Saturday, March 10, 2012

तेरे दो अक्षर

जब दर्द कोई गहराया
अन्तर मेरा घबराया
था कौन
निकट जो आया
मुझको आश्वस्त बनाया
जब जाना मैंने पाया
वे तेरे दो अक्षर थे

मैं थी तुमसे अनजानी
तम की चलती मनमानी
आंखें प्रतिबन्धित आकुल
बन्दिनी चेतना व्याकुल।
उपहार मिला तब उज्ज्वल,
सस्नेह सुनहली निर्मल ,
किरणें कब थीं सूरज की,
वे तेरे दो अक्षर थे

पत्तों ने नाता तोडा
हरियाली ने मुंह मोडा
चुभती थी शुष्क हवाऐं
शाखों ने धीरज छोडा
तब ठूंठ बने पेडों पर
फूटीं कोमल मुस्कानें
वे नूतन किसलय कब थे
वे तेरे दो अक्षर थे

जब-जब सहमी आशाऐं
विश्वास हुआ कुछ धूमिल
जब रोम-रोम कण्टकमय
थी सांस-सांस भी बोझिल
जिसके इंगित पर
बिखरे मोती , माला बन संवरे
वह डोर रेशमी कब थी
वे तेरे दो अक्षर थे

जब भी कोई ना समझा
मन की प्राणों की भाषा
आहत हताश अन्तर था
संज्ञाहत हर अभिलाषा
तब अन्तर-भीगी बातें
चुपके कानों में आईं
मधुमासी गीत नहीं थे
वे तेरे दो अक्षर थे

Monday, March 5, 2012

दुःखान्त

(1) "दुखान्त यह नही होता कि रात की कटोरी को कोई जिन्दगी के शहद से न भर सके और वास्तविकता के होंठ कभी उस स्वाद को चख न सकें ।
दुःखान्त यह होता है कि रात की कटोरी से चन्द्रमा की कलई उतर जाए और उसमें पडी कल्पना कसैली हो जाए ।

(2) दुःखान्त यह नही होता कि जिन्दगी की डगर पर समाज के बन्धन काँटे बिखेरते रहें और आपके पाँव लहूलुहान होते रहें ।
दुःखान्त यह होता है कि आप लहूलुहान पैरों से उस जगह जाकर खडे होजाएं जहाँ से आपको कोई रास्ता बुलावा ही न दे ।

(3) दुःखान्त यह नही होता कि आप इश्क के ठिठुरते शरीर के लिये उम्र भर गीतों के पैरहन सीते रहें ।
दःखान्त यह होता है कि उन पैरहनों को सीने के लिये आपके विचारों का धागा चुक जाए ।और कलम की सुई का छेद टूट जाए ।

(4) दुःखान्त यह नही होता कि किस्मत से आपके साजन का नाम पता न पढा जाए ।
दुःखान्त यह होता है कि आप अपने प्रिय को उम्र की सारी चिट्ठी लिखलें और आपसे प्रिय का नाम पता खोजाय । "

'रसीदी टिकट '(अमृता प्रीतम) से ।
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सच है । धागा चुक जाना ,कलम टूट जाना , नाम पता खोजाना और गलत पते पर चिट्ठी जाना बहुत बडी विडम्बनाएं हैं जीवन की ।

Saturday, March 3, 2012

सृजन की पीडा का फल


सुबह से ही उसकी हालत मुझे बेचैन कर रही थी । बार बार उसका उठना फिर पसर जाना ,मुँह से झाग गिरना ..सब कुछ व्यथित कर देने वाला । यशपाल जी की एक कहानी में आया शीर्षक साकार हो रहा था--सृजन की पीडा । तब तक उसके आसपास कोई नही था और मुझे स्कूल जाना था लेकिन उस समय मेरा सारा ध्यान सिर्फ उसकी पीडा पर था । किसी तरह उसके घरवालों को बुलवाया । यह बडे खेद की बात है कि एक तरफ लोग गाय को माता कहते हैं पूजा करते हैं पर उसका ध्यान नहीं रखते । यही हाल कन्या और नदी का भी है । खैर...

और तीन-चार घंटे की पीडा के बाद जो फल सामने आया उसने रोम-रोम पुलक से भर दिया । सफेद रेशमी रोओं वाला बछडा । वह निरुपमा माँ मुग्ध हुई अपने शिशु को प्यार कर रही थी और हमारी ग्यासो ( कामवाली) मुझे कहानी सुना रही थी कि --'"देखो दीदी गाय बिना सहायता के 'ब्या' गई जबकिन औरतों को कितनी मदद चइये होती है । कहते हैं कि एक बार एक गाय 'ब्या' रही थी उसने औरत से कहा कि मेरी पीठ सहला दे । औरत ने कहा कि तेरी पीठ सहलाऊँ कि अपना काम देखूँ । मुझे 'टैम' नही है । गाय ने कहा कि बहन , मेरा तो भगवान है पर तू जब बच्चा जनेगी तो तुझे जरूर मदद की जरूरत पडेगी । मेरा जाया तो 'छिन, भर में ही खडा हो जाएगा पर तेरे बच्चे को खडे होने में नौ महीने लग जाएंगे । भगवान ने गाय की सहायता की । और देखो दीदी औरत को 'जादा 'कस्ट' उठाना पडता है । गाय का ही तो 'सराप' लगा है । है कि नही ?"
जो भी हो ,चाहे मानवी हो या अन्य , माँ तो माँ होती है । कहानी की यह सच्चाई है कि कुछ ही देर बाद वह सद्यजात बछडा चलने को तैयार था । साफ-सुथरा मोहक । तब मुझे अपने गबरू की भी याद आई जो बेहद खूबसूरत और प्यारा था । मेरी पहली बाल कहानी 'इन्तज़ार' का नायक भी बना था लेकिन आठ दिन का ही जीवन जीकर चल बसा था । यह कहानी चकमक के नवम्बर 1988 के अंक में श्री राजेश उत्साही ने प्रकाशित की थी ।
सच है कि सिर्फ माँ ही होती है जो इतनी सघन पीडा सहती है तब कहीं इतना मीठा फल पाती है । क्योंकि वह एक जीवन को साकार रूप देती है ।