सोमवार, 23 जनवरी 2023

ध्रुवगाथा ( खण्डकाव्य) ----एक अंश

'ध्रुवगाथा' --सन् 2012 में प्रकाशित मेरी दो पहली पुस्तकों में से एक है ( दूसरी अपनी खिड़की से ). लेकिन मेरी ही कसौटी पर पूरी तरह खरी न उतरने के कारण इसका प्रचार प्रसार नहीं हुआ . वैसे तो मैंने सात बड़ी पुस्तकों में किसी का भी कहीं प्रचार नहीं किया है . उन्ही दिनों इसी ब्लाग  पर ध्रुवगाथा की चर्चाएं तो हुई हैं . दस वर्ष में कुछ नए साथी  भी यहाँ आए  हैं . इसलिये अपने और आप सबके विचारों में लाने के लिये  पुस्तक का एक अंश आप सबके अवलोकनार्थ यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ .  

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 नेह नेह का उत्तर हो , पर नहीं हुआ है .

समतल समझा जहाँ , वहीं पर गहन कुँआ है .

 

दोष न केवल अनीति करना , सहना भी है .

सरेआम अन्याय देख चुप रहना भी है .

 

 

लेकिन ध्रुव को ऐसे नहीं बिखरने दूँगी .

मन माला से एक मोती गिरने दूँगी .

 

और उठी आन्दोलित मन को चली सम्हाले .

मन की दुर्बलता की बेटा थाह पाले .

 

धीरज हुआ रेत का घर , जब ध्रुव को देखा .

तेज कटारी नोंक , हृदय पर गहरी रेखा .

 

आँखें थीं आरक्त रिसा हो घाव नया ही .

ध्रुव की नज़रों ने माँ से सब हाल कहा ही .

 

मेरा लाल ,बहादुर क्यों इतना उदास है .

कितनी सारी खुशियाँ अपने आसपास है .

 

समझ न आय़ा , तुम सब मिलकर नगर गए क्यों ?

बहुत थका देने वाली थी , डगर गए क्यों ?

 

मैंने समझाया था अभी नहीं जाना है .

स्वयं बुलाएंगे वह समय अभी आना है.

 

यहाँ कुटज में ही देखो तो कितना सुख है .

शान्त ,सृष्टि के आँगन में बोलो क्या दुख है .

 

रही लाल के अपने , पथ में पलक बिछाए .

मुख पर ऐसी गहन उदासी तनिक न भाए .

 

तू तो मेरा सूरज , राजाओं का राजा .

आ बेटा , अब माँ की बाहों में भी आजा .

 

हाथ हटाया , बैठ गया ध्रुव नज़र फेरकर .

बोला आँसू पौंछ ,और नजरें तरेरकर .।

 

माँ , तुम सदा ज्ञान की ही बातें करती हो .

वीर बनो , यशवान् बनो , कहती रहती हो .

 

वीर यशस्वी कुछ भी मुझे नहीं बनना है .

क्या वे मेरे पिता नहीं , सच सच सुनना है .

 

बेशक हैं ,बेटा सवाल क्यों आया मन में .

क्योंकि यही नवनीत सा मिला मन मन्थन में .

सहना तुमने सीखा है माँ , मुझे न भाता .

दुनिया में मेरी तो एक तुम्ही हो माता .

 

बेटा , कोई जटिल समस्या होगी मन में .

शायद बाधा कुछ आई होगी चिन्तन में  .  

 

राजनीति की बातें हैं ,तुम बच्चे ही हो .

क्या समझोगे अभी अक्ल के कच्चे ही हो .

 

यदि छोटी छोटी बातों पर ही ऐसे उलझेंगे .

बड़े बड़े मसले उनसे कैसे सुलझेंगे .

 

तुम तो माँ बस उनकी सी ही बात कहोगी .

मेरी अब क्या कोई बात नहीं समझोगी ?

 

राज काज में बच्चों का दिल तोड़ा जाता ?

