शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

"राम राम !...खोलो रानी चन्दन किवाड़ ..."



" दशहरा ..विजय-दशमी . शौर्य ,युद्ध और विजय का प्रतीक-पर्व, जिसके पीछे कितनी कथाएं ,कितनी जनश्रुतियाँ छिपी हुई हैं .देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर पर विजय और उसका वध, राजा रघु की कुबेर पर विजय , राम की रावण पर विजय .पराजित कुबेर ने उपहार स्वरूप राजा रघु के लिये अपना खजाना खोल दिया और राजा रघु ने प्राप्त सारा धन प्रजा में बाँट दिया . उसी याद में कहीं कहीं स्वर्ण-स्वरूप शमी के पत्ते लुटाए जाते हैं . इसी दिन राम ने रावण का अन्त कर एक अनाचार का अन्त किया था .दशहरा न्याय और सत्य की जीत का त्यौहार है . बुराई पर अच्छाई की विजय का त्यौहार है . वचन-पालन और दानशीलता का त्यौहार है......'
यह सब मैंने तीसरी-चौथी कक्षा में ही पढ़ लिया था .गाँव में हर साल दशहरे की सुबह लोगों को उत्साह से अपने ट्रैक्टर, जीप ,मोटर साइकिल ,साइकिल ,औजार ,मशीन और वाहनों को साफ करते देखती थी तो मन उल्लास से भर जाता था . हमारे घर भी काकाजी अपनी साइकिल की और माँ अपनी सिलाई मशीन की सफाई करती थी . जिनके पास बन्दूकें थीं वे बड़े गर्व से अपनी 'दोनाली' ,'पँचफैरा' और 'मौजरनिकालकर साफ करते थे . और साफ करने के बाद एक दो फायर भी कर देते थे . क्योंकि इसी दिन से बच्चों को पटाखे चलाने का लायसेन्स मिल जाता था . सो सभी बच्चे बड़ी आतुरता से दशहरे की प्रतीक्षा करते थे .
दशहरे की प्रतीक्षा मुझे भी रहती थी लेकिन प्रतीक्षा के कारण दूसरे थे . एक तो यही था कि बीस-पच्चीस दिन स्कूल जाने का कोई झंझट नहीं था . उन दिनों स्कूलों में दशहरा से दीपावली तक अवकाश हुआ करता था . हम लोग सुबह सुबह स्कूल जाने की बजाय खेतों की मेड़ पर ओस भीगी घास पर चल सकते थे .पूरब के क्षितिज पर सूरज को उभरता हुआ देख सकते थे . नदी किनारे दूर दूर तक कास के झूमते फूलों को देख सकते थे जो हवा और लहरों की गति से ताल मिलाकर लहराते हुए लगते थे .उन्ही दिनों गन्ने के खेत से आती हुई मीठी खुशबू भी ललचाती थी . तोरई और कद्दू की बेलों में चमकते बड़े बड़े पीले फूल बहुत लुभाते थे . मिट्टी में दबे शकरकन्द और मूँगफलियों को जमीन से बाहर निकाल लेने का भी वही मौसम होता है .और मोरों के पंख गिराने का भी . पाँख (मोरपंख) ढूँढ़ने लड़के मुँह अँधेरे ही निकल पड़ते थे . हमें भी जब कभी कभी 'चंदक' मिल जाता था तो वह एक उपलब्धि हुआ करती थी .
दशहरे की प्रतीक्षा का दूसरा और सबसे बड़ा कारण दशहरे की बहुत ही उल्लासमय शाम थी जब दूधिया चाँदनी के रुपहले विस्तार में सारा गाँव एक परिवार जैसा लगता था . लोग द्वार द्वार पर जाते परस्पर मिलते .राम राम कहते और नारियल बताशे की भेंट ग्रहण करते . दसमीं का तिर्यक चाँद पन्त जी की 'घूँघट से मुँह छुपाए मुग्धा' की याद दिलाता था . उसे पूरा गोल होने में अभी भले ही चार-पाँच दिन बाकी होते पर गाँव की गलियाँ चाँदनी की झील में नहाकर निखर जातीं थीं । तब चाँदनी शायद ज्यादा चमकीली ,ठण्डी और मोहक हुआ करती थी ।
जब चाँदनी अपने पूरे सौन्दर्य के साथ झमकती हुई पेड़ों और मुँडेरों से उतरती हुई आहिस्ता से चबूतरों पर और फिर गलियों में बिखरने लगती तब लोग दरी बिछाकर ,थालियों में नारियल के टुकड़े , मिश्री ,बतासे ,लोंग इलायची सजाकर अपने अपने द्वार पर बैठ जाते थे और मिलने आने वाले लोगों को राम राम कहकर नारियल बतासे आदि देते थे । लगभग रात के एक बजे तक , जब तक कि नींद पलकों पर मनों वजन नही लाद देती और हर चौथे पल जम्हाँइयों (उबासियों) के कारण लोगों के चेहरे विकृत नही होने लगते ,तब तक गली में राम राम का सिलसिला चलता रहता और गलियों में मंगलवारी हाट जैसा माहौल बना रहता था लेकिन स्नेह और उल्लास भरा... हमारे चबूतरा पर काकाजी बैठते थे फिर जब वे 'राम राम' के लिये गाँव में निकलते तब माँ 'राम-राम ' के लिये चबूतरा पर बैठ जातीं थीं ।
उस रुपहली रात में बच्चे खास तौर पर उत्साहित रहते थे । उन्हें उन्मुक्त होकर उजली गलियों में घूमते हुए ज्यादा से ज्यादा 'चटक' या 'खुरैरी' ( स्थानीय बोली में नारियल के टुकड़े )और बतासे पाने का सुनहरा मौका जो मिलता था ।
उसी समय हाथों में टेसू लिये लड़कों की टोली भी द्वार पर आ धमकती और गा उठती थी---
"टेसू आए घर के द्वार
खोलो रानी चन्दन किवार
चन्द चन्द के टके बनाए
एक टके की पन्नी मँगाई ....।"
या
"मेरा टेसू यहीं अड़ा
खाने माँगे दही बड़ा ।
दही बड़ा में पन्नी
धर दो एक अठन्नी ।"
दशहरा के दिन से प्रारंभ हुआ टेसू और झाँझी के जुलूस पूर्णिमा तक गलियों में धूम मचाए रहता . पूर्णिमा को दोनों का विवाह सम्पन्न कराया जाता . 
उन दिनों जब गाँव में बिजली नही थी ,चाँदनी रात किसी सौभाग्य से कम नही होती थी । एक तरफ कमरों में अँधेरे के साम्राज्य में प्राणपण से संघर्ष करती लालटेन या दिये की टिमटिमाती रोशनी थी तो बाहर अँधेरे को सुदूर कोने में खदेड़ने वाले ,रुपहले उजाले के अजस्र स्रोत---चन्द्रदेव । मनुष्य ही क्या पेड़-पौधे भी उनके साक्षात्कार का उत्सव मनाते थे ।
साधन-हीनता विषाद का मूल नही होती । विषाद के मूल में होता है साधनहीनता का अहसास जिससे तब किसी का परिचय था ही नही । उस साधनहीन सम्पन्नता का एक अलग आनन्द था । मेरा विचार है कि प्रकृति के हर उपादान में ईश्वर की स्थापना मनुष्य ने भौतिक साधनों के अभाव में ही की होगी .
दशहरे की वह रात अनौखी हुआ करती थी . कोई छोटा-बड़ा या अमीर-गरीब नही । सब सबके दरवाजे पर जाकर अभिवादन में राम राम कहते हाथ जोड़ते हैं . अंजुरी आगे बढ़ाते हैं और दूसरे ही पल अंजुरी नारियल बतासों से भरी होती है ।
आज किसी को रावण याद नहीं . याद होगा भी क्यों  वह तो वीर पुरुषोत्तम राम के हाथों मारा जा  चुका है . सब केवल राम को याद कर रहे हैं । राम की विजय का उत्सव मना रहे हैं . गलियाँ राम राम ध्वनि से गूँज रही हैं । साहस ,शौर्य और शील के पर्याय राम के स्मरण से  .ऐसे में रावण का क्या काम ? जहाँ 'राम' हैं वहाँ 'रावण' नहीं होसकता . होगा भी तो वह राम के हाथों मारा जाएगा जरूरी है राम का होना .                         
सचमुच मुझे याद नही कि तब दूर दूर तक भी धोखा ,बेईमानी, हत्या , बलात्कार जैसे अपराध का कोई किस्सा सुना गया हो ।
रावण-दहन केवल रामलीला के दौरान होता था . मैंने कहीं पढ़ा है कि अच्छाई के प्रचार से अच्छाई बढ़ती है और बुराई के प्रचार से बुराई । रावण ( बुराई का प्रतीक) को याद करना एक तरह से बुराई को जीवित रखना ही तो है । हम रावण बनाते हैं इसलिये उसे जलाने का नाटक करते हैं . गन्दगी फैलती है तभी तो सफाई-अभियान की जरूरत होती है । शायद इसीलिये हमारे गाँव में रावण को जलाने की परम्परा कभी नही रही ( अब पता नही ) पहली बार मैंने रावण जलाने का दृश्य एक फिल्म में देखा था ( शायद रेशम की डोरी) .वास्तव में  मेरे लिये दशहरा 'रावण 'के अन्त से अधिक 'राम' की विजय का पर्व है .राम का स्मरण करने और नारियल-बतासे लेने देने का पर्व है ।

