शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

माँ



 पौष-माघ की ठिठुरन में

है गरम रजाई माँ

तपती जेठ दुपहरी में

ठंडी अमराई माँ ।

 

तिमिर हटाती सरस प्रभाती

पूरब की लाली

बूँद-बूँद अमृत बरसाती

शरद जुन्हाई माँ ।

 

छलका है वात्सल्य

सूर के छन्दों में इसका

गिरधर की कुण्डलियाँ

तुलसी की चौपाई माँ ।

 

'हरि' की मोहक मधुर बाँसुरी

'रवि' का सरस सितार

पावन अनुपम 'बिस्मिल्ला खाँ' की

शहनाई माँ ।

 

रोते शिशु तो मीठा--मीठा

दूध मिले भरपेट

रूखी रोटी पर है

मक्खन और मलाई माँ

 

स्वार्थ नही सन्देह नही

बस प्यार भरा विश्वास

झूठे चेहरों की दुनिया में

एक सच्चाई माँ ।

( 'कुछ ठहरले और मेरी ज़िन्दगी ' गीत संग्रह से )

8 टिप्‍पणियां:

  1. झूठे चेहरों की दुनिया मे
    एक सच्चाई माँ ।
    Wahh

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  2. अहा!!!
    बहुत ही लाजवाब अविस्मरणीय सृजन
    🙏🙏🙏🙏

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  3. मां के आंचल जैसा सुकून और कहीं नहीं मिलता दुनिया में,,,

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  4. आपकी कविता पढ़कर सच में मन भर आया। आपने माँ को मौसम, संगीत और मिठास से जोड़ा, यह बहुत खूबसूरत लगा। मैं हर पंक्ति में अपनापन महसूस करता हूँ। सूर, तुलसी और बिस्मिल्ला खाँ का संदर्भ कविता को और गहराई देता है। आप सीधे दिल पर बात रखते हैं, इसलिए शब्द असर करते हैं।

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