मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

चकमक और मैं


आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभ-कामनाएं ।
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22 अक्टूबर को चकमक के तीन सौ वें अंक का विमोचन भारत-भवन( भोपाल) में श्री गुलजा़र जी द्वारा किया गया । इस अवसर पर उनके अलावा और भी अनेक प्रख्यात साहित्यकार थे । प्रयाग शुक्ल जी  और वरुण ग्रोवर से  काफी बातें हुई . वरुण ग्रोवर  और सुशील शुक्ल  कभी चकमक के बाल पाठक हुआ करते थे . आज आसमान छू रहे हैं . वरुण फिल्म लाइन  में  चले गए हैं और सुशील  चकमक  को नया रूप देने की कोशिश कर रहे हैं . सुशील बहुत अच्छे  रचना कार भी हैं . उत्साही जी  और उनकी श्रीमती  निर्मला से भी भेंट हुई .  चकमक से जुडे सभी लोगों के लिये यह काफी महत्त्वपूर्ण अवसर था । मेरे लिये भी ।
गुलज़ार जी व सुशील शुक्ल के साथ 


सन् 1986 में चकमक से मेरा परिचय अँधेरे कमरे में टार्च हाथ लग जाने जैसा हुआ था । उन दिनों में उसी गाँव के उसी स्कूल में पढाया करती थी जहाँ कुछ साल पहले मैं खुद पढी थी । मुख्य सड़क से काफी दूर हमारा गाँव तब हर सुविधा से वंचित था .आठवीं व ग्यारहवीं कक्षा तो सात-आठ कि. मी.पैदल जा जाकर पास करलीं थी और बी. ए. एम.ए. के प्रमाण-पत्र बच्चों को पालते-सम्हालते हुए स्वाध्याय द्वारा हासिल कर लिये थे ।मतलब कि बाहर की दुनिया से कोई खास परिचय नही था । खास तौर पर पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य से ।(आज भी मैं कूप-मण्डूक ही हूँ) जो कुछ भी पाठ्यक्रम में आया ,ज्ञान वहीं तक सीमित रहा । यों लिखने का शौक तो ग्यरहवीं कक्षा से ही शुरु होगया था । और सात-आठ कहानियाँ व कविताएं व गीत तभी लिख डाले थे । यही नही एक बाल उपन्यास भी लिख डाला जिसका एकमात्र पाठक मेरा छोटा भाई ही रहा । खैर वह उपन्यास व कहानियाँ तो नष्ट हो गईँ पर कविताएं अभी भी हैं लगभग दो सौ गीत ---जाने कौन जिन्दगी में यह नव-परिवर्तन लाया ..या मैं तुमको पहचान न पाई ..आदि । पर वे सब अप्रकाशित रचनाएं आत्म-केन्द्रित सी हैं और उन्हें साहित्य की श्रेणी में रखने का दुस्साहस नही करूँगी ।