इसलिये आप सभी अपनों को दशहरा की राम राम और नारियल-बतासे की सादर , सस्नेह भेंट ।

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

दोराहे ऐसे भी होते हैं ।

आजकल दुर्गाजी की झाँकियों से हर सडक ,चौराहा व गली जगमगा रही है । मधुर ,कर्णकटु ,भक्तिमय और फूहड सभी तरह के भजनों से हर दिशा संगीतमय (कोलाहलमय) है ।


बात कुछ यों हुई कि अंजना (छोटी बहन) ने शाम को अपने घर बुलाया । भजनों का कार्यक्रम था । जैसा कि नवरात्रि में अधिकतर होता है । उसके घर में प्रति वर्ष नवरात्रि में देवी की स्थापना होती है । 
मैंने उल्लासपूर्वक हाँ कहदी । हालांकि स्कूल के बाद ऐसे किसी कार्यक्रम में जाने का हौसला नही रह जाता ,पर जाने कबसे गीत-भजन गाए ,सुने नही थे । उसने रमा और सुधा ( मौसेरी बहनें) को भी फोन कर दिया था । रमा मेरे पडोस में ही है । सुधा कुछ दूर सेवा नगर में । अंजना हम तीनों से अलग न्यू- कालोनी में । 
सुधा के बिना हमारी मण्डली अधूरी है । वह जब ढोलक पर थाप देती है सुनने वाले वाह कहने विवश होजाते हैं । खराब गीत भी उसकी ताल के साथ समा बाँध देता है । इसीलिये वह भजन-मण्डली में विशेष सम्मान और स्थान पाकर हम सबसे आगे है । 
मैं उसके बिना भजन गाने का मन नही बना पाती । मेरी आवाज वैसे ही बहुत मन्द और दुर्बल सी है पर एक-दो गीत तो मुझे गाने ही पडते हैं । इसलिये जहाँ भी भजन कार्यक्रम होता है मैं सुधा को आगे रखती हूँ । अंजना नए-पुराने बहुत सारे भजनों को कंठस्थ रखने के लिये याद की जाती है । जबकि मैं जहाँ देखो डायरी लिये फिरती हूँ । अपने लिखे भजन या कविताएं ही मुझे याद नही ।  
मैंने तय किया कि मैं किलागेट (घर) आने की बजाय शाम को स्कूल से सीधी न्यूकालोनी पहुँच जाऊंगी और रमा-सुधा वहीं जाकर मिल जाएंगी । चारों बहनें मिलकर खूब आनन्दित होंगी ।
लेकिन स्कूल से निकलते समय तेज वर्षा हो रही थी । मुझे तय किया कार्यक्रम रद्द होता हुआ लगा । फोन करने पर पता चला कि रमा की तबियत भी कुछ खराब होगई है । वह न जा सकेगी । रमा नही तो सुधा भी नही । गजब का तालमेल है दोनों में । रह गई मैं अकेली  जैसा कि अक्सर होता है । ऐसे मैं जैसे एक दोराहे पर खड़ी रह जाती हूँ । इधर जाऊँ या उधर जाऊं के दो छोर जैसे किन्ही अनजान हाथों में होते हैं । मैं कुण्ठित सी उस भँवर से चाहकर भी बाहर नही आ पाती । 
अंजना के घर जाऊँ या न जाऊँ --  मैं इसी ऊहापोह में डूबी खड़ी थी कि बगल में किलागेट वाला टेम्पो आ खड़ा हुआ । जबकि न्यू कॉलोनी के लिये मुझे हजीरा वाला टेम्पो लेना था । 
"चलो ,छोड़ो , घर चलते हैं ।"--मैंने स्वयं को मुक्त करते हुए सोचा---"हल्की बारिश तो अब भी हो रही है । साथ में पानी की बोतल, छतरी, किताबें और दिनभर की ड्यूटी के बाद थकान भी । यहाँ गाँव या अपना घर तो है नही कि जैसी भी हालत में हो पहुँच जाओ । बहन की ससुराल है । हुलिया का कुछ ध्यान तो रखना चाहिये और फिर ऐसा कौनसा अनिवार्य है पहुँचना । नवरात्रि के भजनों का ही तो कार्यक्रम है । अंजना से फिर किसी दिन ऐसे ही मिल आऊँगी ।"
उधर टेम्पो ड्राइवर ,जो रोज आने जाने के कारण जानता है ,बोला---"मैडम चलना हो तो जल्दी बैठो । अभी जाम लगजाएगा ।"
सोचने का इतना टाइम नही था । मैं लपककर टेम्पो में चढ़ गई । वैसे भी मुझे स्कूल से सीधे घर आने की ऐसी भयंकर आदत पडी हुई है कि अक्सर घर में घुसने पर याद आता है कि अरे चाय बनाने के लिये शक्कर नही है या कि और कई जरूरी चीजें, लेकिन घर आने के बाद जो कपड़े बदल लिये तो फिर जरूरतें पड़ी रहें एक तरफ । कौन फिर से दूसरे कपड़े पहने !कौन बाजार जाए ! 
सुनीता (कामवाली) जब कई दिनों तक झाडू टूटने या बर्तन का साबुन खत्म होने की शिकायत करते करते और मेरी ," आज भूल गई कल ले आऊँगी", सुनते-सुनते थक जाती है ,तो वह खुद ही खरीद लाती है और पैसे माँग लेती है । खैर...
