Tuesday, June 17, 2014

वनवास हुए हम

आखिरी पल में जीने की आस हुए हम ।
धुँधलाए नयनों की प्यास हुए हम ।

सौतेली माँ सी रही जिन्दगी 
इसलिये उम्रभर का वनवास हुए हम ।

हमें महकने खिलने की चाहत तो थी 
मगर रेशा-रेशा कपास हुए हम ।

रही लहलहाने की फितरत कहाँ 
पठारों पे सूखी सी घास हुए हम ।

गुजर जाएंगे गुल खिलाए बिना 
बियाबान मरु का मधुमास हुए हम ।

न देखा न जाना पर माना उन्हें 
कहा सबने अन्धा विश्वास हुए हम ।

बरसने लगें कब किसे है खबर 
उमडते पावस का आकाश हुए हम  ।
(1997)

8 comments:

  1. जीवन की सच्चाई यही है..

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  2. हम हैं कुछ अपने लिए, कुछ हैं ज़माने के लिये...!! इस लिहाज से देखा जाए तो यह कविता आधी सच है.. क्योंकि अपने लिये अपना आकलन है... लेकिन ज़माने की सोच क्या है इसका पता तो इस कविता के पीछे बोल रहा मैं या हम नहीं लगा सकता...
    इसे ज़रा सा हेरफेर कर ग़ज़ल के रूप में भी कहा जा सकता है दीदी!

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  3. बहुत प्यारी रचना है दी.....
    सलिल दादा ने टोक दिया वर्ना हम ग़ज़ल ही कहते इसे :-)
    सौतेली माँ सी रही जिन्दगी
    इसलिये उम्रभर का वनवास हुए हम ।
    बहुत ही बढ़िया !!

    सादर
    अनु

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  4. हुए हम क्‍या-क्‍या।

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  5. सौतेली माँ सी रही जिन्दगी
    इसलिये उम्रभर का वनवास हुए हम ।
    बहुत सादा, भावप्रद, मन को छूती हुयी सी रचना ... हर शेर नया बिम्ब संजोये ... लाजवाब ...

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  6. हमें महकने खिलने की चाहत तो थी
    मगर रेशा-रेशा कपास हुए हम।
    बहुत ही सुंदर भावपूर्ण अभिव्यक्ति....

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  7. सलिल जी से सहमति। बहुत सुंदर ग़ज़ल बन सकती है क्योंकि बहुत प्यारे शब्द और भाव हैं।

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  8. बहुत कुछ कहती रचना ,अपने ही लिए सोचते केवल, तो कुछ और होते पर ऐसा कहाँ हो पाता है !

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