चकमक का आना एक नयी राह  , नयी  दिशा मिलने जैसा था । हालाँकि उसके बाद मैंने कोई सृजन के कीर्तिमान नही बनाए फिर भी पहली बार हुई हर घटना अविस्मरणीय होती ही है । यह चकमक ही है जिसमें पहली बार मेरी कोई रचना प्रकाशित हुई । वह रचना एक कविता थी--मेरी शाला चिडिया घर है ..। इस कविता के प्रकाशन विषयक एक रोचक प्रसंग है जिसे फिर कभी लिखूँगी । हाँ इसके बाद चकमक का हर अंक मेरे लिये कुछ न कुछ लाता रहा और मुझसे खींच कर रचनाएं भी लेजाता रहा । एक शिक्षिका होने के नाते चकमक से मैंने बहुत कुछ सीखा । बहुत अधिक तो नही पर अब तक चकमक में मेरी लगभग पचास रचनाएं आ चुकीं हैं । मैं मानती हूँ कि अगर चकमक से न जुडी होती तो शायद ये रचनाएं भी न बन पातीं । इस अर्थ में अच्छी पत्रिकाओं से वंचित रहना एक बडी हानि है पाठक व लेखक दोनों की ।
कलेवर की दृष्टि से चकमक अब सचमुच चकमक होगई है । शानदार रंगीन पृष्ठ ,चित्र आकर्षक आवरण और प्रख्यात देशी-विदेशी रचनाकारों की रचनाएं । सम्पादक भाई सुशील शुक्ल अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग करते प्रतीत होते हैं । मैं जब चकमक से जुडी थी तब चकमक के सम्पादक श्री राजेश उत्साही थे । उस समय क्योंकि पत्रिका का आरम्भकाल था सो भले ही इतना बाह्याकर्षण नही था लेकिन सामग्री का स्तर किसी भी स्तर पर कम नहीं था ।,बल्कि कहीं अधिक ऊँचा था .  श्री राजेश उत्साही  बहुत ही कुशल व अनुभवी सम्पादक रहे . रचनाओं का चयन सम्पादन गज़ब था ... खैर ,यहाँ उस पहली रचना को पुनः दे रही हूँ ---

"मेरी शाला है चिडिया-घर ।

हँसते खिलते प्यारे बच्चे ,
लगते हैं कितने सुन्दर ...।
(1)फुदक-फुदक गौरैया से ,
कुर्सी तक बार-बार आते ।
कुछ ना कुछ बतियाते रहते,
हरदम शोर मचाते ।
धमकाती ,---डर जाते ,
हँसती,------ तो हँसते हैं,
मुँह बिचका कर .। मेरी शाला .....
(2)तोतों सा मुँह चलता रहता,
गिलहरियों से चंचल हैं ।
कुछ भालू से रूखे मैले ,
कुछ खरहा से कोमल हैं ।
दिन भर खाते उछल-कूदते ,
मानो वे हैं नटखट बन्दर ।
मेरी शाला ........
(3)हिरण बने चौकडियाँ भरते ,
ऊधम करते जरा न थकते ।
सबक याद करते मुश्किल से ,
बात-बात पर लडते --मनते ।
पंख लगा उडते से लगते ,
आसमान में सोन -कबूतर ।
मेरी शाला.....।
(4)पल्लू पकड खींच ले जाते ,
मुझको उल्टा पाठ पढाते ।
बत्ती खोई...धक्का मारा ...,
शिकायतों में ही उलझाते ।
और नचाते रहते मुझको ,
रखना काबू कठिन सभी पर ।
मेरी शाला ....।
(5)पथ में कहीं दीख जाती हूँ ,
पहले तो गायब हो जाते ,
कहीं ओट से दीदी--दीदी----
चिल्लाते हैं ,फिर छुप जाते ।
कान पकड लाती हूँ तो ,
अपराधी से होजाते नतसिर ।
मेरी शाला .....
(6)जरा प्यार से समझाती हूँ ,
तो बुजुर्ग से हामी भरते ।
पर वे ऐसे मनमौजी ,
अगले पल अपने पथ पर चलते ।
बातें मेरी भी सुनते हैं ,
पर लगवाते कितने चक्कर ।
मेरी शाला ....
(7)गोरे ,काले ,मोटे पतले ,
लम्बे ,नाटे ,मैले ,उजले ।
कोमल ,रूखे ,सीधे ,चंचल,
अनगढ पत्थर से भी कितने ।
पर जितने ,जैसे भी हैं ,
मुझको लगते प्राणों से बढकर ।
मेरी शाला है चिडियाघर ।
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बुधवार, 28 सितंबर 2011

