Saturday, March 10, 2012

तेरे दो अक्षर

जब दर्द कोई गहराया
अन्तर मेरा घबराया
था कौन
निकट जो आया
मुझको आश्वस्त बनाया
जब जाना मैंने पाया
वे तेरे दो अक्षर थे

मैं थी तुमसे अनजानी
तम की चलती मनमानी
आंखें प्रतिबन्धित आकुल
बन्दिनी चेतना व्याकुल।
उपहार मिला तब उज्ज्वल,
सस्नेह सुनहली निर्मल ,
किरणें कब थीं सूरज की,
वे तेरे दो अक्षर थे

पत्तों ने नाता तोडा
हरियाली ने मुंह मोडा
चुभती थी शुष्क हवाऐं
शाखों ने धीरज छोडा
तब ठूंठ बने पेडों पर
फूटीं कोमल मुस्कानें
वे नूतन किसलय कब थे
वे तेरे दो अक्षर थे

जब-जब सहमी आशाऐं
विश्वास हुआ कुछ धूमिल
जब रोम-रोम कण्टकमय
थी सांस-सांस भी बोझिल
जिसके इंगित पर
बिखरे मोती , माला बन संवरे
वह डोर रेशमी कब थी
वे तेरे दो अक्षर थे

जब भी कोई ना समझा
मन की प्राणों की भाषा
आहत हताश अन्तर था
संज्ञाहत हर अभिलाषा
तब अन्तर-भीगी बातें
चुपके कानों में आईं
मधुमासी गीत नहीं थे
वे तेरे दो अक्षर थे

16 comments:

  1. आपकी साहित्य सर्जना मुग्ध करती है हमेशा.. आपकी रचनाएं मन को छू जाती है... इस कविता में भी आपने प्रेम की प्रेरणा को एक संबल बनाकर जीवन के हर पल में संजो दिया है... बहुत ही सुन्दर और लयात्मक रचना.. एक गीत!!

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  2. पत्तों ने नाता तोडा
    हरियाली ने मुंह मोडा
    चुभती थी शुष्क हवाऐं
    शाखों ने धीरज छोडा
    तब ठूंठ बने पेडों पर
    फूटीं कोमल मुस्कानें
    वे नूतन किसलय कब थे
    वे तेरे दो अक्षर थे ...

    मधुर ... बेहतरीन काव्य सृजन ... प्रेम के कोमल बयार और मधुर झंकार की तरह ये गीत सीधे ह्रदय को झंकृत करता है ... आनद आ गया ...

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  3. बहुत सुन्दर ..........
    प्रेम के माधुर्य से लबरेज आपकी कविता दिल को भा गयी...

    बहुत प्यारी......

    सादर.

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  4. मुग्ध मन अभी मौन नहीं तोडना चाहता...क्या और कैसे कहूँ...?

    बस, अद्वितीय, अप्रतिम, अनिद्य ...

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  5. :) :)वाह
    बेहतरीन कविता...
    हर एक पंक्ति कितनी खूबसूरत है!! :)

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  6. खूबसूरत रचना....

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  7. सुन्दर प्रस्तुति !
    आभार !

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  8. सुन्दर प्रस्तुति.....बहुत बहुत बधाई...

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  9. वे तेरे दो अक्षर थे.....wah.... bahot achchi lagi.

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  10. बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति,बेहतरीन मर्मस्पर्शी सुन्दर रचना.....

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  11. जब भी कोई ना समझा
    मन की प्राणों की भाषा
    आहत हताश अन्तर था
    संज्ञाहत हर अभिलाषा
    तब अन्तर-भीगी बातें
    चुपके कानों में आईं
    मधुमासी गीत नहीं थे
    वे तेरे दो अक्षर थे
    Girija ji ap ne to bilkul sangrhneey rachana likhi hai ...badhai sweekaren.

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  12. मेरे ये हृदय को भाये,
    वे तेरे दो अक्षर थे,
    अंतः ये पटल समाये,
    वे तेरे दो अक्षर थे,
    अनुभूति प्रेम कराये,
    वे तेरे दो अक्षर थे,
    मन मुग्ध मेरा कर जाये,
    वे तेरे दो अक्षर थे।
    सुन्दर भावाव्यक्ति.....

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  13. वाह ! ! ! ! ! बहुत खूब सुंदर रचना,बेहतरीन भाव प्रस्तुति,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: तुम्हारा चेहरा,

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  14. Ve tere do akshar the .... Wah wah !!!! Bhavpurn rachna k liye badhai

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  15. बहुत ही सुंदर और सटीक उपमानों द्वारा प्रेम का वर्णन। अच्छी और मन को छूने वाली रचना।

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  16. बेहद सुन्दर... मनमोहक लयात्मकता!
    सादर!

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