रविवार, 28 अगस्त 2022

सिडनी डायरी--5

ब्ल्यू माउंटेन में एक बार फिर 
---------------------------------
पिछली बार जब हम ‘ब्ल्यू माउंटेन गए थे, तब केवल थ्री सिस्टर्स और चलते चलते एक फॉल देखकर लौट आए थे लेकिन मालूम था कि यह भ्रमण पूरे शहर में एक छोटा सा बाजार देखने जैसा है. क्योंकि ब्ल्यू माउंटेन लगभग 11400 वर्ग किमी में फैला है . इसकी लम्बाई लगभग 50-60 किमी है . इसमें ‘सीनिक वर्ल्ड’ , ‘केबल वे’ , ‘स्काई वे’ , ‘वॉक वे’ और केव्स (गुफाओं) के अलावा अनौखी शैलाकृतियों , फॉल, सघन वनों से आवृत्त पर्वतीय प्रकृति का सुरम्य संसार इतना व्यापक है कि उसे एक दिन में नहीं देखा जा सकता था .इसलिये मयंक-श्वेता ने इस बार पूरे तीन दिन के लिये बुकिंग कराली . इस तरह 19 अगस्त को मयंक ने कार की स्टेयरिंग सम्हाली और हमने अपनी सीट .

पैरामेटा से माउंटेन में हमारे गन्तव्य तक का लगभ 80 किमी का मार्ग इस बार और भी मनोरम लगा .ये सर्दियों के जाने और धीरे धीरे वसन्त के आने के दिन हैं . इसका पता पूरे रास्ते छोटे छोटे पीले फूलों के गुच्छों से लदी टहनियों और सफेद गुलाबी फूलों से भरी छोटी झाड़ियों ने दिया .. कहीं कहीं चैरी-ब्लॉसम की कलियाँ पलकें खोल मुस्कराने लगीं हैं . अनेक प्रकार के फूलों के साथ खूबसूरत चैरीब्लॉसम की बेशुमार झाड़ियाँ भी यहां-वहाँ ऋतुरानी की प्रतीक्षा में खड़ी दिखाई दे रही हैं कि वह आए और हमारी टहनियों को ढेर सारे गुलाबी ,सफेद फूलों से भरदे .श्वेता ने बताया कि वसन्त में सड़क के दोनों ओर वीरान से खड़े सारे पेड़ लाल-गुलाबी फूलों से भर जाते हैं .

चैरी ब्लॉसम फूल जो कुछ दिनों बाद
पूरी वादी में छा जाएंगे  

 बीच में कुछ देर ‘dolly's Donuts’ पर रुके . यह ग्लेंब्रुक टाउनशिप के पास एक फेमस कॉफी शॉप और रेस्टोरेंट है . यहाँ के ये डोनट्स् (स्वीट-स्नैक्स) काफी पसन्द किये जाते हैं . हमने कॉफी के साथ कुछ ‘डोनट्स’ खरीदे . बच्चे मिठाई से अधिक डोनट्स पसन्द करते हैं .

“मम्मी देखना नदी आनेवाली है . ”- वहाँ से कुछ दूर बढ़ने पर मयंक ने बताया . उसे मालूम है कि मुझे समुद्र की अपेक्षा .नदियाँ , विशेषकर कल कल बहती नदियाँ देखना बड़ा अच्छा लगता है . नदी किनारों के बन्धनों के बीच भी उन्मुक्त बहती है , लम्बी यात्रा में भी जहाँ चट्टानें मिलीं नहीं कि पिता पर्वत की गोद की अनुभूति पाकर बचपन कल कल ध्वनि में खिलखिला उठता है .उसके हृदय में धरती को सींचते चलने की चाह होती है , उसके सपनों में हरियाली लहलहाती है ..सतत प्रवाहित..उर्वरा , कितने ही प्राणियों ,वनस्पतियों को पालने का हौसला ..नदी की प्रकृति के साथ एक आत्मीयता है .समुद्र जैसी अपार गहन गंभीरता व विशालता मेरी सीमित सोच के लिये एक पहेली ही है .उसकी प्रकृति और गतिविधियाँ कल्पना से परे है . 

खैर..जब नदी की बात चल पड़ी तो मैंने उस नदी के बारे में और जानने साथ कुछ जानकारियाँ भी हासिल करने की कोशिश की  .जैसे नेपियन नदी का मूल नाम Yandhai (Dhruk) है .इसे नेपियन नाम ब्रिटिश राजनेता और उपनिवेश प्रशासक Evav Nepean के सम्मान में सन् 1789 ई. में दिया गया . यह नदी न्यू साउथ वेल्स की दक्षिणी उच्चभूमि की Mittagong range से निकल कर Grose river  के साथ मिलती है तब Hawkesbury river बन जाती है . लगभग 178 किमी का सफर पूरा कर Broken Bay में मिल जाती है अन्ततः ‘तस्मान’ सागर में . यह एक सदानीरा नदी है और पेयजल का सबसे बड़ा साधन .

