गुरुवार, 10 फ़रवरी 2022

मखमली आवाज के साए में

 

उतरती साँझ का उदास सा एकान्त ..पथरीले इलाके का अज़नबीपन ..सन्नाटा ..और तब उस सन्नाटे की सुर्मई परत को तोड़ती थी कहीं दूर से आती मधुर सुरमयी आवाज ," ये जिन्दगी उसी की है... ,छुप गया कोई रे ...बचपन की मुहब्बत को दिल से न भुला देना ..,मोहे भूल गए साँवरिया .." और हम मंत्रमुग्ध सुनते रहते .

यह सन् 1965-66 की बात है .एक साल पहले काकाजी का ट्रांसफर बड़बारी होगया था . बाद में पढ़ाने के लिये मुझे भी साथ लेगये थे .मेरी उम्र छह-सात वर्ष की ही थी . काकाजी  को जब तक कोई अपने जैसा नहीं मिलता था ,वे अकेले रहना ही पसन्द करते थे . बाद में उनके काम से प्रभावित होकर लोग खुद ही उनसे आकर मिलने लगे . सरपंच जी खुद उनके बड़े प्रशंसक होगए थे . खैर ..

काकाजी जब फुरसत में होते तो खूब तल्लीनता के साथ गाते थे .एक शाम काकाजी ने मुझे गाने को कहा .पता नहीं उन्होंने कब मुझे कहीं गुनगुनाते सुन लिया था या ऐसे ही  मेरी रुचि जानने के लिये कहा . पर मैंने बेझिझक गा दिया----" बतादूँ क्या लाना ,तुम लौटके आजाना ये छोटा सा नज़राना पिया याद रखोगे कि भूल जाओगे ..."

शब्दों पर मेरा ध्यान न तब था और न ही अब जबकि उनके अर्थ भी समझती हूँ . मेरे लिये एक ही और सिर्फ एक ही बात मायने रखती है- आवाज और सुरों का माधुर्य.

तब बड़ा बैट्री वाला रेडियो हमारे आँगन में चलता ही रहता था .’हमने देखी हैं उन आँखों की .’.,’.पवन दीवानी .’ तू कितनी अच्छी है . तुम्ही हो माता पिता....चला भी आ आजा’’ ..दिल अपना और प्रीत पराई . ‘मिलती है ज़िन्दगी में मुहब्बत...’ ये दिल तुम बिन कहीं .’.:छुप छुप मीरा रोए.. ‘ ओ वसन्ती ..,गोविन्दा गोपाला .. .,.बाबुल प्यारे ..पत्ता पत्ता बूटा बूटा ..’बेबी तू छोटी है ..’आ जा आ बहार..’ छोड़दे सारी दुनिया ..’उड़ती पवन के संग चलूँगी...’.दिल का खिलौना हाय....’ऐसे अनगिन गीत हैं जिन्हें सुनते दोहराते हमारा बचपन गुज़रा . लता मंगेशकर नाम मेरे अन्तर्मन में कब रच बसकर जीवन का हिस्सा बन गया पता नहीं चला . बाद में तो उनके ऐसे गीत आए कि वे अद्वितीय होगयीं है .

लता जी अब नहीं है तो विचार आया है कि उनकी मखमली आवाज़ के बिना मधुर गीत-संगीत की कल्पना नहीं की जासकती . कोई दिन नहीं गुज़रा जिस दिन उनका गीत नहीं सुना हो . गायन कि क्षेत्र में अनगिन मधुर आवाजें हैं लेकिन लता जी की आवाज की कहीं कोई बराबरी नहीं है . किसी ने पूछा कि लता जी के सबसे पसन्दीदा पाँच गीत बताओ . मैंने कहा पाँच क्या पच्चीस-पचास कहेंगे तब भी बिखरे स्वर माधुर्य को समेटना मुश्किल है. फिल्मी गीत , मीरा तुलसी सूर के भजन ..कितने अद्भुत ..मैं पसन्द के गीत गिनती हूँ और गिनती भूल जाती हूँ .

