Thursday, October 27, 2011

कही छूट जाना एक 'चकरी ' का

इस बार मैं दीपावली पर बैंगलोर न जा सकी । बच्चों के बिना त्यौहार फीका न लगे इस विचार से मयंक(छोटा बेटा) ही यहाँ आगया ।
मयंक में बचपन से ही छोटी-छोटी चीजों को भी जितने विस्तार संवेदना व गहराई से देखने की क्षमता है, मुझमें आज तक भी नही है। आज वह बहुत सारे पटाखे, फुलझडियाँ ,अनार और चकरियाँ खरीद लाया । चकरी उसे खास तौर पर पसन्द है । जब बेशुमार किरणों के साथ वह पूरे आँगन में चक्कर लगाती हुई घूमती है तो लगता है जैसे यह विष्णु भगवान का चक्र है जो अँधेरे को काट रहा है । या अँधेरे की नदी में बेहद चमकीला भँवर है जो धारा को अवरुद्ध कर फैलता जा रहा है या आसमान से बिछडा कोई सितारा है जो जमीन पर गिर कर चकरा रहा है । या फिर कोई तारा मछली भटक कर समुद्र से निकल धरती पर आगई है और जल बिन अकुला रही है ।
बाजार से आते ही उसने बैग से निकाल-निकाल कर मुझे सारी चीजें दिखाईं । तेज धमाके वाले कई बम ,कई तरह की फुलझडियाँ ,अनार ,रेल और ...चकरियाँ..
"अरे !चकरियों वाला डिब्बा कहाँ है माँ ? पूरा डिब्बा था । काफी बडी चकरियाँ लाया इस बार जो देर तक घूमतीं हैं ।"
"अच्छा ! लेकिन बेटा भला मैं कैसे जान सकती हूँ ! लाकर तो तूने ही रखा है । ठीक से देख । होगा यहीं कहीं । जाएगा कहाँ!"
मैं पूजा सजाने में व्यस्त थी लेकिन वह यहाँ वहाँ ढूँढने लगा तो मैं भी उसके साथ देखने लगी और कुछ चिन्तित भी हुई । न केवल उसकी खुशी का खयाल करके बल्कि पैसों के व्यर्थ चले के कारण भी । लेकिन मुझे देख कर वह झट से बोला --"छोडो माँ , जाने दो ।"
रात को सोने से पहले वह काफी संजीदा था । मेरे पूछने पर कहीं डूबती हुई सी आवाज में बोला--" माँ आजकितनी आसानी से कह दिया कि जाने दो उन चकरियों के लिये जिन्हें हम कभी एक-एक रुपया जोड कर खरीदते थे । कितने चाव से पटाखे -फुलझडियाँ लाते थे और एक-एक चीज को एक-एक चीज को कैसे गिन-सहेज कर रखते थे ! एक भी फुलझडी या चकरी कम होजाने पर जैसे सारा गणित ही गडबडा जाता था हमारा ।"
"अब इतना सोचने की क्या बात है बेटा ! यह तो समय-समय की बात है । आज इतनी गुंजाइश है कि चीजों के खोने पर चिन्ता न करनी पडे ।"-मैंने कहा ।
"यही तो माँ !"-- वह कहीं खोया हुआ सा कहने लगा---कहाँ तो एक चकरी का कम होना ही अखर जाता था कहाँ अब पूरा डिब्बा खोने का भी कोई मलाल नही । यह बेशक हमारी आर्थिक उन्नति का सूचक है । पर प्रतीकात्मक रूप से ये -"छोडो, जाने दो" जैसी तसल्लियाँ क्या उस संवेदन-शून्यता को नहीं दर्शातीं जिसके चलते किसी भी भावनात्मक क्षति को अब सहजता व हल्केपन से लिया जाना एक जरूरत बन रहा है । उस एक चकरी से मिली खुशी को हम अब किसी कीमत पर खरीद नही सकते यही नही हम उसके प्रति लापरवाह हो भी चले हैं जो हमारे जीवन को सरस व समृद्ध बनाती है और माँ यह तो बताने की बात नही है न कि समृद्धि केवल पैसा आजाना नही है ।"
मयंक की बातें मुझे आश्वस्त तो करतीं हैं पर कहीं चिन्तित भी । पता नही क्यों।

Tuesday, October 25, 2011

चकमक और मैं


आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभ-कामनाएं ।
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22 अक्टूबर को चकमक के तीन सौ वें अंक का विमोचन भारत-भवन( भोपाल) में श्री गुलजा़र जी द्वारा किया गया । इस अवसर पर उनके अलावा और भी अनेक प्रख्यात साहित्यकार थे । एक तरह से चकमक से जुडे सभी लोगों के लिये यह काफी महत्त्वपूर्ण अवसर था । मेरे लिये भी ।


