शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

प्रेम एक अलग दृष्टि से

 (1)

प्रेम है  ‘एनस्थीसिया’ 

निष्क्रिय कर देता मस्तिष्क को ।

ज़िन्दगी कितनी ही बेरहमी से

चीरती कुरेदती रहे

देती रहे ज़ख्म ।

महसूस नहीं होता किंचित भी दर्द

पता ही नहीं चलता कि ,

चुपचाप निकाला जा चुका है ,

हृदय ,

लीवर ,किडनी ,फेफड़े ..

(2)

प्रेम, 

स्वानुभूति किसी 

हड्डी खखोरते हुए, श्वान की

अपने ही जबड़े से निकलते रक्त का

स्वाद लेते हुए

टीस सहते हुए भी

तृप्त होता रहता है

(3)

 प्रेम

अन्न मन 

लग जाता है जैसे घुन

नहीं छोड़ता उसे

उसके खोखला होने तक .

कहाँ रहता है अन्न फिर

किसी काम का .

(4)

प्रेम 

महज एक इन्द्रजाल  

एक कुहासा  

जिसमें विमुग्ध पथिक 

विलुप्त हुआ अपने आप से

खिंचा चला जाता है कहीं दू...र 

अनजान ,अपना सब कुछ छिन जाने की ,

एक साजिश से  

एक
स्कैम है प्रेम ।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

माँ ऐसे स्वर दे


 अँधियारे का त्रास बहुत है ।

उजियारे की आस बहुत है ।

ज्योतिर्मयी शारदे माँ ,

बस रिक्त हृदय भरदे

मन जगमग जग करदे ।

 

दुर्गम पथ सूना सूना है ।

उस पर भय दूना दूना है ।

दृढ़ आशा विश्वास रहे ,

पथ यों गुंजित करदे

अन्तर निर्भय करदे ।                

बस जगमग जग करदे ।

 

जंजालों में मन अटके ना ।

चौराहों पर अब भटके ना ।

गीत नेह के गाती जाऊँ ,

माँ ऐसे स्वर दे ।

मन जगमग जग करदे ।

 

कूल-किनारे हरियाली हो ।

अन्तर कोश नहीं खाली हो ।

नदिया का अविरल प्रवाह ,

निर्मल , कल कल स्वर दे

मन जगमग जग करदे ।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

माँ



 पौष-माघ की ठिठुरन में

है गरम रजाई माँ

तपती जेठ दुपहरी में

ठंडी अमराई माँ ।

 

तिमिर हटाती सरस प्रभाती

पूरब की लाली

बूँद-बूँद अमृत बरसाती

शरद जुन्हाई माँ ।

 

छलका है वात्सल्य

सूर के छन्दों में इसका

गिरधर की कुण्डलियाँ

तुलसी की चौपाई माँ ।

 

'हरि' की मोहक मधुर बाँसुरी

'रवि' का सरस सितार

पावन अनुपम 'बिस्मिल्ला खाँ' की

शहनाई माँ ।

 

रोते शिशु तो मीठा--मीठा

दूध मिले भरपेट

रूखी रोटी पर है

मक्खन और मलाई माँ

 

स्वार्थ नही सन्देह नही

बस प्यार भरा विश्वास

झूठे चेहरों की दुनिया में

एक सच्चाई माँ ।

( 'कुछ ठहरले और मेरी ज़िन्दगी ' गीत संग्रह से )

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बिरबा सींचें आशा के


 नया वर्ष ले हर्ष आगया 

बिरबा रोपें आशा के ।

जो व्यतीत अब है अतीत 

छोड़ें भी ठांव  निराशा के 


सुबह सुबह सूरज की पाती 

हरकारा दे जाता है 

कोई पाखी आ मुँडेर पर 

पढ़कर रोज सुनाता है ।

सुनो उसे समझो ,समझाओ 

शब्द अर्थ उस भाषा के । 


बीत गया, घट रीत गया 

मनमीत उसे फिर से भरलो 

जो अबतक सोचा है केवल ,

अब उसको पूरा करलो ।

लिखलो मीत ,गीत जो 

अब तक लिखे नहीं अभिलाषा के 


समय साथ देता उनका ही ,

लक्ष्य बाँध चल देते जो ।

अर्थ आज के दिन को देकर  

दीप्तिमान कल लेते जो । 

पल पल को मुट्ठी में करलो 

काटो बन्ध दुराशा के ।


छोड़ो उनको जो तिनकों से 

धारा में बह जाते हैं ।

जिधर हवा का रुख होता है , 

अपनी राह बनाते हैं ।

अर्थ अनर्थ स्वार्थ में करते

सीधी सच्ची भाषा के 

जो अतीत अब है व्यतीत 

छोड़ें भी ठांव निराशा के