नेपियन -हॉक्सबरी नदी ( चित्र गूगल से साभार)

नेपियन नदी के बाद धरातल की ऊँचाई बढ़ती जाती है .रोचक बात है कि ऊंची नीची सड़क पर झूलते हुए पता नहीं चलता कि हम 1100 मीटर ऊँची पहाड़ कही जाने वाली जगह पर पहुँच गए है

ब्ल्यू माउंटेन नाम की सार्थकता

-------------------------------------

आवास जहाँ हम ठहरे

मैंने पढ़ा था कि सन् 1788 ई. में आर्थर फिलिप द्वारा इस क्षेत्र का नाम कार्मार्थन और लैंसडाउन हिल्स रखा गया था। कार्मार्थन पहाड़ियाँ क्षेत्र के उत्तर में थी और लैंसडाउन पहाड़ियाँ दक्षिण में लेकिन पूरी पर्वत श्रंखला में यूकेलिप्टस के पेड़ अधिकता में हैं . इस पेड़ की पत्तियाँ दूसरे पेड़ों जैसी हरी न होकर हल्की नीलिमायुक्त होती हैं जो दूर से नीले रंग का आभास देती हैं .विज्ञान की भाषा में पेड़ों द्वारा बड़ी मात्रा में उत्सर्जित होने वाले वाष्पशील ‘टेरपेनोइड्स’ के कारण किरणों का बिखराव होता है इस प्रकार नीली धुंध बनती है जिसके लिए पहाड़ों का नाम ब्ल्यूमाउंटेन रखा गया . हमारे यहाँ भी तमिलनाडु में स्थित पर्वत श्रंखला का नाम 'नीलगिरि की पहाड़ियाँ' है ,जो यूकेलिप्टस ( नीलगिरि )के पेड़ों से ढँकी हुई हैं . 

थ्री सिस्टर्स में  कई जगह  ऐसे बोर्ड लगे हैं  .

जिस समय हम कटुम्बा टाउन में पहुँचे , दोपहर के 12--12.30 का समय था . इस बार हमारा विचार नीच उतरकर 'थ्री सिस्टर्स' वाली पहाड़ियों तक पहुँचने का था .पहले जब आए थे, सारा परिदृश्य ऊपर से ही देखकर चले गए थे . 'थ्री सिस्टर्स' तक पहुँचने के लिये यूकेलिप्टस और दूसरे तमाम तरह के पेड़ों से घिरा सुन्दर ट्रैक है . लेकिन उन तीन पहाड़ियों से कुछ ही दूर पहले रास्ता बन्द कर दिया गया है . इसलिये हमें बीच से ही लौटना पड़ा .लौटते हुए रास्ते में ‘वूलवर्थ’ से दूध और कुछ ज़रूरी सामान लिया और पहले अपने गन्तव्य पर पहुँचे जहाँ हमें दो रातें बितानी थीं . यह कटुम्बा से लगभग 12 मिनट की दूरी पर Blackheth  village में था . यहीं मैंने जाना कि 'विलेज' का मतलब हर जगह 'गाँव' नहीं होता . जैसे कॉटेज या कुटीर का मतलब छप्पर या झोपड़ी नहीं होता . चारों ओर ऊँचे अनाम वृक्षों के बीच सुन्दर सर्वसुविधायुक्त आवास , जिसमें दो कमरे ,हॉल किचन दो टॉयलेट्स यानी 'टू बी एच' के फ्लैट जैसा ही . साथ वाले पोर्शन में शीशे के पार एक बुजुर्ग दिखे जो किसी विचार में डूबे से बैठे थे . सामने कु्र्सी पर एक हमउम्र महिला . ये मकान मालिक होंगे हमने सोचा . उनकी नीली कार बाहर ही रखी थी . 

बाहर पेड़ों पर शाम उतरने लगी थी . चिड़ियों के कलरव से पेड़ ही नहीं पूरा आसमान गूँज रहा था . शायद यह घर बच्चों के पास लौटने की खुशी होती है . उधर पड़ोस के घर से एक डॉगी महाशय यहाँ की परम्परा ( Don't interfere in others) को तोड़ते हुए और अपनी सभ्य स्वामिनी की समझाइश को दरकिनार कर बाउण्ड्री से ऊपर सिर उठाकर जब तब हमसे पता पूछ लेते थे कि कौन हो ? कहाँ से आए हो ?  मकान के चारों ओर आकाश को ताकते ऊँचे पेड़ थे . सूरज जैसे ही यूकेलिप्टस के झुरमुट के पीछे अदृश्य हुआ कि सर्दी ने बड़ी सख्ती से हमें अन्दर जाने को कह दिया . अन्दर आकर मैंने देखा वे सज्जन अभी तक उसी मुद्रा में बैठे थे . वहाँ कुछ मकानों के बाद ही चारों ओर जंगल का एहसास होता है . लाइट केवल घरों और बाजार में होती है .इसलिये दिन की अपेक्षा रात कुछ ज्यादा ही सुनसान और सन्नाटे भरी लगती है . वहाँ स्ट्रीट लाइट नही थी . दिन की पलकें मुँदते ही उजाला सड़कों पर केवल गाड़ियों का और घरों में बिजली का होता है . बहुत दिनों बाद हमने आसमान को तारों से भरा देखा . जैसा हम केवल अपने गाँव में देखा करते थे . 

