वसन्ती ने आँगन में पडी खाट पर पसरे रामधन को देखा तो लगा जैसे किसी ने छाती में दहकता कोयला दाग दिया हो । नस-नस में खून जैसे धुँआ बन कर उड चला हो । जी में आया कि धक्का देकर दरवाजे से बाहर करदे ।
अब कौनसा नाता निभाने चला आता है यहाँ ...ऐसा ही निभाने वाला होता तो क्या ,दूसरी , रखता ।मैं कोई बाँझ थी कि बिगडी थी ।..हजार बार तो कह दिया कि अब उसी से निभा । बेकार ही हमारा खून मत जला । समझ ले कि हम तेरे लिये मर गये और तू हमारे लिये ..। -----ताव से भरी वसन्ती ने बडबडाते हुए घास का गट्ठर बाहर ही पटक दिया और दनदनाती हुई भीतर गई ।बूढी साबो बहुत दिनों बाद बेटे को देख कुछ पल के लिये सारे ताने-उलाहने भूल गई और हुलसकर पानी का लोटा भर कर ला रही थी कि वसन्ती ने लोटा छीन कर एक तरफ रख दिया और सास पर बरस पडी---
लाड बाद में दिखाती रहना अम्मा ।..पहले इससे पूछ कि क्यों आया है यहाँ । हमारा खून जलाए बिना जी नही भरता इसका ।सब कुछ भूल कर अपने बच्चों को पाल रही हूँ तो अब यह भी नही सुहाता इसे ।...और तेरा जी पिराता है तो तू भी चली जा अपने लाडले के साथ । मर नही जाऊँगी अकेली । ..नही तो साफ कहदे कि यहाँ अपनी सूरत दिखाने न आया करे नही तो ...।
अरे बेटी----साबो गहरी साँस भरते हुए बोली---सात फेरों का बन्धन तो मरे छूटता है ।
छूटता होगा ---वसन्ती तिलमिला कर बोली---इससे मेरा तो अब कोई नाता नही है । मरेगा तब भी आँसू न निकलेंगे मेरे ..। कहते--कहते उसकी आवाज भर्रा गई ।गले की नसें फूल ईं । और पनियाई सी आँखें सुर्ख होगईँ ।
चोट खाई सी साबो चुपचाप खटिया में जा धँसी । वसन्ती का एक-एक शब्द कलेजे पर हथौडे की तरह पड रहा था । शायद रामधन ने कुछ सुना नही । महाभारत होजाता । पर वह वसन्ती से भी क्या कहे । कैसे कहे ।अच्छी भली बहू को छोड कर ,निमौना ,से दो बच्चों को बिसरा कर रामू ने जो किया वह क्या छिमा करने लायक है । छिनालें जाने क्या पट्टी पढा देतीं हैं कि आदमी अपना घर-बार ,बद-बदनामी सब भूल उनके जाल में जा फँसता है । रामधन के दूसरा घर बसा लेने के बाद साबो ही जानती है कि कैसे उसने वसन्ती को सम्हाला है । और कैसे न सम्हालती । अबोध वसन्ती इसी आँगन में जवान हुई । माँ बनी । उस संकट में भी वह मायके नही गई । और साबो के अलावा उसका है ही कौन । हुलक-हुलक कर रोती वसन्ती को छाती से लगा कर साबो ने जाने कितनी रातें गुजारी हैं । उसकी बात का बुरा माने भी तो कैसे । और वह गलत भी तो नही कहती --यह घर है कोई रंडी का कोठा नही कि जब मन हुआ ,चले आए जी बहलाने ।...ऐसे कपूत से तो वह निपूती ही भली थी साबो ।
अम्मा ..ओ अम्मा तू ऐसी कठोर होगई है कि...। रामधन ने घर में सन्नाटा पाकर हाँक लगाई । साबो के मन में हूक सी तो उठी पर बहू के गुस्से का ख्याल कर चुप्पी साध गई ।
घर में और कोई नही है क्या । गुड्डू ..राजू ...प्यास के मारे कंठ सूख रहा है । कोई पानी देने वाला भी नही रहा क्या ।--रामधन जोर से चिल्लाया तो वसन्ती से न रहा गया । लोटा में पानी लाते हुए बोली--
क्यों चिल्ला रहे हो गला फाड कर । बहरे नही हैं हमलोग..।
