गुरुवार, 29 जुलाई 2021

फुनगियों पर उतरती धूप



“मम्मी ...!”

ईशान बिस्तर में से ही चिल्लाया . उसकी आँखें बन्द थीं और सिर तक चादर ओढ़े हुए था मतलब सीधा था कि वह अभी सोना चाहता था . ईशान को बचपन से ही सुबह देर तक
जागने की आदत है .फिर चाहे उससे गरमागरम जलेबियों का नाश्ता क्यों न छूट जाए ..या रौनक पापा के साथ नहर तक सैर कर आए और उसे चिढ़ाते हुई बताए कि सैर में उसे बहुत मज़ा आया . उसने बेहद खूबसूरत सारस का जोड़ा देखा . जो जागत है सो पावत है जो सोवत है सो खोवत है ..


“जा जा अपनी कहावतों का ज्ञान कहीं और जाकर बाँट मेरी नानी ...”

दस-बारह साल से ईशान बाहर ही रहा है . . पहले बी. टेक. और एम टेक के लिये और नौकरी के कारण.. अभी हफ्ताभर पहले ही वह बैंगलोर से आया है . वहाँ एक मल्टीनेशनल कमपनी में शानदार नौकरी है...बढ़िया फ्लैट ..सारी सुविधाएं ..लेकिन करोना संक्रमण के कारण हुए ल़ॉकडाउन में कम्पनी ने घर से ही काम करने की अनुमति दे दी है . माँ ने आग्रह किया कि अपने घर आकर ही काम करले . इसी बहाने कुछ साथ रह लेगा ..कितने सालों से साथ रहने का मौका ही नहीं मिला .  

मैट्रो सिटी की जिन्दगी और कम्पनी में काम करने के समय ने ईशान की सुबह देर तक सोते रहने की आदत को और मजबूत कर दिया है . बैंगलोर में फ्लैट बन्द करने  के बाद बाहर की कोई आवाज नहीं आती . वैसे भी वहां इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनके कारण किसी को परेशानी न हो . लेकिन यहाँ तो पूरी गली जैसे हमारे घर से निकलती है . साइकिल भी निकले तो उसकी खट् भी सुनाई देती है . फिर कभी रद्दी वाला तो कभी दूध वाला ....तो कभी कोई बच्ची मीठे नीम के पत्ते माँगने आजाती है ..और पड़ोस के माधौ का बेटा तो चाहे जब शिवरात्रि के मेला से खरीद लाई पुंगी को जब तब बजाता रहता है—पीं ...पीँ ...पीँ ”

“मम्मी ,लाली आंटी से कहो कि थोड़ी देर से आया करें ..—ईशान ने आने के दूसरे ही दिन कह दिया ---हद है यार, पाँच बजे ही दरवाजा खटखटा देती हैं ..और इस डब्बू को तो मैं देखता हूँ ..खिड़की के पास खड़ा मेरे कान पर ही बजाता रहता है –पीं ..पीं..पीं .......”

 “ईशान  ,ये सब जल्दी सो जाते हैं .—माँ ने हंसकर कहा --- तू भी रात में जल्दी सो जाया करो जल्दी सोना जल्दी जागना अच्छी सेहत के लिये बहुत जरूरी है .सुबह हवा ज्यादा साफ और ठण्डी होती है ...”

“ओहो मम्मी , मुझे पता है लेकिन अच्छी सेहत के लिये नीद पूरी भी होनी चाहिये ....ईशान चादर ओढ़कर सो जाता है . माँ की बात उसके लिये वैसी ही है जैसे कोई धूप से कहे कि यहाँ मत आना ..उधर कोने में फैल जाना या कोई से कहे –-“बादल भैया  आ जाओ पेड़-पौधे तुम्हें बहुत याद कर रहे हैं ....”

.---------------------------

“मम्मी ..!”

ईशान ने दोबारा पुकारा तो गौरी उसके पास पहुँची . देखा ईशान आँखें खोलने की कोशिश करता हुआ नाराजी  बैठा था . बाहर गली में कालू एक अपरिचित बछड़े को देख जोर से भौंक रहा था मानो पूछ रहा हो –“क्यों भई कौन हो ? कहाँ के हो ?...इधर कैसे आए ?”