उन्ही दिनों मैंने कहा था –“काकाजी मुझे अगर भगवान मिलें तो मैं उनसे अमरफल माँगूँगी .”

“अमरफल का क्या करेगी बेटी ?”—काकाजी ने कुछ चकित होकर पूछा .

“मैं उसे लता मंगेशकर को दूँगी . “

काकाजी हँस पड़े पर वह एक बच्ची की सच्ची भावना थी . देखा जाए तो उनका भौतिक शरीर भले ही मिट गया है पर वास्तव में वे अमर हैं . उनके गीत अनन्तकाल तक हवा में संगीत भरते रहेंगे . मन को महकाते रहेंगे .  

एक गीत उनके नाम

मधुर माधुरी ,दिव्य वाणी हो तुम

शुभे शारदे हो कल्याणी हो तुम ।


शिवालय में गुंजरित वन्दन के स्वर

प्रभाती पवन की सुशीतल लहर ।

विहंगों को कलरव तुम्ही से मिला ,

है निर्झर तुम्हारे सुरों में मुखर ।

सान्ध्य--मंगल की ज्योतित कहानी हो तुम

शुभे शारदे हो कल्याणी हो तुम ।

 

कोकिला विश्व-वन की ,तुम्हारी कुहू सुन ,

विहँस खिलखिलाता है सुरभित वसन्त ।

मधुप गुनगुनाते ,विकसते हैं पल्लव

तुम्हारे सुरों से ही जागे दिगन्त

ऋचा सामवेदी सुहानी हो तुम

शुभे शारदे कल्याणी हो तुम ।

 

हिमालय में गूँजे कोई बाँसुरी

कमल--कण्ठ से जो झरे माधुरी

क्षितिज पर ज्यों प्राची की पायल बजी

अलौकिक , दिशाओं में सरगम बजी ।

युगों को धरा की निशानी हो तुम ।

शुभे शारदे हो ,कल्याणी हो तुम ।

 

तुम्हारे सुरों से है करुणा सजल ।

तुम्हारे सुरों से ही लहरें चपल ।

प्रणय-ज्योत्स्ना की सरस स्मिता ,

समर्पणमयी भक्ति पावन अमल ।

हो आराधना शुचि , शिवानी हो तुम ।

शुभे शारदे कल्याणी हो तुम । 

 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

चाँदनी वाला मोहल्ला

एक पुरानी पोस्ट फिर से 

Sunday, July 4, 2010

चाँदनी वाला मोहल्ला-----24 जून ग्वालियर
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हम जिस मोहल्ले में रहते हैं ,वह ग्वालियर की पुरानी और पिछड़ी बस्तियों में से एक है ।नाम है  ,'कोटावाला मोहल्ला'। कहते हैं कि सामने खण्डहर सी दिखने वाली हवेली कोटावाले राजा की थी ।मोहल्ले का यह नाम इसीलिये पड़ा ।इससे ज्यादा जानकारी रखने वाले लोग अब नहीं हैं ।न ही जानने की किसी को जरूरत व फुरसत है ।
मेरा भतीजा इसे--'कुत्ता वाला मोहल्ला' कहता है । जो कभी कभी सटीक लगता है ।जब यहाँ आदमियों से ज्यादा कुत्ते नजर आते हैं । काले ,भूरे,बादामी ,चितकबरे छोटे- बड़े, सीधे-लड़ाकू --सभी तरह के बहुत सारे देशी कुत्ते (विदेशियों को ऐसी आजादी कहाँ )। दिन में खूब खिलवाड़ करते है।और रात में खूब मन भर रोते हैं ।भगाओ तो भाग जाते हैं पर कुछ देर के लिये, आपको यह तसल्ली देने ही कि आपकी आज्ञा का पालन होता तो है कम-से-कम ।
पर मेरे दिमाग में इस मोहल्ले का एक नया और प्यारा सा नाम उगा है ----चाँदनी वाला मोहल्ला ।
जी नही , यह चाँदनी चाँद से उतरी किरण नही है ।और ना ही कोई रूपसी युवती ।यह तो सामने रहने वाली पारबती की डेढ-दो साल की बेटी है ,जो घर से ज्यादा गली में रहती है ।गाती, खेलती,गिरती,,रोती....।
सुबह होते ही चाँदनी अपनी कोठरी से बाहर आजाती है। दिखाने भर के लिये दूध डाली गई पतली काली कटोरी भर चाय के साथ बासी रोटी खाकर घंटों तक गली में रमक-झमक सी घूमती रहती है ।कभी वह कुत्ते के गले में बाँहें डालना चाहती है तो कभी बैठी हुई गाय की पीठ पर सवारी करने के मनसूबे बनाती है ।यही नही ,जब उसका रास्ता रोकने की हिमाकत करता कोई सांड़ खड़ा होता है, वह उसके नीचे से निकल कर ऐसे खिलखिलाती है जैसे कोई बाजी जीत गई हो ।माता-पिता काम पर जाते हैं तो क्या हुआ ,जानवर चाँदनी का पूरा खयाल रखते है ।इस मासूम परी को शब्दों में बाँधना आसान नही है ।मैंने तो बस कोशिश की है --