वसन्ती कहना तो चाहती थी कि इधर कैसे चले आए । क्या चहेती से खटपट होगई । पर उसकी नजर रामधन की चढी सी आँखों पर गई और धीरे-धीरे निकलती कराह सुनी तो पास आई और माथा छूकर देखा । फिर ठहरी हुई सी आवाज में बोली---हूँ...जोर का बुखार चढा है । तभी तो मैं कहूँ कि..।
इसके बाद रामधन का कराहना बढ गया और वसन्ती का बडबडाना---अपना तो होस ही नही है इस आदमी को । कभी बुखार कभी हैजा तो कभी पेट का दरद । मनमानी तो करली अब ढंग से रहा भी नही जाता । हम भी तो रहते हैं कि नही ।
फिर वह योंही बडबडाती हुई रामधन के लिये कम्बल लाई । दूध गरम करके पिलाया । कम्बल ओढाया ।और पास बैठ कर माथा दबाने लगी । न कोई ताव न झल्लाहट ।
यह सब देख खाट में गुडमुड सी पडी साबो की आँतों में ऐंठन सी हुई ।और आँखों के छोरों से परनाला भरभरा कर बह चला । पता नही वे आँसू खुशी के थे या पीडा के ।
मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011
गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011
दो कविताएं प्रेम की
यादें
---------
(1)
कुछ यादें,
सुपरफास्ट ट्रेन की तरह
गुजरती रहतीं हैं अक्सर
ह्रदय के पुल से।
धडधडाती हुई,
चप्पा--चप्पा थर्राती हुई
उडाती हुई--धूल, पत्ते, ...तिनके ।
उतर नही पाती जिन्दगी ,
किसी भी स्टेशन पर
चाह कर भी ।
(2)
नियमित धारावाहिकों सी
कुछ यादें
करतीं हैं षडयन्त्र ।
रूबरू नही होने देतीं मुझे
अपने-आप से ।
सोच भी नही पाती ,
अपनी पीडाओं और अभावों को
अपनों के पराएपन को,
छल और दुरावों को
गहराई से ।
(3)
उतर आती है पूरब के क्षितिज से
यादों की धूप
मुग्ध , चकित झाँकती है
कमरे में ।
मेरे दिखाती है मुझे
मेज पर जमी धूल
गुलदस्ते के सूखे फूल
पलटतीं हैं मेरी डायरी के
एक अरसे से कोरे रह गए पन्ने
और यूँ करतीं हैं मुझे
और भी उदास ..तन्हा...।
--------------------------
(2)उनका आना
खयालों में उनका आना
फूटना है कोंपलों का
ठूँठ शाखों पर
पतझड के बाद ।
दस्तक देना है
पोस्टमैन का
भरी दुपहरी में
थमा जाना
एक खूबसूरत लिफाफा ।
मिलजाना है
रख कर भूला हुआ कोई नोट
किताबें पलटते हुए
अचानक ही ।
लौट आना है
एक गुमशुदा बच्चे का
अपने घर
बहुत दिनों बाद ।
मिल जाना है
अचानक ही
किसी अनजान शहर में
बचपन के सहपाठी का ।
और दिमाग में भरी हो
खीज और झुँझलाहट
ऐसे में एक मासूम
दुधमुँही मुस्कराहट का
समाजाना आँखों में ।
यूँ उनका आना खयालों में
कोई जरूरी चीज भूल गये
आदमी की तरह
लौट पडना जिन्दगी का
उल्टे पाँव घर
या
मिलना एक सान्त्वना
अपनत्व और दुलार भरी
चोट से आहत
रोते हुए बच्चे को
या फिर
गुलमोहर के झुरमुट से
कूक उठना कोयल का
कॅालोनी की उबाऊ खामोशी के बीच
किसी दोपहर अचानक ही
यूँ उनका आना खयालों में
सन् 1998 में प्रकाशित व पुरस्कृत
---------
(1)
कुछ यादें,
सुपरफास्ट ट्रेन की तरह
गुजरती रहतीं हैं अक्सर
ह्रदय के पुल से।
धडधडाती हुई,
चप्पा--चप्पा थर्राती हुई
उडाती हुई--धूल, पत्ते, ...तिनके ।
उतर नही पाती जिन्दगी ,
किसी भी स्टेशन पर
चाह कर भी ।
(2)
नियमित धारावाहिकों सी
कुछ यादें
करतीं हैं षडयन्त्र ।
रूबरू नही होने देतीं मुझे
अपने-आप से ।
सोच भी नही पाती ,
अपनी पीडाओं और अभावों को
अपनों के पराएपन को,
छल और दुरावों को
गहराई से ।
(3)
उतर आती है पूरब के क्षितिज से
यादों की धूप
मुग्ध , चकित झाँकती है
कमरे में ।
मेरे दिखाती है मुझे
मेज पर जमी धूल
गुलदस्ते के सूखे फूल