“अब क्या हुआ ईशान ?”

“कुछ नहीं ,मैं किसी दोस्त के घर चला जाता हूँ .”---ईशान टीशर्ट पहनते हुए कमरे से बाहर निकला . पर बाहर निकलते ही उसकी नजर नीम की शाखा पर बैठी गिलहरी पर पड़ी जो लगातार बोले जा रही थी---चुक्क..चुक्क ...जैसे कोई पत्थर तराश रहा हो .....कितनी ही चिड़ियों की चहचहाहट से पूरा पेड़ गूँज रहा था .

“

ईशान ने देखा पेड़-पौधों ,गली—चौबारों की आँखें खुल गईं .ओस में भीगी चादर को धूप ने फुनगियों पर फैला दिया वह उड़कर छत और आँगन में आ गिरी थी . मुँड़ेर पर सुनहरी धूप फैल गई थी . आसमान में तमाम पक्षी में कल्लोल करते जा रहे थे . नीम की शाखों पर दो-तीन गिलहरियाँ सरपट दौड़ती हुई छू छुआवल खेल रही थीं . ...उधर टहनियों में गौरैया फुदक रही थी ,पंडुकी शायद अपने साथी या बच्चे को पुकार रही थी और बुलबुल अपने बच्चों को चुग्गा लाई थी तो खूब छीना-झपटी और मीठी मान मनौवल चल रही थी ....

“हद है यार . इतनी सुबह हड़कम्प मचा रखा है ..इन्हें कौनसे ऑफिस जाना है जो .....इस बार ईशान के शब्दों में शिकायत थी पर भावों में कुछ और ही था . माँ ने उसके कोमल भाव को ताड़ लिया . हँसकर बोली ---

“ अब इन्हें रोक सकते हो तो रोको ...”

“ नहीं माँ इन्हें रोकने का मतलब तो सुबह को रोकना होगा ,धूप को उतरने से रोकना होगा ..और यह हमारे वश में कहाँ ...”

यह कहते हुए ईशान गिलहरी की तरफ देख मुस्करा उठा .

.


गुरुवार, 20 मई 2021

ग्यारह वर्ष का समय

19 मई  2021

शीर्षक पढ़कर आपको  शायद आचार्य शुक्ल की कहानी याद आ रही होगी लेकिन यह कहानी नहीं वह अवधि है जिसमें मैं काकाजी को याद करते-करते जिया ( माँ ) को भी खो चुकी हूँ . आज उन्हें गए पूरे ग्यारह वर्ष होगए हैं  . उनको याद करते हुए मैंने कई संस्मरण लिखे हैं . आज उनके लिये लिखी सबसे पहली रचना को पुनः प्रस्तुत कर रही हूँ .  


पिता से आखिरी संवाद
---------------------------------
(1)
आज ..अन्ततः,
तुमने अलविदा कह ही दिया ।
मेरे जनक ।
सब कहते हैं.....और ..मैं भी जानती हूँ कि,
अब कभी नहीं मिलोगे दोबारा..
लेकिन आज भी,
जबकि तुम्हारी धुँधली सी बेवस नजरें,
पुरानी सूखी लकड़ी सी दुर्बल बाँहें,
और पपड़ाए होंठ,
बुदबुदाते हुए से अन्तिम विदा लेरहे थे,
मैं थामना चाह रही थी तुम्हें,
कहना चाहती थी कि,
रुको,..काकाजी ,
अभी कुछ और रुको
शेष रह गया है अभी ,
बाहों में भर कर प्यार करना ,
अपनी उस बेटी को ,
जो कभी पगडण्डियों पर चलते हुए,
दौड़-दौड़ कर पीछा किया करती थी,
तुम्हारे साथ रह कर तुम्हारी उँगली थामने..
रास्ता छोटा हो जाता था
तुमसे गिनती सीखते या
सफेद कमलों के बीच तैरती बतखों को देखते
आज भी.....दुलार को तरसती तुम्हारी वही बेटी
अकेली खड़ी है उन्ही सूनी पथरीली राहों पर ,
अभी तक पहली कक्षा में ही,
आ ,ई , सीखती हुई ,
तलाश रही है राह से गुजरने वाले
हर चेहरे में ।
तुम्हारा ही चेहरा ।
भला ऐसे कोई जाता है
अपनी बेटी को,
सुनसान रास्ते में अकेली छोड़ कर ।

