शनिवार, 26 सितंबर 2026

गणपति बप्पा अगले बरस आना ज़रूर पर ...

दस-बारह दिनों की धूम धाम के बाद अगले वर्ष फिर इसी तरह आने की गुहार लगाते हुए शिव पार्वती के लाड़ले गणेश जी की , विदाई हो गई है । मैं भी दिल से कहती हूँ कि अगले साल फिर आना । पर्व और त्यौहार हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं । आस्था व भक्तिभाव के साथ ऐसे आयोजन जीवन की एकरसता को मिटाकर नया उत्साह व ऊर्जा का संचार करते हैं । गीत-संगीत ,भजन तनाव दूर करते हैं । हे प्रथम पूज्य विनायक , आप तो वैसे भी मंगल, मोद और मोदक के देव हैं ।
मुझे याद है हमारे गाँव में केवल एक ही जगह पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती थी । सारा गाँव एक जगह इकट्ठा होकर आरती में शामिल होता । परस्पर सौहार्द्र बढ़ता था । बहुत ही सुन्दर झाँकियाँ , भजन , नाटक ,नकल आदि कलापूर्ण कार्यक्रम होते थे । बच्चे बड़े सब मनोयोग से इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे । 
लेकिन अब जबसे घर ,गली ,मोहल्ला और बाजार की तरह धर्म में भी राजनीति का दखल हुआ है , ये आयोजन या तो प्रदर्शन और गुटबाजी का हिस्सा बन गए हैं या अमर्यादित मौजमस्ती का । चार चार कदम पर प्रतिमा स्थापित करके धर्म के नाम पर नियमों , दायित्त्वबोध और नैतिकता को ताक पर रख दिया जाता है । भजनों के नाम पर लाउडस्पीकर पर पैरोडियाँ बजाना शराब पीना ,हुल्लड़बाजी करना इन आयोजनों का सबसे खराब पक्ष है । वास्तव में लाउडस्पीकर का उपयोग जब तक बहुत ज़रूरी न हो ,नहीं होना चाहिये । आप आराधना या इबादत अपने लिये कर रहे हैं दूसरों को सुनाने के लिये नहीं । लेकिन हमारे यहाँ इस बात का ध्यान रखा ही नहीं जाता । सुबह से दोपहर तक और शाम से देर रात तक तेज आवाज में सस्ती पैरोडियाँ बजाते हैं ज़रा भी परवाह नहीं करते कि किसी की नीद खराब हो रही है , कोई बीमार है ,किसी का अध्ययन अध्यापन , लिखना पढ़ना प्रभावित हो रहा है । शराब डांस बीच बीच में गाली गलौज भी । क्या यह भक्ति है ?

संस्कृति का यह रूप तो हमारा नहीं है । पर बना दिया गया है । चन्दा इकट्ठा करके हर चार कदम पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करने के बाद भक्ति कम उच्छ्रंखलता अधिक दिखाई देती है ।  गणेश उत्सव हो या दुर्गा उत्सव ,जन्मदिन की पार्टी हो , शादी या फिर अन्य कोई आयोजन हो  लाउडस्पीकर पर तेज गीत बजाकर  रात रात भर गीत चलाए जाते हैं । अगर कोई आपत्ति करे तो “खुशी बर्दाश्त नहीं होती” या “धर्म विरोधी हो ” जैसे आरोप लग जाते हैं । मोहल्ले में एक आयोजक को कहा कि गीत बजाओ पर धीमी आवाज में , बच्चे पढ़ रहे हैं तब एक महिला तन कर आगई -–“थोड़ा धर्म को भी माना करो मैडम , तुम बच्चों को क्या सिखाती होगी ..”

