शुक्रवार, 10 मार्च 2023

‘ऑरेंज’ में चैरी



सिडनी डायरी--10

 शीर्षक काफी जिज्ञासा भरा है न ?

जब मयंक ने बताया कि हम ऑरेंज जा रहे हैं तो मुझे लगा कि यह ‘स्ट्राबेरी पिकिंग’ जैसा ही कुछ रोचक अभियान होगा . ‘फ्रूट-पिकिंग’ यानी पेड़ों से खुद ही पके फल चुनना .इसके बारे में मैं सिडनी जाने से पहले ही जान चुकी थी ,जब श्वेता ने अपने हाथों स्ट्राबेरी चुनते हुए फोटो डाले , ‘प्लम-पिकिंग’ के बारे में बताया . यह बात उत्साह से भर देने वाली थी . अपने हाथों पेड़ से पके फल तोड़ने के आनन्द ही अनौखा होता है . मैं उससे भलीभाँति परिचित हूँ . हमारे घर में अमरूद का पेड़ था जिसके फल खूब बड़े और मीठे होते थे . खुद ही तोड़कर खाए भी खूब औरों बाँटे भी खूब .( अफसोस कि अब वह पेड़ नहीं है ) तिलोंजरी (गाँव) में भी खेतों से टमाटर ,बैगन ,लौकी आदि खूब तोड़े हैं . स्ट्राबेरी , चैरी , प्लम ( आलूबुखारा) के पेड़ और टहनियों में लगे फल देखना तोड़ना मेरे लिये नया अनुभव होगा यह सोचकर मैं काफी उत्साहित थी . हालाँकि इस बार सर्दियों भर वर्षा का मौसम रहने के कारण फलों की पिकिंग का अवसर बन नहीं पाया था लेकिन उम्मीद बनी हुई थी . ऑरेंज जाने की बात से मुझे लगा कि ऑरेंज-पिकिंग यानी सन्तरे चुनने का सुअवसर आगया है .

यहाँ भी है लखनऊ
लेकिन ऑरेंज के लिये जिस तरह की तैयारियाँ हो रही थीं ,उससे लग रहा था कि कहीं दो चार दिन रुकने की योजना है . मैंने पहले भी लिखा है कि श्वेता इंजीनियर के साथ एक अच्छी माँ और गृहणी भी है . खाना बनाने खाने के बारे में उसके विचार मेरे या अपनी माँ जैसे ही हैं . अगर दो-चार दिन बाहर रुकना पड़े तो वह भी बाहर पिज्ज़ा बर्गर पर समय बिताने की बजाय कुछ घर का ही बनाना पसन्द करती है .इसके लिये दाल चावल मसाले घी आदि साब रख लिया .मैंने भी दिनभर के लिये मूँग दाल की कचौड़ियाँ बनाली . तभी बातों बातों में मालूम हुआ कि 'ऑरेंज' कोई फल नहीं,बल्कि एक शहर है, जहाँ हम जा रहे हैं . तब मैंने जिज्ञासावश गूगल पर ऑरेंज के बारे में कुछ जानकारियाँ भी हासिल कीं,
जैसे ऑरेंज सिडनी से लगभग 158 किमी दूर बसा ऑरेंज 'न्यू साउथ वेल्स' के मध्यपूर्व में फैले पठारी क्षेत्र में कैनवोलास पर्वत की ढलान पर बसा छोटा सा शहर है जो सन्तरा की तरह खट्टा मीठा और रसीला न सही लेकिन सुन्दर , साफसुथरा ,सुव्यवस्थित और शान्त शहर है . 
वस्तुतः ऑरेंज आधिकारिक रूप से सन् 1846 में किंग विलियम द्वितीय के सम्मान में एक गाँव के रूप में स्थापित .
शान्त सुन्दर
ऑरेंज 
मिनी एप्पल
आलूबुखारे (प्लम) से लदी टहनियाँ 

किया गया था . मूल रूप से यह ‘विराजुरी’ आदिवासियों की भूमि है .बाद में ऑरेंज से मात्र 30 किमी दूर 'ओफियर' (Ophir) टाउन में सोने की खदानों , और उपजाऊ भूमि में उन्नत कृषि के कारण ऑरेंज में उल्लेखनीय प्रगति हुई . 1877 में ऑरेंज को रेलमार्ग द्वारा सिडनी से जोड़ दिया गया . 1946 तक ऑरेंज एक छोटे शहर के रूप में उन्नत होगया था . आज यह बड़े पार्कों और 'वाइनरीज' के कारण न्यू साउथ वेल्स के सुन्दर सुव्यवस्थित शहरों में गिना जाता है ,जहाँ सुकून से कुछ समय गुजारने लोग जाते रहते हैं .ऑरेंज पहुँचने के लिये अपने साधन के अलावा बस और रेल सेवा भी बहुत सुनदर और सुविधाजनक है .23 दिसम्बर 2022 को सुबह ऑरेंज के लिये मयंक ने कार की स्टेयरिंग सम्हाली और हमने अपनी सीट .
चैरी के बगीचे में 
 अब रास्ते में 'फ्रूट-पिकिंग' खोजने का सिलसिला चला . श्वेता ने जहाँ जहाँ सर्च किया , उधर उधर मयंक ने कार घुमाई . बोला ,"आज मम्मी को फ्रूट-पिकिंग का अनुभव तो कराना ही है . जहाँ ,जैसे भी मिले ." 