हम संझा साँझी खेलते

क्वार माह यानी शरद ऋतु का प्रारम्भ । यानी एक रमणीय और सुहानी ऋतु का आगमन । इस ऋतु के सुहानेपन को कवि-शरोमणि तुलसीदास जी ने अनेक अनूठी उक्तियों द्वारा व्यक्त किया है ।
कवि सेनापति ने शरद-वर्णन जिस सजीवता से किया है, दर्शनीय है---
"पावस निकास याते पायौ अवकास ,भयौ जोन्ह कौ प्रकास सोभा ससि रमनीय कौं । विमल आकास होत वारिज विकास ,
सेनापति फूले कास हित हंसन के जीय कों । छिति न गरद,मानो रंगे हैं हरद सालि, 
सोहत जरद को मिलावै प्रान पीय कौं ।
 मत्त हैं दुरद मिट्यौ खंजन दरद ,
रितु आई है सरद सुखदाई सब जीव कौं ।"
ऐसी सुखदाई ऋतु में जब वर्षा रानी की छमछम ठहर जाती है, बिजली की सुनहरी पायलें उतार दी जातीं हैं ,बादलों के नगाडे उठा कर रख दिये जाते हैं ,किसी धुले-पुछे दर्पण जैसे निरभ्र आसमान की नीलिमा गहरा जाती है ,चाँदनी निखर कर चमक उठती है , ताजा नहाई सी धरती हरी चूनर ओढ कर मुस्करा उठती है, कास फूल उठता है , नदियाँ पारदर्शी हो जातीं हैं , तब तारों की छाँव में किशोरियों की तानें गूँज उठतीं हैं --"हम संझा साँझी खेलते ,हम जाहि बिरियाँ तन खेलते...
म्हारे उतते ही आए बाबुला ,बाबुल ने लई पहचानि .संझा साँझी..."
फूलों के रूप और गन्ध से गमकता ,लोक कला के सौन्दर्य से दमकता यह उत्सव गँवई--किशोरियों का सबसे उल्लासमय त्यौहार होता है । कनागतों (श्राद्ध-पक्ष) के साथ शुरु हुआ यह उत्सव सर्व-पितृ अमावस्या तक चलता है । मुझे याद है कि किस तरह हमारी हर शाम गीतों से गूँजती थी । पन्द्रह दिन हँसते-गाते बीत जाते थे एक नई ऊर्जा व उल्लास देकर ।
त्यौहार ऊर्जा व उल्लास तो देते ही है पर साथ ही हमें लगता है कि समय सिकुड कर छोटा होगया है धोने पर सिकुडे सूती कपडे की तरह । सावन बीता कि जन्माष्टमी आई । फिर साँझी ,नौदेवी ,दशहरा, दिवाली फिर देवठान....त्यौहार किस तरह जिन्दगी को गति देते हैं कि दौड उठती है फास्ट ट्रेन की तरह । दिन महीने पेडों की तरह पीछे भागते लगते हैं ,इस तरह कि उन्हें गिन भी नही पाते ।
हाँ अभी बात है केवल साँझी की .
क्वार में प्रतिपदा को प्रतीक्षा का उल्लासमय अन्त एक लुभावनी सी प्रतिस्पर्धा के आरम्भ के रूप में हो जाता था । प्रतिस्पर्धा यह कि एकदिन पहले पूर्णिमा  के दिन ही तय होजाता था कि इस साल साँझी किसके द्वार की दीवार पर सजेगी ,कि कौन सबसे ज्यादा सुन्दर और रंग-बिरंगे फूल लाएगी और कौनसे दिन किसके घर से साँझी का भोग लगेगा । 
