Friday, July 3, 2015

थोड़ी सी जमीन

माँ को जो खड़ी है जीवन के
अंतिम पड़ाव पर ,
चुग्गा की तलाश में
किसी चिड़िया सी ही
वह जीवनभर उडती रही है
यहाँ-वहां , ऐसे-वैसे
बस मुडती रही है .
आजीवन असुविधाओं की अभ्यस्त रही माँ 
नहीं चाहती कोई खास एशोआराम
सिर्फ एक आत्मीय सम्बोधन
सुबह-शाम .

अस्त्तित्त्व और अधिकार के
सारे प्रश्न उसके लिये हैं बेकार
जो कुछ भी था उसके पास  
तुम्हें सब दे चुकी है .
अब थके-हारे पांवों को ,
तुम दे दो थोड़ी सी जमीन.
जमीन --
अपनत्त्व की
घर में उसके अस्तित्त्व की
तुम्हारा जो कुछ है ,उसका भी है .
जमीन--
आश्वस्ति की कि 
अशक्त और अकर्म होकर भी
माँ अतिरिक्त या व्यर्थ नहीं है 
कि ,पढ़ और समझ सकते हो ,
उसके चेहरे की किताब का 
एक एक शब्द 

जमीन ,
छोटी छोटी बड़ी बातों की
कि दफ्तर से लौटकर
कुछ पलों के लिए ही सही
बेटा मिलकर ही जाता है  
अपने कमरे में  .
पास बैठकर हाल-चाल पूछता है
ना नुकर करने पर भी
बुला लेता है अपने साथ खाने पर .
कि एक पिता की तरह .
घर में बनी या 
बाजार से लाई हर चीज 
माँ को देता है ,खुद खाने से पहले
नकारकर कहीं से उभरती आवाज को कि,
अरे छोड़ो ,बड़ी-बूढ़ी क्या खाएंगीं !   
कि रख देता है माँ की हथेली पर
पांच-पचास रुपए बिना मांगे ही .
भले ही वह लौटा देती है 
मैं क्या करूंगी , कहकर
लेकिन पा लेती है वह 
अपने लिए एक ठोस जमीन .
सन्तान को अक्सर कहा जाता है 
बुढ़ापे की लाठी .
फिर जन्म और जीवन में..
सम्बल के नाम पर मन में .
बेटे से बढ़कर कोई नहीं होता माँ के लिए  
वह तुम्हें दुनिया में 
बड़े गर्व और विश्वास के साथ लाई है
बेटे की माँ बनकर फूली नही समाई है .   
तुमसे अभिन्न  ,
माँ क्यों है विच्छिन्न ?
जरा देख तो लो  
माँ की आँखें क्यों रहतीं हैं खोई खोई सी ?
क्यों रात में सोते-सोते 
घबराकर उठ जाती है ?
मौन मूक माँ की आँखें 
उन आँखों की भाषा पढलो-समझ लो .
लगालो गले ,
सहलादो माँ की बोझ ढोते थकी पीठ  
उठालो , सम्हालकर रखलो 
बौछारों में भीग रही है वह जर्जर किताब
एक दुर्लभ इतिहास  
अनकहे अहसास 
खो जाएंगे जाने कब ! कहाँ ! 
बहुत जरूरी है उसका ध्यान और मान  .
उतना ही जितना शरीर के लिए प्राण . 
तुम्हारी शिराओं में बह रहा है उसी का रक्त
स्रोत है वह जीवन की नदी का
द्वार है संसार का .

देखलो माँ के दुलारे ,!
कि कहाँ लडखडा रही है तुम्हारी जननी
पड़ी है जो तुम्हारे सहारे
देखलो कि तुम्हारा सहारा पाकर
वह कैसे खिल उठती है  
मोगरे की कली सी .
मेरा बेटा ...,
यह अहसास पुलक और गर्व के साथ
बिखर जाता है खुश्बू सा उसके अन्दर बाहर  
ये दो शब्द तुम्हारे काम आएंगे   
किसी भी धन से कहीं ज्यादा...यकीनन.

दो पल ठहरकर सोचो कि,
माँ ने तो दे दी तुम्हें एक पूरी दुनिया .
तुम दे दो माँ को थोड़ी सी जमीन 
बिना गमगीन वह ,
फैला सके अपने लड़खड़ाते पाँव ,
निश्चिन्तता के साथ .











13 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, नौशेरा का शेर और खालूबार का परमवीर - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शनिवार (04-07-2015) को "सङ्गीतसाहित्यकलाविहीना : साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीना : " (चर्चा अंक- 2026) " (चर्चा अंक- 2026) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  3. बहुत सुन्दर ,हर बेटे के लिए करनीय कार्य -

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  4. मन भर आया रचना के बाद ... सही है माँ कुछ नहीं चाहती बस कुछ बातों के और अगर ये सुख कोई भी बेटा दे पाए तो उसका अगला पिछला सभी जन्म सुधर जायें ... किस्मत वाले बच्चों को ही ये सेवा नसीब होती है ... इन पलों को लपक के सहेजना चाहिए ...

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  5. बहुत ही भावपूर्ण रचना और हर माँ के दिल की आखिरी इच्छा...

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  6. माँ दो जून की रोटी की भूखी नहीं होती है वह तो दो मीठे बोल की भूखी होती हैं
    बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना

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  7. बेहद बेहद सुन्दर...मन को छूती हुई !

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  8. वह कैसे खिल उठती है
    मोगरे की कली सी .
    “मेरा बेटा ...”,
    सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना

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