बुरा भला हो , मनचाहा पथ मोड़ा जाता ?

 

राजेश्वर ,रानी को समझा भी सकते थे .

मुझको पास बुलाकर गले लगा सकते थे .

 

पर जड़वत् बने रहे ,कुछ कहा न टोका .

चले वहाँ से, तब भी दे आवाज न रोका .

 

फिर भी तुम कहती हो ,मुझको सह लेना था .

रानी जो कुछ कहती उसको कह लेना था .

 

रहा रोकता कुछ पल तक ध्रुव अपने वशभर

पीड़ा फूट पड़ी नयनों से निर्झर झर झऱ ..

 

बीते पल खुद सुनीति ने भी देखे जीकर

गहरी आह भरी , आई, दृगजल को पीकर .

 

बाँहों में ले सुत को अपने कंठ लगाया .

मन को संयत किया , लाड़ले को समझाया .

 

अच्छा चलो साँझ घिर आई दीप जलाऊँ .

भूखे होगे बोलो रुचि का ,अभी पकाऊं .

 

 

देखो वह रह रहकर जुगनू चमक रहा है .

विकसा कोई फूल पवन जो महक रहा है .

 

तुमने उस दिन देखे थे जो अण्डे प्यारे .

निकल पड़े हैं आज उन्हीं से बच्चे प्यारे .

 

चीं चीं चीं चीं करके माँग रहे थे दाना .

नहीं समझ में आता उनका रोना गाना .

 

सुनो लाल , अब रोष छोड़कर उठ भी जाओ .

सिखलाया जो गीत तुम्हें , अब मुझे सुनाओ.

 

माँ मुझको चिड़ियों फूलों से मत बहलाओ .

मेरी क्लान्ति मिटे ,वह कोई राह दिखाओ .

 

तुम ही कहतीं ,जो परवश हो झुक जाते हैं .

जीते हैं लेकिन अन्दर से मर जाते हैं .

 

स्वत्व छिने तब भी कोई जो चुप रहता है .

बेचारा बनकर ही आजीवन रहता है .

 

शान्ति , शान्ति बस शान्ति सदा कायर करते हैं .

तूफानों के साथ वीर जीते मरते हैं .

 

अच्छा , मैं भी सुनूँ ..कहाँ क्या काम करोगे ?”

नन्हें हाथों कहाँ कहाँ तुम नाम लिखोगे .

 

कहने को हूँ अभी जननि मैं छोटी वय का .

किन्तु हठी हूँ स्थिर हूँ मैं अपनी लय का .

 

उन्हें समझनी होगी पीड़ा की परिभाषा .

भर देते बचपन की झोली ढेर निराशा.

 

हाँ ,हाँ तुम ऐसा ही कर लोगे , करना भी .

न्याय के लिये उन्हें मिटाना , खुद मिटना भी .

 

किन्त्तु अन्य पथ भी है ,उन्हें सजा देने का .

खुद की ही नज़रों में उन्हें झुका देने का .

 

राह नहीं है किन्तु कलह विद्रोहों वाली .

वह है दृढ़ विश्वास अटल संकल्पों वाली .

 

वैसे भी प्रतिशोध जलाता है खुद को भी .

ओला नाशक फसल , गलाता है खुद को भी ,

 

जहाँ द्रोह के कंटक जाल बिछाए जाते .

उन्नति की राहों में शूल उगाए जाते .

 

यह सब नहीं , राह दिखलाओ वही मुझे माँ .

जिस पर चल , कुछ होने का हो भान मुझे माँ .

 

अच्छा सुनो , परम ईश्वर पालक हैं सबके .

परमपिता है , परम हितैषी सारे जग के .

 

मैं ,तुम ,राजा , रानी क्या हैं , विश्व उन्ही का .

धरती से अम्बर तक है साम्राज्य उन्हीं का .

 

उनके इंगित से ही यह दुनिया चलती है .

पतझड़ होता मधुऋतु में कलियाँ खिलती हैं .