साँझी के लिये सबसे पहला और सबसे प्यारा व रोचक काम होता था फूल इकट्ठे करना . धरती पर साँझ के उतरते--उतरते फूलों का ढेर लग जाता था -लाल, पीले, नीले गुलाबी, सफेद, जोगिया ..तमाम रंग के बेशुमार फूल जो खेतों, बाडों और बगीचों से चुन कर लाए जाते हैं । उधर कुछ कला-चतुर किशोरियाँ दीवार को गोबर से लीप कर गोबर से ही सुन्दर आकृतियाँ बनातीं थी । वे आकृतियाँ अनेक तरह की होतीं थीं--चन्दा--तारे, सूरज,मोर ,गूजरी , पनिहारिन, वृक्ष ,फूल-पत्ती और साँतिये आदि विभिन्न तरह की रचनाएं जो फूलों से सज्जित होकर जगर-मगर खिल उठतीं  थीं । रचनाकाराएं खुद ही मुग्ध होकर गा उठतीं थीं---
"मेरी साँझुलदे के आसो-पासो फूलि रही फुलवारी ।
तुम पहरौ साँझुलदे रानी नौ तोले का हरवा ।
त्यारे बाबुल ने गढायौ ,मैया रानी ने दै घाल्यौ ..."
फिर दिया बाती की बेला पर जब मन्दिर में घंटा घड़ियाल के साथ भगवान की आरती होती थी इधर सभी लडकियाँ साँझुल रानी को भोग लगातीं थीं । भोग हर तरह का होता था- हलवा पूरी खीर लड्डू ,कच्चा दूध जो बडे 'जतन' से 'अछूता' रखा जाता था ,उसी तरह जिस तरह भगवान का भोग रखा जाता है । बड़ी श्रद्धा व भक्ति और उल्लास के साथ साँझी को भोग लगाया जाता था . लड़कियाँ गातीं भी जातीं थीं ---
"मेरी साँझी भोग ले, भोग ले ।
और की साँझी रोग ले रोग ले ।
 मेरी साँझी रानी और की साँझी..."
पता नही क्यों !'और' की साँझी के लिये की गई ऐसी अमंगल कामना ! यह मानवीय कमजोरी का सहज उद्घाटन है जिसके कारण वह अपनी वस्तु की श्रेष्ठता व कुशलता चाहता है । कोई छल नही ,कोई दुराव नहीं ।
भोग लगाने के बाद शुरु होता था गीतों का सिलसिला । गीत कई तरह के थे -चन्दा के ,भैया के , मायके की सहेलियों के और साँझी के सौन्दर्य के ।
किन्तु दूसरे लोकगीतों की तरह साँझी के गीतों में भी उस नारी की व्यथा-कथा के ही स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं जो माता-पिता की लाडली है । ससुराल में सास--ननद से प्रताडित है । वह मायके की गलियों के लिये तरसती है । चन्दा या बटोही द्वारा अपना मार्मिक सन्देश मायके को सन्देश भेजती है ----
"चन्दा रे तू चन्द बिरियां तन ठाड्यौ ही रहियो , 
हेला मारियो ही रहियो ।
सासु बोलनि मारै ,
ननदी ठोलनि मारै ।
मेरे बाहुल से कहियो ,
उन्हें हरवा गढावैं ,
उन्हें पाट पुरावें...। 
मोहि बेगि बुलावें...।"
शायद हरवा कंगन पाकर लालची सास--ननदें उनकी बेटी के प्रति सदय हो जावें ।
कभी कोई मायके से आया राहगीर उसे पहचान कर पूछ लेता है । गाँव की बेटी उसकी अपनी बेटी जैसी ही तो है--
"तुम काहे के दुख दूबरी ,और काहेनि मैलौ भेस ...?"--उत्तर मिलता है --