लेकिन अब मुश्किल यह हुई कि इधर तो मेरा टेम्पो में बैठना हुआ और उधर दिल--दिमाग में यह खयाल बुरी तरह उछल-कूद करने लगा कि अंजना मेरा इन्तजार कर रही होगी । ससुराल के माहौल में मुझे साथ पाकर उसे कितनी खुशी होगी । फिर यह बारिश कौनसी मुसीबत है ! सर्दियाँ होतीं तो फिर भी मुश्किल होती । अभी तो सितम्बर हैं । ये मन की बहानेबाजियाँ ही तो है जो मुझे अक्सर अवसरों से वंचित कर देतीं है । मुझे अंजना के पास जाना चाहिये । वहाँ भी सब कुछ घर जैसा ही तो है । उसकी सास ननदें मुझे कितना मान देतीं हैं ! देखते ही खुश होजातीं हैं । रोज-रोज तो ऐसे बुलावे आते नही है । घर भी अभी ऐसा कौनसा अर्जेन्ट काम पडा है ! 
बस अब मुझे टेम्पो में बैठे रहना मुश्किल लगने लगा । लगने लगा क्या मुश्किल हो ही गया ।
"भैया जरा रोकना ।"-- मैंने ड्राइवर को कहा । वह परिचित था सो कुछ हैरान सा बोला ---"क्यों मैडम चलना नही है ?" मैंने बात बनाई--
"नही भाई कुछ काम याद आगया है । देर से जाऊँगी ।" टेम्पो तीन-चार सौ मीटर दूर ही चला कि मैं उतर पडी ।  
हजीरा और किलागेट की सडक का अलगाव आगे जाकर फूलबाग चौराहे पर होता है जहाँ से एक सडक किलागेट बाईं ओर मुड जाती है । हजीरा के लिये सड़क सीधी जाकर पड़ाव चौराहे से बाई ओर मुड़ती हैं । मैं फूलबाग भी उतर सकती थी लेकिन इतना सब्र कहाँ ! 
अब मैं शिन्दे की छावनी पर खड़ी हजीरा के टेम्पो का इन्तजार कर रही थी ।पाँच बजे सभी टेम्पो इस तरह भरे चलते हैं मानो लोग किसी मेला के लिये जारहे हों । ठसाठस भरे वाहन चिढ़ाते हुए से सर्राटे से निकल रहे थे । जो ड्राइवर सवारियों को पुकार-पुकार कर बुलाते हैं वे अब देख भी नही रहे थे । मुझे अपने आप पर गुस्सा आया । गाड़ी चलाना जानती तो इस तरह आश्रित नही रहती । पेजर पर एक-दोबार कोशिश की थी । चला भी ली थी। साइकिल तो बचपन में चलाती ही थी । पर अब सबको यह डर रहता है कि मैं गाड़ी चलाऊंगी तो हाथ-पाँव तोड़ लूँगी । मुझे गाड़ी चलाने की अनुमति नही है । अब तो मेरा भी विश्वास कमजोर होचुका है । ऑटो की अपनी मुश्किलें हैं । कभी बहुत देर से आए तो कभी समय से पहले ही आ खड़ा हो । पूरी तरह उसी के आश्रित । रोज अलग से तय करो तो एक ही दिन में सौ रुपए तो समझ ही लो । बात कंजूसी की कम नजरिये की अधिक है । जब आठ या दस रुपए में काम चलता हो तो पचास रुपए क्यों खर्च किये जाएं ?
इससे तो अच्छा है कि वे रुपए सुनीता के बच्चों को दे दिये जाएं । इसलिये  अभीतक टेम्पो ही अपना आने जाने का साधन बना हुआ है । 
तकरीबन पन्द्रह मिनट इसी तरह खड़ी रही । कोई भी समझ सकता है कि वे पन्द्गह मिनट किस तरह पन्द्रह दिनों जितने बड़े और बोझिल होगए थे । पछता रही थी कि आखिर अच्छा भला टेम्पो छोड़ दिया । ऐसी बड़ी भजनों की पड़ी थी कि अब बीच में खड़ी हूँ फालतू ही । 
हाल यह था कि जहाँ के लिये भी साधन पहले मिलता मैं जाने तैयार थी । तभी संयोग से किलागेट वाला ही एक खाली टेम्पो सामने आकर रुका । वह भी रोज का परिचित ड्राइवर । आग्रह पूर्वक बोला --"आइये मैडम ।"
मुझे लगा जैसे संकट की घड़ी में कोई अपना आगया ।
वैसे भी किसी टेम्पो में इस तरह खाली सीट अभी आधे घण्टे तक मिलने वाली नही थी । मैं हजीरा जाने का विचार छोड़ फिर किलागेट के लिये बैठ गई । लगा कि एक झंझट से बच गई हूँ । क्या पता गुड्डी के यहाँ कितनी देर लगती । घर लौटने तक खूब अँधेरा होजाता । फिर दूसरे तमाम काम भी उतने ही लेट होते । आज कोई छूटा हुआ काम पूरा कर लूँगी । वगैरा...वगैरा..।
लेकिन रास्ते भर मैं फिर यही सोचती रही कि गुड्डी मेरा कितना इन्तजार कर रही होगी । कितना बुरा लगेगा उसे । काश मैं मन पक्का करके चली जाती । चली ही जाती न ? 