पलटतीं हैं मेरी डायरी के
एक अरसे से कोरे रह गए पन्ने
और यूँ करतीं हैं मुझे
और भी उदास ..तन्हा...।
--------------------------
(2)उनका आना
खयालों में उनका आना
फूटना है कोंपलों का
ठूँठ शाखों पर
पतझड के बाद ।
दस्तक देना है
पोस्टमैन का
भरी दुपहरी में
थमा जाना
एक खूबसूरत लिफाफा ।
मिलजाना है
रख कर भूला हुआ कोई नोट
किताबें पलटते हुए
अचानक ही ।
लौट आना है
एक गुमशुदा बच्चे का
अपने घर
बहुत दिनों बाद ।
मिल जाना है
अचानक ही
किसी अनजान शहर में
बचपन के सहपाठी का ।
और दिमाग में भरी हो
खीज और झुँझलाहट
ऐसे में एक मासूम
दुधमुँही मुस्कराहट का
समाजाना आँखों में ।
यूँ उनका आना खयालों में
कोई जरूरी चीज भूल गये
आदमी की तरह
लौट पडना जिन्दगी का
उल्टे पाँव घर
या
मिलना एक सान्त्वना
अपनत्व और दुलार भरी
चोट से आहत
रोते हुए बच्चे को
या फिर
गुलमोहर के झुरमुट से
कूक उठना कोयल का
कॅालोनी की उबाऊ खामोशी के बीच
किसी दोपहर अचानक ही
यूँ उनका आना खयालों में
सन् 1998 में प्रकाशित व पुरस्कृत
बुधवार, 2 फ़रवरी 2011
जड
वर्मा जी ,साहब ने कहा है कि आप दसवीं कक्षा में चले जाएं । पीरियड खाली है ।
क्यों , यह पीरियड तो गिरीश का है । और वह आज विद्यालय में मौजूद भी है ।
गिरीश सर साहब के साथ डी.ई ओ ऑफिस जारहे हैं ।
ऑफिस जारहे हैं या कोने वाले रेस्टोरेन्ट में चाय पीने ...।--वर्मा जी ने चपरासी से व्यंग भरे लहजे में पूछा तो वह निरुत्तर होगया ।
ठीक है । तू जा अपना काम कर । वर्मा जी ने चपरासी से कहा तो वह चला गया ।
मुझे आश्चर्य हुआ । वर्मा जी कक्षा में जाने की बजाय कोई पत्रिका पलटते रहे ।
कभी किसी काम को ना न कहने वाले वर्मा जी में यह परिवर्तन ..। वे तो सदा दूसरे लोगों को समझाते रहे हैं कि हमें काम का ही वेतन मिलता है इसलिये कभी काम से इन्कार मत करो ।काम के प्रति ईमानदार रहोगे तो इसका लाभ जरूर मिलेगा ।
उन्ही वर्मा जी में यह कैसा बदलाव ।
तो क्या करूँ राघव ।----वर्माजी मेरी नजरों का सवाल पढते हुए कुछ हताशा भरे स्वर में बोले ---अगर बिना आपत्ति किये काम करते जाओ तो लोग गधा ही समझ लेते हैं और काम लादे जाते हैं तुम देखते ही हो कि मेरे सबसे ज्यादा पीरियड हैं । कई प्रभार भी हैं फिर भी अरेंजमेंट में भी मेरा नाम ही आगे रहता है । मैं इसका कभी विरोध भी नही करता । पर दुख तब होता है जब गिरीश जैसे लोगों को, जो दिन भर गप्पें हाँकते रहते है ,साहब हर तरह की छूट देते हैं क्योंकि गिरीश .....सब जानते है कि साहब उसे क्यों साथ लगाए रहते हैं । उससे भी ज्यादा दुख तब होता है जब प्रोत्साहन की जगह साहब और रस्सी कस देते हैं तथा गिडगिडाने के बाद भी मेरी छुट्टी स्वीकृत नही करते ।तुम तो जानते हो कि मैं कभी फालतू छुट्टी नही लेता । अभी मेरी बेटी की तबियत खराब होगई थी और मुझे अचानक उसके पास जाना पडा था । मैं छुट्टी के लिये आवेदन देगया था पर साहब ने मेरा वेतन काट लिया बोले कि तुमने छुट्टी पहले से स्वीकृत नही कराईँ । क्या यहाँ कानून सबके लिये बराबर है । अगर साहब की नजर में ईमानदारी और कर्मनिष्ठा का कोई मूल्य नही, गधे-घोडे सब बराबर हैं तो मैं क्यों इतना पागल बनूँ । जो होगा देखा जाएगा । वेतन तो मुझे भी उतना ही मिलता है .जितना.....। क्या मैं गलत कह रहा हूँ राघव...।