(1)
कुँए की मुडेर पर,
धूप के आते-आते
उतर आती है चाँदनी भी
कोठरी के क्षितिज से।
बिखर जाती है पूरी गली में ।
धूप ,जो---
उसके दूधिया दाँतों से झरती है ।
(2)
चाँदनी सुबह-सुबह,
भर जाती है मन में
नल से फूटती
जलधार की तरह
मन--- जो रातभर लगा रहता है ,
कतार में ।
खाली खडखडाते बर्तनों सा,
भरने कुछ उल्लास,ऊर्जा ।
दिन की अच्छी शुरुआत के लिये ।
(3)
भरी दोपहरी में,
चाँदनी नंगे पाँव ही
टुम्मक-टुम्मक..
चलती है बेपरवाह सी
तपती धरती पर
आखिर ,कौन है वह,
जो बिछा देता है ,
हरी घास या अपनी नरम हथेली,
उसके पाँव तले ।
(4)
दूसरे बच्चों की तरह,
उसके कपडे साफ नही हैं
बाल सुलझे सँवरे नही हैं ।
पीने-खाने को दूध-बिस्किट नही है ।
और दूसरे बच्चों की तरह ,
मचलने पर उसे
टॅाफी या खिलौने नही मिलते है।
पर दूसरे तमाम बच्चों से ज्यादा,
हँसती-खिलखिलाती और खेलती है।
वह नन्ही बच्ची---चाँदनी ।
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और अन्त में ------------
चिडियों की चहकार है चाँदनी।
ताजा अखबार है चाँदनी ।
गजक मूँगफली बेचने वाले के गले की खनक,
दूधवाले की पुकार है चाँदनी ।

पहली फुहार जैसी।
फूलों के हार जैसी ।
भर कर दुलार छूटी ,
दुद्धू की धार जैसी ।




बुधवार, 5 जनवरी 2022

अंगरेजी कैलेण्डर का आखिरी दिन –2

 उस दिन मैंने मयंक को लिखा था ---दिन है यह अविस्मरणीय , एक का आविर्भाव और दूसरे का तिरोभाव  .

यह क्या बात हुई माँ -– मयंक ने मेरे तिरोभाव शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा . शासकीय सेवा का समापन किसी का तिरोभाव कैसे हो सकता है वह भी आप जैसी महिला का जो कहीं रुकना ही नही जानती .