(2)
-------------------------------------------------------
यूं तो अब भौतिक रूप से,
तुम्हारे होने का अर्थ रह गया था,
साँस लेना भर एक कंकाल का
धुँधलाई सी आँखों में
तिल-तिल कर सूखना था
पीडा भरी एक नदी का ।
उतर आना था साँझ का
उदास थके डैनों पर ।
लेकिन अजीब लगता है
फूट पडना नर्मदा का
यों थार के मरुस्थल में
पूरे वेग से ।
स्वीकार्य नही है
तुम्हारा जाना
जैसे चले जाना अचानक धूप का
आँगन से, ठिठुरती सर्दी में ।
बहुत अखरता है,
यूँ किसी से कापी छुड़ा लेना
पूरा उत्तर लिखने से पहले ही ।
और बहुत नागवार गुजरता है
छीन लेना गुड़िया , कंगन ,रिबन
किसी बच्ची से
जो खरीदे थे उसने
गाँव की मंगलवारी हाट से ।

(3 

इस जीवन के नैसर्गिक अन्त के पहले ही

शायद होने लगता है,

अगले जीवन का आरम्भ ।

विस्मृत होजाती हैं दैहिक (वैचारिक भी) अनुभूतियाँ ।

फर्क नहीं पडता कि,

मल-मूत्र साफ करने वाला स्त्री है या पुरुष

बेटा है या बेटी....।

तभी तो ,

तुम होगये थे शिशु जैसे अबोध ।

और तुम्हारी बेटी

माँ जैसी विशाल ..उदार ।

एक ,पिता के पुत्रवत् होजाने..

और एक पुत्री के मातृवत् होने की यात्रा,

एक अद्भुत गाथा है,

स्रष्टि के अलौकिक स्नेह की..


रविवार, 9 मई 2021

माँ एक नदी


माँ , एक नदी
अनन्त जलराशि
ह्रदय में समेटे 
अविराम बहती है .

 धरती को अमृत से
अनवरत सींचती है
माँ जैसा भाव लिये ,
चुपचाप बहती है ।
चट्टानों, रोडों को
अनजाने मोडों को
निर्विकार सहती है ।
माँ एक नदी ,

साँस लेते हैं 
कितने ही जीवन 
उसकी गोद में 
आराम से  .
धरती का  सौन्दर्य
हराभरा रहता है  .
धारा में  पानी के साथ साथ  
विश्वास बहता है . 
हालाँकि
नदी के शान्त विस्तार में 
उभर आते हैं  जब कई टापू
 यहाँ--वहाँ
तोअविभाजित बहने का
उसका संकल्प
बिखर जाता है , जाने कहाँ
नदी बँट जाती है ,
कई धाराओं में
धाराएं होतीं जातीं हैं
क्रमशः क्षीण ,मन्थर...
सूखने लगता है
किनारों का विश्वास

लेकिन  तब भी  नहीं होती है
क्षीण , मन्थर..
उसकी सींचने की प्रवृत्ति
नहीं भूलती  नदी भी 
धरती को नम और हरी भरी 
बनाए रखने का संकल्प 
पानी की आखिरी  बूँद तक   .
माँ की ही तरह..।
--------------

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

तुम अतुलनीया

जिया की याद में --

 

नफरत को अनदेखा करके
मन में बचाए रखना
केवल स्नेह  ,
प्रतिशोध व ईर्ष्या की जगह 
हदय में निरन्तर  निस्रत
वात्सल्य ..प्रेम , ममत्व .
और ,
कटुता को भुलाकर हर जगह 
खोजना  केवल माधुर्य ---
यह तुम्हारी  ही दृष्टि थी माँ !