रात्रि का भोजन हमने घर से बनाकर लाई मिक्स सब्जी और पराँठों और ओवन में पकाए शाकाहारी ‘बार्बीक्यू के साथ किया . बगल वाले पोर्शन में शीशे के पीछे अब पर्दा लग गया था .रात में सर्दी बहुत थी पर विद्युत-प्रवाह से कुनकुने गरम हुए बिस्तर में काफी अच्छी नींद आई . सुबह बाहर घास और कारों पर जमे हिमकणों से पता चला कि रात में तापमान कितना नीचे चला गया था . हवा में बर्फीली छुअन थी . .सुबह हवा तेज व नुकीली थी पर पेड़ों की फुनगियों से उतरती धूप सुबह को सुहानी बना रही थीं .चिड़ियाँ चहचहाकर धूप का उत्सव मना रही थीं ..घास के मैदान में अब धूप की चिड़िया नीचे उतर आई थी और घास पर बिखरे मोती चुगने लगी थी .....अगले वृत्तान्त में भी जारी .......



    

रविवार, 7 अगस्त 2022

और कितनी आजादी ?

 

अभी एक बाल पत्रिका के सम्पादकीय में एक प्रसंग है कि किसी स्कूल में आजादी के अमृतमहोत्सव में अध्यक्ष बच्चों को बताते हैं कि हमारे देश को आज़ाद हुए 75 वर्ष हो चुके हैं लेकिन आजादी अधूरी है . असली आजादी मिलनी अभी बाकी है . इस तरह के रटे रटाए भाषण मंचों पर अक्सर सुनने मिल जाते हैं .वे तो केवल रटा हुआ भाषण पढ़ते हैं ,लेकिन हमारे देश में कुछ बहुत ज्यादा पढ़े लिखे लोगों का भी यही मानना है कि हम पूरी तरह आजाद नहीं हैं . मैं चकित हूँ . और कितनी आजादी चाहिये ? 

देश में आप जहाँ चाहे आ जा सकते हैं , रह सकते हैं .जाति धर्म के आधार पर कोई भेद या दबाब नहीं . आप किसी भी अव्यवस्था या परेशानी के लिये शिकायत कर सकते हैं . आपको अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता मिली हुई है . सच कहूँ तो कुछ अधिक मिली है . कई बार तो अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता नौसिखिया के हाथ में पिस्तौल थमा देने जैसी सिद्ध होती है . 

लेकिन हमारे देश में तो आजादी इससे कहीँ बहुत आगे ले रखी है लोगों ने .संसद से लेकर सड़क तक और नेताओं से लेकर गली मोहल्लों के लोग तक किसी भी ज़रूरी/गैरज़रूरी मुद्दे ले सड़क घेर कर बैठ जाते हैं ,चाहे यातायात बाधित होता रहे . अपनी सुविधा के लिये सरेआम नियम तोड़ते हैं .ज़रा सी व्यक्तिगत असुविधा पर पूरे देश को ही कोसना शुरु कर देते हैं . कानून का गलत लाभ उठाते हैं . धर्म और जाति के नाम पर अफवाहें व विध्वंस फैलाते हैं . विरोधप्रदर्शन के लिये गाड़ियाँ व ट्रेन रोक ही नहीं लेते उन्हें जला भी देते हैं , देश विरोधी बातें ही नहीं करते ,खुले आम देश के टुकड़े होने का ऐलान भी करते हैं , दूसरे देश का झण्डा लेकर जिन्दाबाद के नारे लगा लेते हैं , धर्म विषयक आपत्तिजनक बातें करके , निराधार अफवाहें फैलाकर  समाज में अशान्ति फैलाते हैं . डाक्टर ,पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों तक को पीट लेते हैं , फेसबुक ट्विटर पर अपनी चाहे जैसी भड़ास निकालते रहते हैं . अपना काम छोड़कर महीनों तक आन्दोलन करने का समय और अधिकार है आपके पास , चर्चित होने के लिये मर्यादा विरुद्ध लिखने बोलने, यहाँ तक कि निर्लज्जता के साथ निर्वस्त्र प्रदर्शन की आजादी तक आपके पास है भला और कितनी आजादी चाहिये ? 

आजादी को अधूरी कहने वाले लोगों ने कभी बैठकर सोचा है कि जिसे वे अधूरी आजादी कहते हैं वह आजादी मंच पर रटे रटाए भाषण देकर कोरे कागज काले करके नहीं मिली थी . आजादी कोई पेड़ में पका फल नहीं थी कि टहनी हिलाई और टप्प से झोली में आ गिरी . उसे पाने के लिये लगभग दो सौ साल देश के लाखों लोगों का खून बहा था . हजारों ने हँसते हँसते प्राणों की बलि दी थी . असंख्य वीरों ने जीवन के सारे सुख त्याग दिये थे और काँटों की राह पर चल पड़े थे . और महीनों ,सालों तक आजादी की आग सीने में धधकाए झुलसते रहे थे . पर उन्हें परवाह थी केवल आजादी की क्योंकि वे अपने लिये नहीं , देश के लिये लड़े थे क्योंकि वे देशभक्त थे . खुद से ज्यादा देश के लिये सोचते थे .प्राणपण से लड़े थे ताकि देश को विदेशी शिकंजे से मुक्ति मिले . ऐसी आजादी को अधूरी आजादी कहना , क्रान्तिकारी वीरों का इससे अधिक अपमान और क्या होगा . वास्तव में अधूरे तो वे सपने हैं जो क्रान्तिकारियों ने आजाद देश के लिये देखे थे .   

