Saturday, December 31, 2011

नववर्ष आप सबके लिये मंगलमय हो



ऐसी हो हर सुबह आपकी
ऐसी ही हर शाम ।











हर पल मन को छूकर गुजरे
स्नेहिल अभिराम




Thursday, December 29, 2011

कुछ नही तो यही सही

आजकल कुछ नया नही सूझ रहा । इसलिये पुरानी रचनाओं को देकर ही रिक्ति-पूर्ति की जारही है । यहाँ यह लगभग पन्द्रह वर्ष पुराना गीत है ।
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मेरे दिल का हाल ,न पूछो
कितना क्यूं बेहाल ,न पूछो
हर संवेदनशील आदमी
क्यूं रद्दी रूमाल ,न पूछो ।

क्या अपने क्या बेगाने
चाहा सबसे बस अपनापन
पर इस बस्ती में रहते हैं
सब कितने कंगाल ,न पूछो
मेरे दिल का हाल ,न पूछो।

करे कोई अपराध
सजा मिल जाती और किसी को
कैसे-कैसे मिल जाती है
हत्यारों को ढाल न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

केवल दर्द मिलेगा तुमको
जहां जुडोगे दिल से
ह्रदय की राहों में बिखरे हैं
कितने जंजाल न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

सब उगते सूरज के गायक
यह ढलती संन्ध्या का
साथी दुखी अकेलों का,
इस मन की उल्टी चाल पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

बूंद-बूंद को तरसे पाखी
धूल उडी आंखों में
उजडे शुष्क मरुस्थल में
अब कैसे नदिया-ताल ! न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो

Tuesday, December 20, 2011

सुख तथा कुछ और क्षणिकाएं

सुख
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(1)
सुख--
एक नकचढा मेहमान,
और मैं.....
झुग्गी-झोपडी वासी
अकिंचन मेजबान
उसे कहाँ बिठाऊँ !
कैसे सम्हालूँ !!
(2)
सुख--
चौराहे पर ,
कभी-कभी मिलजाने वाला
कोई परिचित्
तुरन्त एक यंत्र-चालित सी स्मित्
"क्या हाल हैं ?"
"ठीक हैं "
और फिर नितान्त अपरिचित्
(3)
सुख --
जैसे बीच सडक पर,
गैर-जिम्मेदार भाग्य द्वारा
चलते-खाते
लापरवाही से फेंका गया
छिलका ।
फिसलता है ,गिरता है
मन....बार-बार ,
होता है शर्मसार

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कुछ क्षणिकाएं
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(1)
पलटती रहती है
अतीत के पन्ने
बूढी हुई जिन्दगी ।
(2)
तुम हो आसपास
तो जीवित हैं
हर अहसास ।
(3)
स्नेह की ओट में
छुपालो
यूँ नफरत से बचालो ।
(4)
सुख
अगर सुख नही
तो दुख
बेशक दुख नही ।
(5)
प्रतीक्षा की धूप में
पत्ते पकने लगे
पल एक-एक कर
झरने लगे ।
(6)
गलत को नही कहा
तुमने गलत
तो फिर बेशक
तुम गलत ।
(7)
तुम हो चाहे
दुख का कारण
या दुख के कारण ।
हर समस्या का
तुम्ही हो निवारण ।
(8)
न कोई क्लाइमेक्स
न कलरफुल साइट
जिन्दगी का चित्र
केवल ब्लैक एण्ड व्हाइट ।
(9)
स्नेह का व्यापार
बेकार मन को
बढिया रोजगार