जब हम तुम्हारी तरह से सोचते थे
तब कितना आसान था सब कुछ ।
सब कुछ यानी --
कुछ भी मुश्किल नही था , 
कुछ भी...
जब से हम अपनी तरह सोचने लगे हैं
सन्देह व अविश्वास लग गया है हमारे साथ ।
हमें दिखते हैं केवल दोष ,अभाव
महसूस होते हैं ,
अपनों में  छल और दुराव
मन होगया है ,
गर्मियों वाले नाले की तरह ।
कद-काठी से छोटे दुशाले की तरह ।
अब समझ में आता है कि
हमारे आसपास क्यों है इतनी अशान्ति
श्रान्ति और क्लान्ति
और यह  भी कि ,
क्यों तुम्हें
अतुलनीया कहा जाता है माँ !


सोमवार, 22 मार्च 2021

नदी का द्वीप

(1984 में लिखी गई एक कविता )

अजस्र , स्रोतस्विनी के बीच

एक निर्जन द्वीप 

सिरजा गया  ,

माँ के द्वारा ही .

उद्दाम उन्मत्त प्रवाह में

खरोंचे गए कगार

वक्ष पर प्रहार

धरती के .

जमा होता रहा मलबा

जब समतल में आकर धारा

हुई मन्थरगति .

साल दर साल चढ़ती गईं परते

यों साकार हुआ 

धारा के बीचों बीच

एक द्वीप अनचाहा सा

निर्जन, शुष्क उपे,क्षित .

निरन्तर प्रवाह में 

कण कण क्षरित तन

सतत चढ़ती परतों से बोझिल मन

टूटने –जुड़ने से संत्रस्त

स्थूल अचल 

देखता है धारा की

तरल मधुर गतिशीलता

साथ रहकर भी विलग है.

स्रोतस्विनी का अंग होकर भी

अलग है .  

सोमवार, 22 फ़रवरी 2021

खुशबू के गीत


मौसम के द्वार पर ऋतुरानी आई

पलकों के छोर खोल कलियाँ मुस्काईं .

कोयल ने बाँची जो केसरिया पाती

गूँज उठी सुधियों के आँगन शहनाई .

 

 
भोर ने उतार दी कुहासे की शाल अब

गुलमोहर भर लाया मुट्ठी गुलाल अब

किंशुक ने कुंकुम की थाली सजाई .

गूँज उठी सुधियों के आँगन शहनाई .


रचने लगा शिरीष खुशबू के गीत अब

वासन्ती सरसों ,उमंगों की जीत अब

झौर झौर बौर बौर महकी अमराई

गूँज उठी सुधियों के आँगन शहनाई

 

ठूँठ हुए अन्तर में पल्लव से पीके हैं

राग ने सिखाने के ढंग नए सीखे हैं

पोर पोर पीर जागी ,अखियाँ अलसाईं

गूँज उठी सुधियों के आँगन शहनाई

 

 

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

एक पेन की तलाश

यह हास्य-व्यंगात्मक संस्मरण लगभग 25 वर्ष पहले लिखा . लिखकर भूल भी गई . आज नजर पड़ी तो पोस्ट करने का विचार आया . पात्र और स्थान का नाम परिवर्तित है . आप पढ़ें  और मुस्कराएं ) 

-------------------------------------------------------

बक्की-झक्की राधे दर्जी को जाने क्या सूझी कि सबके सामने ही पं. सूधेलाल माड़साब की तारीफ कर गया .—

“भाई कोई बुरा मानो या भला ,मास्टर हो तो पंडित सूधेलाल जैसा . कि पढ़ाए तो आवाज पूरे गाँव में गूँजे . क्या बुलन्द आवाज है भाई .जरूरत पड़ जाए है तो जन-जन तक अपना सन्देश बिना माइक के ही पहुँचा सकते हैं .और लोग भले ही बैठे-बैठे गप्प हाँकते रहें पर पंण्डित सूधेलाल को हमने कभी फालतू नही बैठे नही देखा ..”.

