Friday, July 22, 2011

सूरज के साथ-साथ

सुबह--सुबह सूरज के साथ
उतरती है...गूँजती है
उनीदी अलसाई सी गली में
एक सत्तर साल के
आदमी की आवाज--
दूध ले लो...दूध
ठकुराइन..मिसराइन..
ओ दुकान वाली पंडिताइन
दूध ले लो ...।
उसे परवाह नही कि
साँसों के भँवर में डूबती हुई सी
उसकी आवाज काँपती है
झरोखों से झाँकती हुई सी आँखें
जैसे आखिरी पडाव तक की
दूरी नापतीं हैं ।
अपना ही बोझ उठाने में असमर्थ से पाँव
डगमगाते हैं
सूराख वाले जूतों को घसीटते हुए से
कसमसाते हैं ।
और ...कि,
दमा की बीमारी बलात् ही
खीचना चाहती है उसे अस्सी तक
उसे परे हटाता है
दूध भरी बाल्टी का बोझ उठाए
वह रोज आता है ।
सूरज के साथ--साथ ।
उसे बचाना जो है ,अपने आप को
'निठल्ला' और ,रोटी-तोडा'
जैसी उपाधियों से ।
निकट आती नीरव शाम के धुँधलके तक
समेट लेना है उसे निरन्तर
ढेर सारी धूप अपने अन्दर ।
और मुस्कराते देखना हैं उसे
अपने पोते--पोतियों को
उनकी नन्ही कोमल हथेलियों पर
चाकलेट व बिस्किट रखते हुए ।
वह सत्तर साल का बूढा
दूध के साथ भर जाता है
भगौनी में ढेर सारी ऊर्जा
और उल्लास भी ।
सुनहरी धूप सा
एक विश्वास भी...।
-----------------

13 comments:

  1. उसे बचाना जो है ,अपने आप को
    'निठल्ला' और ,रोटी-तोडा'
    जैसी उपाधियों से ।

    यह सोच जैसे किसी भी बुज़ुर्ग का पीछा करती हुई सी ..

    वह सत्तर साल का बूढा
    दूध के साथ भर जाता है
    भगौनी में ढेर सारी ऊर्जा
    और उल्लास भी ।
    सुनहरी धूप सा
    एक विश्वास भी...।

    बहुत सुन्दर रचना ...संवेदनशीलता से भरी हुई

    ReplyDelete
  2. उसे बचाना जो है ,अपने आप को
    'निठल्ला' और ,रोटी-तोडा'
    जैसी उपाधियों से ।


    अब अधिक क्या कहूँ...आपकी रचनाएं,चाहे गद्य या हो पद्य...मन भिंगो जाती है...

    जीवन के कटु सत्य इस कविता में जिस ढंग से आपने चित्रित किया है न...क्या कहूँ...

    ReplyDelete
  3. बहुत भावभीनी व यथार्थ से सामना कराती रचना... ऊर्जा काम करने से चुकती नहीं बढ़ती है...आभार!

    ReplyDelete
  4. वह सत्तर साल का बूढा
    दूध के साथ भर जाता है
    भगौनी में ढेर सारी ऊर्जा
    और उल्लास भी ।
    सुनहरी धूप सा
    एक विश्वास भी...।
    यही वह विश्वास है जिसके बल पर मानवता आज भी ज़िन्दा है।

    ReplyDelete
  5. सूरज के साथ अँगड़ाई लेती विश्व की दिनचर्या।

    ReplyDelete
  6. वह सत्तर साल का बूढा
    दूध के साथ भर जाता है
    भगौनी में ढेर सारी ऊर्जा
    और उल्लास भी ।
    सुनहरी धूप सा
    एक विश्वास भी...।
    chamatkarik shabd-rachna.......wah.

    ReplyDelete
  7. जिंदगी के कटु यथार्थ से रूबरू कराती और आशा का उजास फ़ैलाती मर्मस्पर्शी एंव खूबसूरत रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  8. जीवन का संघर्ष!!

    ReplyDelete
  9. यथार्थ लिखा है ... बहुत लाजवाब ...

    ReplyDelete
  10. बेहद मार्मिक मगर कटु सत्य को उजागर किया है।

    ReplyDelete
  11. हृदयस्पर्शी रचना....
    सादर...

    ReplyDelete
  12. बहुत सुंदर रचना.... अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया...

    ReplyDelete