मैं क्या कहता । वर्मा जी की निराशा से मैं निराश होगया पर उनकी बात को झुठलाने के लिये मेरे पास कोई तर्क नही था ।
क्यों , यह पीरियड तो गिरीश का है । और वह आज विद्यालय में मौजूद भी है ।
गिरीश सर साहब के साथ डी.ई ओ ऑफिस जारहे हैं ।
ऑफिस जारहे हैं या कोने वाले रेस्टोरेन्ट में चाय पीने ...।--वर्मा जी ने चपरासी से व्यंग भरे लहजे में पूछा तो वह निरुत्तर होगया ।
ठीक है । तू जा अपना काम कर । वर्मा जी ने चपरासी से कहा तो वह चला गया ।
मुझे आश्चर्य हुआ । वर्मा जी कक्षा में जाने की बजाय कोई पत्रिका पलटते रहे ।
कभी किसी काम को ना न कहने वाले वर्मा जी में यह परिवर्तन ..। वे तो सदा दूसरे लोगों को समझाते रहे हैं कि हमें काम का ही वेतन मिलता है इसलिये कभी काम से इन्कार मत करो ।काम के प्रति ईमानदार रहोगे तो इसका लाभ जरूर मिलेगा ।
उन्ही वर्मा जी में यह कैसा बदलाव ।
तो क्या करूँ राघव ।----वर्माजी मेरी नजरों का सवाल पढते हुए कुछ हताशा भरे स्वर में बोले ---अगर बिना आपत्ति किये काम करते जाओ तो लोग गधा ही समझ लेते हैं और काम लादे जाते हैं तुम देखते ही हो कि मेरे सबसे ज्यादा पीरियड हैं । कई प्रभार भी हैं फिर भी अरेंजमेंट में भी मेरा नाम ही आगे रहता है । मैं इसका कभी विरोध भी नही करता । पर दुख तब होता है जब गिरीश जैसे लोगों को, जो दिन भर गप्पें हाँकते रहते है ,साहब हर तरह की छूट देते हैं क्योंकि गिरीश .....सब जानते है कि साहब उसे क्यों साथ लगाए रहते हैं । उससे भी ज्यादा दुख तब होता है जब प्रोत्साहन की जगह साहब और रस्सी कस देते हैं तथा गिडगिडाने के बाद भी मेरी छुट्टी स्वीकृत नही करते ।तुम तो जानते हो कि मैं कभी फालतू छुट्टी नही लेता । अभी मेरी बेटी की तबियत खराब होगई थी और मुझे अचानक उसके पास जाना पडा था । मैं छुट्टी के लिये आवेदन देगया था पर साहब ने मेरा वेतन काट लिया बोले कि तुमने छुट्टी पहले से स्वीकृत नही कराईँ । क्या यहाँ कानून सबके लिये बराबर है । अगर साहब की नजर में ईमानदारी और कर्मनिष्ठा का कोई मूल्य नही, गधे-घोडे सब बराबर हैं तो मैं क्यों इतना पागल बनूँ । जो होगा देखा जाएगा । वेतन तो मुझे भी उतना ही मिलता है .जितना.....। क्या मैं गलत कह रहा हूँ राघव...।
मैं क्या कहता । वर्मा जी की निराशा से मैं निराश होगया पर उनकी बात को झुठलाने के लिये मेरे पास कोई तर्क नही था ।
शनिवार, 8 जनवरी 2011
अनजाने से सच
हुए, हादसे भी अपने
उनको अफसाने हैं ।
जीवन के कुछ राज रहे
अब तक अनजाने हैं ।
झूठ बोलकर भी वो सच्चे,
हम झूठे सच कह कर ।
सदा हाशिये पर ही हैं
हम मुख्य कथानक होकर ।
उनके दुख तो दुख
हमारे सिर्फ बहाने हैं ।
जीवन के ये राज....
सुविधाओं पर उनका ही हक
फिर भी रोते हैँ ।
उनके बिखराए मलबे को
हम ही ढोते हैं ।
फिर भी ,
गीत अराजकता के उनको गाने हैं ।
जीवन के ये राज....
छूट कहाँ पढने की
अब हैं सिर्फ परीक्षाएं ।
पास-फेल करना
उनकी मर्जी है,
जो चाहें ।
गिने-चुने उत्तर ही रटने और रटाने हैं
जीवन के ये राज....
क्या गठरी को खोलें
उसमें धूल भरी होगी
उम्मीदों की तितली
कबकी
दबी मरी होगी ।
फिर से जी उठने के किस्से
हुए पुराने हैं ।
जीवन के ये राज रहे.