यह 31 दिसम्बर 2020 की बात है . मयंक के जन्मदिन का और मेरे लगभग 44 वर्ष 6 माह (विभागीय प्रशिक्षण सहित) के सेवाकाल से निवृत्ति का . मयंक ने ठीक कहा लेकिन मैंने तिरोभाव शब्द का प्रयोग उस शिक्षिका के लिये किया जिसे स्कूल की आदत होगयी थी , जिसने पढ़ने और फिर पढ़ाने के अलावा कुछ जाना सीखा ही नहीं . स्कूली जीवन की बात करूँ तो मेरा तो जन्म ही स्कूल में हुआ . ताऊजी और काकाजी (पिताजी )शिक्षक थे , शिक्षक धर्म का मनसा वाचा कर्मणा पालन करने वाले . जिया (माँ ) एक बालबाड़ी स्कूल में छोटे बच्चों को पढ़ाती थीं . जब पढ़ने के लिये काकाजी के साथ बड़बारी गयी थी तब पाँचवी पास करने तक स्कूल का एक कमरा ही हमारा घर बना रहा . सन् 1975 में ग्यारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की .जनवरी में विवाह और जून 1976 में शिक्षक-चयन परीक्षा में चयनित होकर एक वर्ष संस्थागत् प्रशिक्षण . सौ रुपए स्टाय-फण्ड के मिलते थे. 23 जुलाई 1977 को माध्यमिक विद्यालय मे नियुक्ति मिली . बच्चों का जन्म ,स्नातक ,स्नातकोत्तर ( दो विषयों में ) बच्चों की पढ़ाई , जीवन के तमाम सघर्ष विसंगतियों के बीच विद्यालय मेरे अभिभावक से रहे . अब तक का जीवन घर से ज्यादा विद्यालयों में बीता है क्योंकि छुट्टी के बाद स्कूल अक्सर मेरे साथ घर भी आता रहा है . अपने बच्चों से अधिक विद्यार्थियों का ध्यान रहा है . रिश्तेदारों से कहीं अधिक निकटता स्टाफ सदस्यों से रही है . एक वफादार हमसफर जैसी नौकरी से मुक्ति कहीं न कहीं तिरोभाव का सा अनुभव तो करवा ही रही थी . अर्द्धशती में मात्र साढ़े छह साल ही तो कम रहे . घर से स्कूल , स्कूल से घर इस रास्ते के अलावा मैंने कोई रास्ता कभी अपनाया ही नहीं ..

मेरे लिये अध्यापन मात्र नौकरी नहीं, बल्कि पूजा-आराधना जैसी रही है .पिताजी और ताऊजी से ही मैंने सीखा और सिद्धान्त बना कि मेरी नियुक्ति बच्चों को पढ़ाने के लिये हुई है .अगर मैं छात्र की जिज्ञासा शान्त नहीं कर पाती हूँ , मेरा पढ़ाया हुआ अंश छात्र आत्मसात नहीं कर पाये हैं , जो जानते हैं, उससे आगे नहीं बता पाती हूँ तो शिक्षक के रूप में मेरा होना व्यर्थ है . मेरे ये विचार व्यवहार में भी रहे इसलिये मुझे छात्रों व पालकों से भरपूर स्नेह व सम्मान मिला है . एक लम्बी अवधि तक संस्था-प्रधान भी अच्छी शिक्षिका मानते रहे हालाँकि अन्तिम कुछ वर्षों मेरा अच्छी शिक्षिका होने का गरूर खूब टूटा .  हर काम सही और नियमित करने के बावजूद मुझे अपमान का सामना करना पड़ा . दिल लगाकर छात्रों को पढ़ाने , सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी स्कूल में अतिरिक्त एक दो घंटे देकर करवाने के बाबजूद मेरे विरुद्ध हवाएं चलीं . मेरे छात्र जिला, संभाग और प्रदेश स्तर पर पुरस्कृत हो रहे हैं और अवकाश होते हुए भी आवेदन को अमान्य कर मेरा वेतन काट लिया गया है . वेतन कटना आर्थिक हानि कम मानसिक हानि अधिक रही है .हैरानी भी कि बिना अपराध बताए सजा तो किसी कानून में नहीं दी जाती . पर संस्था का कानून अलग होता है जिसे अधिकारी और उसके आगे पीछे रहने वाले लोग बनाते हैं . मेरा वेतन ऐसे ही कानून के तहत एक बार नहीं तीन तीन बार काटा गया . ऐसा क्यों हुआ , समझ में आ रहा था पर उसे दूर करे के उपाय मेरी अन्तरात्मा के विरुद्ध थे . खैर ..