"हम सासु के दुख दूबरी और ननदी रे मैलौ भेस ।"
ऐसा सुना जाता है कि साँझी किसी जुलाहे की लाडली और रूपसी बेटी थी । उसे ससुराल में झाडू व पौंछा की तरह इस्तेमाल किया जाता था । वह दूसरों का अनाज कूटती फटकती थी । तब कही उसे दो रोटियाँ मिल पातीँ थी । 
साँझी की व्यथा जैसे हर लडकी की व्यथा है । पराए घर जाकर उसे जाने कैसा वातावरण मिलेगा । सो भविष्य की सोच छोडकर बचपन को भरपूर जीने की सलाह देती है---
"खेलि लै बिटिया खेलि लै तू माई बाबुल के राज ।"
तेरहवें दिन कोट (साँझी का बडा रूप ) बनाया जाता है । इसमें वे सारी चीजें बनाई जातीं हैं जो पिछले बारह दिनों में बनाई गईँ थीं । मुझे याद है कि कोट की तैयारियाँ बडे जोर-शोर से की जाती थी जिसे सजाने में हमारे ताऊजी पूरा सहयोग करते थे । अपने निर्देश में ही हमसे मिट्टी की कौडियाँ बनवाते थे । सफेद रंग से रँगी और बीच में काली लकीर से सजी  वे कौडियाँ एकदम असली लगतीं थीं । सुनहरी--रुपहली पन्नियों के मुकुट, झुमके ,हार ,कंगनों से साँझी को सजाते थे । कोट में 'मुड़फोरा' का बडा महत्त्व होता था । यह मिट्टी से ही बना होता था इसे बडी चतुराई व गोपनीयता के साथ कोट में कहीं इस तरह फिट किया जाता कि कोई जान न सके । जान भी ले तो हरगिज ले जा न सके । इसलिये लडकियाँ रात भर जाग कर मुड़फोरा की रखवाली करती थी । सुबह उसे सलामत पाकर गा उठतीं थी ---"ऐ, रे मुडफोरा बामन !
मेरी साँझुलदे रानी कौं हरवा क्यों नहि लायौ "
संभवतः मुडफोरा को साँझी का सुहाग माना जाता होगा । उसे चुराने की रीति वर के अपहरण से जुडी होगी । किसी भी त्यौहार के पीछे कोई एक कहानी नही होती । समय और स्थान के अनुसार उसमें अनेक कथा-किवदंतियाँ जुड जातीं हैं । कोई समय होगा जब दूल्हे को चुराकर बेटी ब्याहना गौरव तथा मान की बात समझा जाता होगा । वधू-अपहरण तो इतिहास की जानीमानी घटना है ही ।
अमावस्या की शाम को भारी मन से साँझी को दीवार से उतार कर नदी में सिरा दिया जाता था । शाम को गोठ (दावत) होती थीं ।
उन दिनों को याद कर महसूस होता है कि खुशी न तो सुविधा-साधनों की मोहताज होती है न ही सम्पन्नता की । हमने सुविधाएं जुटाते-जुटाते उस खुशी को कहीं खो दिया है जो जीवन की सबसे बडी उपलब्धि होती है । ये प्रकृति के आँगन में जीवन से जुडे ये गीत ,ये पर्व हालाँकि गाँवों तक ही सीमित रहे हैं या कि अब गाँवों में भी टी.वी. ने इन लोक-उत्सवों का कुहुक फीका कर दिया है पर इनमें छुपी मानव की जिजीविषा और संवेदना से हम ,चाहे कही भी रहें, आज भी अलग नही है ।