पुराने समय के मैट्रिक पास पंडित सूधेलाल मुखरैया जबसे सुरावली गाँव के प्राथमिक विद्यालय में आए हैं ,गाँवभर में चर्चित होगए हैं .मझोला कद , लम्बा चेहरा ,इक्का-दुक्का बालों के अलावा खोपड़ी सफाचट्ट हैं जिसकी आबरू बचाए रखने कानों के ऊपर चारों ओर दीवार बने हुए से सफेद बाल ,गेहुँआ रंग ,माथे पर रोली की बिन्दी ,चेहरे और पैरों के बीच दीवार बना हुआ सा पेट और पेट को हिलाती हुई तेज चाल ,सफेद झकाझक धोती-कुरता और उन्ही के रंग से मेल खाती भौंहें , दाढ़ी और कानों के ऊपर उगे बाल जो उनकी पचास पार आकर स्थिर सी होगई उम्र का ऐलान करते हैं .आँखें कान और दाँत आश्चर्यजनकरूप से दुरुस्तहैं .रोज कम से कम पन्द्रह किमी पैदल चलते हैं लेकिन तोंद की सेहत पर कोई असर नही है पैरों में हमेशा चप्पलें ही होती हैं जिनका पिछला एक सिरा चलते-चलते घिस गया है . नई चप्पलें पूरा घिस जाने पर ही आतीं हैं ..चलते समय धोती का एक सिरा हाथ में थामे वे चलते-चलते स्कूल में आकर साँस लेते हैं और लोगों की ओर देखते हुए जताते हैं कि उनसे पहले स्कूल में कोई नही आया .

"वाह पंडित जी ..भई नौकरी करो तो पंडिज्जी की तरह ."—लोग सुनाते हैं तो उनका निष्ठाभाव कई गुना बढ़जाता है .

"क्या करें भाई ,जिसका खा रहे हैं उसकी तो बजानी पड़ेगी .अब लोग घर के कामों में उलझे रहते हैं , टूसन-ऊसन करते हैं स्कूल में लेट आते हैं तो यह नौकरी के प्रति ....."

एम एल शर्मा समझ जाते हैं कि इशारा उन्ही की ओर है पर मुस्कराकर रह जाते हैं . पं. सूधेलाल से किसी की नही चलती. वशभर वे अपनी बात ही आगे रखते हैं जैसे कि एक दिन लता बहिन जी कक्षा में बच्चों की अधिक संख्या से परेशान थी . पहली कक्षा और उसमें साठ-पैंसठ बच्चे .किसको सम्हाले ,किसे पढ़ाए ..

"कक्षा में ज्यादा से ज्यादा चालीस बच्चे होने चाहिये .'एल टू आर' ( लर्निंग टू रीड) वाले तो बीस बच्चे ही कहते हैं .."

लता की बात सुनकर पंडितजी चुप कैसे रहते .बोले--

"लता बहनजी , जब एक चरवाहा सौ बकरियों को घेर सकता है तो क्या एक मास्टर साठ बच्चों को नही घेर सकता ..?"

"हाँ मास्टरजी ,घेर तो सकते हैं ..लेकिन सिर्फ घेर ही सकते हैं ."-–लता ने हँसकर कहा .

मास्टर साहब खाने के बेहद शौकीन हैं .उनका हाजमा किसी को भी चकित कर देने वाला है. कनागतों ( श्राद्ध-पक्ष) में वे भोजन के लिये आमन्त्रित करने वाले किसी भी व्यक्ति को निराश नही करते . बस आधा-एक घंटे के अन्तराल से हलवा-पूरी और दहीबड़ा खाकर कम से कम चार लोगों को कृतार्थ कर देते हैं .जब  

लेकिन सबसे ज्यादा चकित करता है उनका आत्मविश्वास भरी बुलन्द आवाज

सूधेलाल जी की आवाज तो उनके लिये एक वरदान है .किसी को अपनी बात कहने के लिये जोर नही देना पड़ता .यह बात अलग है कि उनके बार बार कहनेपर भी बच्चे शान्त नही होते .लोग पंडित जी की बातों का रस लेते हैं . तभी तो राधे दर्जी मुँह पर ही मास्टर जी की तारीफ कर गया . और सबकी आफत होगई .