वास्तव में आजादी की कीमत वह कभी नहीं समझ सकता जो आजादी के इतिहास को , देशभक्त वीरों की विकलता ,अंगरेजों के अत्याचारों के विरोध और देश के लिये उनकी चिन्ता को अनुभव करते हुए नहीं पढ़ता . आजादी का पर्व अव्यवस्थाओं को गाने का नहीं ,देश के वीरों ,जाँबाज़ों को याद करने का है, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का और उनके देखे सपनों को पूरा करने का संकल्प लेने का है . स्वतन्त्रता संग्राम का इतिहास पढ़ना सुनना, वीरों के शौर्य व शहादत को याद करना ,समाज और देश के प्रति अपने दायित्त्व समझना ..ये ही बातें हैं जो हमारे राष्ट्रीय पर्व हमें याद दिलाते हैं . और इसे याद रखने पर ही हम आजादी का महत्त्व न केवल समझ सकते हैं बल्कि उसे बनाए व बचाए भी रख सकते हैं . इसके लिये आज देश में और खासतौर पर राजनीति में देशभक्त नौजवानों की ज़रूरत है . कुछ लोग देशभक्ति शब्द का मज़ाक उड़ाते हैं उसे आडम्बर कहते हैं .पर देशभक्ति की वह उत्कट भावना ही थी जिसके कारण वीरों ने त्याग और बलिदान किया , हमें आजादी मिली . अपने देश के प्रति प्रेम और कर्त्तव्य-निष्ठा के कारण ही हमारे सेना के जवान दुर्गम पहाड़ों में साहस के साथ डँटे रहते हैं . सच्ची देशभक्ति ही हमें ईमानदारी से देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करने प्रेरित करती है .

इसलिये आजादी के पर्व पर हम शहीदों को याद करते हुए , उनके द्वारा सौंपी आजादी को एक अनमोल उपहार समझें  कीमत समझते हुए उसे बचाए रखने का प्रण करते हुए पर्व मनाएं . वरना आजादी को अधूरी कहते कहते यह होगा कि “आधी छोड़ पूरी को धावे , वह भी आधी हाथ से जावे .” जय हिन्द ,जय हिन्द की सेना .

मंगलवार, 26 जुलाई 2022

'मूल्यहीन' ( बहुमूल्य) उपहार और खुशियाँ

 ऋचा बाजार से लौटी तो तमाम सामान के साथ एक बहुत सुन्दर बार्बी डॉल भी थी .

मैंने पूछा “–यह गुड़िया किसलिये ?”

“भूल गईँ आप , आज शाम को संदीप ने बुलाया है न . वे लोग जब हमारे यहाँ आए थे किंशू के लिये कार लाए थे . मैंने सोचा उसकी बेटी के लिये भी कुछ ले चलूँ


. बच्चियों को डौल सबसे ज्यादा पसन्द होती है ?”

सन्दीप अमन का दोस्त है . वह भी एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में इंजीनियर है . घर में पत्नी दिशा और एक पाँच साल की बेटी है .शान्वी बार्बी डॉल पाकर खुशी से चहकी—"थैंक्यू आंटी .”

और फिर वह अपनी उस नई डौल से खेलने लगी . नई इसलिये कहा कि उसके पास ऐसी ही सुन्दर और मँहगी लगभग पच्चीस-तीस बार्बी डौल पहले से थीं , जो उसके खिलौने वाले कॉर्नर में बहुत ही अस्तव्यस्त तरीके से पड़ी थीं . किसी के बाल बुरी तरह बिखरे थे किसी का टॉप गायब तो किसी का स्कर्ट . किसी के कपड़े बहुत घिस पिट गए थे जैसे शान्वी का अब उनसे कोई वास्ता नहीं था . 

“इतनी सारी डौल्स ?” –-मैंने बिखरी पड़ी डौल्स को समेटते हुए कहा . मेरा विस्मय स्वाभाविक था . एक तो ये डौल मँहगी होती हैं , फिर इतनी सारी अनावश्यक भी हैं . बच्ची कितनी गुड़ियों से खेलेगी उसके पास और भी बहुत सारे खिलौने हैं .. दिशा हँसते हुए बोली --–“ आंटी ये हमने खरीदी नहीं हैं . कुछ इसके बर्थ डे पर गिफ्ट में मिलीं और कुछ किसी के बर्थडे पर रिटर्न गिफ्ट में मिली .”

“पर सारे गिफ्ट उसे देते भी गए ?” मेरा विचार है कि खाना उतना ही लेना चाहिये जितनी भूख हो . इसी तरह बच्चों के पास खेलने के लिये खिलौनों के भी अधिक विकल्प नहीं होने चाहिये . ज़रूरत से अधिक चीजें और उन्हें चुनने के विकल्प खुशी की बजाय खुशी में व्यवधान बनते है .  