सन् 1990 में चकमक में प्रकाशित
चित्र भी चकमक से ही लिये गए हैं।

बुधवार, 14 सितंबर 2011

शहर में बरसात

उसके स्वागत में कहीं
मोर नाचा नहीं
पपीहे ने गाया नहीं
उसके आने का सन्देश
हवा ने भी दिया नही
उमंगित होकर
लहर-लहर कर
बस आसमान का.
छोटा सा टुकडा
धुँधला हुआ,
गहरा हुआ ।
गडगडाहट हुई ।
बिजली चमकी।
बूँदें टपकीं
सीमेन्ट ,और कंकरीट की छत पर
मुँडेर पर रखे गमलों में
कोलतार की सडकों पर ।
नालियाँ उमडी
गीला हुआ।
फिर वर्षा थमी
सडकें सूखीं
मकान सूखे ।
आसमान साफ होगया
अक्सर ऐसा ही हुआ ।
और एक दिन यूँहीं
वर्षा गुजर भी गई,
किसी रजिस्टर में
अपने हस्ताक्षर किये बिना ही
अपना नाम आखिर ,वह,
लिखती भी कहाँ ..!

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

जन्म दिन पर मन्नू के लिये






सुबह-सुबह की पहली धूप
मुबारक़ हो ।
पार किये उनतीस अनूप
मुबारक़ हो ।
बाँहों में कोमल
विहान सा ही उजला
अपना यह प्यारा प्रतिरूप
मुबारक़ हो ।

9 सितम्बर

रविवार, 21 अगस्त 2011

मान्या और विहान




नन्हे राजा
नयना बाँके-बाँके
कोटर में से
कोयल के शिशु झाँके
नदी नहायी धूप
चाँदनी फाँके
कितने सारे फूल
भोर ने ,
हर टहनी पर टाँके
लुढक गई है गेंद
रात की काली वाली।
जाने दो,
झुनझुना बजाती
डाली-डाली


मेरी गोदी चाँद सलौना
नही चाहिये और खिलौना
साथ इसी के खेलूँगी मैं,
सौ सौ नखरे झेलूँगी मैं
मेरा राजा भैया है
मेरी जेब रुपैया है ।

रविवार, 31 जुलाई 2011

वे दो शब्द

वे दो शब्द--
मरहम से,
दे दो उसे
जो गिरा है अभी-अभी
लगा लेगा
अपने ताजा जख्मों पर ।

वे दो शब्द--
उत्तीर्ण होने की सूचना जैसे,
पेपर बिगडने के बावजूद
दे दो उसे ।
जो फेल होजाने पर
शर्मिन्दा हो ।
अपने आप से
चल सके फिर से
नये हौसले के साथ ।

वे दो शब्द-
अनायास ही
किसी किताब के पन्नों में मिल गये,
नोटों जैसे
दे दो उसे
जो तलाश रहा हो बेचैनी के साथ
अलमारी का कोना-कोना
पर्स गुल्लक तकिया बिछौना
एक-एक अठन्नी के लिये
महीने के आखिरी दिनों की
तंगहाली में ।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

