गुरुवार, 5 दिसंबर 2024

अबूझ मन

 बहुत विचित्र है मन भी  

जहाँ भी जाना होता है ,

चल देता है हुमक कर

मुझसे पहले ही ।

बावज़ूद इसके कि 

कोई नहीं जानता इसे ।

नहीं सुनता-समझता  

कोई इसकी भाषा ।

फिर भी कहना चाहता है

अपनी बात ,

चाहे कोई सुने न समझे ।

सुनकर औरों की बातें ,  

मतलब निकाल लेता है,

अपनी तरह का ।

गढ़ लेता है कहानियाँ प्रेम की ,

संवेदना और लगाव की ।

दिल से दिल के जुड़ाव की ।

चल पड़ता है कहीं भी 

नंगे पाँव ही ,

बिना सोचे समझे

सुनकर सिर्फ दो बोल अपने से ।

नंगे पाँव लहूलुहान होते हैं 

काँटे कंकड़ चुभते हैं

जलते हैं गरम रेत पर ..

लेकिन भूल जाता है

पाकर जरा सी नमी ।

पा लेता ज़मीं ।

खुश रहता है ठगा जाकर भी । 

इसका कुछ नहीं होने वाला अब

फिर ‘कुछ’ होकर भी ,

आखिर होना क्या है !