“ क्या करें आंटी ?”--–सन्दीप मेरे सिद्धान्त को एक तरह से नकारकर बोला –--"  गिफ्ट को शान्वी जब तक खोल नहीं लेती रो रोकर बुरा हाल कर लेती है . हैं तो सब उसी के लिये ..हमने जिस तंगी में बचपन जिया है ,अपनी बेटी को नहीं जीने देंगे . अब गिफ्ट उससे बड़े तो नहीं हैं न ?”

आज युवावर्ग जिस विचारों के साथ जीवन को स्वरूप दे रहा है , उसके अनुसार सन्दीप का उत्तर अप्रत्याशित तो नहीं था क्योंकि यह ‘यूज एण्ड थ्रो’ का युग है . आज साधन प्रमुख हैं साध्य नहीं . लेकिन यह सोचनीय है . वे नहीं समझ रहे कि इस तरह वे बच्चों को असहनशील , एकाकी और कमजोर बना रहे हैं .

सवाल है कि क्या खुशी मंहगे और इतने सारे खिलौनों से मिलती है ? क्या खुशी के लिये साधन का इतना बहुमूल्य और बहुल होना आवश्यक है ?

मुझे याद आता है कि हमें बचपन में बाजार से खरीदा हुआ शायद ही कोई खिलौना मिला हो .पर क्या खुशियों की हमारे पास कोई  कमी थी ? बबूल के काँटे में कोई पत्ता फँसाकर बनाई गई ‘फिरकनी’ ..(चकरी)  ‘किल किल काँटे’ , ‘पँचगुट्टे’ ,चंगा पै ,माटी के दियों की बनी तराजू , और घर में ही कपड़े से बनी पुत्तो ( पुतरिया, गुड़िया ) आदि .. सबसे हमें इतना ही आनन्द , बल्कि इससे कहीं अधिक आनन्द मिलता था .

सादा कपड़े की वह पुतरिया मेरे लिये दुनिया का सबसे मँहगा खिलौना थी क्योंकि हमारे पास उसका कोई विकल्प नहीं था . मैने कहा न कि विकल्प आपको किसी एक चीज पर पूरा ध्यान नहीं देने देते .  

आज लोगों के पास पैसा है वे अपने बच्चों के लिये बहुत सारी मँहगी चीजें खरीदकर अपना प्यार जताते हैं . लेकिन बहुलता के कारण साधन मँहगे होकर भी मूल्यहीन और प्रभावहीन सिद्ध होते हैं जैसे पेट बहुत भरा होने पर स्वादिष्ट व्यंजन .

शान्वी ने तो थोड़ी देर बाद ही नई डौल को भी एक तरफ डाल दिया और दूसरे तमाम खिलौनों को उठाने पटकने लगी . फिर न जाने किस बात पर रोने भी लगी ...सन्दीप और दिशा उसे मनाने की कोशिश में कह रहे थे –बेबी डोन्ट क्राइ डियर , वी विल बाइ अ न्यू वन ...

बुधवार, 13 जुलाई 2022

सिडनी डायरी --4



 

सफेद रेगिस्तान

--------------

सब कुछ स्वप्नलोक जैसा . दूर दूर तक केवल बर्फ ही बर्फ .. विस्फारित से नयन हिम का निस्सीम सा वैभव विस्तार देखने आतुर ..मिट्टी पत्थर मैदान पहाड़ पौधे झाड़ियाँ ...सब हिमाच्छादित.. शुभ्रवसना माँ जैसे धवल चादर ओढ़कर आराम कर रही हो . कहीं कहीं उगे पौधे और झाड़ियाँ चंचल शिशु जैसे माँ के लाख ढँकने के बावज़ूद चादर से मुँह निकालकर देख रहे हों ..

यह विवरण आस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में स्थित ‘स्नोई माउंटेन’ (snowy mountain)  की ‘पेरिशर वैली’ का है .आस्ट्रेलिया की यह उच्चतम पर्वत श्रंखला 'ग्रेट डिवाइडिंग रेंज ' की  एक श्रंखला है ) जहाँ हम पिछले सप्ताह गए थे . इन दिनों अदम्य के स्कूल की छुट्टियाँ चल रही है . स्नोई माउंटेन जाने का उसका आग्रह बहुत समय से लम्बित था . हालाँकि मयंक श्वेता का स्वास्थ्य इसकी अनुमति नहीं दे रहा था पर पहले की बुकिंग थी ,जिसे स्थगित करने का कोई विकल्प नहीं था उधर अदम्य जिस उल्लास से अपने कपड़े खिलौने सूटकेस में जमा रहा था योजना को रद्द करना मुश्किल था इसलिये 7 जुलाई 2022 को मयंक ने कार की स्टेयरिंग सम्हाली और हम लोगों ने अपनी-अपनी सीट .सिडनी से पेरिशर वैली तक का यह  लगभग 500 किमी का है  . लेकिन सफर है काफी सुन्दर और सुविधाजनक . सपाट निर्बाध सड़क , दोनों तरफ पेड़ ; पेड़ हरे भरे भी और वसन्त का इन्तज़ार करते सूने उजड़े से पत्रविहीन भी . लगभग 150 किमी चलने के बाद हम लोग कॉफी के लिये (चाय नहीं मिलती ) ‘ओलिव व्यू कैफे’ में रुके . जैसा कि नाम से स्पष्ट है यहाँ ओलिव यानी जैतून का बड़ा फार्म है . यह जगह बहुत ही खूबसूरत है . कॉफी और घर से बनाकर लाई गईं मूँगदाल की कचौड़ियाँ खाकर
ताजगी मिली तो मयंक ने दुगने उत्साह के साथ कार स्टार्ट कर दी .