Monday, December 12, 2011

एक सुरमय सुरम्य पर्व


ग्वालियर को गालव ऋषि की तपोभूमि , वीरांगना लक्ष्मीबाई की अन्तिम कर्मभूमि के साथ तानसेन नगरी होने का गौरव भी मिला हुआ है ।
वही संगीत-सम्राट तानसेन जिनके लिये सूरदास जी ने कहा था-"विधना यह जिय जानिकै शेषहि दिये न कान ,धरा ,मेरु सब डोलिहैं तानसेन की तान ।" वही तानसेन जो अकबर के दरबार के नौ रत्नों में से एक थे और वही तानसेन जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के पर्याय माने जाते हैं ।
तानसेन उनका नाम नही बल्कि उपाधि है जो बाँधवगढ के राजा रामचन्द्र ने उन्हें दी थी । कहते हैं कि उनका मूल नाम तन्ना मिश्र ( कुछ लोग पाण्डे भी कहते हैं ) था । उनका जन्म ग्वालियर के पास ही बेहट ग्राम में संवत् 1563 में हुआ था । उस समय ग्वालियर में कला निपुण संगीत रसिक राजा मानसिंह तोमर का शासन था इसलिये ग्वालियर संगीतकला का विख्यात केन्द्र था और बैजू बक्सू कर्ण और मेहमूद जैसे संगीताचार्य व गायक एकत्र थे । अनुमान है कि तानसेन ने इन्ही से प्रारम्भिक संगीत शिक्षा ली होगी । राजा मानसिंह के बाद वह संगीत-मण्डली बिखर गई और तानसेन वृन्दावन चले गए । वहाँ उन्होंने स्वामी हरिदास से संगीत की उच्चशिक्षा ली थी । बाद में अष्टछाप के संगीताचार्य गोविन्दस्वामी से भी गायन सीखा था । वे क्रमशः दौलत खाँ, राजा रामचन्द्र तथा अकबर के दरबार की शोभा रहे थे ।
तानसेन ध्रुपद शैली के विख्यात गायक व दीपक राग के विशेषज्ञ थे । जनश्रुति है कि जब वे दीपक राग गाते थे तब अग्नि प्रज्ज्विलित हो जाती थी । इस बात में कितना तथ्य है यह तो नही मालूम लेकिन यह तय है कि तानसेन को संगीत कला का पर्याय माना जाता है । उन्होंने संगीतसार व रागमाला नामक दो ग्रन्थों की तथा अनेक ध्रुपदों की रचना की । तानसेन की इस नगरी में किले के अलावा अनेक दर्शनीय मन्दिर मकबरे व दरगाह हैं(जिनसे आगे कभी परिचय करेंगे) जिनकी दीवारें और मीनारें आज भी जैसे गुनगुनातीं हैं । हर पत्थर से सुरों की झंकार गूँजती है और प्रतिवर्ष दिसम्बर माह में तो माटी का कण-कण राग-रंजित हो उठता है ,हवा का हर झोंका लय ताल में बहता है,जब तानसेन-समारोह में देश भर से शास्त्रीय संगीत के विशिष्ट कलाकार यहाँ आकर अपनी कला बिखेरते हैं और स्वयं को धन्य मानते हैं । यहाँ देश के लगभग सभी शीर्षस्थ और महान शास्त्रीय गायक प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं ।संगीत-सम्राट की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिये इस समारोह का आयोजन उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत व कला अकादमी तथा मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् व संस्कृति विॆभाग करता है ।
बैजाताल का एक दृश्य---


इस बार 9 दिसम्बर से 12 दिसम्बर तक तानसेन--समारोह चला । यह 87 वां समारोह था । प्रतिवर्ष यह तानसेन के समाधि-स्थल (हजीरा) पर ही सम्पन्न होता था जहाँ मोहम्मद गौस का खूबसूरत मकबरा भी है । मोहम्मद गौस तानसेन के अत्यन्त श्रद्धास्पद थे । लेकिन इसबार यह समारोह बैजाताल पर सम्पन्न हुआ । ग्वालियर में अनेक प्राचीन इमारतों के अलावा ,सिन्धिया घराने का भी जो वास्तु-वैभव जहाँ-तहाँ बिखरा है, बैजाताल उसका एक सुन्दर उदाहरण है । समारोह में इसकी साज-सज्जा विशेष रूप से की गई ।
रात्रि के समय बैजाताल का दृश्य---


फिर भी कहा जासकता है कि संगीत कला है ,हृदय व आत्मा का विषय है । इसे बाहरी साज-सज्जा नही बल्कि कला-साधकों की प्रस्तुति विशिष्ट बनाती है । कलाकार साज-सज्जा से नही श्रोताओं के ध्यान से प्रभावित होता है । अन्तिम दिन सुरों की फुहारें बेहट गाँव की माटी को भिगोतीं हैं । आखिर संगीत का वह मधुर स्वप्न यहीं तो साकार हुआ था ।
इसबार बनारस घराने की प्रसिद्ध ख्याल व ठुमरी-गायिका सुश्री सविता देवी को तानसेन अलंकरण से अलंकृत किया गया । इनके अलावा श्री कमलकामले,गौरी पाठारे ,सलिल भट्ट समरेश चौधरी अश्विनी भिडे ,मोइनुद्दीन खाँ आदि प्रख्यात कलाकारों ने मनमोहक गायन-वादन से श्रोताओं को डुबोदिया । यहाँ बिहारी का यह दोहा प्रासंगिक है कि, "तन्त्री नाद ,कवित्त रस, सरस राग रति रंग,अनबूडे बूडे, तरै जे बूडे सब अंग ।"
तानसेन समारोह हर संगीत-प्रेमी के लिये एक अद्भुत सुरम्य सुरमय पर्व है । राग जैसे साकार होकर श्रोता को अपने कुहुक में बाँध लेते हैं और लेजाते हैं कहीं दूर किसी स्वप्न-लोक में ,जहाँ हम सिर्फ अपने साथ होते हैं ।