सबका पढ़ाना बन्द . चाहे मिसरा जी हों या सरमा जी ,अपनी कक्षा में बच्चों को पढ़ाना छोड़ पं. सूधेलाल के व्याख्यान सुनने विवश होजाते हें .पंडित जी पढ़ाते हैं तो सिर्फ उनकी आवाज सुनाई देती है . पंडितजी का धाराप्रवाह ओजस्वी भाषण जो अक्सर एक ही तरह का होता सब अपना मुँह बाँधे सुनते हैं .और दबे दबे मुस्कराते हैं गाँव वाले भी आ खड़े होते हैं 

और सबसे पहले लेट आने वालों की जोरदार खबर लेते हैं –.."ओय कल्यान ..तू आज फिर लेट आया !..देखो तुम अब लेट आओगे तो जीवनभर लेट ही होते रहोगे .जिसने अनुशासन नही सीखा, वह कुछ सीख ही सकता .कुछ बन नही सकता  तुमने सुना होगा कि अनुशासन ही देश को महान बनाता है .जब अनुसासन एक देश को महान बना सकता है तो बच्चों को क्या नही बना सकता ?..विद्या मनुष्य को मनुष्य बनाती ..मानोगे तो फायदे में रहोगे नही तो हमारा क्या बिगड़ेगा . फिर वे बाहर खड़े गाँववालों की तरफ देखकर और जोश से भर जाते हैं—अगर गाँव में थानेदार आजाए तो लोग जी हजूरी करते हैं पर शिक्षक के लिये ठीक से दुआ-सलाम भी नहीं ..टेढ़ि जानि संका सब काहू...

उनके पीरियड में कोई पढ़ता नही है ,पढ़ ही नही सकता है इसलिये ज्यादातर छात्र खुश रहते हैं .कुछ नही रहते और पंडित जी से कोई पाठ पढ़ाने का आग्रह करते हैं तो पंडित जी का पारा चढ़जाता है –--"पाठ पढ़ा दीजिये ..अरे अभी क्या मैं झक मार रहा हूँ .पढ़ाने को कहो तो कोई भी पढ़ा सकता है पर मैं ऐसी बातें बता रहा हूँ जो मेरे पचास साल के अनुभवों का निचोड़ है .मैंने धूप में बाल सफेद नही किये ."

"पंडिज्जी आप हमें कोई कविता समझा दीजिये . अभी तक एक भी पाठ नही हुआ .."

"कविता पढ़ादो ..कविता पढ़कर क्या कवि बनोगे ?..कवियों को कोई दो कौड़ी नही पूछता . कविताओं में इतनी रुचि ठीक नही ..."

छात्र उनकी टालमटोलका मतलब खूब जानते हैं इसलिये अक्सर जटिल सवाल करते रहते हैं और पंडित जी के बगलें झाँकने का आनन्द लेते हैं .

बच्चे मुस्कराते हैं और दूसरे शिक्षक खीजते हैं कि कब इनका पीरियड खत्म हो और गाँव के लोग उन्हें सुनाकर कहते हैं-पंडीजी सही तो बोल रहे हैं .पंडीजी के चेहरे पर विजयी भाव चमक उठता है .

आज जब पंडितजी कक्षा में गए तो जाते ही उन्हें शिकायत मिली—-"पंडिज्जी ,किसी ने पप्पू के बस्ते में से उसका पेन निकाल लिया ."

"अच्छा !"--–पंडितजी को अचरज हुआ —" किसने ले लिया ?"

"यही तो पता नही है ."

"मैं लगाता हूँ पता . मेरी कक्षा में और चोरी !..राम राम चोरी सबसे बड़ा पाप है .कबसे नही मिल रहा ?"

"कल से ."

"तो मूरख ,तुझे कैसे पता कि स्कूल में ही खोया है ?"

"मैं यहाँ से सीधा घर गया . घर जाते ही मैंने हिन्दी का काम पूरा करने के लिये कापी पेन निकालना चाहा तो केवल कापी निकली . पेन बस्ते में था ही नही .."

"होसकता है रास्ते में गिर गया हो ."

"मेरा बस्ता फटा नही है .."