अन्ततः बाथर्स्ट टाउन के बाद एक जगह 'चैरी-पिकिंग' खोजने में सफल हो ही गए .वहाँ चैरी के अलावा ,मिनी एप्पल, प्लम ,अंजीर के भी बगीचे हैं . लेकिन पिकिंग के लिये चैरी के बगीचे ही तैयार थे . मिनी एप्पल और प्लम अभी पके नहीं थे . 17 डॉलर प्रति व्यक्ति के हिसाब से चैरी गार्डन में जाने का टिकिट था .हम चैरी के बगाचे में पहुँचे तो मैं वहाँ का दृश्य देख रोमांचित हुए बिना न रह सकी . गहरे लाल , मैरून हुए पके फलों से सजी चैरी की टहनियाँ पास आने का निमंत्रण दे रही थीं . चैरी चुनते खाते हुए और भी परिवार थे . मुझे खाने की बजाय तोड़ने का चाव अधिक था . "मम्मी सत्रह डॉलर हमने फल खुद तोड़कर खाने के लिये अदा किये हैं इसलिये पहले खाओ जितना चाहो .खाने के बाद बीज यहीँ डालने हैं .साथ ले जाने के लिये अलग कीमत देनी होगी ."--मयंक ने कहा .पर केवल खाना ही क्यों , टहनियों से पके फल तोड़ना क्या कम आनन्दप्रद था ? मीठे मीठे लाल जामुनी चैरी फल जीभर कर तोड़े , पूर्ण त़प्ति तक खाए . पास ही सेव के बगीचे थे . 

घर, जहाँ हम चार दिन रहे 

"माँ ये मिनी एप्पल हैं . छोटे हैं पर मीठे होते हैं . " –श्वेता ने बताया -"एप्पल पिकिंग में उतना आनन्द नहीं . आखिर कितने सेव खाओगे , दो , चार .."  खैर चैरी-पिकिंग एक प्यारा अनुभव रहा .

ऑरेंज में मयंक ने चार दिन के लिये एक घर लिया था .गृहस्वामी सिडनी या अमेरिका ,इंगलैंड जैसे दूसरे देशों में चले जाते हैं . तब ये मकान इस तरह आय का साधन भी बने रहते हैं . दो बेडरूम , हॉल सुविधायुक्त किचन पीछे बड़ा गार्डन . यहाँ सभी मकान उतने बड़े तो नहीं होते लेकिन उनमें गार्डन के लिये काफी जगह छोड़ी जाती है .सड़कें काफी चौड़ी और सुन्दर हैं पर लोग बहुत ही कम ..पड़ोस में बसी एक अंग्रेज महिला से श्वेता की बात हुई . पता चला कि इतने बड़े घर में केवल पति-पत्नी है ,एक कुत्ता और कुछ पक्षी हैं . उनका बेटा सिडनी में रहता है .यहाँ रहना उसे पसन्द नहीं .

हमने 'वूलवर्थ' से दूध ,दही मक्खन ब्रेड सलाद की सब्जियाँ खरीदी .पहली शाम तो घर से बनाकर लाया खाना पर्याप्त था . हमने तारों भरे आसमान के नीचे बैठकर चाय पी और बातें करते रहे कि हमारे यहाँ लोग गाँवों से शहरों को पलायन रोजगार और शिक्षा आदि सुविधाओं के लिये करते हैं . लेकिन यहाँ इतने शानदार घर और सुन्दर शहर को इसलिये छोड़ देते हैं कि वहाँ बड़े शहर जैसी रंगीनियाँ और सुविधाएं नहीं हैं . सचमुच पैसा सुविधाएं और पसन्द बदल देता है .

छाँव में आराम करते छोटे कंगारू
डब्बो नेशनल पार्क-- मैं अप्रैल में सिडनी आई थी . तभी से कंगारू देखने की बड़ी
 लालसा थी . यह ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय पशु है लेकिन मुझे वह भोला-भाला सा प्राणी अपनी उछाल वाली दौड़ और बच्चे के लिये पेट के साथ लगी थैली के कारण शुरु से ही बड़ा आकर्षक लगा है . ऑस्ट्रेलिया आकर कंगारू न देखा तो क्या देखा . मेरी इसी बात को ध्यान में रख इससे पहले मयंक ने दो नेशनल पार्क देख डाले पर मन नहीं भरा . एक पार्क में तो थे ही नहीं ,दूसरे में बड़े थके ,धूप से बेहाल और दयनीय सी हालत में तीन चार कंगारू दिखे जो एक पेड़ की छाँव में सिमटे बैठे थे .

गेंडा

हाँ रास्ते में सड़क पर कुचले पड़े निरीह से कंगारू अपने राष्ट्रीय पशु होने पर कड़े सवाल करते हुए से कई बार दिखे पर मुझे तो उनकी उछाल वाली चाल देखनी थी . किसी ने बताया था कि ऑरेंज जा रहे हो तो डब्बो ज़रूर जाना . ‘ टॉरंगो जू ‘डब्बो’ में कंगारू यकीनन मिलेंगे . इसलिये दूसरा दिन हमारा डब्बो के नाम रहा .

शुतुरमुर्ग ( ऑस्ट्रिच)
डब्बो टाउन ऑरेंज से लगभग 155 किमी दूर बड़े एरिया में फैले नेशनल पार्क के लिये विशेष रूप से जाना जाता है . हम भी उसी के लिये और खास तौर पर कंगारू देखने गए थे . पार्क सचमुच बहुत बड़ा है . घूमने के लिये वहाँ किराए पर गाड़ियाँ उपलब्ध थीं . अगर तेज धूप न होती तो हम तीनों ही पैदल चलना अधिक पसन्द करते पर धूप को देखते हुए गाड़ी लेनी ही पड़ी . नेशनल पार्क जितना बड़ा और सुन्दर है , जानवरों का हाल उतना ही विचारणीय , इसके पीछे धूप बड़ा कारण थी इसलिये चीता महाशय अपनी गुफा से बाहर ही न आए . पानी के ऊपर तैरती हुई सी उभरी दो आँखों से ही पता चलता था कि ये हिप्पो महाशय हैं . शेर भी दुनिया से बेखबर से बड़े अन्यमनस्क से लगे . शेरनी जरूर  अपने बच्चों में मन बहला रही थी .यह स्वभावतः मातृत्त्व और स्त्रियोचित गुणों का ही प्रतीक है . गेंडा , शुतुरमुर्ग और बड़े कछुओं को देखना बहुत रोचक रहा .इतने बड़े कछुए मैंने कभी नहीं देखे .
भीमकाय कछुआ
इनके अलावा हाथी , जिराफ , एमू , टर्की , क्वाला , और छोटे कंगारू देखे पर आशानुरूप कंगारू देखने की लालसा डब्बो में भी पूरी न हो सकी .... 
जारी .....




