखेंगे तो कहीं न कहीं ये कहानियां हमें अपने आस-पास ही बिखरी नजर आएंगी।


गुरुवार, 20 सितंबर 2012

पच्चीस साल बाद


'पच्चीस साल बाद' ---फिल्मी नाम लग रहा है न ? लेकिन यह सच है कि पुस्तक 'ध्रुव-गाथा' जो कल ही प्रकाशित होकर आई है ,पच्चीस साल से पहले ही लिखी गई थी । कथ्य व शिल्प में बेहद सामान्य होते हुए भी इस दृष्टि से मान्य हो सकती है कि यह सुदूर गाँव की केवल ग्यारहवीं पास और स्वाध्याय से बी.ए. प्रथम वर्ष पढ़ती हुई महिला की रचना है । जब इसकी रचना हुई थी मैंने कविता के नाम पर केवल पंचवटी पढ़ी थी । गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ाते हुए ,बच्चों को सम्हालते हुए स्वाध्याय से ही जैसे-तैसे शिक्षा ले रही थी ऐसे में मेरा साहित्यिक ज्ञान कितना होगा । स्पष्ट है कि पाठ्यक्रम से बाहर नही । गुप्त जी की पंचवटी मेरी प्रिय पुस्तक थी (है) ध्रुवगाथा पर उसका ही प्रभाव दिखता है ।
लिखने की प्रवृत्ति तो हाईस्कूल पास करते ही दिखने लगी थी । कुछ गीत ,कहानियाँ व एक बाल-उपन्यास (रानी नील गगन की) ग्यारहवीं पास करते-करते लिख लिया था । पर जाने क्यों लगता था कि जैसा लिखा जाना चाहिये वह यह नही है । (आज भी ऐसा ही है ) इसलिये वे रचनाएं नष्ट भी होगईं । इसका एक ही कारण है कि मैं पर्याप्त साहित्य नही पढ़ पाई हूँ । अध्ययन न केवल अभिव्यक्ति के द्वार खोलता है बल्कि उसे निखारता व विविधता भी देता है । सन् 1982 में जब ध्रुवगाथा लिखना शुरु किया तब विवेक का जन्म होने को था ।
ध्रुव की कथा ने मुझे सदा प्रभावित किया । भागवत कथा में जब शास्त्री जी साश्रु इस कथा को सुनाते थे तब प्रौढ़ श्रोताओं के साथ हम बच्चे भी रोने लगते थे । समयानुसार इस कथा का बीज नमी और धूप पाकर अंकुरित हुआ और सहज ही कुछ पंक्तियाँ रच गईँ । और फिर यों ही बचकाने से प्रयास-स्वरूप ध्रुवगाथा ने एक खण्डकाव्य का रूप ले लिया ।1986 तक यह पूरा होगया । पिताजी ने शाबासी दी तो मैं खुद की नजरों में कुछ बड़ी होगई । लेकिन जब 1987 में मैंने एम.ए. के पाठ्यक्रम में 'नई कविता' पढ़ी तो मेरा उत्साह क्षीण होगया । मुझे अपनी रचना द्विवेदी-युग की शुरुआत में ही में लिखी गई कुछ ज्यादा ही साधारण रचना लगी । पर उसमें सुधार-परिष्कार का अवकाश ही नही था । अब मेरे जीवन में मयंक जी(छोटा बेटा) भी आ चुके थे और मेरे दिल-दिमाग और समय पर पूरा अधिकार जमा चुके थे । अब कहाँ किताबें और कहाँ पढ़ाई । इसके बाद यह हुआ कि मैं ध्रुवकथा को किसी बक्सा में डालकर भूल गई । सन् 2001 में बाल-साहित्य की एक कार्यशाला में लखनऊ जाना हुआ .वहाँ गाजियाबाद की सुश्री मधु बी.