मुझे जो चाहिये था वह बेहिसाब मिला . मेरे छात्र-छात्रों ने मुझे भरपूर आदर व स्नेह दिया है . आज भी दे रहे हैं . एक सच्चे सिक्षक को और क्या चाहिये .

और हाँ एक व्यक्ति के रूप में मेरा तिरोभाव कभी नहीं होसकता . मयंक ने बिल्कुल सही कहा . 

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

ग्रेगोरियन कैलेण्डर का आखिरी दिन --1






31 दिसम्बर साल का सबसे हलचल और उत्तेजना भरा दिन होता है , साथ ही एक हल्का सा मलाल भी कि कितना कुछ मुट्ठी से फिसल गया .सूखे रेत की तरह . समय के पाँव पीछे की ओर नहीं होते . वह निसंस्गता के साथ निकल जाता है . उसे रोका नहीं जा सकता पर हाथ पकड़कर कुछ पल उसके साथ बिता सकते हैं पर वह भी नहीं कर पाते और उसके गुजर जाने पर आहें भरते हैं 

इस दिन को मैं बहुत सारी बातों के लिये याद करती हूँ पर उनमें जो सबसे अनमोल और अविस्मरणीय उपलब्धि का दिन है . 31 दिसम्बर 1985 का दिन .मयंक का जन्मदिन .


1985 रात्रि के 10 बजे . कमलाराजा हॉस्पिटल ग्वालियर . कोशिशें न होती तो ये महाशय एक वर्ष बाद यानी 1986 में जन्मे होते . हुआ यह कि निर्धारित तिथि के बाद सुबह शाम , और शाम सुबह गिनते पन्द्रह दिन से भी ज्यादा होगए तो मैं डाक्टर अरोरा ,जिनकी देखरेख में शिशु का जन्म होना था, से मिली . डाक्टर बोली –“आप डेट भूल गयी हैं .” मैंने सोचा महिला अपनी चाबी ,चश्मा ,पर्स ,रुपए...या और कुछ भी भूल सकती है पर अपनी डेट कभी नहीं भूलती . डाक्टर को भी मैंने यही विश्वास दिलाया तो वे तुरन्त बोली –"तब फिर देर करना ठीक नहीं .आप एडमिट हो जाइये ." 

31 दिसम्बर की सुबह मैंने हॉस्पिटल की शरण ली . दो तीन ड्रिप चढ़ाने के बाद  असर हुआ . कुछ पीड़ा भरे घंटों के बाद कल-निनाद के साथ ही शिशु का अवतरण हुआ. पास खड़ी नर्स ने तालियाँ बजाकर कहा –--"सिर बड़ा सरदार का ..". गर्भ में ही अतिरिक्त समय बिताने के कारण महाशय इतने परिपक्व होकर आए थे कि एकदम नवजात लगे ही नहीं . नहा धोकर आराम से अंगूठा चूसकर सबको विस्मित कर रहे थे .अगूठा चूसने की आवाज सुनकर मैंने सिर घुमाकर पालने की ओर होकर देखा .हदय पुलक से भर गया . स्वस्थ सुन्दर जैसे कोई देवशिशु . इतने प्यारे और सुखद परिणाम के आगे सृजन की पीड़ा कुछ नहीं होती . ज़रूरत है एक माँ की उस पीड़ा को समझने और महत्त्व देने की . उस समय नहीं दिया जाता था पर आज दिया जा रहा है ,यह सचमुच सुखद है .

मयंक का जन्म मेरे लिये एक अनमोल उपहार से कम नहीं . मुझे याद नहीं कि उसके कारण मुझे कभी कोई व्यवधान , असुविधा या तनाव हुआ हो .मार्च 86 में जब मैं एम ए पूर्वार्द्ध की परीक्षा दे रही थी वह तीन माह का था .उसे लेकर गाँव से पैंतालीस कि मी दूर बस से मुरैना परीक्षा देने आती थी . उसे गाँव की ही एक बहिन के घर छोड़ती थीं . तीन घंटे की परीक्षावधि सहित लगभग साढ़े चार घंटे बाद आकर उसे लेती और उन जीजी के प्रति कृतज्ञता जताती पर वे उल्टे कहतीं –-अरे इससे हमारा समय बहुत खुशी में बीतता है  खेलता रहता है . ज़रा भी  परेशान नहीं करता .