 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2023

मन-उन्मन

 ‘यहाँ’ होता है ,

तो याद करता है बातें  

‘वहाँ ’की .

और ‘वहाँ’ से निकलकर भटकता है

‘यहाँ ‘..जाने कहाँ कहाँ...

व्यथा को परे झटककर

कोशिशें होती हैं .

बहलने की , उबरने की

और आनन्द में आशंकाएं

उसके समापन की .

कोई क्षण जब सामने होता है ,

देखता है उससे परे ..उस पार सुदूर..

पर गुज़र जाता है वह .

मलता है हाथ ,

चला गया वह पल ,

बिना बताए ,दूर से ही

मिल नहीं पाया उसे ,

जी नहीं पाया जीभर .  

हाय ,क्यों है यह मन ,

ऐसा उन्मन ?

जीते हुए सोचता है

अक्सर मृत्यु के बारे में ,

और देखना ,

मृत्यु के समय चाहेगा

मोहलत कुछ और जीने की .

रविवार, 19 फ़रवरी 2023

चार दिन न्यूकैसल के --2

गतांक से आगे  

27 जनवरी



सामने विशाल मालवाहक और यात्री जहाज
फोर्ट स्क्रैच्ले--नॉबी बीच के ऊपर पहाड़ी पर स्थित लगभग 200 वर्षों का इतिहास समेटे हुए यह एक स्थान सुरक्षा और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तो रहा ही है . यहाँ उस समय के सैनिकों के कपड़े जूते और दैनिक जीवन की वस्तुएं , बर्तन ,रसोई , वॉशबेसिन तोप बन्दूक सुरक्षित देखी जा सकती हैं ,अब यह पहाड़ी गन फाइरिंग और वहाँ से चारों ओर के मनोरम दृश्यावलोकन के लिये बहुत ही उपयुक्त है .

गन-फाइरिंग

गन-फाइरिंग—पारम्परिक समुद्री यात्रा के सम्मान में फोर्ट स्क्रैच्ले पर दोपहर एक बजे तोपें चलाई जाती हैं . उससे पहले की तैयारी और सावधानी देखना काफी रोमांचक होता है बहुत सारे पर्यटक इस प्रक्रिया को देखने पहुँचते हैं . 18-19 वी सदीं का कालखण्ड जैसे पुनःजीवित होजाता है . नेवी के कैप्टन निरीक्षण भी करते हैं कि फाइरिंग सुचारु रूप से हो पा रही है या नहीं.

इस पहाड़ी से एक ओर शहर तो दूरी तरफ पोर्ट पर खड़े विशाल मालवाहक जहाज , दस बारह मंजिला क्रूज़ , बड़े स्टीमर जैसे बस-स्टैण्ड पर बसें खड़ी रहती हैं और अपना नम्बर आते ही चल देती हैं .तीसरी चौथी तरफ अपनी विशालता के गर्व में लहराता और बड़े बड़े जहाजों को डुबा सकने की सामर्थ्य के अभिमान में गरजता निस्सीम सा नीलाभ सागर . उत्तुंग नीली लहरें तट से टकराकर दुग्ध-धवल होजाती हैं मानो वे हुलसकर शुष्क सूने मरुस्थलीय तट को मोतियों का हार पहनाकर बहला रही हों ,या माँ धरा को रजत की रूप-रुपहली मेखला पहना रही हों . या फिर लहरों के विशालकाय फणिधर क्रोध में गरजते फुफकारते हुए तट टकरा रहे हों और टकराकर फुफकारते हुए ढेर सारा झाग निकाल रहे हों . ऊपर तेज हवा पाँव उखाड़ने पर तुली होती है लेकिन नीचे हरे, नीले और सफेद रंग का मिश्रित मोहक सौन्दर्य आपके पाँव थाम लेता है .



फोर्ट स्क्रैच्ले पर ही कुछ आकर्षक वस्तुओं की शॉप है . विभिन्न डिजाइन के 'शार्पनर' मयंक को इतने पसन्द आए कि दस-ग्यारह खरीद डाले .6 डॉलर प्रति शॉर्पनर . वहाँ से नीचे उतरकर लंच कहाँ किया जाय ,इस पर विचार हुआ . मयंक शाकाहारी है लेकिन नई चीजें नए रेस्टोरेंट देखने का शौक है तय हुआ कि मैक्सिकन व्यंजनों का स्वाद लिया जाय .इसके लिये हमने अन्टोजिटॉस (antojitos) रेस्टोरेंट चुना . मैक्सिकन खाने में 'वैजीटेरियन' कुछ ठीक ठाक मिल जाता है . वहाँ मिला भी- ‘वेजिटेबल्स रोल’ और ‘बरिटॉ बॉउल’.

हर विदेश की तरह यहाँ भी मांसाहार वालों के लिये तो अनेक अच्छे विकल्प है लेकिन शाकाहारी लोगों के लिये पिज्ज़ा ,बर्गर ,सबवे के अलावा कुछ नहीं . गनीमत है कि अब हर जगह भारतीय रेस्टोरेंट मिल जाते हैं . खाना खाने के बाद म्यूजियम देखने गए .

न्यूकैसल संग्रहालय –आदिवासी संस्कृति और परम्पराओं की प्राथमिकता रखने वाला यह म्यूजियम हर प्रसंग और घटनाओं के लिये सुन्दर पृष्ठ भूमि है . मौलिक रूप से इसकी स्थापना 1988 में हुई . अनेक प्राचीन वस्तुओं और रोचक व अनूठे उपकरणों के अलावा इस संग्रहालय का सबसे खास प्रोग्राम है –‘फायर एण्ड अर्थ’ का प्रदर्शन . यह दो बड़े उद्योग ‘कोल’ और ‘बी.एच.पी.’ का मिला जुला लगभग आधा घंटे का शानदार प्रदर्शन है . इसके अलावा ‘सी-मॉन्स्टर’ की प्रदर्शनी भी थी 30 डॉलर के टिकिट में .