शनिवार, 27 सितंबर 2014

विपक्ष-धर्म

मुद्दा सच्चा हो या झूठा , 
हम तो सिर्फ विरोध करेंगे ।
वो जैसी भी राह बनाएं ,
हम तो सिर्फ विरोेध करेंगे ।

वामपक्ष हम  
उल्टा चलना धर्म हमारा ।
चिनगारी को ज्वाल बनाना
कर्म हमारा ।
समतल राह न होने देंगे । 
राहों में गतिरोध बनेंगे।

हंगामा , हड़ताल, 
और आरोपों की बौछारें 
चक्का-जाम ,रैलियाँ ,
पुतला--दहन और फटकारें ।
सत्तासीनों को लुढ़काओ
जनता से अनुरोध करेंगे ।

कैसे भूल सकेंगे ,जब थी 
हाथ हमारे सत्ता।
अपनी ही थी हर बाजी  
हर चाल तुरुप का पत्ता ।
फिर से कैसे वह सब पाएं, 
जैसे भी हो शोध करेंगे ।

जनता को जतलाएंगे 
उससे चुनाव में भूल हुई है।
सर्दी गर्मी प्याज टमाटर 
भडकाने को तूल कई हैं।
जनता ने धोखा खाया है 
जनता में यह बोध भरेंगे ।

देश भाड़ में जाए चाहे 
कोई लूटे खाए।
चर्चाओं में छाए रहना , 
केवल हमको भाए। 
सक्रिय रहें सत्ता पाने तक 
खुद को यों संबोध करेंगे ।


मंगलवार, 16 सितंबर 2014

एक आमंत्रित गीत



बस भरोसा रहे ,और रहे हौसला 
दौर तूफान का भी , गुजर जाएगा ।
 क्या हुआ रात हो गई अगर राह में,
चलते--चलते सुबह का पहर आएगा ।

यह अँधेरा उसी को डराता सदा 
जो उससे निगाहें बचाता सदा 
आँधियाँ धूल से ,भर गईं जो चमन ,
बारिशों में वो फिर से निखर जाएगा ।

खिड़कियाँ बन्द क्यूँ ,रोशनी मन्द क्यूँ ?
सोच की चादरों में है पैबन्द क्यूँ ?
राह दे दो उसे ,जो है भटका हुआ ।
वरना जाने कहाँ वो किधर जाएगा ।

जो चले आए अपना तुम्हें जानकर ।
साथ लेकर चलोगे यही मानकर ।
अब जो बदली अगर , तुमने अपनी नजर 
मीत सोचो कि क्या कुछ बिखर जाएगा ।

अब नही मानता नीम की छाँव को 
भूलता जा रहा ,खेत ,घर ,गाँव को 
भीड़ में खो रहा ,एक सड़क हो रहा 
ऐसा ही होगा ,जो भी शहर जाएगा ।

पत्थरों में उगे बीज की बात हो ,
बीहड़ों  में  सुने गीत की बात हो ।
सोज और ओज आवाज में हो अगर ,
तो यकीनन समय भी ठहर जाएगा ।