 

पर्वत सागर नदियाँ सूरज चाँद सितारे .

उनके कहने भर से ही चलते हैं सारे .

 

आश्रय लेना है तो केवल जगत्पिता का .

उनको पाकर भूलोगे अध्याय व्यथा का .

 

परमेश्वर है कौन ? पिता कैसे हो सकते ?

नेह पितृ सम परमेश्वर कैसे दे सकते ?

 

राजेश्वर हैं जनक , उन्ही का नेह चाहिये .

द्वेषमयी के नयनों से बस मेह चाहिये .

 

तो तुम मेरी पूरी बात नहीं समझे हो .

राजा, रानी , द्वेष ,दण्ड में ही उलझे हो .

 

इसको छोड़ो , आगे भी जाकर कुछ सोचो .

जो कोई भी सोच न पाया हो वह सोचो .

 

ऐसा है तो , पूरी बात बताओगी अब

जगत्पिता के घर मुझको पहुँचाओगी कब ?”

 

 

 हाँ !...तो मैंने कहा पिता ईश्वर से बढ़कर .

कोई नहीं जगत में आश्रय उनसे बढ़कर .

 

राजा, रानी मैं, तुम . सब  इनके अनुचर हैं .

परम सत्य है ,परम पिता वे परमेश्वर हैं .

 

जब चाहो ,जैसा भी चाहो पा सकते हो .

अपनी सारी बातें उन्हें बता सकते हो .

 

 

हर वंचित की खोज खबर लेने वाले हैं ,

पुस्कार या दण्ड वही देने वाले हैं .

 

चन्दा सूरज तारों में उनकी उजियाली .

उनसे ही पत्ते पत्ते में है हरियाली .

 

अच्छा माँ फिर मुझको उनका पता बताओ .

उन्हें सुनाने अच्छा सा एक गीत सिखाओ .

 

कैसा रंग रूप है ,वास कहाँ है उनका .

और कौन जो सबसे खास रहा है उनका .

 

एक जगह हो तो कहदूँ यह उनका घर है .

उनका घर तो सारा ही धरती अम्बर है .

 

निर्मल अन्तर वाले ही उनसे मिल पाते .

भोले निश्छल मन वाले ही उनको भाते .

 

कहदो माँ ,क्या निर्मल  निश्छल मन है मेरा ?”

हँसकर माँ ने हाथ यों ही बालों में फेरा .

 

फिर तो माँ मैं ईश्वर से मिलने जाऊँगा .

तभी मिटेगी व्यथा , तभी सो भी पाऊँगा .

 

अब तो खुश हो बेटा ,चलकर खा लो खाना .

और सुनो ,मित्रों को यह सब नहीं बताना .

 

अभी नहीं है मुझको माँ , कुछ खाना वाना ..

पहले परमपिता को सारी बात बताना .

 

अभी चला जाता हूँ माँ यह ठीक रहेगा .

सुबह मिलेगा जो अपनी ही बात कहेगा .

 

उफ् !..ध्रुव तुम तो पीछे पड़ जाते हो .

नहीं जानते कुछ भी केवल अड़ जाते हो .

 

बता दिया है ,लेकिन अभी नहीं जाना है .

और बहुत कुछ है जो तुमको समझाना है .

 

अभी अल्पवय हो , जब कुछ और बढ़ोगे .

तभी जगतपति की सूरत पहचान सकोगे .

 

राह कठिन है अभी ही तुम चल पाओगे .

कहाँ कहाँ ढूँढ़ोगे , बेटा थक जाओगे .

 

देखो अभी माँगते हो खाना तुतलाकर .

अपनी हठ पूरी करवाते मचल मचलकर .

 

लोरी बिना सुने भी क्या तुम सो पाते हो

ज़रा कहीं ओझल ओजाती ,चिल्लाते हो .

 

अवसर आएगा ,जब दोनों साथ चलेंगे .

उनके साथ रहेंगे  सारी बात कहेंगे .