28 जनवरी--

लाइटहाउस
नॉबी’ज़ लाइट हाउस (Nobby ‘s Lighthouse)

सन् 1854 में स्थापित नॉबीज हैड पर स्थिति यह सक्रिय लाइट हाउस ( प्रकाश स्तम्भ) सुन्दर परिदृश्य के लिये ही नहीं बल्कि पोर्ट की निगरानी व सुरक्षा की दृष्टि से भी एक महत्त्वपूर्ण लैंडमार्क है . बलुआ पत्थर ( सैंडस्टोन) से निर्मित इस लाइटहाउस की ऊँचाई 10 मीटर है और रेंज 44 कि मी. कार पार्किंग से लगभग 800 की दूरी पर लगभग 220 मीटर ऊँची पहाड़ी पर स्थित है . यहाँ से एक तरफ न्यूकैसल सिटी का विहंगम दृश्य है और तीन तरफ लहरों पर छोटे बड़े जहाजों को झुलाता सुदूर क्षितिज तक फैला नीलाभ सागर . असीम अथाह जलागार के सामने मानव का अस्तित्त्व कितना तुच्छ है , लेकिन हदय लहरों और तूफानों से जूझते मानव के उस नगण्य से पर अजेय अस्तित्व का अभिनन्दन करता है .

झील में आतिशबाजी

क्राइस्ट चर्च मेमोरियल गार्डन

चर्च
गए . यह बहुत शान्त और हरे भरे गार्डन के बीच एक विशाल और सुन्दर भवन है .इसे शहर का हदय कहा जाता है . इसके अन्दर जाने की स्वीकृति नहीं थी ,इसलिये हमने बाहर ही कुछ देर ठण्डी छांव में विश्राम किया .  

29 जनवरी---शिवम् आज सिडनी लौट गया .शाम को झील कि किनारे शानदार आतिशबाजी भी देखने मिली . 30 जनवरी को लौटते लौटते सब एक पूल में घंटों तैरे नहाए ..लगभग पाँच बजे हम लोग सिडनी लौट आए .

चार दिन का भ्रमण यह सचमुच बहुत शानदार और अविस्मरणीय रहा .   

बुधवार, 15 फ़रवरी 2023

रहे किनारे पर



राह किसी की चले नहीं जो 
,

रहे किनारे पर .

सोच नदी को है 

धाराओं के बँटवारे पर .


कोई नाव पकड़ लेते जो पार उतर जाते .

लहर कतारों में,वे खुद को अलग नहीं पाते .

रेले गुज़रे, जमे रहे अपने ही द्वारे पर .

राह किसी की चले नहीं जो ...


पत्ते होते तो ले जाती साथ हवा अपने .

धारा में ,बहने वालों को सागर सागर के सपने .

उन सपनों की सीमा है बस एक शिकारे पर 

राह किसी की चले नहीं जो..


दरवाजे नीचे थे , झुकना हमें नहीं आया .

तप तपकर बादल सा उमड़ा गीत वही गाया .

दिल से निकले दो शब्दों के रहे गुजारे पर .

राह किसी की चले नही जो ..

 

जाने क्यों हाँ हाँ कहने की आदत नहीं रही .

राजमार्ग पर चले सदा पगडण्डी नहीं गही . 

चले सदा अपने पैरों ना किसी सहारे पर .

राह किसी की चले नहीं जो ..

 

इसीलिये चढ़ ना पाए वे कोई उच्च शिखर 

पर सोते निश्चिन्त , नहीं उनको गिरने का डर  .

चले नहीं ना कभी चलेंगे किसी इशारे पर .

राह किसी की चले नही जो  ...

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023

सिडनी डायरी -9 'न्यू कैसल' में चार दिन

26 जनवरी 2023

हमारा गणतंत्र-दिवस . सुबह तड़के से ही हृदय में सदा की तरह उमंग थी . याद कर रही थी कि स्कूल में किस तरह आठ दिन पहले से ही गणतंत्र-दिवस की तैयारियाँ शुरु हो जाती थीं . स्वतन्त्रता दिवस के पर्व में बादलों की छाँव तले, कभी रिमझिम फुहारों में जहाँ गर्व के साथ देशभक्त वीरों और सेनानियों के प्राणोत्सर्ग की स्मृति में हृदय विगलित होता है , मेघ भी जैसे उनकी सजल स्मृतियों में हमारा साथ देते हैं , वहीं गणतन्त्र-दिवस शीत लहर के बीच गुनगुनी चमकीली सुहानी धूप में खुशी और धूमधाम का पर्व होता है . इस बार में स्कूल से ही नहीं अपनी मातृभूमि से भी दूर हूँ . टीवी पर प्रसारण देखना भी संभव नहीं था क्योंकि कार्यक्रम का जब प्रसारण हुआ होगा हम 'न्यू कैसल' पहुँच चुके थे .

न्यू कैसल साउथवेल्स के उत्तरी भाग में ही बसा विशाल नीलाभ जलधि की फेनिल तरंगों के सौन्दर्य से रचा बसा खूबसूरत शहर है . यह सिडनी से लगभग 170 कि.मी. दूर न्यूसाउथ वेल्स का दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर माना जाता है . इस बार हमारे साथ पाँच परिवारों के ग्रुप में से शिवम् ही (सपरिवार) था . शिवम् बहुत ही ऊर्जावान् और महत्त्वाकांक्षी युवक है .समय का बड़ा पाबन्द . अगर सात बजे चलना तय है तो भले ही दो छोटे बच्चों का साथ है वह सात बजे ही निकलता है . हम जब एक घंटा दूरी पर थे शिवम् केव्स बीच पहुँच चुका था .साथ में पत्नी नेहा बच्चे अमायरा व रिधान तथा नेहा की माँ मधु सिंह भी थीं.