एम ए उत्तरार्द्ध का आवेदन भरने के समय तक महाशय हाथ पाँव चलाना सीख गए थे .वहीं हाथ में पेन पड़ गया और गोल गोल घुमा दिया मेरी प्रीवियस की अंकसूची पर . इस तरह लिखाई का अभ्यास शुरु हुआ . उसे कभी कुछ सिखाना नहीं पड़ा . चार्ट में देख देखकर भाइयों से सुन सुनकर कब पढ़ना सीख गया पता ही न चला . तीन साल की उम्र में ही वह चॉक से फर्श पर हैण्डपम्प से पानी भरता आदमी इतनी जल्दी बनाता था कि लोग हैरत में पड़ जाते थे . प्रशान्त व विवेक की तरह ही शिक्षा के उचित अवसर और सुविधा न मिलने के बाबजूद वह भी आज जिस स्थित में हैं ,आश्वस्ति के लिये बहुत है . उसकी सोच मुझे एक ठोस ज़मीन देती है . एक माँ के लिये यह छोटी बात नहीं है .

 

गुरुवार, 14 अक्टूबर 2021

मैं बेटा नहीं ,बेटी हूँ .

 दुर्गा नवमी पर विशेष

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जब हम सिडनी में थे ,श्वेता ने कन्या-पूजन के अवसर पर आसपास की बच्चियों को बुलाया । मैंने एक बच्ची से ऐसे ही पूछा –"कैसी हो बेटा ?"

यह सामान्य औपचारिक वाक्य है जिसका उपयोग हम लोग परिचय संवाद के लिये करते हैं । अधिकांश लोग अब लड़कियों के लिये बेटा शब्द ही काम में लाते हैं । मैं स्वयं अपनी बहुओं को बेटा कहकर पुकारती हूँ । उसी आदत के चलते मैंने उस बच्ची से कहा पर वह बच्ची मानो मेरी गलती को सुधारते हुए बोली-- "मैं बेटा नहीं, बेटी हूँ ।" उसकी कोमल हँसी में आत्मविश्वास और गर्व छलक रहा था । उत्तर मेरे लिये अप्रत्याशित और न केवल दिल-दिमाग के खिड़की-दरवाजों को खोलने वाला था बल्कि उस मानसिकता पर प्रहार भी था जिसके चलते हम अनजाने ही बेटा कहकर बेटी को बेटे से पीछे या नीचे कर देते हैं । अक्सर माता पिता को कहते हुए सुना जाता है –हमने अपनी बेटी को बेटे की तरह पाला है । क्यों ? बेटी को बेटी की तरह क्यों नहीं ? बेटी का सृष्टि में जो स्थान है वह बेटे का कभी नहीं होसकता ,इसे हम क्यों भूल जाते हैं और उसे बेटे की तरह या बेटे की जगह स्थापित कर उसे न्यून बना देते हैं । इसी प्रवृत्ति के कारण बहुत सारे दैहिक और मानसिक विघटन आने वाले हैं , आ भी रहे हैं । एक अनावश्यक सी प्रतिस्पर्धा और खींचतान बढ़ रही है । जब तक स्त्री पुरुष वाले काम नहीं करती उसे कमजोर माना जाता है क्योंकि इस प्रतिस्पर्धा को जन्म ही वहाँ से शुरु होजाता है जब हम बेटी को बेटे की तरह कहकर पालते हैं ।बराबरी करना गलत नहीं है ,गलत है प्रतिस्पर्धा । प्रकृति ने ही उन्हें भिन्न बनाया है तो उस भिन्नता को स्वीकृति परस्पर कमतर दिखाने की मानसिकता क्यों ? जब बेटी को बेटी की तरह गर्व के साथ पाला जाएगा तब बेटा भी उसका सम्मान करना सीखेगा । गहराई और विस्तार से देखें तो बेटी को बेटा कहने की प्रवृत्ति एक तरह से स्त्रीत्त्व को भी चुनौती ही है ।

बेटी तुम आँगन की फुलवारी हो . धरती की हरियाली हो . जीवन का उत्सव हो . वैभव हो . तन मन की ऊर्जा हो , सृष्टि की निर्मात्री हो ,तुम्हारी हँसी का स्वर कभी मन्द न हो . तुम्हारी आँखों की चमक कभी फीकी न हो . तुम गौरव हो , सम्मान हो . प्रकृति का वरदान हो .   