जोशी जी से भेंट हुई । संयोग से मैं उन्ही के कमरे में ठहरी थी । मधु दीदी बहुत ही खुशमिजाज और ज़िन्दादिल महिला हैं । उनके पास बैठ कर कोई ऊब नही सकता । बातों-बातों में मैंने अपने उस बचकाने प्रयास का उल्लेख किया तो उन्होंने हर तरह से मुझे यह मानने विवश कर दिया कि अपनी रचना को यों गुमनामी के अँधेरे में रखना ठीक नही । अपने लिये ही सही उसे प्रकाश में जरूर लाओ ।तब मैंने कुछ सुधार के साथ ध्रुवकथा को टंकित करवाया । भाषा छन्द शैली कुछ नही बदला जा सका । बदलना चाहती थी पर वह दीवारों को छत और फर्श को दीवार बनाने जैसा दुष्कर कार्य होता ।
खैर पच्चीस साल बाद आई इस रचना को कहीं कोई जगह मिलेगी ऐसा तो मैं नही मानती फिर भी बाल खण्ड-काव्य के रूप में इसे कुछ लोग पसन्द करेंगे ऐसी उम्मीद तो है । पुस्तक में से ही ध्रुव-नारद-संवाद के कुछ अंश यहाँ दे रही हूँ पढ़ कर अपनी बेबाक टिप्पणी अवश्य दें । 
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स्वर्ग धरा के बीच सुगम संचार चलाने
आते हैं जब-तब नारद संवाद बनाने ।
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वन सुषमा को देख मुग्ध हो चले आरहे
प्रभु के नही प्रकृति के मुनिवर गीत गा रहे
.........।
सहसा ठिठके ज्यों सोये बालक को देखा
उभरी माथे पर विस्मय की गहरी रेखा ।
पल्लव सा सुकुमार यहाँ क्योंकर सोया है
किसने छोड़ा , कुलभूषण किसका खोया है ?
   ..................
 "वत्स कौन हो ?और यहाँ तुम कैसे आए?
घोर विपिन में तुम क्यों जरा नही घबराए ?"
"घबराऊँगा क्यों ? प्रभु से मिलने निकला हूँ
राजपुत्र हूँ पर काँटों के बीच पला हूँ ।
यह तो आप कहें  कैसे आए हैं मुनिवर
कहीं आप ही तो हैं नही पिता परमेश्वर
माँ ने कहा रूप कोई भी रख लेते हैं
यूँ भगवान भक्त को खूब परख लेते हैं ।
यह सच है तो अपना असली रूप दिखाओ
बाहों में ले लो फिर अपने गले लगाओ ।"
......
"सदियों से मैं खोज रहा हूँ ईश्वर को ही ।
होते अगर कहीं वो ,मिल जाते मुझको ही ।
वन में भटक रहे हो ,किसने बहकाए हो ?"
मेरे मत से बेटा व्यर्थ यहाँ आए हो ।"
"अरे !आपको शायद यह भी पता नही है
तरु मेरा विश्वास , कि नाजुक लता नही है ।
जरा खींचने से जो टूट बिखर जाएगा
ध्रुव है यह ,जो ठान लिया वो कर पाएगा ।"
...........................
"भजन ?अरे बालक यह तो है मन बहलाना
इसी बहाने बुरे विचारों से बच जाना ।
कहीं नही है नाम रूप का कोई ईश्वर
सुन पुकार जो आजाए जैसे जादूगर ।"
.................
"गहन समर्पण और लगन से कितनों ने ही
ईश्वर को पाया है , बतलाया माँ ने ही ।
मुझमें लगन समर्पण भी गहरा है मुनिवर
यद्यपि मैं छोटा भी हूँ अज्ञान निरक्षर ।"......