‘केव्स बीच’ और हम

केव्स बीच

लगभग 42 किमी में विस्तारित केव्स बीच स्वन-सी प्रायद्वीप में स्थित है जो मॉक्वारी लेक और प्रशान्त महासागर के बीच ग्रेटर न्यूकैसल का ही भाग जो सर्फिंग और फिशिंग के लिये खासतौरपर जाना जाता है लेकिन हमारे लिये सुदूर समतल बीच , काँच सा साफ पानी और अठखेलियाँ करती ,शोर मचाती ऊँची लहरों का आकर्षण ही प्रमुख था . शरारती बच्चे लहरें जैसे बचो बचो चिल्लाती हुई आती हैं और तेज थपेड़ों से किनारे की ओर धकेल देती है और लौटते हुए पैरों के नीचे से रेत खींचती हुई लेजाती है जैसे कोई पैरों के नीचे से कोई फर्श या दरी खींचले .उस दशा में अक्सर गिर जाते हैं ,हम भी खूब गिरे , सम्हले , लहरों के साथ खेलते रहे

तट के किनारे कई जगह ऊँची चट्टानों में 'केव्स' ( सुरंगें) होने के कारण इस तट का नाम ‘केव्स बीच’ पड़ा है . चट्टानों के सँकरे रास्ते से उफनती गरजती लहरों का आना जाना बड़ा रोमांचक और दर्शनीय होता है . 

किनारे पर रेत में धूप सेकते बच्चे,युवा ,वृद्ध स्त्री पुरुष आदिम युग की याद दिला रहे थे ,लेकिन कोई ध्यान नहीं देता कि कौन क्या पहने हैं ..पहने है भी या ...यहाँ परिवेश ही है ऐसा ..आचार विचार व्यवहार देशकाल के अनुकूल ही शोभा देता है असहज भी नहीं लगता . अपने देश में यहाँ का उदाहरण देना उतना ही अनुचित है ,जितना यहाँ साड़ी पहनने का आग्रह .   

घंटों तक ..लहरों में झूलना ,हिचकोले खाना जितना आनन्दमय होता है बाहर निकलकर कपड़े बदलना उतना ही कष्टकर . समुद्र के नमक बहुल जल और रेत से लिपटे कपड़े ,उसपर सार्वजनिक खुली जगहों पर छोटे फव्वारों में किसी तरह नहाना , कपड़े बदलना और उतरे रेत भरे कपड़ों को थैली में भरकर कार में डालना बड़ा असुविधाजनक...तब स्थानीय गोरे युवक युवतियों का अत्यल्प कपड़े (पट्टियाँ) पहनकर नहाना काफी प्रासंगिक और आवश्यकतानुसार ही लगा . न उतारने में झंझट न पहनने में और ना ही धोने में...

नहाने के बाद सबने घर से बनाकर लाया तृप्तिदायक खाना खाया . फिर हम सब अपने विश्राम-स्थल की ओर चल पड़े .

‘वार्नर्स बे’ और ‘पिप्पीज लॉज’

‘वार्नर्स बे’ सिटी ऑफ मॉक्वरी का एक उपनगर है ( सिटी ऑफ मॉक्वरी ग्रेटर न्यू कैसल का ही एक हिस्सा है ) जो न्यूकैसल से 15 कि मी की दूरी पर है .यहाँ 'पिप्पीज' लॉज' में तीन रूम बुक किये थे एक शिवम्-नेहा व बच्चों का ,दूसरा मयंक श्वेता और अदम्य का  और तीसरा मेरा व नेहा की मम्मी का था .नेहा की मम्मी मुम्बई से हैं पर अपने शान्त ,मितभाषी स्वभाव  के कारण सबसे थोड़ी अलग हैं . पर उनकी साहित्यिक अभिरुचि , राजनैतिक व सामान्य ज्ञान चकित करने वाला है . ये ही बातें हैं जिनके कारण हमें साथ रहना बहुत सहज लगता है . 

लॉज में कमरे साफ सुन्दर और सुविधायुक्त थे . यह स्थान इतना सुन्दर लगा कि परिदृश्य देखते आँखें न भरें . लॉज के सामने ही सुदूर तक फैली वार्नर्स खाड़ी , उसमें दौड़ते स्टीमर , सी प्लेन , नावें ..हरे-भरे पेड़ ..टहलने के लिये सुन्दर रास्ता  . मधु जी और मैं सुबह सुबह दूर तक 'वाकिंग' के लिये निकल जाते थे . वह सचमुच एक अपूर्व आनन्दमय समय था . 

आगे भी जारी ....

मंगलवार, 31 जनवरी 2023

सिडनी डायरी -8 कॉकटू आइलैण्ड भ्रमण

14 जनवरी 2023
आज हम 'कॉकटू' आइलैंड देखने गए .

‘यूनेस्को’ द्वारा विश्व विरासत में शामिल किया गया यह बहुत खूबसूरत द्वीप ( आइलैंड) सिडनी हार्बर का सबसे बड़ा द्वीप है . यहाँ 'पैरामेटा रिवर' और 'लेनकोव रिवर' मिलकर सिडनी हार्बर में मिलती हैं . पैरामेटा सबर्ब ( उपनगर ) से कॉकटू आइलैंड के लिये फैरी (river cat) सबसे सुन्दर आराम और आनन्ददायक साधन है .फैरी का पूरा सफर पैरामेटा 'वॉर्फ' (wharf) (घाट) से 'सिडनी हार्बर' तक लगभग एक घंटा बीस मिनट का है . कॉकटू सिडनी हार्बर से पहले आने वाला घाट wharf है .फैरी द्वारा यह मेरी दूसरी यात्रा थी . फिर भी अनभव उतना ही रोमांचक ,मनोरम , कौतूहल और आनन्दमय लगा . जिस तरह जलधारा को चीरती हुई फैरी गहरे विशाल जल पर रानी की तरह अपना आधिपत्य जताती हुई सी ,झूमती गाती ,पानी में भारी हलचल मचाती चलती है , मुझे जलपरी सी मोहक लगती है . नदी किनारे रोज सुबह वॉक करते हुए ,जब फैरी को आते जाते देखती हूँ पाँव स्वतः ही रुक जाते हैं . वह किस तरह सोई हुई सी शान्त नदी को छेड़ती चलती है और नदी जैसे नींद टूटने के कारण पूरे आवेग से झुँझला उठती है , उफनती हिलोरें किनारों से टकराती हैं .  

