Monday, August 30, 2010

किसलिये !!

आज ही पढा--अगर किसी पर भरोसा करो तो पूरी तरह , बिना सन्देह के करो ।क्योंकि तब दो में से एक मिलना तो तय है---या तो जिन्दगी का सबक या एक अच्छा साथी ।...बात सही है पर सबक को सहने-स्वीकारने के लिये तैयार होना बडे साहस का काम है । गहन विश्वास व स्नेह का प्रतिफल भी यदि सबक के रूप में सामने आए तो उस वेदना का कोई अन्त नहीं है । पूरी जिन्दगी बिखर जाती है ,आलपिन निकले दस्तावेजों की तरह.....। निराशा भी बडे निराशाजनक तरीके से अभिव्यक्त होती है ,इस गीत की तरह---

बीहडों की कंकरीली राह सी हुई।
जिन्दगी यूँ किसलिये गुनाह सी हुई ?

यह जो सन्ताप है ,
किसका अभिशाप है ।
गीत बन सका न दर्द,
बन गया प्रलाप है ।
सौतेले रिश्तों के डाह सी हुई।
जिन्दगी यूँ किसलिये गुनाह सी हुई ?

उम्मीदें काई पर चलतीं ,फिसलतीं हैं ,
जितना समेटूँ ये और भी बिखरतीं हैं ।
मुट्ठी से रेत के प्रवाह सी हुई।
जिन्दगी यूँ किसलिये गुनाह सी हुई ?

याद नहीं अपना सा ,
कौन कब हुआ ।
बीच में हमेशा ,
दीवार था धुँआ।
गैरों के घर में पनाह सी हुई।
जिन्दगी यूँ किसलिये गुनाह सी हुई ?

आशाएं ठगतीं हैं ।
ठहरी सी लगतीं हैं ।
टूटी हुईं शाखें 
मधुमास तकतीं हैं ।
शाम ढले धूमिल निगाह सी हुई।
जिन्दगी यूँ किसलिये गुनाह सी हुई ? 

बीहडों की कंकरीली राह सी हुई ।
जिन्दगी यूँ किसलिये गुनाह सी हुई ।





Tuesday, August 24, 2010

राखी के बदले

राखी के बदले


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नभ के हिंडोले पर, झूल रहीं घटाएं ।

गा रहीं हैं मल्हारें , रिमझिम फुहारें ।

इस बार राखी पर ,

बाँधूँगी भैया ,तुम्हारी कलाई पर ,

रेशमी डोरी आत्मीयता की ।

सजाऊँगी आरती आँखों में ।

और लगाऊँगी माथे पर ,

टीका विश्वास का ।

तुम भी , भैया इस बार ,

राखी के बदले --रुपए न देना ।

न ही कोई उपहार ।

दे सको तो दे देना मुझे ,

बचपन का एक दिन ।

जी लेना मेरे साथ ,

उस आँगन में बिताए कुछ मीठे पल ,

जहाँ हम मिल कर खाते -खेलते थे ।

और चिडियों की तरह चहकते थे ।

और ढँढ देना मेरी वो अठन्नी भी ,

जो खो दी तुमने बडे होते--होते ॥।

यदि कुछ खरीदना ही हो ,( राखी के बदले )

तो खरीद देना गाँव की हाट से ,

रंगीन रिबनों में लिपटा स्नेह ।

काँच के कंगनों में खनकती उन्मुक्त हँसी ---

जो कही खोगई सी लगती है ।

हो सके तो मेरे भैया ,

तुम छुट्टी लेकर आजाना ।

बरस जाना , सूखी फसल पर ।

भर जाना ----गाँव की सूखी पोखर ।

संझा-बाती की बेला में ,

जला जाना माँ की पूजा का दीपक ।

और ढूँढ देना ,

कहीं रख कर भूला हुआ

माँ का चश्मा ।