जैतून का फार्म

जैतून की कतारें

'कुमा' और 'केनबरा' को पार करते हुए , स्थान के साथ ही धीरे धीरे रंगरूप बदलते जा रहे पेड़ों को निहारते हुए हम तीन बजे
‘जिन्दबाइन’ पहुँच गए . एक बड़ी और खूबसूरत झील के किनारे बसा हुआ यह शहर पेरिशर वैली तक के लम्बे सफर के बीच एक आरामदेह पड़ाव है . यहाँ हमें रात्रि विश्राम के अलावा बर्फीले मौसम के अनुकूल कपड़े जूते कार की चेन आदि सामान लेना था . 'मॉन्स्टर्स-डिपो'( monster depot) में गोरी, तन्वंगी ,अल्पवय और सुदर्शना युवतियाँ जिस तत्परता और सस्मित संवाद के साथ सबको सामान दे रही थीं , सामान के लिये दो घंटे की प्रतीक्षा मुझे बिल्कुल नहीं अखरी . यहाँ अठारह साल के बाद बच्चे ,लड़के हों या लड़कियाँ , अपना खर्च खुद उठाते हैं . सबसे बड़ी बात कि माता पिता को बेटियों की सुरक्षा की चिन्ता नहीं करनी पड़ती .

जिन्दबाइन झील



जिन्दबाइन टाउन




सामान लेने के बाद तय हुआ कि किसी रेस्टोरेंट में बैठकर पेट-पूजा की जाय लेकिन पर्यटकों की इतनी अधिकता कि जहाँ भी गए कोई सीट खाली नहीं थी . वेटिंग भी डेढ़ से दो घंटे ..पूरा  एक घंटा तलाश करने पर एक जगह स्वीकृति मिली वह भी एक घंटे बाद की .  हालाँकि घर से बनाकर लाया खाना ,फल, ब्रेड ,सब रखा था पर बाहर ताजा गरम पिज्ज़ा ( यहां शाकाहारियों के लिये एकमात्र यही भोज्य है ) खाने की इच्छा ने खूब भटकाया ..खैर 

  

8 जुलाई को सुबह नौ बजे हम लोग पेरिशर वैली को चल पड़े . जिन्दबाइन से पेरिशर वैली तक का सफर 30-35 मिनट का है . कुछ किमी चलने पर जंगल शुरु होगया . असल में यह पूरा क्षेत्र कॉजियस्को नेशनल पार्क (kosciuzko national park) का ही हिस्सा है . आस्ट्रेलिया का यह कठोर और वीरान क्षेत्र जून से अक्टूबर तक बर्फ और हिमपात के कारण पर्यटकों के लिये बेहद आकर्षक और रोमांचक रहता है .अक्टूबर से गर्मियाँ प्रारम्भ होजाती हैं .

हम लोग जैसे जैसे बढ़ते गए , पेड़ों के बीच बर्फ का विस्तार भी बढ़ता गया साथ ही हमारा उत्साह व रोमांच भी . और ..अन्ततः हम बहुप्रतीक्षित सर्वत्र हिमाच्छादित विशाल पेरिशर वैली में थे . हमने जिन्दबाइन से लिये कोट ,बूट ,ग्लब्ज पहने ,जो बर्फ के लिये खासतौर पर तैयार किये गए होते हैं .हमारे उत्साह का कोई ठिकाना न था . सब बच्चों की तरह किलक रहे थे . बर्फ का ऐसा वैभव पहली बार सामने था . दूर तक केवल प्रकृति का धवल हास ..मानो किसी ने सफेद नरम कालीन बिछा दिया हो . उजला कालीन जिस पर कठोर बूट रखते संकोच होता था . उसी समय और.. हिमपात (स्नो फॉलिंग) भी शुरु होगया .. अहा.. धवल फुहारों में खड़े हम... ,चेहरे पर , कपडों पर,  हिमकणों स्पर्श ...वह सचमुच एक अपूर्व अनुभव था .ऐसी फुहारें जो भिगो नहीं रहीं थीं . जैसे किसी ने रेशा रेशा कपास बिखराकर उड़ा दिया हो . पैरो के नीचे बर्फ का ढेर था ..शिलाखण्ड जैसी कठोर नहीं , रेत जैसी भुरभुरी और  गीली बर्फ जिसके गोले बनाकर लोग एक दूसरे पर फेंक रहे थे .हवा में हिमकण रेत की तरह उड़ रहे थे, ..जैसे हम बर्फ के रेगिस्तान में खड़े हों ..दूर दूर तक ठंडा सफेद रेगिस्तान जिसे पार करना  दुष्कर हो . पाँव मन मन भारी होरहे थे पर उत्साह ऐसा कि रोम रोम  ऊर्जा से भरा जा रहा था . हम जी भरकर फिसले , दौड़े , बर्फ के गोले बनाकर एक दूसरे पर फेंके ..लोग स्कीइंग कर रहे थे . जो अभ्यस्त थे वे दूसरे हिस्से में रोप वे से ऊपर जाकर स्कीइंग का आनन्द ले रहे थे 