‘पैरामेटा’ से ‘ओलम्पिक-पार्क’ तक ,जो कुल दूरी का एक चौथाई हिस्सा है , फैरी बड़े आराम से चलती है. कुल समय का लगभग आधा समय इतनी दूरी में ही ले लेती है . किनारे के पेड़ों ,पक्षियों , आसमान और हवा से बतियाती चलती है जैसे उसे घर पहुँचने की कोई जल्दी नहीं हो . पर 'डक रिवर' के मिलने के बाद जैसे ही सिल्वर ब्रिज आता है फैरी अचानक गति पकड़ लेती है जैसे कोई ऑफिस जाने वाले को घड़ी देखने के बाद अपनी लेट लतीफी याद आती है और वह हडबड़ाता हुआ भागता है . सिलवर वाटर ब्रिज को बाद नदी गहरी और विशाल होजाती है और हवा के थपेड़े उतने ही तेज . बड़ी बड़ी लहरों पर झूलती हुई , सामने आती साथी फैरियों को हैप्पी जर्नी बोलती हुई , सात आठ स्टेशनों पर सहयात्रियों को उतारती चढ़ाती हुई आखिर कॉकटू स्टोशन पर हमें भी उतारकर विदा कहती हुई आगे बढ़ गई सिडनी हार्बर की ओर  .

कॉकटू आइलैंड का विस्तार पहले लगभग 32 एकड़ था किन्तु बाद में इमारती लकडियों और बलुआ पत्थरों ( सैंडस्टोन ) द्वारा बढ़ाया जाने से अब 44 विस्तार एकड़ है .समुद्रतल से लगभग 60 फीट ऊँचाई वाला , भीड़ और शोरगुल से अलग यह द्वीप प्रकृति का जैसे वरदान है . हरे भरे सघन वृक्ष , जानी अनजानी वनस्पतियों और फूलों को देख मन खिल उठता है . ऊँचाई से चारों ओर लहराते समुद्र के हरे नीले फिरोजी सौन्दर्य और धवल फेनिल लहरों को और लहरों पर तैरते छोटे बड़े जहाजों को देखना एक अविस्मरणीय अनुभव है .

पैरामेटा  घाट (wharf) ,
जहाँ से फैरी लौट जाती है .

फैरी

कॉकटू आइलैंड न केवल नयनाभिराम सौन्दर्य के लिये बल्कि ऐतिहासिक व तकनीकी दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है . सन् 1839 से सन् 1869 तक यह ऑस्ट्रेलिया पेनल कोड द्वारा दण्डित उन अपराधियों का कारावास था , जो ब्रिटिश उपनिवेशों में नाराजी या विरोध से भरे होते थे . संग्रहालय के अलावा सन् 1857 से 1991 तक ऑस्ट्रेलिया का सबसे बड़ा 'शिपयार्ड' ( जहाज बनाने व मरम्मत करने का स्थान) रहा . बहुत सी इमारतें आज भी अच्छी स्थिति में हैं . हमने वहाँ आनन्ददायी तीन चार घंटे व्यतीत किये . शाम पाँच बजे फैरी द्वारा ही पैरामेटा लौट आए . कॉकटू आइलैंड भ्रमण एक बहुत शानदार और मनोरम अनुभव था .   

सोमवार, 23 जनवरी 2023

ध्रुवगाथा ( खण्डकाव्य) ----एक अंश

'ध्रुवगाथा' --सन् 2012 में प्रकाशित मेरी दो पहली पुस्तकों में से एक है ( दूसरी अपनी खिड़की से ). लेकिन मेरी ही कसौटी पर पूरी तरह खरी न उतरने के कारण इसका प्रचार प्रसार नहीं हुआ . वैसे तो मैंने सात बड़ी पुस्तकों में किसी का भी कहीं प्रचार नहीं किया है . उन्ही दिनों इसी ब्लाग  पर ध्रुवगाथा की चर्चाएं तो हुई हैं . दस वर्ष में कुछ नए साथी  भी यहाँ आए  हैं . इसलिये अपने और आप सबके विचारों में लाने के लिये  पुस्तक का एक अंश आप सबके अवलोकनार्थ यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ .  

........................

 नेह नेह का उत्तर हो , पर नहीं हुआ है .

समतल समझा जहाँ , वहीं पर गहन कुँआ है .

 दोष न केवल अनीति करना , सहना भी है .

सरेआम अन्याय देख चुप रहना भी है .

लेकिन ध्रुव को ऐसे नहीं बिखरने दूँगी .

मन माला से एक न मोती गिरने दूँगी .

 और उठी आन्दोलित मन को चली सम्हाले .

मन की दुर्बलता की बेटा थाह न पाले .

धीरज हुआ रेत का घर , जब ध्रुव को देखा .

तेज कटारी नोंक , हृदय पर गहरी रेखा .

 आँखें थीं आरक्त रिसा हो घाव नया ही .

ध्रुव की नज़रों ने माँ से सब हाल कहा ही .

 “मेरा लाल ,बहादुर क्यों इतना उदास है .

कितनी सारी खुशियाँ अपने आसपास है .

 समझ न आय़ा , तुम सब मिलकर नगर गए क्यों ?

बहुत थका देने वाली थी , डगर गए क्यों ?

 मैंने समझाया था अभी नहीं जाना है .

स्वयं बुलाएंगे वह समय अभी आना है.

 यहाँ कुटज में ही देखो तो कितना सुख है .

शान्त ,सृष्टि के आँगन में बोलो क्या दुख है .

 रही लाल के अपने , पथ में पलक बिछाए .

मुख पर ऐसी गहन उदासी तनिक न भाए .

 तू तो मेरा सूरज , राजाओं का राजा .

आ बेटा , अब माँ की बाहों में भी आजा .”

 हाथ हटाया , बैठ गया ध्रुव नज़र फेरकर .

बोला आँसू पौंछ ,और नजरें तरेरकर .।

 “माँ , तुम सदा ज्ञान की ही बातें करती हो .