यह अफसोस की बात है कि ऐसे कथित धार्मिकों ने हमारे धर्म को बदनाम कर रखा है । विडम्बना यह है कि समझदार लोग ऐसे में निरपेक्ष रहते हैं । इसलिये ये आयोजन प्रायः उन हाथों आ गए है जिनके लिये इन आयोजनों का अर्थ केवल मौजमस्ती करना है । मौज मस्ती गलत नहीं पर मौज में कई तरह के व्यवधान व अशान्ति अखरती है ।   

। हे मंगल दाता ,बुद्धि-विधाता , गणपति बप्पा आप अगले साल भी आएं और आते रहें लेकिन अब जब आएं तो अपने भक्तों को समझाएं ज़रूर कि रात रात भर ( दिन में भी ) तेज आवाज में गाने बजाना , कार्यक्रमों के लिये रास्तों का अतिक्रमण करना , दिन-रात मुफ्त बिजली जलाना ,शराब पीकर हुल्लड़ करना . खाने के बाद दोना पत्तल गलियों सड़कों पर फेक देना .. सब नियम विरुद्ध आचरण है ,भक्ति का आडम्बर है ,हिन्दू धर्म और संस्कृति की विकृति है । इन्हें समझएं कि धार्मिक आयोजन सबको एक साथ जोड़ने , धार्मिक और सामाजिक सौहार्द्र बढ़ाने और अपनी सुन्दर परम्पराओं को याद रखने के लिये होते हैं । नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति के सौन्दर्य व धर्म की व्यापकता समझाने के लिये होते हैं । देवी दुर्गा ,भगवान शिव, मर्यादा पुरषोत्तम राम , लीलाधर कृष्ण , विघ्नेश्वर भगवान गणेश ...सभी हमें जीने की राह बताते हैं , आस्था और विश्वास देते हैं । हे विनायक, उन्हें यह भी बताना कि शोर शराबा और हुल्लड़बाजी भक्ति आराधना नहीं धर्म को बदनाम करना है । और यह भी कि इन आयोजनों के साथ सबसे पहले ज़रूरी है आयोजकों का जिम्मेदार नागरिक होना । अपने साथ दूरों का ख्याल रखना ,अपने आसपास सफाई रखना ..यह सब बच्चों को भी सिखाना हे गणनायक तब हम गर्व से कह सकेंगे कि ऐसे होते हैं हमारे धार्मिक आयोजन ।  

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

एक गज़ल

 

जालों से उलझनों के ,जैसे हो उबर जाएं

चौराहे से निकलकर , कोई तो डगर पाएं ।

 

थामे रहें न छोड़ें कभी हौसलों का दामन ।

चाहे भले ही कितनी चलती रहें हवाएं ।

 

गुज़री हो उम्र यूँ ही जिनको तलाशते ही ।

कुछ कीजिये वो लमहे ,कुछ देर ठहर जाएं ।

 

इल्ज़ाम ही लगालो, लेकिन यूँ चुप न बैठो

बेकार ग़लतफहमी ,मासूम न मर जाएं ।

 

 तूफान ले गया है सामान जिनका सारा

कैसे करें गुजारा कहदो कि किधर जाएं ।

 

आँखों में नींद थी जब  ,वह बात रात की थी ,

अब भोर को जगाने , चिडियों सा चहचहाएं ।

 

अरसे से रुकी देखो राहों में तमन्नाएं

कहना है जो भी कहदो ,जिससे कि वे घर जाएं ।

रविवार, 13 सितंबर 2026

अपनी खड़ी बोली

 मिसरी की गोली

अपनी  खडी बोली ।

माँ ने दूध में है घोली

अपनी खडी बोली ।

 

सरस है ,सक्षम है

सरल और शुद्ध है

अनुभूतियों का सागर

अभिव्यक्ति में प्रबुद्ध है

संस्कृति के द्वार पर

जैसे रंगोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

झरना ज्यों झरता है

पवन जैसे बहता है

धरती में नमी पाकर

बीज जैसे उगता है

आता वसन्त भरे

फूलों की झोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

शिशु की है किलकारी .

अलकें ज्यों गभुआरी .

अन्तर की बातों सी

हिन्दी मनोहारी .

इससे ही सजती है

सपनों की डोली .

मिसरी की गोली

अपनी खड़ी बोली .