Thursday, December 8, 2011

पियक्कड

रात के लगभग ग्यारह बजे थे । पूरे मोहल्ले में ज्यादातर लोग सोगए थे । केवल ठाकुर धीरसिंह की हवेली से टी.वी. चलने की आवाज आरही थी या अपने साथ हुई किसी ज्यादती को याद कर, रह-रह कर रो उठते बच्चे की तरह गली में एक-दो कुत्ते भौंक उठते थे । अचानक गली में बलवा सा होता लगा । किसी औरत की चीख-पुकार, भाग--दौड ,गाली--गलौज ,बर्तन फेंकने की आवाज ...और मिली--जुली हुंकारें--
"मारो साले को ..हरामी कही का ..,'मूत' पीकर आए दिन नौटंकी दिखाता रहता है । धक्के मार कर बाहर करो ,माहौल खराब कर रहा है मोहल्ले का..पियक्कड साला...।"
देखा जाए तो इस मोहल्ले में इस तरह का माहौल कोई नया नही । शराब पीकर जरा-जरा सी बात पर कट्टा, तलवारें निकालना ,बोतल, ईंट और पत्थर फेंकना, औरतों को पीटना ,चीख-चीख कर माँ-बहन की गालियाँ देना आम रहा है । चूँकि ये लडाइयाँ पूरी तरह शुद्ध शाब्दिक और अहिंसक होती हैं, किसी को खरोंच तक नही आती सो लोग झगडों की ज्यादा चिन्ता नहीं करते । जिन्हें झगडे का तमाशा देखने में रुचि होती वे लोग दर्शक बन कर या बीच-बचाव का श्रेय लेने वहाँ पहुँच भी जाते ।
लेकिन यह झगडा न सिर्फ शाब्दिक था न ही शुद्ध रूप से अहिंसक ।
"यह सब किस्सू के कारण हो रहा है । जब से आया है आए दिन कुछ न कुछ फसाद होता ही रहता है ।" -लोग कह रहे थे । हालाँकि एक-दो लोग इसके लिये कंची( उसकी घरवाली) को जिम्मेदार मानते हैं ।
किस्सू यानी किसनलाल । गाँव से काम की तलाश में आया एक मजदूर । पर शहर में आकर उससे कोई काम न बना । किसी दुकान पर बैठा तो चीजें कम कीमत पर बेच दीं । हलवाई के यहाँ काम मिला तो दूध जला दिया या शक्कर की चासनी बनाने की बजाय बूरा बना दिया । और दूध बेचना शुरु किया तो भैंस वाला पहले ही इतना पानी मिला देता कि लाभ की जगह उसे शिकायतें व गालियाँ मिलीं । शरीर की हालत बिना पानी की फसल सी होगई है सो हम्माली या ईंट-गारा ढोने का काम तो कर नही सकता था । हाँ कभी-कभी किसी टेम्पोवाले का सहायक बन कर पाँच-पचास रुपए ले आता है । ज्यादा पढा-लिखा तो है नही । कुल मिला कर वह अब निकम्मे की उपाधि लेकर या तो अक्सर घर में बैठा घरवाली कंची और बेटी गुड्डन की , जिसकी उम्र रोम-रोम से वसन्त की कोंपल की तरह फूटने लगी है ,रखवाली करता रहता है या नुक्कड पर दिनभर ताश खेलते लोगों की चालें देखता रहता है । कंची लाली-पौडर लगाए देहरी में बैठी दिन भर बीडी बनाती है और उसे ताने और जली-कटी भी सुनाती रहती है ।
"कहाँ यह खूसट सा किस्सू और कहाँ बेचारी कंची , एकदम नरम लौकी सी । बन्दर के हाथों नारियल लगना और किसे कहते हैं ! शराबियों की औरतों की तो जिन्दगी ही नरक है । लोगों की सहानुभूति कंची के साथ है ।
"देखना ,अब भी वही कंची पिट रही होगी ।"---कोई अनुमान लगा रहा था । जिसका उत्तर तुरन्त ही आया---
"तो भैया तुम मोहल्ले में रहते भी हो या नही । अब वो दिन नही रहे । गट्टू और मंगल के होते किस्सू की इतनी हिम्मत नही है कि कंची पर हाथ उठा जाए...।"