अब तक अनजाने हैं ।
अपनी इस हालत के
हम खुद भी हैं जिम्मेदार ।
हमदर्दी के याचक बन कर
रहे उन्ही के द्वार ।
जिन्हें हमारी खबरों से
अखबार चलाने हैं ।
जीवन के ये राज रहे
अबतक अनजाने हैं ।
गुरुवार, 30 दिसंबर 2010
३१ दिसम्बर का उपहार
31 दिसम्बर 2010
--------------------------
सन् 1985 जाते--जाते मयंक (सबसे छोटा बेटा) के रूप में एक उपहार हमें देगया था । मुझे याद आता है कि इसी तरह बुआ या जीजी घर से जब विदा होतीं थीं तो जाते-जाते हमारी हथेली पर रुपया-दो रुपया जरूर रखतीं थीं और वह राशि हमारे बड़ी यादगार और अनमोल हुआ करती थी ।
यों तो हर माँ को अपनी हर सन्तान विशिष्ट ही लगती है ।लेकिन मयंक की कई बातें हैं जो सचमुच विशिष्ट हैं ।वह बहुत छुटपन से ही रोना तो जैसे जानता ही नही था मानो ,मम्मी को कोई परेशानी न हो इसे वह जन्म से ही सीख आया था । जब वह दो ही साल का था चाक से आँगन में चित्र बनाता था, इतनी फुर्ती से कि देखने वाले चकित रह जाते थे ।
जब वह ढाई साल का था तभी वह उसने अक्षरों के बारे में अपने मौलिक अनुसन्धान (, कि र से स,य थ, श कैसे बन सकते हैं और ट से ही ठ,ड ढ द ह बनाए जा सकते हैं । च को उल्टा जोडो तो ज बनता है और प ष, म भ,घ ध में तो जरा सा ही अन्तर है ...आदि,) ने मुझे विस्मित कर दिया था । मैं हैरान थी कि इसने वर्णमाला कब , कैसे सीखली । सीख ही नही ली उसे इतनी सूक्ष्मता से समझ भी लिया ।
पहली कक्षा में उसने यह कविता भी लिख डाली थी ----
मेरे पास थी एक पतंग ।
चटक लाल था उसका रंग ।
फर्..फर्..फर्..फर् उडती थी ।
साथ हवा के चलती थी ।
पतंग में एक हाथी था ।
वह तो मेरा साथी था ।
जाने कहाँ वो चली गई ।
संग हवा के चली गई ।
मेरे पास थी एक पतंग।
बहुत अच्छा परिवेश व परवरिश न मिलने के कारण मयंक की प्रतिभा को निश्चित रूप से सही दिशा नही मिल पाई ।वह भी बेंगलुरु में ही इंजीनियर है । सब जानते हैं कि आज इंजीनियर बनना और किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में नौकरी पाना युवाओं के लिये बड़ी बात नही रह गई है । फिर भी मयंक जहाँ भी है-----जो कुछ है उससे बेहतर चाहिये---का संकल्प उसके साथ है ।
इस समय वह बर्फवारी से घिरे न्यूयार्क शहर में है । पिछले साल जब वह न्यूजर्सी में था ,पहली बार वहाँ के वैभव ,बर्फीले सौन्दर्य और हडसन नदी के वैभव-विस्तार को देख उत्साहित होने के साथ उदास भी था ।बोला -मम्मी सब कुछ अच्छा है पर कमी यह है कि यह सब भारत में नही है । अपने देश , अपनी धरती के लिये उसके भाव-विचार मुझे आश्वस्त करते हैं ।
कल बातों-बातों में ही उसने कहा ---माँ , मुझमें ऐसी कोई बात ही कहाँ है जो मेरे लिये कुछ लिखा जाए । सच तो यह है कि वह सबसे छोटा व प्यारा होने के साथ कई बातों में इतना बड़ा व समझदार भी है कि जो भी लिखती हूँ प्रयोगवादी कविता के युग में भारतेन्दु-युग की रचना सा लगता है । उसके मना करने पर भी मैं केवल एक प्रसंग यहाँ दे रही हूँ जो बहुत छोटेपन में ही आगए उसके बड़ेपन को दर्शाता है ---- मयंक को एक दोस्त राहुल के साथ मेला जाना था । महीने का पहला सप्ताह होने के कारण भी और सबसे छोटे के लिये उदार भाव होने के कारण मैंने उसे पचास रुपए दिये ।कहा कि कुछ अच्छा खा-पीलेना । कुछ खरीदने लायक बजट था भी नही। शाम को जब लौटा तो उसके हाथ में गोर्की का उन्यास (माँ) था । मैने हैरान होकर इस खरीददारी का कारण पूछा तो उसने बताया कि पिछले साल आपने पैसे कम होने के कारण यह किताब लेते--लेते छोड़दी थी । इसलिये ....
