शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

एक गज़ल

 

जालों से उलझनों के ,जैसे हो उबर जाएं

चौराहे से निकलकर , कोई तो डगर पाएं ।

 

थामे रहें न छोड़ें कभी हौसलों का दामन ।

चाहे भले ही कितनी चलती रहें हवाएं ।

 

गुज़री हो उम्र यूँ ही जिनको तलाशते ही ।

कुछ कीजिये वो लमहे ,कुछ देर ठहर जाएं ।

 

इल्ज़ाम ही लगालो, लेकिन यूँ चुप न बैठो

बेकार ग़लतफहमी ,मासूम न मर जाएं ।

 

 तूफान ले गया है सामान जिनका सारा

कैसे करें गुजारा कहदो कि किधर जाएं ।

 

आँखों में नींद थी जब  ,वह बात रात की थी ,

अब भोर को जगाने , चिडियों सा चहचहाएं ।

 

अरसे से रुकी देखो राहों में तमन्नाएं

कहना है जो भी कहदो ,जिससे कि वे घर जाएं ।

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