शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

प्रेम एक अलग दृष्टि से

 (1)

प्रेम है  ‘एनस्थीसिया’ 

निष्क्रिय कर देता मस्तिष्क को ।

ज़िन्दगी कितनी ही बेरहमी से

चीरती कुरेदती रहे

देती रहे ज़ख्म ।

महसूस नहीं होता किंचित भी दर्द

पता ही नहीं चलता कि ,

चुपचाप निकाला जा चुका है ,

हृदय ,

लीवर ,किडनी ,फेफड़े ..

(2)

प्रेम, 

स्वानुभूति किसी 

हड्डी खखोरते हुए, श्वान की

अपने ही जबड़े से निकलते रक्त का

स्वाद लेते हुए

टीस सहते हुए भी

तृप्त होता रहता है

(3)

 प्रेम

अन्न मन 

लग जाता है जैसे घुन

नहीं छोड़ता उसे

उसके खोखला होने तक .

कहाँ रहता है अन्न फिर

किसी काम का .

(4)

प्रेम 

महज एक इन्द्रजाल  

एक कुहासा  

जिसमें विमुग्ध पथिक 

विलुप्त हुआ अपने आप से

खिंचा चला जाता है कहीं दू...र 

अनजान ,अपना सब कुछ छिन जाने की ,

एक साजिश से  

एक
स्कैम है प्रेम ।

1 टिप्पणी:

  1. वाह!! प्रेम को एक नये नज़रिए से देखने का आपका प्रयास कितना अद्भुत है, गिरिजा जी, सच्ची बात कड़वी होती है पर उसे भी गुनना चाहिए, कौन है ऐसा? जो प्रेम में छला न गया हो, पर प्रेम किए बिना कोई रह भी तो नहीं सकता, जब तक वह यह न जान ले कि जिस प्रेम को वह बाहर तलाश रहा है, वह तो उसकी निजी पूँजी है, प्रेम किया नहीं जाता, बस उसमें हुआ जाता है, और ऐसा प्रेम बहता है अनायास ही सारे जहान के लिए, किसी ख़ास के लिए ही नहीं, और उसमें कोई साज़िश नहीं है, वह तो महा प्रसाद है !!

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