गुरुवार, 4 सितंबर 2014

दो लघुकथाएं

(1)
सम्मान
एक बड़े प्रतिष्ठान ने प्राचार्य से योग्य शिक्षकों के नाम देने को कहा ताकि शिक्षक दिवस पर उन्हें सम्मानित किया जा सके । प्राचार्य ने हिसाब लगाया कि कौन इस समय उनके काम का है कौन नहीं। व्याख्याता 'स' उनके सारे बिलों पर बिना किसी आपत्ति के 'पेड बाई मी' लिख देता है । 'प' किफायती दामों में स्कूल का सामान उपलब्ध कराता है जिससे काफी बचत होजाती है । श्रीमती 'ल' को तो जरूर लिया जाना चाहिये । वह कहीं भी जाती है उपहार लाना नही भूलती और हमेशा विनम्रता की हद तक झुककर रहती है । और 'अ' को तो छोड़ा ही नही जासकता क्योंकि उस जैसा वाक्पटु कोई नही । जेडी साहब के सामने अपने स्कूल और प्राचार्य की ऐसी बात रखी कि साहब खुश होकर चले गए । ऐसे शिक्षकों को सम्मान जरूर मिलना चाहिये ।
"और सर ये रामकुमार और कुसुम ....?"
"अरे इन्हें छोड़ो "--प्राचार्य ने अपने खास सलाहकार नलिन की बात को गीले कपड़े की तरह झटक दिया ।
"ये संस्था के किसी काम के नही । बस रजिस्टर लेकर कक्षा में जाने और पढ़ाने के अलावा कोई काम नही करते । संस्था ऐसे लोगों के भरोसे नही चलती । हाँ तुम अपना नाम भी लिख लेना ..।"
"जी सर ।" नलिन ने खुश होकर कहा और जल्दी-जल्दी प्राचार्य जी द्वारा प्रस्तावित नामों को टाइप करने लगा ।
( सन् 2006 में )
(2)
प्रतिफल 
गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़े गजानन बाबू ने बेचारगी के साथ शिक्षा-विभाग की उस तिमंजिला इमारत को देखा जिसमें अधिकारी और बाबुओं की तो बात ही क्या है , चपरासी तक उन्हें भाव नही दे रहा था । बारह बजे से अब चार बजे तक तक चार बार लौटाए जा चुके थे ।हर बार एक ही उत्तर---"माड़साब , आपसे कितनी बार कहें कि अभी बड़े बाबू नही हैं कुर्सी पर ! कल-सल फिर चक्कर लगा जाना ।"
पीछे मास्टर जी उसकी बड़बड़ाहट को साफ सुन रहे थे ---"बड़े चेंटूराम हैं । पता नही क्यों रिटायर होने के साथ आदमी की अकल भी रिटायर होजाती है ।" 
घर में पत्नी भी यही कहती ह--"जिन्दगी भर बच्चों को पढ़ाते रहे पर खुद काम का कुछ नही सीखा ।  इतना भी नही है कि दफ्तर में ही अपने रुके कामों को करवा लें । चप्पल घिस रहे हैं फालतू ही...।"
" पत्नी शायद ठीक ही कहती है "---गजाननबाबू कभी कभी निराशा के अँधेरे में घिर जाते हैं ।
सचमुच बच्चों को पढ़ाने और महीना बाद वेतन के रुपए गिनने के अलावा उन्होंने कुछ नही जाना । कब कौनसी किश्त लगी , किस माह में कितने रुपए ,क्यों कट गए जानने की जरूरत नहीं समझी । हाँ अध्यापन कार्य में कभी शिथिलता या गिरावट नही आने दी । लेकिन क्या हुआ ! पेंशन प्रकरण को लेकर दफ्तर के चक्कर लगाते दो माह होने को आए पर कोई सुनवाई नही । वे साथी जो खुद कभी कक्षाओं में नही गए और गजाननबाबू के अध्यापन का मजाक उड़ाया करते थे ,अधिकारियों के साथ ठाठ से गाड़ियों में घूम रहे हैं ।
"तो क्या उनकी कार्यनिष्ठा गलत साबित होगई है ? क्या अब मूल्यों व आदर्शों का कोई महत्त्व नही रह गया है ? क्या उनके परिश्रम और ईमानदारी का यही प्रतिफल है ?" 
इन सवालों में उलझे हुए से गजानन बाबू हताश होकर लौटने का विचार कर रहे थे । उनके धुले सफेद कपड़े धूल से मलिन हो रहे थे । होठों पर पपड़ियाँ जम रही थी । चेहरे पर निराशा भरी थकान की कालिमा थी ।
इस तरह तो उन्हें कोई पूछने वाला नही है । यह सोचकर वे लौट ही रहे थे कि एक सरकारी जीप बगल से गुजरी । कुछ आगे गई, फिर पीछे लौटी । ड्राइवर सीट से ही कोई खिड़की में से झाँका । शायद कोई बड़ा अधिकारी था । 
"आप यहाँ !"--कहकर वह नीचे उतरा और पैरों में झुकगया । गजाननबाबू हक्के-बक्के से खड़े थे । 
"आपने मुझे नही पहचाना लेकिन मैंने तो देखते ही जान लिया ।"
"कौन ?...राजीव ?"
"बिल्कुल सही । आपकी कक्षा का सबसे शरारती और सबसे ज्यादा डाँट खाने वाला राजीव । आपने जो कुछ मुझे दिया उसी के कारण आज मैं यहाँ हूँ । आप यहाँ किसी काम से आए होंगे न ? लेकिन अब आपको चिन्ता करने की जरूरत नही है।" 
गजाननबाबू चकित और गद्दगद् हदय से इस आकस्मिक भारी परिवर्तन को देख उनकी आँखें भर आई । अपने कार्य का इससे बड़ा प्रतिफल किसी शिक्षक के लिये और क्या होसकता है । 
(सन् 1994 में रचित )
शुभ-तारिका में प्रकाशित)

