सोमवार, 20 जून 2022

कुछ कमी सी है .

 

हवाओं में आज सर्द नमी सी है .

दिशाओं में धुन्ध गहरी जमी सी है.


ओप अपनी खो रहा सूरज अभी से,   

देख उसको धूप भी अनमनी सी है .


राह में लो अड़ गया आकर समन्दर ,

धार नदिया की तभी तो थमी सी है.


पेड़ ,पंछी ,फूल ,मौसम खुशनुमा हैं .

कौन फिर जिसके बिना कुछ कमी सी है ?


'भाव मेरा जो , वही उसका भी होगा  . '

सोच मेरी अब गलतफहमी सी है .


छूटकर पीछे कहीं कुछ रह गया है ,

सोच सारी अब तक उसी में रमी सी है .


उजड़ता ,बसता ,उगा लेता है फसलें ,

फितरतें मन की बहुत कुछ ज़मीं सी हैं .  

 

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (22-06-2022) को चर्चा मंच     "बहुत जरूरी योग"    (चर्चा अंक-4468)     पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'    
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  2. बहुत सुंदर । मन और ज़मीन की फ़ितरत मिली-जुली सी है ।

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