रविवार, 16 सितंबर 2012

वे 'लक्षणा' को नही जानते ।


"ए ! ओ !! अरे भाई सुनो !!!" 
साक्षरता अभियान के दल-प्रमुख ने एक गाँव वाले को पुकारा जो एक तरफ भागता हुआ सा जारहा था । यह कुछ साल पहले अक्टूबर-नवम्बर की बात है जब प्रदेश के पूर्ण साक्षर होने के आँकडों को जुटाने के लिये शिक्षक अपने छात्रों की बजाय निरक्षरों को साक्षर बनाने गाँव-गाँव घूम रहे थे पर निरक्षर थे कि खेत-खेत ,रबी की फसल बोने तथा अपने दूसरे कामों में रमे थे । खेत बुवाई के लिये उसी तरह सज-सँवर कर तैयार थे जैसे वधू-आगमन पर घर-आँगन और द्वार चौक-साँतियों से सजा-सँवार दिये जाते है । यही कारण था कि जब मोटरसाइकिलों की फौज मोतीझील ( मोतीझील कोई झील नही ग्वालियर में ही एक जगह का नाम है ) के पास उस छोटे से गाँव में पहुँची ,उस समय गाँव में बाहर दरवाजों पर बँधे छोटे बछडों--मेमनों तथा बूढे जानवरों को छोड कोई नही दिखाई दे रहा । या किसी चबूतरा पर पडी चारपाई से कभी-कभी खाँसने की आवाज बता देती थी कि कोई बीमार लेटा है । धूप चमकीली थी लेकिन हल्की सी नरम होगई थी ।  
"यह हाल है इस देश का । लोगों को भूख नही है पर सरकार है कि मुँह में कौर ठूँसे ही जारही है । ठूँसे ही जा रही है ।"
दल-प्रमुख नरेन्द्र जी ने एक असन्तोषभरी नजर पंचायत-भवन के आसपास बिखरे घासफूस और गोबर पर डाली एक दौडते-फँलागते आदमी पर लपककर आवाज का जाल फेंका--"ओ भाई जरा बात तो सुनो ।"
दो बार तो वह जाल खाली ही आया पर तीसरी बार वह आदमी जाल में मछली की तरह फँसा चला आया ।  
"क्या है साब ?"
"अबे ! कहाँ है सब लोग?"
"हजूर ,गेहूँ चना और मटर की बुवाई हो रही है । इस समय तो कोई नही मिलेगा ।"
"अबे मिलेगा कैसे नही । कल खबर भिजवाई थी ना ? हम क्या ऐसे ही डोल रहे हैं मारे-मारे ? सरकार का हुकम है । सबको कुछ जरूरी बात समझानी है । गाँव के सरपंच को तो कम से कम होना ही था यहाँ । जा बोल सबको । औरत ,बच्चे ,बूढे ,जवान सबको बुला ला ।" 
नरेन्द्र जी ने लताडा । फिर धीरे से बोले---"साले पूरे ढोर हैं । अब क्या इन्सान बनेंगे !"
वह आदमी इतने सारे पढे-लिखे लोगों को गाँव में देखकर अपनी लताड भूल गया और आज्ञाकारी बच्चे की तरह चला गया ।
सरपंच तक सूचना पहुँची । सरपंच कामधाम छोड कर आए । 
"सरपंच जी , आपको तो पता है कि साक्षरता अभियान चल रहा है । कल खबर भी भिजवाई थी कि सब लोगों को बारह बजे पंचायत-भवन पर इकट्ठे होने को कहदें ..।"
"आपकी नाराजी वाजिब है साब लेकिन आजकल साँस लेने को भी "...
"अरे छोडो खां साब ,मुश्किल से आधा-पौन घंटा लेंगे । सबको बिस्कुट वगैरा भी दिये जाएंगे ।"
"साब ! कोई कुछ नही खा पाएगा । यह सब हमारे लिये जहर है अभी ।"--सरपंच ने हाथ जोडकर कहा । नरेन्द्र जी चौंके--"जहर !! अरे भाई हम तुम्हें जहर देंगे ? तुम हमारे भाई जैसे ही हो ।...भैया ,हम तो अमृत बाँटने आए हैं। आप लोगो को अशिक्षित होने का कितना घटा सहना पडता है ,पता है ??...चार अक्षर सीख लोगे तो काम आएंगे ..वही सिखाने आए है । सोचो कि आपके घर तक खुद पूरा स्कूल आया है....।"  
"मैं कोशिश करता हूँ साब ..लेकिन" ...।
नरेन्द्र जी पीछे से कहने लगे --"देखा ! लोग ऐसे दंगे फसाद करवाते हैं । हमारे बिस्कुटों में ही जहर बता दिया । यही बात अखबारों तक पहुँच जाए तो क्या हो...! खैर हमें क्या ! सरकार ने भेजा तो आगए । 
"सरपंच से साइन जरूर ले लेना ।" 
"यह जहर वाली बात प्रिंसिपल साहब को जरूर बताना नरेन्द्र ।"
"और क्या । कौन जानता है कि किसके मन में क्या है ।"
कुछ साथियों ने अपनापन दिखाते हुए कहा ।
"ठीक है लेकिन आप लोगों को तो बिस्कुटों में जहर होने का सन्देह नही है न ?"
नरेन्द्र जी ने मुस्कराकर साथियों को देखा तो सब हँस पडे और पारले जी का एक-एक पैकेट अपने बैग में डाल लिया ।