पर यह तो 63 रुपए की है --मैंने कहा तो बोला कि तेरह रुपए राहुल से उधार ले लिये थे ।
पर बेटा ,पहले तो यह कि किताब खरीदना जरूरी नही था । किसी और दिन ले आते ।
माँ, रूसी किताबों की दुकान कल जाने वाली है । खाना -पीना तो फिर भी हो जाएगा ।
पर उधार केवल तेरह रुपए ही क्यों , ज्यादा ले लेता । यानी कि तुमने कुछ खाया पिया भी नही .यह बुरी बात है । मैंने पैसे इसलिये तो नही दिये थे ।
मेरी बात के उत्तर में उसने कहा --सॅारी मम्मा लेकिन , जब तक बहुत जरूरी न हो तब तक उधार नही लेना चाहिये न । फिर क्या कहती मैं ।
कुछ पंक्तियाँ मयंक के लिये---
सागर में लहर तू है
नदिया में भँवर तू है ।
ऊबी थकीं ---तिमिर से
आँखों को सहर तू है ।
खिल-खिल हँसी जो निकली
क्यों आँसुओं में बदली ।
तुझको पता नदी कब
किन घाटियों ने निगली ।
टकराने , जीत जाने की
पहली खबर तू है ।
सपनों के नीड छोड़े
रुख अँधेरे के मोड़े
बिखरे जो चिन्दियों में
संकल्प तूने जोड़े ।
पर्दों के पार देखे
वह तीखी नजर तू है ।
लगने लगा मुझे तो
छोटा दुआ का दामन
आकाश आ समाया
छोटे से अपने आँगन ।
है कही भी मरुस्थल
तो उसमें नहर तू है ।
असीम स्नेह व शुभ-कामनाओं के साथ
माँ
मंगलवार, 21 दिसंबर 2010
छोटे दिन---दो कविताएं
22 दिसम्बर वर्ष का सबसे छोटा दिन माना जाता है । यानी दस घंटे का दिन और चौदह घंटे की रात ।यों खान-पान पहनावा,स्वाद व स्वास्थ्य ,सभी तरह से अच्छी होने के बावजूद मुझे शीतऋतु जरा कम ही अच्छी लगती है । इसके पीछे कई कारणों में से एक यह भी है कि इस ऋतु में दिनों का वही हाल हुआ लगता है जो हाल सस्ते डिटर्जेन्ट की धुलाई से शिफॅान की साडी का हो जाता है । दिन की चादर को खींच कर रात आराम से पाँव पसार कर सोती है । सूरज जैसे अपनी जेब से बडी कंजूसी से एक-एक पल गिन-गिन कर देता है । यहाँ छोटे दिनों पर दो कविताएं हैं । दोनों ही कविताएं दस-बारह वर्ष पहले लिखी गईं । दूसरी कविता बाल--पाठकों के लिये लिखी गई है ।
(1)
-------------------------
मँहगाई सी रातें
सीमित खातों जैसे दिन ।
हुए कुपोषण से ,
ये जर्जर गातों जैसे दिन ।
पहले चिट्ठी आती थीं
पढते थे हफ्तों तक
हुईं फोन पर अब तो
सीमित बातों जैसे दिन ।
वो भी दिन थे ,
जब हम मिल घंटों बतियाते थे
अब चलते--चलते होतीं
मुलाकातों जैसे दिन ।
अफसर बेटे के सपनों में
भूली भटकी सी ,क्षणिक जगी
बूढी माँ की
कुछ यादों जैसे दिन ।
भाभी के चौके में
जाने गए नही कबसे
ड्राइंगरूम तक सिमटे
रिश्ते--नातों जैसे दिन ।
बातों--बातों में ही
हाय गुजर जाते हैं क्यों
नई-नवेली दुल्हन की
मधु-रातों जैसे दिन ।
(2)
(बाल कविता)
----------------
दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं
चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन
लम्बी और उबाऊ,
जटिल सवालों सी रातें
उछल-कूद और मौज-मजे की
छुट्टी जैसे दिन
जाने कब अखबार धूप का
सरकाते आँगन
जाने कब ओझल होजाते
हॅाकर जैसे दिन
जल्दी-जल्दी आउट होती
सुस्त टीम जैसे
या मुँह में रखते ही घुलती
आइसक्रीम से दिन
ढालानों से नीचे पाँव उतरते हैं जैसे
छोटे स्टेशन पर ट्रेन गुजरते जैसे दिन।
कहीं ठहर कर रहना
इनको रास नहीं आता
हाथ न आयें उड-उड जायें
तितली जैसे दिन ।
पूरब की डाली से
जैसे-तैसे उतरें भी
सन्ध्या की आहट से उडते
चिडिया जैसे दिन ।
(1)
-------------------------
मँहगाई सी रातें
सीमित खातों जैसे दिन ।
हुए कुपोषण से ,
ये जर्जर गातों जैसे दिन ।
पहले चिट्ठी आती थीं
पढते थे हफ्तों तक
हुईं फोन पर अब तो
सीमित बातों जैसे दिन ।
वो भी दिन थे ,
जब हम मिल घंटों बतियाते थे
अब चलते--चलते होतीं
मुलाकातों जैसे दिन ।