बर्फ में बहुत देर तक रहना व चलना निश्चित ही हमारी क्षमता से ऊपर था . पास ही बने कैफे में कॉफी पीते हुए मैं उन लोगों के बारे में सोच रही थी जिन्हें महीनों बर्फ में ही रहना पड़ता है . हमारे जवानों को भी देश की सीमाओं पर दुश्मन से ही नहीं बर्फीले तूफानों से भी दो दो हाथ करने होते हैं . कितना कठिनाई भरा जीवन होता है उनका ! सोचकर मन कृतज्ञता से भर गया . 

जिन्दबाइन लौटते शाम होगई . पिछली शाम भूख मिटाने जिस तरह हमें जगह जगह भटकना पड़ा , तय हुआ कि स्टोव मिल जाए तो दाल चावल खुद ही बनालें . श्वेता सारा सामान साथ लाई थी . वह इंजीनियर होने के साथ साथ एक अच्छी गृहणी भी है .काफी प्रयास के बाद बीस डॉलर किराए पर एक घंटे के लिये स्टोव मिल गया . मैंने कहा एक घंटे के लिये बीस डालर ? (लगभग1150 रुपए  मेरे दिमाग में हमेशा रुपया रहता है ) श्वेता हँसकर बोली –"माँ कल खाना तो सौ डालर का था .”  

9 जुलाई को हम जैसे ही जिन्दबाइन से चलने लगे अदम्य महाशय का रोना शुरु होगया . काफी पूछने पर बोले—"मुझे घर नहीं जाना ."

"तो फिर ?"

"मुझे स्नोई माउंटेन ही और जाना है .” 

वहाँ उसने खूब मस्ती की थी .पर यह संभव नहीं था .  उसे किसी तरह मनाया और केनबरा रुकने और बहुत सारी चीजें दिखाने का वादा करके चुप काराया .

पार्लियामेंट ऑफ ऑस्ट्रेलिया का अग्रभाग

पत्रविहीन पेड़ जो वसन्त में फूलों से लद जाएंगे .

केनबरा में पहले से बुकिंग नहीं थी इसलिये कोई होटल नहीं मिला .
हमें पार्लियामेंट हाउस देखकर ही सन्तोष करना पड़ा . लेकिन केनबरा एकबार फिर आना होगा जब वसन्त होगा और पत्रहीन खड़े बेशुमार पेड़ लाल गुलाबी फूलों से भर जाएंगे ..केनबरा से चलते पाँच बज गए . इन दिनों सूर्यास्त होते ही अँधेरा होने लगता है  . घर लौटने तक धूमिल आसमान के नीचे सारा शहर जगमगा रहा था .  

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

सिडनी डायरी ---3



 
हरा भरा हैरिस गार्डन

पैरामेटा में एक उन्नीस मंजिला बिल्डिंग में अठारहवीं मंजिल पर दो कमरों वाला फ्लैट जिसमें सबसे सुन्दर है बड़ी बाल्कनी जहाँ से सुदूर तक विहंगम देखा जा सकता है . यहाँ सभी इमारतों में शीशे के पर्दे हैं जिनके आरपार स्पष्ट देखा जा सकता है . मैं जहाँ बैठी हूँ मेरा व अदम्य का कमरा है . इसमें भी बड़ी सी खिड़की जिसे खिड़की की बज़ाय दरवाजा कहना अधिक उपयुक्त है . पलंग पर लेटे या बैठे मैं शीशे के पार सुदूर सब कुछ देख सकती हूँ . 

कमरे में चांद
 एक साथ कितने रंग 
मेरे सामने बड़ा सा पार्क और चर्च है .पार्क ऊँचे सघन वृक्षों से घिरा हुआ है .वृक्ष भी कितने प्रकार और कितने रंगों के . हरियाली में ही हल्की से गहरी तक कितनी छायाएं हैं .. वृक्षों का वैभव तो देखते ही बनता है . कोई इतना सघन कि धूप पत्तों के बीच से नीचे उतरने की कोशिश करके हार जाती है . घनी टहनियों में गुँथे हुए से पत्ते धूप को हाथों हाथ या कहें आड़े हाथ लेकर लौटा देते हैं .अधिकतर वृक्ष सदाबहार हैं .उनके गहरे हरे और चिकने पत्ते जैसे हमेशा ऐसे ही बने रहने का वरदान लेकर आए हैं . पर कहीं कुछ पेड़ सारे पत्ते उतार कर अवधूत की तरह भी जमे हैं . 
सघन विरल का साथ 

बेशुमार कलियाँ जो फूल बनने तैयार हैं .

