पौष-माघ
की ठिठुरन में
है गरम
रजाई माँ
तपती
जेठ दुपहरी में
ठंडी
अमराई माँ ।
पूरब
की लाली
बूँद-बूँद
अमृत बरसाती
छलका
है वात्सल्य
सूर
के छन्दों में इसका
गिरधर
की कुण्डलियाँ
तुलसी
की चौपाई माँ ।
'हरि' की मोहक मधुर बाँसुरी
'रवि' का सरस सितार
पावन
अनुपम 'बिस्मिल्ला खाँ' की
शहनाई
माँ ।
दूध
मिले भरपेट
रूखी
रोटी पर है
मक्खन
और मलाई माँ
स्वार्थ
नही सन्देह नही
झूठे
चेहरों की दुनिया में
एक सच्चाई
माँ ।
( 'कुछ ठहरले और मेरी ज़िन्दगी ' गीत संग्रह से )


हार्दिक धन्यवाद
जवाब देंहटाएंझूठे चेहरों की दुनिया मे
जवाब देंहटाएंएक सच्चाई माँ ।
Wahh
बहुत धन्यवाद वर्मा जी
हटाएंअहा!!!
जवाब देंहटाएंबहुत ही लाजवाब अविस्मरणीय सृजन
🙏🙏🙏🙏
सुधाजी बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंमां के आंचल जैसा सुकून और कहीं नहीं मिलता दुनिया में,,,
जवाब देंहटाएंकविता जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद
हटाएंआपकी कविता पढ़कर सच में मन भर आया। आपने माँ को मौसम, संगीत और मिठास से जोड़ा, यह बहुत खूबसूरत लगा। मैं हर पंक्ति में अपनापन महसूस करता हूँ। सूर, तुलसी और बिस्मिल्ला खाँ का संदर्भ कविता को और गहराई देता है। आप सीधे दिल पर बात रखते हैं, इसलिए शब्द असर करते हैं।
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