वीर बनो , यशवान् बनो , कहती रहती हो .

“वीर यशस्वी कुछ भी मुझे नहीं बनना है .

क्या वे मेरे पिता नहीं , सच सच सुनना है .”

“बेशक हैं ,बेटा सवाल क्यों आया मन में .”

“क्योंकि यही नवनीत सा मिला मन मन्थन में .”

सहना तुमने सीखा है माँ , मुझे न भाता .

दुनिया में मेरी तो एक तुम्ही हो माता .”

बेटा , कोई जटिल समस्या होगी मन में .

शायद बाधा कुछ आई होगी चिन्तन में  .  

 राजनीति की बातें हैं ,तुम बच्चे ही हो .

क्या समझोगे अभी अक्ल के कच्चे ही हो .

 यदि छोटी छोटी बातों पर ही ऐसे उलझेंगे .

बड़े बड़े मसले उनसे कैसे सुलझेंगे .”

 “तुम तो माँ बस उनकी सी ही बात कहोगी .

मेरी अब क्या कोई बात नहीं समझोगी ?

 राज काज में बच्चों का दिल तोड़ा जाता ?

बुरा भला हो , मनचाहा पथ मोड़ा जाता ?

 राजेश्वर ,रानी को समझा भी सकते थे .

मुझको पास बुलाकर गले लगा सकते थे .

 पर जड़वत् बने रहे ,कुछ कहा न टोका .

चले वहाँ से, तब भी दे आवाज न रोका .

 फिर भी तुम कहती हो ,मुझको सह लेना था .

रानी जो कुछ कहती उसको कह लेना था .”

 रहा रोकता कुछ पल तक ध्रुव अपने वशभर

पीड़ा फूट पड़ी नयनों से निर्झर झर झऱ ..

 बीते पल खुद सुनीति ने भी देखे जीकर

गहरी आह भरी , आई, दृगजल को पीकर .

 बाँहों में ले सुत को अपने कंठ लगाया .

मन को संयत किया , लाड़ले को समझाया .

“अच्छा चलो साँझ घिर आई दीप जलाऊँ .

भूखे होगे बोलो रुचि का ,अभी पकाऊं .

 देखो वह रह रहकर जुगनू चमक रहा है .

विकसा कोई फूल पवन जो महक रहा है .

 तुमने उस दिन देखे थे जो अण्डे प्यारे .

निकल पड़े हैं आज उन्हीं से बच्चे प्यारे .

 चीं चीं चीं चीं करके माँग रहे थे दाना .

नहीं समझ में आता उनका रोना गाना .

 सुनो लाल , अब रोष छोड़कर उठ भी जाओ .

सिखलाया जो गीत तुम्हें , अब मुझे सुनाओ.”

 “माँ मुझको चिड़ियों फूलों से मत बहलाओ .

मेरी क्लान्ति मिटे ,वह कोई राह दिखाओ .

तुम ही कहतीं ,जो परवश हो झुक जाते हैं .

जीते हैं लेकिन अन्दर से मर जाते हैं .

 स्वत्व छिने तब भी कोई जो चुप रहता है .

बेचारा बनकर ही आजीवन रहता है .

शान्ति , शान्ति बस शान्ति सदा कायर करते हैं .

तूफानों के साथ वीर जीते मरते हैं .”

“अच्छा , मैं भी सुनूँ ..कहाँ क्या काम करोगे ?”

नन्हें हाथों कहाँ कहाँ तुम नाम लिखोगे .”

“कहने को हूँ अभी जननि मैं छोटी वय का .

किन्तु हठी हूँ स्थिर हूँ मैं अपनी लय का .

 उन्हें समझनी होगी पीड़ा की परिभाषा .

भर देते बचपन की झोली ढेर निराशा.”

“हाँ ,हाँ तुम ऐसा ही कर लोगे , करना भी .

न्याय के लिये उन्हें मिटाना , खुद मिटना भी .

 किन्त्तु अन्य पथ भी है ,उन्हें सजा देने का .

खुद की ही नज़रों में उन्हें झुका देने का .

 राह नहीं है किन्तु कलह विद्रोहों वाली .

वह है दृढ़ विश्वास अटल संकल्पों वाली .

 वैसे भी प्रतिशोध जलाता है खुद को भी .

ओला नाशक फसल , गलाता है खुद को भी ,

 जहाँ द्रोह के कंटक जाल बिछाए जाते .

उन्नति की राहों में शूल उगाए जाते .”

“यह सब नहीं , राह दिखलाओ वही मुझे माँ .

जिस पर चल , कुछ होने का हो भान मुझे माँ .”

“अच्छा सुनो , परम ईश्वर पालक हैं सबके .

परमपिता है , परम हितैषी सारे जग के .

मैं ,तुम ,राजा , रानी क्या हैं , विश्व उन्ही का .

धरती से अम्बर तक है साम्राज्य उन्हीं का .

उनके इंगित से ही यह दुनिया चलती है .

पतझड़ होता मधुऋतु में कलियाँ खिलती हैं .

 पर्वत सागर नदियाँ सूरज चाँद सितारे .

उनके कहने भर से ही चलते हैं सारे .

 आश्रय लेना है तो केवल जगत्पिता का .

उनको पाकर भूलोगे अध्याय व्यथा का .”

“परमेश्वर है कौन ? पिता कैसे हो सकते ?

नेह पितृ सम परमेश्वर कैसे दे सकते ?

 राजेश्वर हैं जनक , उन्ही का नेह चाहिये .

द्वेषमयी के नयनों से बस मेह चाहिये .”

“तो तुम मेरी पूरी बात नहीं समझे हो .

राजा, रानी , द्वेष ,दण्ड में ही उलझे हो .

 इसको छोड़ो , आगे भी जाकर कुछ सोचो .

जो कोई भी सोच न पाया हो वह सोचो .”

“ऐसा है तो , पूरी बात बताओगी अब

जगत्पिता के घर मुझको पहुँचाओगी कब ?”

 “हाँ !...तो मैंने कहा पिता ईश्वर से बढ़कर .

कोई नहीं जगत में आश्रय उनसे बढ़कर .