सोमवार, 1 सितंबर 2014

"अबे 'होगा' क्यों ? "

बात उन दिनों की है  जब मुझे पर्व और त्यौहारों की बड़ी उल्लासमय प्रतीक्षा रहती थी । यह उल्लास बचपन के कारण था या अनूठे उत्सव-आयोजनों के कारण यह पूरी तरह अलग करके तो नही कह सकती लेकिन इसमें कोई सन्देह नही कि उन दिनों हमारे गाँव में हर त्यौहार को मनाने के लिये विशेष तैयारियाँ होतीं थी । चाहे होली हो , दशहरा हो ,कृष्ण-जन्माष्टमी हो या गणेश-उत्सव ।
गणेश-उत्सव के आठ दिनों की झाँकियों की योजना बहुत पहले ही तैयार कर ली जाती थी जिसके निर्माता--निर्देशक ताऊजी ही होते थे । उनके द्वारा तैयार की गई झाँकियाँ अदुभुत हुआ करती थीं । जैसे एक बार उन्होंने कैलाश पर ध्यानमग्न शिव की झाँकी सजाई ।
" शिवजी निराधार बैठे ध्यान मग्न हैं ।( ध्यान रहे कि शिव प्रतिमारूप नही बल्कि सजीव हैं । किशोर भैया से छोटे देवेन्द्र को शिव के रूप में इतनी कलात्मकता से सजाया गया कि देखने वाले मंत्र-मुग्ध हुए देखते ही रह गए थे और लगभग बारह वर्ष के देबू भाई का आँखें बन्द कर घंटों तक शान्त व निश्चल  बैठे रहना भी कम आश्चर्य नही था ) जटाओं से गंग-धार फूट रही है । उनका धरती से स्पर्श केवल फर्श में गड़े त्रिशूल के द्वारा है,जिसे उन्होंने थाम रखा है । चकित दर्शक आजू-बाजू झाँकते हैं कि आखिर शिवजी अधर में बैठे किस तरह है ।"
हर दिन एक नई और अनूठी झाँकी होती थी । कभी भगवान विष्णु के क्षीरसागर-शयन की कभी माखनचोरी की तो कभी खेत में बीज बोते किसान-दम्पत्ति की ।   
आरती व प्रसाद के बाद भजन गाए जाते थे । उन दिनों गाँव में गाँव के ही बहुत अच्छा गाने-बजाने वालों की भजन-मण्डली थी दो-चार लोग बाहर से भी आजाते थे । और श्रोता भी कम रस-मर्मज्ञ नही थे । ताल और मात्राओं की जरा सी गलती पकड़ लेते थे । 
ऐसे ही एक थे बापू ।
 उन्हें गिरवर बौहरे के नाम से नई पीढ़ी का शायद ही कोई व्यक्ति जानता हो । हर कोई उन्हें बापू ही कहता था । बापू बड़े स्पष्टवादी , सरल और सहृदय थे । गोरा तांबई रंग । उच्च ललाट । लगभग पैंसठ-सत्तर वर्ष की उम्र । कसा हुआ शरीर और निश्चिन्त मुखर हँसी । उन्होंने दो-चार किताबें (कक्षाएं) ही पढ़ी होंगी लेकिन मानस-पाठ सुनते हुए वे दोहा--चौपाइयों का बड़ी गहन और व्यापक व्याख्या करते थे । जितनी आसानी से वे अपनी त्रुटि या अल्पज्ञता को स्वीकार कर लेते थे उतनी ही स्पष्टता से वे आलोचना भी करते थे । वे हर तरह के सांस्कृतिक--आयोजनों में श्रोता बनकर बैठना और प्रस्तुतियों की आवश्यक प्रशंसा या आलोचना करना कभी नही छोड़ते थे । आलोचना भी उनकी कम तीखी नही होती थी । यही कारण था कि उनके सामने गाने के लिये लोग गीत-भजनों का चुनाव सोच-समझकर करते थे । एक दिन शर्माजी बड़ी मेहनत के बाद स्वयं एक फिल्मी गीत की तर्ज पर भजन रचकर लाए ।

