जालों से उलझनों के ,जैसे हो उबर जाएं
चौराहे
से निकलकर , कोई तो डगर पाएं ।
थामे
रहें न छोड़ें कभी हौसलों का दामन ।
चाहे भले ही कितनी चलती रहें हवाएं ।
गुज़री
हो उम्र यूँ ही जिनको तलाशते ही ।
कुछ
कीजिये वो लमहे ,कुछ देर ठहर जाएं ।
इल्ज़ाम
ही लगालो, लेकिन यूँ चुप न बैठो
बेकार
ग़लतफहमी ,मासूम न मर जाएं ।
कैसे
करें गुजारा कहदो कि किधर जाएं ।
आँखों
में नींद थी जब ,वह बात रात की थी ,
अब भोर को जगाने , चिडियों
सा चहचहाएं ।
अरसे
से रुकी देखो राहों में तमन्नाएं
कहना
है जो भी कहदो ,जिससे कि वे घर जाएं ।
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