Friday, April 19, 2013

इसलिये कि....


मैंने अगर की है कोई भूल ,
तो इसलिये नहीं कि
भूल जाओ मुझे तुम
अपनी किसी भूल की तरह ही ।
और बनालो रास्ता
दूर जाने का
मुझसे, अपने आपसे ।
बल्कि इसलिये कि
शिकायत करो ।
कारण पूछो मेरी भूल का
जरूरी लगे तो दे दो सजा भी ।

अगर मैंने कुछ ऐसा कहा जो
बेबुनियाद हो तुम्हारी नजर में
तो मत रहो यों मौन
चुपचाप एक दीवार बनाते हुए ।
तर्कों और बहसों से साबित करो
उसे झूठा...,
यों संवाद तो चलेगा
किसी तरह ही....।

टाँग दिये हैं मैंने कितने ही सवाल,
तुम्हारी दीवार की खूँटी पर
इसलिये नही कि
रद्दी कपडा समझ कर फेंक दो
कचरे के डिब्बे में
बल्कि इसलिये  कि
पूछो तो उन सवालों की जमीन
कहाँ से ,कैसे उगे
संवाद रहे जारी यूँ भी....।

तुम इसे अज्ञान कहते हो
कि मैंने रखीं हैं अपेक्षाएं आज तक
नकारकर तुम्हारी हर निरपेक्षता
इसलिये नही कि
आकर चुनो काँटे मेरी राह के
दे दो सहारा मेरे लडखडाने से पहले
बल्कि इसलिये कि
तुम हो मेरे अपने
अपने, जो अहसास कराते हैं 
मुझे मेरे अपने होने का 
मुझे नही मालूम कि
निरपेक्ष कैसे रहा जाता है
अपनों से .....।

12 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (20 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  2. तो मत रहो यों मौन
    चुपचाप एक दीवार बनाते हुए ।
    तर्कों और बहसों से साबित करो
    उसे झूठा...,
    यों संवाद तो चलेगा
    किसी तरह ही....।
    बहुत उम्दा अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,,,
    RECENT POST : प्यार में दर्द है,

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  3. दीदी,
    इस कविता ने मुझे मेरे परिवार की परंपरा याद दिला दी... हमारे यहाँ आज भी यही होता है.. भूल की शिकायत, उसकी कैफियत और उसकी माफी या सज़ा... कुछ कहा तो बड़प्पन से कभी नहीं दबाया किसी बड़े ने.. तर्क और औचित्य की बुनियाद पर बात मानी या नकारी गयी.. हर सवालों के जवाब दिए गए, उन्हें "बेकार की बात" कहकर परे नहीं धकेला गया.. शायद याभी हमारे परिवार में सभी ने माना है, समझा है, जाना है..
    .
    तुम हो मेरे अपने
    अपने, जो अहसास कराते हैं
    मुझे मेरे अपने होने का
    मुझे नही मालूम कि
    निरपेक्ष कैसे रहा जाता है
    अपनों से .....।
    .
    अब तो आपकी कविता भी एक पाठ की तरह लगती है और स्वयं को विद्यार्थी पाता हूँ..
    प्रणाम स्वीकारें!!

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    1. सलिल भैया ,आपकी टिप्पणियाँ हमेशा प्रतीक्षित रहती हैं इसलिये अब सबसे पहले स्पैम देखती हूँ । हाँ आप रचनाओं को इतनी ऊँचाई दे देते हैं कि मैं बहुत नीचे पाती हूँ अपने आपको ।

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  4. इसलिए कि बहुत सारे प्रश्नों का जबाब तो है लेकिन फिर नया प्रश्न भी खड़ा हो जाता है , यही तो जीवन है ..........बहुत सुन्दर

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  5. बहुत सुन्दर रचना ....
    सच कहा आपने ,निरपेक्ष कैसे रहें अपनों से??
    मगर आपके अपने भी ऐसा ही सोचें तब न....
    दिल को छू गयी रचना.

    सादर
    अनु

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  6. तुम हो मेरे अपने
    अपने, जो अहसास कराते हैं
    मुझे मेरे अपने होने का
    मुझे नही मालूम कि
    निरपेक्ष कैसे रहा जाता है

    बहुत सुंदर और सटीक .....

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  7. ऐसी बातों से ही तो परिवार बनता है, अपने बनते हैं.. निरपेक्ष रहकर तो ईश्‍वर को पाया जा सकता है, इनसान को नहीं।

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  8. अंतर्मन तक कचोटता किसी का निरपेक्षी भाव.......प्रारम्‍भ में समझने में जटिलता हुई परन्‍तु अन्‍त तक आते-आते बहुत विचारणीय लगी आपकी लिखी पंक्तियां। कविता में छन्‍दबद्धता, भाव-स्‍पष्‍टता हो, सरलता हो तो उसमें डूब कर उसे जीवन माना जा सकता है। यदि आपकी यह कविता उपरोक्‍त अपेक्षित तत्‍वों से परिपूर्ण होती तो इसमें कविता-ग्राह्री के लिए एक स्‍मरणीय विचार है।

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