फिल्मी गीतों की तर्ज पर भजन बनाने और गाने की परम्परा ने मौलिक ,पारम्परिक भजन व गीतों को विलुप्त सा कर दिया है । जो गीत चल पड़े हैं उन्ही पर किसी भगवान का नाम जोड़कर भजन का नाम दे दिया जाता है । मुझे याद है यह फिल्मी गीतों की तर्ज पर बने भजन मैं बचपन से ही सुनती आ रही हूँ । हालाँकि इसका विस्तार अधिक सुनाई देता है . अनेक प्रसिद्ध और प्रतिभाशाली गायक भी  इस तरह बने भजन खूब गा रहे हैं . 
दूसरे कई लोगों की तरह मैं भी इस परम्परा को ठीक नही मानती क्योंकि कई लोग तो मात्र गीत के मुखड़ें में मनपसन्द भगवान का नाम जोड़कर धड़ाधड़ नए नए भजन बनाकर गाते रहते हैं । महिला-मण्डलियों में गाए जाते गीतों के कुछ उदाहरण देखिये---"हम तो चले आए भोले तुमको मनाने , चाहे तू माने चाहे न माने ।" ( हम तो तेरे आशिक..)
"आज तुम्हारी पूजा का खयाल दिल में आया है इसीलिये अम्बेरानी का दरबार सजाया है ।"( शायद मेरी शादी का खयाल) 
"आई हो मैया मन्दिर में तुम बहार बनके "( आए हो मेरी जिन्दगी में ) 
"मेला लगाsss"( काँटा लगा..,यह तो प्रसिद्ध भजन गायक का गीत है )
फिल्मी तर्ज पर लोग धड़ाधड़ नए नए भजन बनाकर गा रहे हैं । एलबम निकाल रहे हैं । हालाँकि गीत बनाना आसान है जबकि उसे संगीत देना बेशक कठिन काम है । 
इसलिये आसान राह यही लगती है कि फिल्मी तर्ज का इस्तेमाल कर भजन या किसी भी तरह का गीत बना लिया जाय । बड़े-बड़े संगीतकार भी तो कहीं से नकल करके या अपनी ही पुरानी धुनों में जरा सा हेरफेर करके नए गीतों की धुनें तैयार कर रहे हैं । 
हाँ तो शर्माजी एक स्वरचित भजन लेकर आए ।शर्माजी को गाने का शौक है । "गाना आए या न आए गाना चाहिये" , के सिद्धान्त पर चलते हुए वे न केवल हर जगह गाते हैं बल्कि मानते भी हैं कि उनको गाने का पर्याप्त ज्ञान व अभ्यास है । वे औरों से अच्छा गा सकते हैं ,गाते हैं । सो उन्होंने सबसे पहले हारमोनियम अपने हस्तगत किया और दो तीन बार खखारकर गला साफ करते हुए शुरु किया----
"गणपति कीर्त्तन में आना होगा , भक्तों को दर्शन देना होगा ।
मेरा सुन्दर सपना पूरा करना होगा ...।" 
उन दिनों 'जीवन-मृत्यु' का गीत-"झिलमिल सितारों का.", 'बिनाका गीतमाला' में धूम मचा रहा था । 
अब समस्या यह थी कि " आंगन sss होगा और " सितारों का.." कहते हुए लता जी का स्वर-कौशल व माधुर्य कानों में जितना रस घोलता है वहीं "आना होगा " ,में शर्मा जी का कंण्ठ को भीचकर "आना..इ होगा "....कहना दाल में आए कंकड़ की तरह अखर रहा था और ऊपर से गणेश जी पर 'आना होगा' का दबाब..धौंस । बार-बार 'आना होगा' ..'लाना होगा' , 'देना होगा ' जैसे टुकड़ों को सुनते-सुनते बापू अपने आप को किसी तरह नियंत्रित करते हुए बैठे तो रहे लेकिन जैसे ही शर्मा जी उठकर चले गए ,उनका आक्रोश फूट पड़ा----"वाह री गवैया की पूँछ । 'धीय कौ मुरगा' ( बेटी का बेटा । बेवकूफ । हिकारत को व्यक्त करता स्थानीय शब्द। प्रायः बेटी की सन्तान को दूसरे कुल की माना जाता है इसलिये पोते-पोतियों से कमतर भी ) ..."आना होगा "...अबे,  होगा क्यों ?...का भगवान तेरे बाप का कर्जदार है कि तेरा नौकर, जो तेरी धौंस सुनकर दौड़ा चला आएगा ? 
दर्शक हँस हँसकर बेहाल थे पर बापू की भौंहें जो चढ़ी तो फिर दो चार कर्णप्रिय भजन सुनकर ही उतरीं ।
बापू के उस विरोध का ही प्रभाव था कि लोगों ने गीत रचते समय भावों का भी ध्यान रखना शुरु किया ।कई बार ऐसा होता है कि गीत की धुन बहुत ही अच्छी लगती है लेकिन शब्द हर जगह गाने लायक नही होते ।तब भी फिल्मी तर्ज का सहारा ले लिया जाता है ।पर वह कला की कंगाली ही कही जाएगी ।
उसी धारा में बहते हुए मैंने भी दुर्गाजी की आराधना में कुछ गीत लिखे हैं । लेकिन मैंने वे ही गीत चुने हैं ,जिनमें लोकधुनों का रंग है या  जिनके श्रोता अब ज्यादा लोग नही हैं । कम से कम नई पीढ़ी तो नही । जैसे एक पुराना गीत --"तेरे सदके बलम..." मुझे बहुत प्रिय है उसे गाने के लिये मैंने भजन बनाया था--

"मेरे देखो न गुण, रखलो शरण ,
अम्बे सुनलो अब मेरी पुकार ।
आखिरी आसरा तेरा द्वाsssर ...।

टूटी है नैया ,सुन मेरी मैया 
सागर है गहरा अपार ।
उल्टी हवाएं गुम हैं दिशाएं कैसे मैं जाऊँगी पार.. ।।
देखो मैया  जाऊँगी कैसे मैं पा....र । मेरे देखो न ...।

सुख हो या दुख हो ,तू ना विमुख हो 
हर पल रहे तेरा ध्यान 
चलती रहूँ मैं ,गाती रहूँ मैं टूटे न लय और तान ।
अम्ब मेरी टूटे न लय और ता....न । मेरे देखो न गुन..।"
(एक कड़ी और भी है)
शब्दों और भावों के प्रति यहाँ जो चैतन्यता दिख रही है उसके पीछे कहीं न कहीं बापू के उस सवाल " होगा क्यों"  से मिली प्रेरणा भी है । ऐसे लोग अब बहुत कम रह गए हैं ।