"हूँ ..समझा . देखो बच्चो ! तुम अभी छोटे हो विद्यार्थी हो अभी से ऐसे गुण मत सीखो कि लोग तुम्हारे ही नही तुम्हारे माँ-बाप के नाम पर थूकें .आज का बच्चा कल का नागरिक है .आज चोरी करेगा तो कल बैंक लूटेगा .लगता है तुम पर मेरी बातों का असर जरा भी नही हुआ .कहते हैं न कि कुत्ते की पूँछ को बारह साल दबाकर रखो( किसने दबाकर रखी )तो भी वो टेढ़ी ही निकलेगी . यह बहुत चिन्ता की बात है .देखो मेरे पास ऐसी चीज भी है जिसे मुँह में रखते ही चोर खुद चोरी कबूल लेता है पर मैं नहीं चाहता कि ऐसी चीज बच्चों को खिलाऊँ ....चलो, मैं पचास तक गिनती गिनूँगा . देखता हूँ कि कौन आता है खुद पेन लेकर ..एक दो ..तीन .दस ...बीस .तीस ..और पचास ..अरे कोई नही आया ."

"चलो सब खड़े हो जाओ...लातों के भूत बातों से नही मानते .बच्चे खड़े होगए तो पंडितजी हाथ में डण्डा घुमाते हुए सबको गहरी निगाहों से देखते हुए गुजरने लगे .पहला डण्डा पप्पू को मारने उठाया –" हाथ कर आगे .."

"यह क्या पंडिज्जी ..मेरा ही पेन खोया है और मुझे ही ...क्या मैं खुद अपना ही पेन चुराऊँगा ?"

"मेरी नजर में सब बराबर हैं .आजकल इन्सान का कोई भरोसा नही जब वह अपना अपहरण करवा सकता है ..तुमने समाचार नही पढ़ा ..तो क्या अपना पेन नही चुरा सकता ?"

कक्षा में हँसी का फव्वारा फूट पड़ा . लोग खिड़कियों से सटे हुए पंडित जी की प्रतिभा का आनन्द ले रहे थे .. 

"चुप रहो ."—पंडितजी दहाड़े—--"किसी पर भी हँसना आसान है .तुम लोग कुँए के मेंढ़क हो . कूपमण्डूक .बाहर की दुनिया देखो तो पता चले कि तुम....."

"हे भगवान. क्या हम यहीँ टर्र..टर्र करते रहेंगे ?"—बच्चों में से कोई बोला तो पंडितजी उधर मुड़े –

"अच्छा ! ठहर बिरमा के ! ..कमीन !..पेन तूने ही चुराया है ..लोगों के खेतों से गन्ने और बूट उखाड़ता है ..मूँगफलियाँ खोदकर ले जाता है ..मुझे सब पता है . पप्पू का पेन तूने ही चुराया है ."

इसके साथ ही अरुण की के कानों की जोरदार मालिश और खिंचाई हुई . जब पंडिज्जी को लगा कि कुछ ज्यादा होगया तो कुछ नर्म हुए -- "देखो बेटा ,पेन का न मिलना तुम्हारे साथ मेरी भी हार है इसलिये डरो मत जो पेन को ढूँढ़ने में सफल होगा उसे मैं परीक्षा में दस नम्बर ऊपर से दूँगा ..चलो बताओ ..होसकता है भूल से तुमने ही रख लिया हो ..कई बार मैं भी रख लेता हूँ .."

"ओ ..याद आया पंडितजी !"--पप्पू बोला 

"आपने कल मुझसे पेन लिया था फिर मैं लेना भूल गया और आप भी ..."

"हें !!.." पंडितजी ने कुरते की जेब तलाशी .एक पेन हाथ में आया तो बोल पड़े–--

"अरे हाँ ..हाँ ..मैंने कहा था न कि कभी कभी गलती होजाती है ."

"सो तो ठीक है पर मुझे दस नम्बर तो मिलेंगे ना ?"

"हाँ दूँगा तुझे बड़े-बड़े लड्डू ..नालायक ! शैतान लड़के मुझे ही उल्लू बनाते हैं .."

इसके साथ ही स्कूल में एक तेज ठहाका बुलन्द हुआ .