गुरुवार, 16 सितंबर 2021

एक 'चकरी ' की कीमत

(कुछ संशोधन के बाद पुनः प्रकाशित)

“इतने सारे पटाखे –फुझड़ियाँ !”

सोनी पुलकित हुई बेटे सार्थक को देख रही थी . उसे बचपन से ही कपड़ों मिठाइयों से ज्यादा पटाखों का शौक रहा है . कई महीनों पहले से पैसे जोड़ जोड़कर अपने मनपसन्द पटाखे फुलझडियाँ लाता था और बड़े उत्साह से गली भर के बच्चों को दिखाकर चलाता था . अब अच्छी नौकरी है .पैसा है .. इस दीपावली पर वह तीन साल बाद घर आया है . बहुत उल्लास में है . कई तरह की मिठाइयाँ ,नए कपड़े ढेर सारे पटाखे और नई तरह की तमाम रोशनियों के डिब्बे लाया था .लक्ष्मी-पूजन के समय सार्थक थैलों में से सारा सामान निकाल रहा था . 

“अरे , चकरियों वाला एक डिब्बा कहाँ गया ? इस बार तो मैं काफी बडी ,देर तक घूमने वाली चकरियों का बड़ा डिब्बा लाया था !”

“ हे राम ,कहीँ दुकान पर ही तो नही छूट गया ? ” माँ को चिन्ता हुई . चकरी चलाना बचपन से ही उसका सबसे प्रिय खेल है .जब चकरी सुनहरी रुपहली और रंगबिरंगी किरणें बिखराती हुई घूमती थी तो उसका उल्लास देखते ही बनता था . कहता था--

“ माँ देखो ,बेशुमार किरणों के साथ चकरी पूरे आँगन में चक्कर लगाती हुई घूमती है तो लगता है जैसे यह विष्णु भगवान का चक्र है जो अँधेरे को काट रहा है । या अँधेरे की नदी में बेहद चमकीला भँवर है जो धारा को अवरुद्ध कर फैलता जा रहा है या फिर आसमान से बिछडा कोई सितारा है जो जमीन पर गिर कर आकुल हुआ घूम रहा है .”

“एक बार दुकान पर जाकर देखले बेटा ! जाने कितने का होगा.”   

सार्थक ने दो पल इधर-उधर देखा और झटके से बोला--   

“ अरे जाने दो माँ....परेशान न हो..और आजाएंगी ..”

पूजा के दिये सजाते हुए माँ का सारा ध्यान बेटे के वाक्य पर था –“जाने दो माँ ..और आ जाएंगी .”  बचपन में एक चकरी भी सार्थक के लिये खुशियों का खजाना थी . आज पूरा डिब्बा भी उसके लिये कोई मायने नही रखता . चकरी उसके पैसों की तुलना में छोटी होगई है , शायद वे बड़ी खुशियाँ भी जो छोटी छोटी चीजों से मिला करती हैं .

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शुक्रवार, 10 सितंबर 2021

मन्नू मेरा मान

( संशोधित व पुनः प्रकाशित )

9 सितम्बर 1982 , कमलाराजा चिकित्सालय (ग्वालियर) । रात्रि साढे दस बजे पीडा और प्रतीक्षा का कठिन दौर गुजर गया और दे गया एक अनौखा और प्यारा प्रतिफल ---मन्नू(विवेक) ।

