Thursday, October 7, 2010





शिवम् है कि मानता नही ।


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शिवsss म्.....।

माँ पुकारती है ।

दिनभर बैठे--बैठे ,बीडी बनाते

झाडू-पौंछा या चौका--बर्तन करते,

थकी हुई माँ ..।

हाथ से बहुत पीछे छूट गए सपनों की याद में ,

कहीं रुकी ह्ई माँ

और बैठे-ठाले, शराबी , दस साल बडे ,

खाँसते--खखारते पति की मर्दाना माँगों से

ऊबी--छकी माँ,

सारा गुस्सा उतारती है अक्सर,

आठ साल के शिवम् पर ।

जो उग आया है शायद

जिन्दगी की जमीन पर ।

अपने आप उग आई घास की तरह

जमीन को हरियाली से मढ रहा है ।

बिना पानी--खाद के बढ रहा है ।

माँ कोसती रहती है उसकी हँसी को ।

खेलने की खुशी को ।

अरे , शिवsssम् ---मर जा तू,

ठठरी बँधे , आग जले ,

मेरी जान न खा तू ।

खेलता रहता है दिन भर ।

खेलना बन्द कर , आ...

चल मेरे साथ बीडी बनवा ।

पत्ते काट , तम्बाकू भर ।

हजार बीडियों का कोटा पूरा करवा ।

चुलबुला शिवम् बैठ जाता है,

बीडी बनबाता है ।

झूठे गुस्से से तनी हुई ।

सायास गम्भीर बनी हुई

माँ को देख खिलखिलाता है ।

माँ दाँत पीसती है ---अरे , मरे, होंठ बन्द कर ।

थोडा तो डर ,कि निकाल कर दे दूँगी ,

पूरी बत्तीसी तेरे हाथ में ।

ही..ही..ही..---शिवम् फिर खिलखिलाता है ।

माँ की इन धमकियों को मानता नही ।

बुत बन कर रहना वह जानता नही ।

और कुछ ही देर बाद ,

खो जाता है

अपने साथियों में ।

माँ चिल्लाती है ,गालियाँ देती है ।

शिवम् खिलखिलाता रहता है ,

अक्सर यूँ ही


14 comments:

  1. एक बेहद गम्भीर बात को , ज़िन्दगी के दर्शन को बेहद संजीदगी से कह दिया।

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  2. एक वास्तविकता को बहुत सुंदर तरीके से तरीके से लिखा है...बधाई

    http://shikanjee.blogspot.com/

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  3. गरीबी पर और घर गृहस्थी की ज़िम्मेदारी निबाहती स्त्री पर सशक्त कविता ..


    कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

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  4. एक माँ और उसकी संतान की समानांतर व्यथा को व्यक्त करती मार्मिक रचना.. कृपया कविता की पंक्तियों को सुव्यवस्थित कर लें ताकि कविता का कलेवर भी सुंदर दिखे...

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  5. @ संगीता दी... आपकी सलाह मान ली गई है!मेरी टिप्प्णी सीधी छप गई..

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  6. धन्यवाद संगीता जी ,व सलिल जी । सीखने की प्रक्रिया में आपकी सलाह और टिप्पणियाँ बडे काम की हैं ।

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  7. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति!

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  8. गरीब माँ की व्यथा और बच्चे की बाल सुलभ बालपन का सुन्दर और सशक्त चित्रण.

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  9. ek majboor maa aur uske chulbule bete kee nabz bahut hi sahi pakdee aapne .....rachna bahut hee umda hai ...aur mujhe khushi hai kee aap mere blog tak aayeen ..mujhe padha aur aap se mil saka...ab aataa rahunga.... bahut bahut dhanywaad aap ka

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  10. सशक्त रचना...बधाई.

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  11. एक बार यहाँ भी देखें ...

    http://charchamanch.blogspot.com/2010/10/20-304.html

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  12. हमारे आस पास के अदृश्य अनदेखे संसार के धूप छांही छटा का बेहद मर्मस्पर्शी और सटीक अभिव्यक्ति जो आहिस्ता से दिल में उतरती है और देर तक गूंजती रहती है. बेहद खूबसूरत प्रस्तुति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

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  13. 4/10

    सुन्दर, सहज व सरल लेखन
    लेकिन कविता नदारद है
    इसे एक कहानी की तरह ही पढ़ा जाएगा

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