चलते--चलते

सीट-1
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गाडी जैसे ही स्टेशन पर रुकी । अनारक्षित डिब्बों में लोगों ने अपनी-अपनी सीट सम्हाली ।किसी ने पाँव पसार लिये किसी ने बैग रख लिया । जो लोग टायलेट के लिये निकले थे वे भी लौट कर अपनी सीट पर जम गए । पता नही कौन आकर बैठ जाए । और एक बार जम गए व्यक्ति को हटाना बडा मुश्किल होता है ।ऐसे में ही भीड का एक रेला डिब्बे में घुसा ।लोग चल कर नही मानो धक्कों के सहारे आगे बढ रहे थे । जैसे कोई बेतरतीबी से थैले में कपडे ठूँसे जारहा हो । पसीने की गन्ध मिश्रित भभका साँसों में घुटन पैदा करने लगा । सीट पर बैठे लोगों को यह आपत्ति थी कि खडे लोगों की भीड ने हवा का रास्ता भी बन्द कर दिया था ।वहीं खडे लोग कहीं किसी तरह पाँव रखने की जगह बना रहे थे और बैठे लोगों से कह रहे थे --"भैया यह सीट छह लोगों की है और बैठे पाँच ही हैं ।"
पहले तो बैठे लोगों ने यह बात सुनी ही नही । पर जब यही बात कई बार दोहराई तब एक ने ऊँघते हुए कहा--"दूर से आ रहे हैं भैया । थके हैं । आगे चले जाओ । डिब्बा खाली पडा है ।"
"बैठे--बैठे भी तकलीफ हो रही है तुम्हें । एक आदमी जो कुछ पढा-लिखा लगता था ,बोल उठा---आराम करना था तो घर पर ही रहते न !"
"किराया हमने भी दिया है । कोई सेंतमेंत नही जा रहे ।"--एक दूसरे यात्री को भी बल मिला ।
वही एक अधेड उम्र के सज्जन भी खडे थे ।ऊपर को सँवारे हुए खिचडी बाल ,लम्बी और आगे को झुकी नाक ,आँखों में अनुभव की चमक ।सफेद लेकिन कुछ मैले कुरता-पायजामा और कन्धे में लटका खद्दर का थैला उन्हें सबसे अलग बना रहा था । वे बडी व्यंग्य भरी मुस्कान लिये लोगों का वार्तालाप सुन रहे थे । मौका पाकर बोले--"जमाना ही बदल गया साहब । आदमी की गुंजाइश खत्म हो रही है वरना दिल में जगह हो तो कहीं कोई रुकावट है ही नही । पहले जवान लडके बुजुर्गों व महिलाओं को उठ कर जगह देते थे ।पर आज खुद को जगह मिल जाय बस...। अरे कुछ घंटों का सफर है । कोई लग कर यहाँ रहना तो है नही । सीट कोई अपनी पुश्तैनी थोडी है ।"
उन सज्जन की बातों से प्रभावित होकर लोगों ने सरक कर उनके लिये जगह बनादी ।उनके चेहरे पर असीम सन्तोष छागया । बैठ कर वे अपने अनुभव लोगों को सुनाने लगे । पर जैसे ही अगला स्टेशन आया वे कुछ अस्थिर व सजग होगए ।
इस बार उनकी सजगता व व्यग्रता सीट पाने की नही ,सीट बचाने की थी ।वे आने वाले हर यात्री से कह रहे थे --भैया जी आगे जाओ पूरा डिब्बा खाली पडा है
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सीट---2
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यह वर्षों पहले की बात है । जब एक दिन बस से मैं अकेली अपने गाँव लौट रही थी । जौरा बस स्टैण्ड पर जब बस पाँच मिनट के रुकी तो अमरूद खरीदने का विचार आय़ा । मैंने अपना बैग सीट पर रखा । बगल वाली सीट पर बैठे सज्जन को जता कर मैं फल खरीदने चली गई और दो ही मिनट में जब लौटी तो मैंने अपनी सीट पर एक सहारिया-महिला को बैठी पाया जो लकडियाँ बेच कर घर लौट रही थी । वह मेरे विरोध--भाव से पूरी तरह बेखबर सी इस तरह बैठी थी मानो वह सीट सदा से उसी की है । मेरा बैग हटा कर उसने एक तरफ नीचे रख दिया गया था । पहले तो मुझे गुस्सा आया । पर वैसा ही जैसा अखबार की खबरें पढते--पढते आता है । वह मेरे गुस्से से अप्रभावित ,अनजान ,अविचल भाव से बैठी रही ।
"यह सीट तो मेरी है । तुम कही दूसरी सीट देखलो ।"--मैंने खुद को संयत कर कहा ।
मेरी इस बात पर उस महिला ने पहले तो मुझे ऐसे देखा जैसे मैंने कोई अनधिकृत बात कह दी हो । और फिर बडे खरखरे से लहजे में बोली-- "काए, सीट पै का तेरौ नाम लिख्यौ है ? तुई कौं नई देखि लेती अपने काजैं सीट ?"
मैने आसपास देखा लोग दबे--दबे मुस्करा रहे थे । मुझे लगा कि एक अनपढ मजदूर महिला से विवाद करना ठीक न होगा । इसलिये मैं पीछे एक सीट पर जगह बना कर बैठ गई ।
लेकिन वर्षों बाद मुझे ,लकडियाँ बीन-बेच कर गुजारा करने वाली उस जाहिल आदिवासिन की उस बात के मायने समझ आए हैं कि सीट कैसे हासिल की जाती है । और इसके लिये पढा-लिखा व समझदार होना कतई जरूरी नही है । साथ ही यह भी कि ,सीट हासिल करना ही काफी नही होता ,उसे बचाए रखने की कवायदें भी जरूरी है । हालाँकि मैं इसे आजतक सीख नही पाई ,पर यह अलग बात है ।