अफसर बेटे के सपनों में
भूली भटकी सी ,क्षणिक जगी
बूढी माँ की
कुछ यादों जैसे दिन ।
भाभी के चौके में
जाने गए नही कबसे
ड्राइंगरूम तक सिमटे
रिश्ते--नातों जैसे दिन ।
बातों--बातों में ही
हाय गुजर जाते हैं क्यों
नई-नवेली दुल्हन की
मधु-रातों जैसे दिन ।
(2)
(बाल कविता)
----------------
दादाजी की पगडी जैसी लम्बी रातें हैं
चुन्नू जी के चुनमुन चड्डी ,झबलों जैसे दिन
लम्बी और उबाऊ,
जटिल सवालों सी रातें
उछल-कूद और मौज-मजे की
छुट्टी जैसे दिन
जाने कब अखबार धूप का
सरकाते आँगन
जाने कब ओझल होजाते
हॅाकर जैसे दिन
जल्दी-जल्दी आउट होती
सुस्त टीम जैसे
या मुँह में रखते ही घुलती
आइसक्रीम से दिन
ढालानों से नीचे पाँव उतरते हैं जैसे
छोटे स्टेशन पर ट्रेन गुजरते जैसे दिन।
कहीं ठहर कर रहना
इनको रास नहीं आता
हाथ न आयें उड-उड जायें
तितली जैसे दिन ।
पूरब की डाली से
जैसे-तैसे उतरें भी
सन्ध्या की आहट से उडते
चिडिया जैसे दिन ।
रविवार, 12 दिसंबर 2010
दो लघुकथाएं
---------------------
(1) --सन्दिग्ध
----------------------
देखो, ऐसा करना-----चलते--चलते कनक ने पत्नी को समझाया ----अगर मुझे ऑफिस में जरूरी काम न होता तो राजन जी को मैं खुद ही अटेण्ड करता । अब तुम्हें ही करना होगा इसलिये कुछ न हो तो पडौस से टीनू या बबलू को ही बुला लेना कुछ तो मदद मिलेगी ही । और फिर.....कहते-कहते कनक रुक गया ।और सोनिया का चेहरा देखने लगा जिस पर हैरानी के भाव थे ।
राजन सोनिया के भाई का दोस्त है और सोनिया का सहपाठी भी । यहाँ विभाग के किसी काम से आया है। कनक से अनायास ही भेंट होगई तो औपचारिकतावश घर आने को कहना ही पडा ।अब उसकी ट्रेन शाम सात बजे है। और कनक छह बजे से पहले नही लौट पाएगा । तब तक सोनिया को अकेले ही सब देखना होगा और फिर......कनक आगे कहते-कहते रुक गया ।
पर इतने छोटे बच्चे भला क्या मदद करेंगे ---सोनिया ने हैरानी से पति को देखा । वैसे भी कोई खास काम नही है । बाजार से कुछ लाना नही है । खाना बन ही चुका है । बस परोसना ही तो है । टीनू--बबलू को बुलाने की क्या जरूरत ।
जरूरत है-------कनक ने जोर देकर कहा--- हर बात को अपने हिसाब से मत देखा करो । तुम घर में अकेली हो और.......सोनिया , लोगों को बात बनाते देर नही लगती ।बच्चे रहेंगे तो..........।
सोनिया कनक के आशय को समझ कर आहत होगई । बोली-----कनक , राजन मेरे भाई जैसे हैं ।
पर भाई तो नही है न । कनक ने तपाक से कहा और बाहर निकल गया । सोनिया अवाक् सी पति को देखती रह गई
( 2 ) फर्क
---------------------
माँ ,विनीता को साकेतनगर जाना है ।
सुनील की बात सुनकर मेरे मन में हल्का सा विरोध जागा और साथ में कई सवाल भी । साकेतनगर यानी अपनी माँ के घर । पर क्यों ....आज ही तो सुबह दोनों पूना से आए हैं वह भी सिर्फ हफ्ताभर के लिये । अभी बैग, सूटकेस खुले तक नही हैं । इसके अलावा विनीता की माँ अभी कुछ दिन पहले ही महीनाभर पूना रह कर लौटी हैँ । मुझे तो फिर भी दोनों छह माह बाद मिल रहे हैं । वैसे भी मेरी अपनी कोई बेटी नही है । विनीता ही मेरी बहू भी है और बेटी भी । कबसे उसके आने का इन्तजार था । उसके आने से घर कैसा भरा-भरा लगरहा है ।पहले कितनी सारी बातें सोच रखी थी मैंने । दोनों को --क्या बना कर खिलाऊँगी । कहाँ-कहाँ चलेंगे । कितनी सारी बातें करेंगे । और भी कितना कुछ । पर यह क्या ..विनीता ने आते ही माँ के पास जाने की योजना बना ली । मुझे बताए बिना ही .....।
ये सारी बातें सोचते हुए मैंने स्नेह व कुछ अधिकार से कहा ---
बेटी अभी तो हम लोग ठीक से मिले बैठे भी नहीं हैं । साकेत नगरभी चली जाना । पहले मेरे साथ तो....