किसी पेड़ के पत्ते , हर हाल कुर्सी से चिपके रहने की लालसा वाले नेताओं की तरह ,सूख जाने पर भी टहनियों में अटके हुए हैं . कोई पेड़ पतझड़ में लाल हुआ जा रहा है तो कोई पीला . किसी पेड़ की टहनियों में पत्तों को हटाकर छोटी छोटी बेशुमार कलियाँ आकर जम गई हैं और कुछ ही दिनों में हल्के गुलाबी .फूलों में बदल जाने वाली हैं . कहीं छोटी छोटी झाड़ियाँ फूलों की लड़ियाँ गला में डाले इतराती हुई लगती हैं .

सामने छोटी सी नदी है जो शहर के केन्द्र 

तक पहुँचते पहुँचते समुद्र हो जाती है .  

नदी किनारे खूबसूरत जोड़ा 

नदी के किनारे पेड़ों से घिरा बहुत ही हराभरा मैदार है .नदी के साथ साथ सुन्दर फुटपाथ हैं जहाँ इक्का दुक्का  लोग टहलते दौड़ते मिल जाते हैं . भीड़ नहीं हैं क्योंकि जगह ज्यादा और लोग कम हैं . नदी में नियमित रूप से स्टीमर चलते हैं ,जिन्हें फेयरी कहा जाता है . पैरामेटा से सिटी तक जाने के लिये यह एक बहुत सुन्दर सुहाना साधन है . 


सजने के अजब ढंग

यहाँ सबसे 

फेयरी 

अच्छी बात है सड़क के साथ फुटपाथ जो पूर्ण सुरक्षित है . बस सड़क पार करने के लिये दस से पन्द्रह सेकण्ड रुककर सिग्नल के दौड़ते हुए आदमी के हरे होने की की प्रतीक्षा करनी है . फिर पार करने के बीच भले ही सिग्नल लाल होगया हो , गाड़ियाँ तब तक रुकी रहती हैं जब तक पार करने वाला सड़क पार न कर जाय . बिना सिग्नल निकलने वालों पर भारी जुर्माना लगता है चाहे वह गाड़ी वाला हो या पैदल चलने वाला . तो सही व्यवस्था लोगों की जागरूकता से कहीं अधिक सजा का डर है . फिर लोग नियम से चलने के आदी हो ही जाते हैं . राज्य कानून सजा की आवश्यकता है ही इसलिये .तभी स्पेंसर ने राज्य को बुराई मानते हुए भी आवश्यक कहा है .

सोमवार से शुक्रवार यहाँ दिनचर्या एक सी है . सुबह चाय नाश्ते के बाद अदम्य को स्कूल छोड़कर श्वेता मयंक का ऑफिस वर्क शुरु हो जाता है . मैं टहलने के लिये आधे से एक घंटा पार्क में या नदी किनारे निकल जाती हूँ . जहाँ अपने देश के बहुत से लोग मिलते हैं . संवाद न हो तो भी स्वदेशी होने का एहसास हो जाता है . वातावरण काफी साफ सुथरा और सुन्दर है . शनिवार रविवार अवकाश का होता है . आसपास ही मयंक और श्वेता के कई मित्र हैं . अमर , शिवम् ,सौरभ , रवि आदि ..ये दोनों दिन अक्सर इन्हीं मित्र-परिवारों के साथ खाते पीते हँसते खेलते गुजरते हैं . और तब सब भूल जाते हैं कि हम अपने देश में नहीं हैं ....

जारी.......

बुधवार, 29 जून 2022

अगर प्रेम विश्वास रहे

 

अगर प्रेम विश्वास रहे तो

साथ न छूटेगा .

अन्तर को जोड़ा जिसने

वो तार न टूटेगा .

 

संकल्पों के बीज भरी

फसलें लहराती हों

मोड़ मोड़ पर जहाँ हवाएं

फागुन गाती हों .

वहाँ लुटेरा कोई भी

खलिहान न लूटेगा .

अगर प्रेम विश्वास रहे...

 

यहाँ वहाँ से टुकड़े ले

जो भवन खड़ा करते हैं

सहज प्रवाहित धारा में

चट्टान अड़ा करते हैं .

होंगे वे निःशब्द 

समय जब कारण पूछेगा .

 

मनमानी को जो अपना

अधिकार समझते हैं .

पकी फसल पर जो

बनकर अंगार बरसते हैं

पर कब तक ,एक दिन तो

घट कच्चा है ,फूटेगा .

 

सोमवार, 20 जून 2022

कुछ कमी सी है .

 

हवाओं में आज कुछ नमी सी है .

खिड़कियों पर धुन्ध आकर जमी सी है.


ओप सूरज की सिमटती जा रही है ,   

फुनगियों पर धूप भी अनमनी सी है .


राह में आकर मिला जबसे समन्दर ,

धार नदिया की तभी से थमी सी है.


पेड़ ,पंछी ,फूल ,मौसम खुशनुमा हैं .

कौन फिर जिसके बिना कुछ कमी सी है ?


'भाव मेरा जो , वही उसका भी होगा  . '

सोच मेरी अब गलतफहमी सी है .


छूटकर पीछे कहीं कुछ रह गया है ,

सोच सारी उसी में ही रमी सी है .


उजड़ता ,बसता ,उगा लेता है फसलें ,

फितरतें मन की बहुत कुछ ज़मीं सी हैं .