शनिवार, 23 अगस्त 2014

तमाशा

सोनपुरा मोहल्ला में जैसे ही किसी लोकल-चैनल के रिपोर्टर पहुँचने की सूचना मिली महिलाएं ,बच्चे ,जवान, बूढ़े उसी तरह आशा ,उल्लास व कौतूहल से भर गए जैसे सुदूर अंचल में  साड़ी बेचने वाले या बिसाती के जाने पर महिलाएं हुलास से भर उठतीं हैं । 
लोग इस तरह दौड़ पड़े मानो उन्हें पानी का टैंकर आने का समाचार मिल गया हो । 
जो जिस हाल में था वह वहाँ आगया जहाँ कैमरा व माइक सम्हाले दो मीडियाकर्मी खड़े थे । 
"हम शहर के इस उत्तर पश्चिम इलाके सोनपुरा में खड़े हैं "--माइक सम्हाले एक भारी-भरकम आदमी ने बोलना शुरु किया-- "अब मैं एक एक करके लोगों से यहाँ की समस्याओं के बारे में जानकारी लेने जा रहा हूँ ।"
कुछ लोग एकदम सम्हल गए । कैमरे के सामने तरीके से खड़ा होना चाहिये । कुछ लड़के हँस रहे थे और कुछ इस तरह की मुद्रा बनाए थे मानो वे इस कार्यक्रम की खास शख्सियत हैं । उनके मोहल्ला में टीवी के रिपोर्टर आए हैं यह क्या कम है ।
"हाँ माताजी आप बताएं"--मीडियाकर्मी ने बहुत ही शिष्टाचार व विनम्रता से कहते हुए एक महिला के सामने माइक बढ़ाया हालाँकि महिला की उम्र गहरे रंग वाले स्थूलकाय व्यक्ति से कुछ कम ही होगी ।
"पानी गन्दौ आइ रऔ है । भारी बदबू ..।" 
"और बताइये..।"
"बरसा होती है तब पानी घरों में भर जाता है। बिजली 'भौत' कम आती है।"
"और क्या-क्या परेशानियाँ है...?"
मीडियावाले को एक ही जगह सवाल करते देख एक युवकनुमा आदमी अपने बालों पर हाथ फेरते हुए और शर्ट का कॉलर ठीक करते हुए माइक के सामने आया कि कहीं उसका मौका न चूक जाए । बीच में ही बोला---- "समस्या साहब एक थोड़ी है । पानी तो फुल सीवर का आ रहा है। गन्दगी आप देख ही रहे हैं । मैं कार्यालय के पच्चीस चक्कर लगा चुका मेरा आईडी नम्बर कोई नही दे रहा । सर आप ही कुछ......
"आप बताएं अम्माजी "----मीडिया वाले ने युवक की बात पूरी होने से पहले ही माइक एक बुढ़िया के सामने कर दिया । बुढ़िया काँपती हुई बोली----"बे..टा का बताऊँ ! 'पेंसिल' ना मिल रई चारि महीना ते । भूखनि मरिबे की नौबति आइ गई है । 'सिकात' लेकर गई तो एक आदिमी नै दरबज्जे से ही भजाइ दई । कोऊ सुनिबो बारौ नईं हैं ।...मेरौ जबान बेटा तो 'अकसीडेंट' में....।" 
बूढ़ी अम्मा रोने लगती इससे पहले ही वह दूसरी तरफ चला गया । कैमरे की ओर देखकर बोलने लगा । 
"जी हाँssss आप देख रहे हैं.... आप देख सकते हैं कि यह है बाssर्ड ग्यारह और मेरे बाईं तरफ है बाssर्ड दस । ग्यारह और दस के बीच फँसे हैं येsssलोग । गन्दा पानी पीने मजबूर । बिजली की समस्या भी है । जैसा कि आप देख सकते हैं कि लोग किस तरह परेशान हैं । कोईssssसुनने वाला नही है । 
इस बीच कैमरा अपनी ओर आते देख लोग हाथ हिलाकर ऐसे मुस्करा रहे थे जैसे उन्हें कोई अवार्ड मिल गया हो । जिनकी तरफ कैमरा नही जा रहा था वे धक्का-मुक्की करके आगे आना चाह रहे थे । तभी एक अधेड़ बिना बुलाए सामने आगया और मीडिया कर्मी से बोला--"साहब ,आपकी तरह और भी लोग यहाँ की रिपोर्ट ले गए हैं पर कुछ नही हुआ । हमारी बिनती है कि आप पार्षद अलोपी सिंह को पकड़ें । हम लोग नरक की जिन्दगी जी रहे हैं और वह मजे में ए सी में सो रहा है । आप कहें तो उसके मुँह पर कहदूँ कि पक्का खाऊ है । क्या इसके लिये जिताया था । जीतने के बाद इधर सूरत दिखाने तक नही आया ..।"
"देखिये "---मीडिया-कर्मी सतर्क हुआ और सधे हुए स्वर में बोला---" हम आपकी परेशानी समझ रहे हैं पर आप सम्हलकर बोलें । सधे हुए शब्दों में अपनी बात कहें ।टीवी पर आपको लोग देख रहे हैं । शिष्ट भाषा का प्रयोग करें । किसी के लिये अपशब्द या गाली जैसे शब्दों का प्रयोग न करें ।" 
"साहब मैंने गाली तो दी नही है । सही बात को आप गाली कहते हैं !हम जिस दिन गाली पर उतर आए तो.... "--आदमी कहता रहा लेकिन मीडिया कर्मी पहले ही उसकी तरफ से माइक हटा चुका था और अब वह खुद कैमरे को अपनी बात सुना रहा था---
"आप देख रहे हैं लोगों में गुस्सा है । लोग परेशान हैं । हम इसी तरह शहर की समस्याओं से आपको रूबरू कराते रहेंगे । आप देखते रहिये 'आजकल'  । हम फिर किसी बार्ड की समस्या को लेकर आपके सामने फिर हाजिर होंगे । कैमरामैन नकुल के साथ मैं तिलकराज । याद रखिये कल इसी समय इसी चैनल पर । नमस्कार ।" 
कुछ ही पलों में गाड़ी ढेर सारा धुँआ छोड़कर चली गई और साथ ही  उस गन्दी सी बस्ती में एक हलचल ,जो काई जमे पानी पर फेंके कंकड़ से हुए सूराख सा अल्पकालिक ही सही,लोगों को ऊब से राहत देता है । लोग इस बात से उत्साहित थे कि कल वे टीवी पर दिखाई देंगे । और इसी बहाने वे कुछ देर अपनी समस्याओं को भूल गए थे ।