सन् 1986 में चकमक से मेरा परिचय अँधेरे कमरे में टार्च हाथ लग जाने जैसा हुआ था । उन दिनों में उसी गाँव के उसी स्कूल में पढाया करती थी जहाँ कुछ साल पहले मैं खुद पढी थी । मुख्य सडक से काफी दूर हमारा गाँव तब हर सुविधा से वंचित था आठवीं व ग्यारहवीं कक्षा तो सात-आठ कि. मी.पैदल जा जाकर पास करलीं थी और बी. एम.ए. के प्रमाण-पत्र बच्चों को पालते-सम्हालते हुए स्वाध्याय द्वारा हासिल कर लिये थे ।मतलब कि बाहर की दुनिया से कोई खास परिचय नही था । खास तौर पर पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य से ।(आज भी मैं कूप-मण्डूक ही हूँ) जो कुछ भी पाठ्यक्रम में आया ,ज्ञान वहीं तक सीमित रहा । यों लिखने का शौक तो ग्यरहवीं कक्षा से ही शुरु होगया था । और सात-आठ कहानियाँ व कविताएं व गीत तभी लिख डाले थे । यही नही एक बाल उपन्यास भी लिख डाला जिसका एकमात्र पाठक मेरा छोटा भाई ही रहा । खैर वह उपन्यास व कहानियाँ तो नष्ट हो गईँ पर कविताएं अभी भी हैं लगभग दो सौ गीत ---जाने कौन जिन्दगी में यह नव-परिवर्तन लाया ..या मैं तुमको पहचान न पाई ..आदि । पर वे सब अप्रकाशित रचनाएं आत्म-केन्द्रित सी हैं और उन्हें साहित्य की श्रेणी में रखने का दुस्साहस नही करूँगी ।
चकमक का आना एक नयी राह मिलने जैसा था । हालाँकि उसके बाद मैंने कोई सृजन के कीर्तिमान नही बनाए फिर भी पहली बार हुई हर घटना अविस्मरणीय होती ही है । यह चकमक ही है जिसमें पहली बार मेरी कोई रचना प्रकाशित हुई । वह रचना एक कविता थी--मेरी शाला चिडिया घर है ..। इस कविता के प्रकाशन विषयक एक रोचक प्रसंग है जिसे फिर कभी लिखूँगी । हाँ इसके बाद चकमक का हर अंक मेरे लिये कुछ न कुछ लाता रहा और मुझसे खींच कर रचनाएं भी लेजाता रहा । एक शिक्षिका होने के नाते चकमक से मैंने बहुत कुछ सीखा । बहुत अधिक तो नही पर अब तक चकमक में मेरी लगभग पचास रचनाएं आ चुकीं हैं । मैं मानती हूँ कि अगर चकमक से न जुडी होती तो शायद ये रचनाएं भी न बन पातीं । इस अर्थ में अच्छी पत्रिकाओं से वंचित रहना एक बडी हानि है पाठक व लेखक दोनों की ।
कलेवर की दृष्टि से चकमक अब सचमुच चकमक होगई है । शानदार रंगीन पृष्ठ ,चित्र आकर्षक आवरण और प्रख्यात देशी-विदेशी रचनाकारों की रचनाएं । सम्पादक भाई सुशील शुक्ल अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग करते प्रतीत होते हैं । मैं जब चकमक से जुडी थी तब चकमक के सम्पादक श्री राजेश उत्साही थे । उस समय क्योंकि पत्रिका का आरम्भकाल था सो भले ही इतना बाह्याकर्षण नही था लेकिन सामग्री का स्तर किसी भी स्तर पर कम नहीं था । खैर ,यहाँ उस पहली रचना को पुनः दे रही हूँ ---

"मेरी शाला है चिडिया-घर ।
हँसते खिलते प्यारे बच्चे ,
लगते हैं कितने सुन्दर ...।
(1)फुदक-फुदक गौरैया से ,
कुर्सी तक बार-बार आते ।
कुछ ना कुछ बतियाते रहते,
हरदम शोर मचाते ।
धमकाती ,---डर जाते ,
हँसती,------ तो हँसते हैं,
मुँह बिचका कर .। मेरी शाला .....
(2)तोतों सा मुँह चलता रहता,
गिलहरियों से चंचल हैं ।
कुछ भालू से रूखे मैले ,
कुछ खरहा से कोमल हैं ।
दिन भर खाते उछल-कूदते ,
मानो वे हैं नटखट बन्दर ।
मेरी शाला ........
(3)हिरण बने चौकडियाँ भरते ,
ऊधम करते जरा न थकते ।
सबक याद करते मुश्किल से ,
बात-बात पर लडते --मनते ।
पंख लगा उडते से लगते ,
आसमान में सोन -कबूतर ।
मेरी शाला.....।
(4)पल्लू पकड खींच ले जाते ,
मुझको उल्टा पाठ पढाते ।
बत्ती खोई...धक्का मारा ...,
शिकायतों में ही उलझाते ।
और नचाते रहते मुझको ,
रखना काबू कठिन सभी पर ।
मेरी शाला ....।
(5)पथ में कहीं दीख जाती हूँ ,
पहले तो गायब हो जाते ,
कहीं ओट से दीदी--दीदी----
चिल्लाते हैं ,फिर छुप जाते ।
कान पकड लाती हूँ तो ,
अपराधी से होजाते नतसिर ।
मेरी शाला .....
(6)जरा प्यार से समझाती हूँ ,
तो बुजुर्ग से हामी भरते ।
पर वे ऐसे मनमौजी ,
अगले पल अपने पथ पर चलते ।
बातें मेरी भी सुनते हैं ,
पर लगवाते कितने चक्कर ।
मेरी शाला ....
(7)गोरे ,काले ,मोटे पतले ,
लम्बे ,नाटे ,मैले ,उजले ।
कोमल ,रूखे ,सीधे ,चंचल,
अनगढ पत्थर से भी कितने ।
पर जितने ,जैसे भी हैं ,
मुझको लगते प्राणों से बढकर ।
मेरी शाला है चिडियाघर ।
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