पौष-माघ
की ठिठुरन में
है गरम
रजाई माँ
तपती
जेठ दुपहरी में
ठंडी
अमराई माँ ।
पूरब
की लाली
बूँद-बूँद
अमृत बरसाती
छलका
है वात्सल्य
सूर
के छन्दों में इसका
गिरधर
की कुण्डलियाँ
तुलसी
की चौपाई माँ ।
'हरि' की मोहक मधुर बाँसुरी
'रवि' का सरस सितार
पावन
अनुपम 'बिस्मिल्ला खाँ' की
शहनाई
माँ ।
दूध
मिले भरपेट
रूखी
रोटी पर है
मक्खन
और मलाई माँ
स्वार्थ
नही सन्देह नही
झूठे
चेहरों की दुनिया में
एक सच्चाई
माँ ।
( 'कुछ ठहरले और मेरी ज़िन्दगी ' गीत संग्रह से )


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