 राजा, रानी मैं, तुम . सब  इनके अनुचर हैं .

परम सत्य है ,परम पिता वे परमेश्वर हैं .

 जब चाहो ,जैसा भी चाहो पा सकते हो .

अपनी सारी बातें उन्हें बता सकते हो .

 हर वंचित की खोज खबर लेने वाले हैं ,

पुस्कार या दण्ड वही देने वाले हैं .

 चन्दा सूरज तारों में उनकी उजियाली .

उनसे ही पत्ते पत्ते में है हरियाली .“

“अच्छा माँ फिर मुझको उनका पता बताओ .

उन्हें सुनाने अच्छा सा एक गीत सिखाओ .

 कैसा रंग रूप है ,वास कहाँ है उनका .

और कौन जो सबसे खास रहा है उनका .”

“एक जगह हो तो कहदूँ यह उनका घर है .

उनका घर तो सारा ही धरती अम्बर है .

 निर्मल अन्तर वाले ही उनसे मिल पाते .

भोले निश्छल मन वाले ही उनको भाते .”

“कहदो माँ ,क्या निर्मल  निश्छल मन है मेरा ?”

हँसकर माँ ने हाथ यों ही बालों में फेरा .

“फिर तो माँ मैं ईश्वर से मिलने जाऊँगा .

तभी मिटेगी व्यथा , तभी सो भी पाऊँगा .”

“अब तो खुश हो बेटा ,चलकर खा लो खाना .

और सुनो ,मित्रों को यह सब नहीं बताना .”

 “अभी नहीं है मुझको माँ , कुछ खाना वाना ..

पहले परमपिता को सारी बात बताना . “

“अभी चला जाता हूँ माँ यह ठीक रहेगा .

सुबह मिलेगा जो अपनी ही बात कहेगा .”

“उफ् !..ध्रुव तुम तो पीछे पड़ जाते हो .

नहीं जानते कुछ भी केवल अड़ जाते हो .

 बता दिया है ,लेकिन अभी नहीं जाना है .

और बहुत कुछ है जो तुमको समझाना है .

 अभी अल्पवय हो , जब कुछ और बढ़ोगे .

तभी जगतपति की सूरत पहचान सकोगे .

 राह कठिन है अभी नहीं तुम चल पाओगे .

कहाँ कहाँ ढूँढ़ोगे , बेटा थक जाओगे .

 देखो अभी माँगते हो खाना तुतलाकर .

अपनी हठ पूरी करवाते मचल मचलकर .

 लोरी बिना सुने भी क्या तुम सो पाते हो

ज़रा कहीं ओझल होजाती ,चिल्लाते हो .

 अवसर आएगा ,जब दोनों साथ चलेंगे .

उनके साथ रहेंगे  सारी बात कहेंगे .”

 कितने ही आख्यान और श्लोक सुनाए .

टीस भुलाने माँ ने ध्रुव को खेल खिलाए .

 दिवस ढला ,सन्ध्या आई , रैना कजराई .

स्वप्न सजाने पलकों पर , एक लोरी गाई .

........................

मन्द हुआ स्वर माँ का , लोरी गाते गाते

शान्त श्रान्त सो गई पुत्र को स्वयं सुलाते .

 पर ध्रुव को थी नींद कहाँ , मन में थी हलचल .

तारों पर ठहरी थीं कब से अखियाँ अविचल .

 नए सवालों की पीड़ा भी नई अभी थी .

उसे गोद से उतारने की बात चुभी थी .

 समझ नहीं आता यों अपना वन में रहना .

तज अधिकार राजमाता का यों चुप रहना ..

 माँ के मन में क्यों कोई विद्रोह नहीं हैं .

धन वैभव सुख सुविधाओं से मोह नहीं हैं

फिर भी छोटी रानी के मन में भय कैसा ?

क्यों इतना आक्रोश और उद्वेलन ऐसा ?

 जो न बैठना भाया पास पिता के मेरा .

ज्ञात नहीं क्या है सम्बन्ध पिता से मेरा .

 सूत्र कहाँ है द्वेष ईर्ष्या भरी कथा का .

माँ ने क्यों ढोया है इतना भार व्यथा का .

 सुत होकर भी पिता के लिये हुआ पराया .

मुझ पर क्या गुज़री यह उनको ध्यान न आया .

क्यों पा लेता ठाठ कोई एकाधिकार का .

क्यों बनता अधिकार वही मन के विकार का

 सारे प्रश्न करूँगा मैं तो परम पिता से

लक्ष्य एक मिलना है मुझको जगत्पिता से .

 माँ कहती है सबके परम पिता ईश्वर हैं .

फिर भी अभी नही जाने देती क्योंकर है .

बड़ा तो न जाने कब तक मैं हो पाऊँगा .

सोच सोचकर ही तिल तिल मिटता जाऊँगा .

 इसीलिये मुझको जाना ..जाना ही होगा .

ईश्वर का आश्रय , मुझको पाना ही होगा .

 हठ भी यह ,संकल्प और अभिलाषा भी है

मिलें जनक जीवन के , नेह पिपासा भी है .

बड़ा नहीं तो क्या संकल्प बड़ा है मेरा .

पा ही लूँगा मोहन को विश्वास घनेरा

 माँ कहती है समदर्शी ममतामय ईश्वर .

उन्हें बुलाता जो मन से मिल जाते सत्वर .

समदर्शी के लिये बड़ा क्या ,क्या है छोटा .

मिलता सबको स्नेह खरा हो या हो खोटा .

 उनसे मिलकर सब कुछ मैं कहने वाला हूँ .

सहकर यों अन्याय न चुप रहने वाला हूँ .

 चुपके से ध्रुव उठा न आहट होने ही दी .

दबे पाँव बाहर निकला , माँ सोने ही दी .

 जागा क्षणिक विचार , बहुत दुख होगा माँ को .

कुछ न दे सका अपनी इतनी प्यारी माँ को .

 किन्तु विचार विलीन हुआ संकल्प भँवर में .

और चला चुपचाप अकेला घोर तिमिर में .