गट्टू और मंगल मोहल्ले के दादा हैं । कई काण्ड करके जेल जा चुके हैं । ठाकुर रायसिंह के मकान में एक कमरा किराए से उन्होंने ही किस्सू को दिलवाया है । गट्टू ने कंची को बहन माना है । और मंगल ने भौजाई । अब उनकी बहन--भावज को कोई टेढी नजर से भी देख तो जाए । किस्सू की क्या शामत आई है ।
तब तो सचमुच किस्सू की शामत ही आई थी । वह कंची को पीट रहा था । दरअसल वह गुड्डन के बारे में पूछ रहा था कि वह रोज जाती कहाँ है । उससे बिना पूछे-बताए लडकी को कौनसे काम पर लगा दिया है जो लौटने में रोज दस--ग्यारह बज जाते हैं । और उसके पास ये नए-नए कपडे ,सैंडिल, कहाँ से आए ।
"यह सब तो वह पूछे जो कमा कर खिलाए"---कंची ने जो यह जबाब दिया तो किसनलाल तिलमिला उठा ।बस दो हाथ जमाए ही थे कि कंची की चीख गट्टू और मंगल के कानों तक पहुँच ही गई । दोनों तुरन्त आगए । आते ही गालियों की बौछार करते हुए किस्सू पर पिल पडे । और लगा कि मोहल्ले में बलवा होगया ।
किस्सू जमीन पर अधलेटा पडा रिरिया रहा था---"मंगल भैया ,गट्टू भैया मेरी बात तो सुनलो ..।"
"क्या सुनें तेरी हरामखोर.!"----मंगल पूरी ताकत से चिल्लाया ।--- "साला दो घूँट पीकर आए दिन नौटंकी करता रहता है । बीबी--बच्चों का खयाल नही है । दो लात पडेंगी तभी सही होगा । अब वो जमाना नही रहा कि मर्द औरत को जानवर की तरह पीटता रहे और लोग चुपचाप तमाशा देखते रहें । खास तौर पर मैं तो टाँग तोड कर हाथ में पकडा दूँगा समझे ।"
"मेरी बात सुनलो मंगल भैया फिर जो सजा दोगे मंजूर है '---किसुनलाल लडखडाते हुए मंगत के पैरों में गिर गया । शराबी की हेकडी तभी तक कायम रहती है जब तक कोई धमकाता नही । एक घुडकी उसे जमीन पर ले आती है
मंगल भैया , मेरी बेटी..मेरी गुड्डन अभी तक नही लौटी है । 'राँड' बताती नही है कि लडकी कहाँ गई है । फिर पीटूँ नही तो क्या पूजा करूँ इसकी !"
पहले ,चल दूर हट---मंगत ने पाँव झटका--- बडा आया लडकी की चिन्ता करने वाला ... चुपचाप जाकर अन्दर सो जा । वरना दो लपाडे धर दूँगा तो आँखें बाहर निकल आएंगी कौडियों की तरह..।
एक तो कुछ कमाता धमाता नही है और घरवाली को आए दिन पीटता रहता है । साले की रिपोट लिखादी तो जाएगा महीनों के लिये जेल में ...।
"अर् र् रे ऐसे कैसे कर दोगे रिपोट ! लडकी के मामा चाचा बने फिरते हो और....। मेरे क्या जबान नही है । मैं भी सब बता दूँगा कि मेरी लडकी को कौन बरगला रहा है । मुझे सब पता है । किस् सी से डरता नही हूँ "---किस्सू ने सीना तान कर खडे होने की कोशिश की । फिर लडखडा कर गिर पडा ।
अरे यह ऐसे नही मानेगा---मंगत और गट्टू ने उसे पकड -घसीट कर कमरे में बन्द कर दिया ।
कमरे में से बर्तनों के पटकने--फोडने की आवाज किस्सू की नशे में लडखडाती चीखें सुनाई देरही थी ---"अर् रे ,कोई तो सुन लेता मेरी बात । अरे 'अधरमियो' ! कीडे पडेंगे तुम्हारे । दगाबाजो ..!"
"चलो..चलो ..स्साला , पियक्कड है । पियक्कडों की बात का क्या भरोसा । रात भर ऐसे ही नाटक करेगा ,सुबह सही होजाएगा ।"---मंगल ने कहते हुए सबको धकेला और नाटक का पटाक्षेप कर दिया ।