 

कितने ही आख्यान और श्लोक सुनाए .

टीस भुलाने माँ ने ध्रुव को खेल खिलाए .

 

दिवस ढला ,सन्ध्या आई , रैना कजराई .

स्वप्न सजाने पलकों पर , एक लोरी गाई .

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 मन्द हुआ स्वर माँ का , लोरी गाते गाते

शान्त श्रान्त सो गई पुत्र को स्वयं सुलाते .

 

पर ध्रुव को थी नींद कहाँ , मन में थी हलचल .

तारों पर ठहरी थीं कब से अखियाँ अविचल .

 

नए सवालों की पीड़ा भी नई अभी थी .

उसे गोद से उतारने की बात चुभी थी .

 

समझ नहीं आता यों अपना वन में रहना .

तज अधिकार राजमाता का यों चुप रहना ..

 

माँ के मन में क्यों कोई विद्रोह नहीं हैं .

धन वैभव सुख सुविधाओं से मोह नहीं हैं

 

फिर भी छोटी रानी के मन में भय कैसा ?

क्यों इतना आक्रोश और उद्वेलन ऐसा ?

 

जो न बैठना भाया पास पिता के मेरा .

ज्ञात नहीं क्या है सम्बन्ध पिता से मेरा .

 

सूत्र कहाँ है द्वेष ईर्ष्या भरी कथा का .

माँ ने क्यों ढोया है इतना भार व्यथा का .

 

सुत होकर भी पिता के लिये हुआ पराया .

मुझ पर क्या गुज़री यह उनको ध्यान न आया .

 

क्यों पा लेता ठाठ कोई एकाधिकार का .

क्यों बनता अधिकार वही मन के विकार का

 

सारे प्रश्न करूँगा मैं तो परम पिता से

लक्ष्य एक मिलना है मुझको जगत्पिता से .

 

माँ कहती है सबके परम पिता ईश्वर हैं .

फिर भी अभी नही जाने देती क्योंकर है .

 

बड़ा तो न जाने कब तक मैं हो पाऊँगा .

सोच सोचकर ही तिल तिल मिटता जाऊँगा .

 

इसीलिये मुझको जाना ..जाना ही होगा .

ईश्वर का आश्रय , मुझको पाना ही होगा .

 

हठ भी यह ,संकल्प और अभिलाषा भी है

मिलें जनक जीवन के , नेह पिपासा भी है .

बड़ा नहीं तो क्या संकल्प बड़ा है मेरा .

पा ही लूँगा मोहन को विश्वास घनेरा

 

माँ कहती है समदर्शी ममतामय ईश्वर .

उन्हें बुलाता जो मन से मिल जाते सत्वर .

 

समदर्शी के लिये बड़ा क्या ,क्या है छोटा .

मिलता सबको स्नेह खरा हो या हो खोटा .

 

उनसे मिलकर सब कुछ मैं कहने वाला हूँ .

सहकर यों अन्याय न चुप रहने वाला हूँ .

 

चुपके से ध्रुव उठा न आहट होने ही दी .

दबे पाँव बाहर निकला , माँ सोने ही दी .

 

जागा क्षणिक विचार , बहुत दुख होगा माँ को .

कुछ न दे सका अपनी इतनी प्यारी माँ को .

 

किन्तु विचार विलीन हुआ संकल्प भँवर में .

और चला चुपचाप अकेला घोर तिमिर में .

4 टिप्‍पणियां:

  1. अद्भुत! सरल शब्दों में गूढ़ ज्ञान और काव्य की कल-कल बहती धारा, नमन है आपकी लेखनी को!

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  2. कितना सुंदर बन पड़ा है यह सृजन आपकी कलम को पाकर हमेशा की तरह बहुत बढ़िया ।

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  3. बहुत स्वागत अभिनन्दन पल्लवी जी . काव्यांश को पढ़ने व प्रतिक्रिया देने का धन्यवाद . बिना सुधी पाठकों के पढ़े सृजन अधूरा ही रहता है .

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