रविवार, 9 सितंबर 2012

दर्द को सोने न देना ।


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यह 19 वर्ष पहले की बात है । सातवीं कक्षा एक का मासूम छात्र एक दिन स्कूल में अपने शिक्षक द्वारा पूछे गए सवाल का सही उत्तर देकर आत्म-विश्वास से भर उठा था ।
सवाल गणित का था । कक्षा में केवल एक वही था जिसने सही उत्तर दिया था । शिक्षक ने मुस्करा कर शाबाशी देने की बजाय उससे कहा कि ठीक है , चलो अब सबको एक-एक थप्पड लगाओ ।
सबको यानी अपने सभी सहपाठियों को । वह सीधा-सादा छात्र लडाई-झगडे से दूर रहने व सहपाठियों को अपना दोस्त मानने के अलावा डरता भी था । पर सबसे बडी बात तो यह थी कि वह इसे बिल्कुल गलत मानता था । अगर छात्र सवाल का जबाब नही दे पाए तो खुद सर को ही उन्हें दण्ड देना चाहिये न । वह अपने सहपाठियों को भला कैसे थप्पड मारता ,सो लडखडाती सी जुबान में बोल पडा---"सर मैं कैसे.?..क्यों ....??"
"अच्छा ! कैसे....!" बच्चे के कक्षाध्यापक ने आँखें निकाल कर कहा--- "आ देख मैं बताऊँ ! ऐसे...।" और उन्होंने बच्चे के गाल पर जोर का थप्पड लगा दिया ।
बच्चे को चोट लगी । गाल पर लगी तो लगी पर मन पर जो चोट लगी उसका दर्द बहुत गहरा हुआ । 'आखिर मुझे थप्पड क्यों मारा सर ने ? मैंने तो सही जबाब दिया था । क्या सही जबाब का ऐसा इनाम मिला करता है ?
इस बात को वह वर्षों तक नही भूल पाया । शायद आज तक भी उसे मलाल है कि आखिर लोग सही उत्तर को मान क्यों नही देना जानते । क्या इससे गलत और झूठे जबाबों की राह नही खुल जाती ?
वह बच्चा कोई और नही मन्नू (विवेक) था । जो आज 30 वर्ष का होगया है ,उस दर्द को भुलाने की  नाकाम कोशिश करता हुआ । मुझे मालूम है कि यह कोशिश बेकार ही होती है । सहृदय सरल व्यक्ति संवेदना को दरकिनार करके बहुत दूर तक सहज नही रह सकता । जो झूठ बोलना नही जानता वह कोशिश भी करता है तो पकडा जाता है ।
फिर कोशिश करने की जरूरत ही क्या है । दर्द कायम  रहे और वह रचनात्मक रूप लेता रहे , सकारात्मक रूप में व्यक्त होता रहे ।
अनन्त शुभ-कामनाओं व स्नेह के साथ यह कविता भी आज मन्नू और मन्नू जैसे हर सच्चे ,ईमानदार और संवेदनशील व्यक्ति के लिये है जो कहीं न कहीं निराश होकर विचारों का प्रवाह बदलने की कोशिश करता है -----

" याद रखो ,
दर्द को आबाद रखो ।
दर्द , जो होता है सही सवाल के
गलत जबाब का  ।
दर्द जो बनावटी व्यवहार और
झूठे हिसाब का ।
दर्द ,जो सरलता पर
छल के वारों का है
दर्द ,जो आँगन में उठती दीवारों का है
दर्द ,जो अन्याय की जीत का है
दर्द ,जो 'गोंडवी' के गीत का है ।
दर्द ,जो उठता है
अखबार की सुर्खियाँ  पढने पर
दर्द ,जो होता है खुले आसमान तले
राशन के सडने पर ।
दर्द ,जो जगा देता है ,
'अलार्म की तरह ।
दर्द जो चलाए रखता है
गंतव्य तक पहुँचने के 'चार्म' की तरह ।
इस दर्द को सोने न देना ।
यह पूँजी है जीवन की ,
दौलत है दुनिया की
इसे खोने न देना ।"