Wednesday, January 5, 2022

अंगरेजी कैलेण्डर का आखिरी दिन –2

 उस दिन मैंने मयंक को लिखा था ---दिन है यह अविस्मरणीय , एक का आविर्भाव और दूसरे का तिरोभाव  .

यह क्या बात हुई माँ -– मयंक ने मेरे तिरोभाव शब्द पर आपत्ति जताते हुए कहा . शासकीय सेवा का समापन किसी का तिरोभाव कैसे हो सकता है वह भी आप जैसी महिला का जो कहीं रुकना ही नही जानती .

यह 31 दिसम्बर 2020 की बात है . मयंक के जन्मदिन का और मेरे लगभग 44 वर्ष 6 माह (विभागीय प्रशिक्षण सहित) के सेवाकाल से निवृत्ति का . मयंक ने ठीक कहा लेकिन मैंने तिरोभाव शब्द का प्रयोग उस शिक्षिका के लिये किया जिसे स्कूल की आदत होगयी थी , जिसने पढ़ने और फिर पढ़ाने के अलावा कुछ जाना सीखा ही नहीं . स्कूली जीवन की बात करूँ तो मेरा तो जन्म ही स्कूल में हुआ . ताऊजी और काकाजी (पिताजी )शिक्षक थे , शिक्षक धर्म का मनसा वाचा कर्मणा पालन करने वाले . जिया (माँ ) एक बालबाड़ी स्कूल में छोटे बच्चों को पढ़ाती थीं . जब पढ़ने के लिये काकाजी के साथ बड़बारी गयी थी तब पाँचवी पास करने तक स्कूल का एक कमरा ही हमारा घर बना रहा . सन् 1975 में ग्यारहवीं कक्षा उत्तीर्ण की .जनवरी में विवाह और जून 1976 में शिक्षक-चयन परीक्षा में चयनित होकर एक वर्ष संस्थागत् प्रशिक्षण . सौ रुपए स्टाय-फण्ड के मिलते थे. 23 जुलाई 1977 को माध्यमिक विद्यालय मे नियुक्ति मिली . बच्चों का जन्म ,स्नातक ,स्नातकोत्तर ( दो विषयों में ) बच्चों की पढ़ाई , जीवन के तमाम सघर्ष विसंगतियों के बीच विद्यालय मेरे अभिभावक से रहे . अब तक का जीवन घर से ज्यादा विद्यालयों में बीता है क्योंकि छुट्टी के बाद स्कूल अक्सर मेरे साथ घर भी आता रहा है . अपने बच्चों से अधिक विद्यार्थियों का ध्यान रहा है . रिश्तेदारों से कहीं अधिक निकटता स्टाफ सदस्यों से रही है . एक वफादार हमसफर जैसी नौकरी से मुक्ति कहीं न कहीं तिरोभाव का सा अनुभव तो करवा ही रही थी . अर्द्धशती में मात्र साढ़े छह साल ही तो कम रहे . घर से स्कूल , स्कूल से घर इस रास्ते के अलावा मैंने कोई रास्ता कभी अपनाया ही नहीं ..

मेरे लिये अध्यापन मात्र नौकरी नहीं, बल्कि पूजा-आराधना जैसी रही है .पिताजी और ताऊजी से ही मैंने सीखा और सिद्धान्त बना कि मेरी नियुक्ति बच्चों को पढ़ाने के लिये हुई है .अगर मैं छात्र की जिज्ञासा शान्त नहीं कर पाती हूँ , मेरा पढ़ाया हुआ अंश छात्र आत्मसात नहीं कर पाये हैं , जो जानते हैं, उससे आगे नहीं बता पाती हूँ तो शिक्षक के रूप में मेरा होना व्यर्थ है . मेरे ये विचार व्यवहार में भी रहे इसलिये मुझे छात्रों व पालकों से भरपूर स्नेह व सम्मान मिला है . एक लम्बी अवधि तक संस्था-प्रधान भी अच्छी शिक्षिका मानते रहे हालाँकि अन्तिम कुछ वर्षों मेरा अच्छी शिक्षिका होने का गरूर खूब टूटा .  हर काम सही और नियमित करने के बावजूद मुझे अपमान का सामना करना पड़ा . दिल लगाकर छात्रों को पढ़ाने , सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी स्कूल में अतिरिक्त एक दो घंटे देकर करवाने के बाबजूद मेरे विरुद्ध हवाएं चलीं . मेरे छात्र जिला, संभाग और प्रदेश स्तर पर पुरस्कृत हो रहे हैं और अवकाश होते हुए भी आवेदन को अमान्य कर मेरा वेतन काट लिया गया है . वेतन कटना आर्थिक हानि कम मानसिक हानि अधिक रही है .हैरानी भी कि बिना अपराध बताए सजा तो किसी कानून में नहीं दी जाती . पर संस्था का कानून अलग होता है जिसे अधिकारी और उसके आगे पीछे रहने वाले लोग बनाते हैं . मेरा वेतन ऐसे ही कानून के तहत एक बार नहीं तीन तीन बार काटा गया . ऐसा क्यों हुआ , समझ में आ रहा था पर उसे दूर करे के उपाय मेरी अन्तरात्मा के विरुद्ध थे . खैर ..

मुझे जो चाहिये था वह बेहिसाब मिला . मेरे छात्र-छात्रों ने मुझे भरपूर आदर व स्नेह दिया है . आज भी दे रहे हैं . एक सच्चे सिक्षक को और क्या चाहिये .

और हाँ एक व्यक्ति के रूप में मेरा तिरोभाव कभी नहीं होसकता . मयंक ने बिल्कुल सही कहा . 

2 comments:

  1. सुंदर संस्मरण, जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं, ग़रूर टूटने के पीछे भी नियति की कोई योजना होती है, वह किसी और उद्देश्य के लिए तैयार कर रही होती है

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  2. जीवन में उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं, इसके बावजूद आपने अपने कर्त्तव्य का पालन बहुत ही निष्ठा के साथ किया, बहुत बहुत बधाई!

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