मन्नू में कई सारी खूबियाँ हैं । अपने दोनों भाइयों ( बडा प्रशान्त , छोटा मयंक ) की तरह सच्चा , ईमानदार, संवेदनशील और स्नेहमय है । कार्य के प्रति गहन उत्तरदाय़ी । और माँ के लिये विशेषरूप सेसजग, चिन्तित । ये गुण तीनों को मुख्यधारा से प्रायः अलग कर देते हैं । इसलिये कभी-कभी अकेलापन भी सालता है । मन्नू में कुछ और भी बातें हैं । कुछ ऐसी कि सोचने पर मजबूर करदें और कुछ हँसने पर -भी । जब वह चलना सीख गया था तब वह अक्सर गाँव में निकल जाता था । हमारा बहुत सारा समय सिर्फ उसे तलाशते बीतता था । गाँव की महिलाएं इस प्रतीक्षा में रहतीं कि कब मन्नू उनके घर जाए और वे उसे छुपाकर मुझे खूब छकाएँ । एक दिन जब वह ढाई - तीन साल का ही होगा ,और हम गाँव में ही थे ,छत पर खडे , सूर्यास्त को देख रहे थे । पंछियों की कतारें कल्लोल करती लौट रहीं थी । मन्नू एकदम गुमसुम खडा किसी सोच में डूबा था अचानक बोला ----मम्मी , पता है , सूरज अब कहां जारहा है । मैं तो नही जानती , तू ही बता ...। मम्मी , यह धरती मोती की तरह है ,बीच में सुरंग है । मोती में जैसे धागा डालते है न वैसे ही सूरज बीच सुरंग से निकल कर सुबह दूसरी तरफ पूरब दिशा की ओर पहुँच जाता है । भई वाह -----मैं उसकी इस नई कल्पना पर कहे बिना न रह सकी । वर्षा-ऋतु में जब बिजली चमकती थी , वह कहता था----देखो बिजली उछल रही है । एकदिन मन्नू को मैंने सब्जी खरीदने भेजा । जब लौटा तो मैंने देखा कि कुछ टमाटर गले थे । और कई भिन्डी एकदम कडक । बेटा देख कर लाना चाहिये ।---मैंने समझाया तो कुछ खिन्न होकर बोला ---मम्मी, जरा सोचो कि सब लोग छाँटकर ले जाएंगे तो बेकार बचे--खुचे को कौन लेगा । इस तरह क्या उस बेचारे का नुक्सान नही होगा । जब मन्नू सातवीं कक्षा में था , उसे एक शिक्षक ने सिर्फ इस बात पर पीट दिया कि उसने अपने साथियों को चाँटा मारने से इन्कार कर दिया था । चाँटा इसलिये कि किसी को सवाल का सही उत्तर नही आया था जो अकेले मन्नू ने दिया था । उसे हफ्तों तक यह मलाल होता रहा कि सही उत्तर का इनाम उसे इतना कडवा और अन्याय पूर्ण मिला । उसका यह मलाल,-- यह कैसा इनाम , फालसे वाला , भडभूजा जैसी छोटी पर सार्थक अभिव्यक्तियों में प्रकट भी हुआ । कोई आश्चर्य नही कि संवेदनशील लोगों को पग-पग पर ऐसे अनुभव होते रहते हैं , पर वे अपने गुणों से विसंगतियों को परे धकेलकर , जिन्दगी को सरस बनाते रहते हैं । मन्नू के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है । वस्तुतः उसका ह्रदय एक कलाकार का ह्रदय है । और कलाकार भले ही सही राह दिशा न मिलने से कला को विकसित न कर पाए पर कचरे में से भी स्रजन का सामान जुटा लेता है । आज अपने दोनों भाइयों के साथ वह बैंगलुरु में इंजीनियर है । मुझसे उसकी दूरी केवल भौगोलिक ही है । सुबह-शाम उसकी आवाज घर के कोने-कोने को जगाती रहती है , हर पल उसकी याद , मन को महकाती रहती है । सचमुच मन्नू जैसा बेटा पाकर कोई भी ईश्वर और भाग्य को मानने विवश होजाएगा । -- गिरिजा कुलश्रेष्ठ मोहल्ला - कोटा वाला, खारे कुएँ के पास, ग्वालियर, मध्य प्रदेश (भारत)