आपके साथ तो रहूँगी ही-----विनीता ने मेरी पूरी बात सुने बिना ही कुछ उदासी के साथ कहा-----पर मम्मी अकेली हैं । भाभी मायके चली गईं हैं ।...मम्मी की तबियत भी ठीक नही है । इसलिये मैं सोच रही थी कि ....।
बातें सहज-स्वाभाविक होते हुए भी मुझे झिंझोड गईँ ।मायके जाने के पीछे विनीता के तर्क नही , वह आत्मीयता व संवेदना प्रमुख थी जो एक बेटी की माँ के लिये होती है । ये सारी समस्याएं मेरी भी हो सकतीं थीं यदि विनीता मेरी बेटी होती । पहली बार मुझे बेटी की कमी खली । बहू और बेटी के इस फर्क को स्वीकार करते हुए मैंने विनीता के जाने को सहज रूप में ले लिया । मेरे पास और कोई चारा भी तो नही था ।
---------------------
(1) --सन्दिग्ध
----------------------
देखो, ऐसा करना-----चलते--चलते कनक ने पत्नी को समझाया ----अगर मुझे ऑफिस में जरूरी काम न होता तो राजन जी को मैं खुद ही अटेण्ड करता । अब तुम्हें ही करना होगा इसलिये कुछ न हो तो पडौस से टीनू या बबलू को ही बुला लेना कुछ तो मदद मिलेगी ही । और फिर.....कहते-कहते कनक रुक गया ।और सोनिया का चेहरा देखने लगा जिस पर हैरानी के भाव थे ।
राजन सोनिया के भाई का दोस्त है और सोनिया का सहपाठी भी । यहाँ विभाग के किसी काम से आया है। कनक से अनायास ही भेंट होगई तो औपचारिकतावश घर आने को कहना ही पडा ।अब उसकी ट्रेन शाम सात बजे है। और कनक छह बजे से पहले नही लौट पाएगा । तब तक सोनिया को अकेले ही सब देखना होगा और फिर......कनक आगे कहते-कहते रुक गया ।
पर इतने छोटे बच्चे भला क्या मदद करेंगे ---सोनिया ने हैरानी से पति को देखा । वैसे भी कोई खास काम नही है । बाजार से कुछ लाना नही है । खाना बन ही चुका है । बस परोसना ही तो है । टीनू--बबलू को बुलाने की क्या जरूरत ।
जरूरत है-------कनक ने जोर देकर कहा--- हर बात को अपने हिसाब से मत देखा करो । तुम घर में अकेली हो और.......सोनिया , लोगों को बात बनाते देर नही लगती ।बच्चे रहेंगे तो..........।
सोनिया कनक के आशय को समझ कर आहत होगई । बोली-----कनक , राजन मेरे भाई जैसे हैं ।
पर भाई तो नही है न । कनक ने तपाक से कहा और बाहर निकल गया । सोनिया अवाक् सी पति को देखती रह गई
( 2 ) फर्क
---------------------
माँ ,विनीता को साकेतनगर जाना है ।
सुनील की बात सुनकर मेरे मन में हल्का सा विरोध जागा और साथ में कई सवाल भी । साकेतनगर यानी अपनी माँ के घर । पर क्यों ....आज ही तो सुबह दोनों पूना से आए हैं वह भी सिर्फ हफ्ताभर के लिये । अभी बैग, सूटकेस खुले तक नही हैं । इसके अलावा विनीता की माँ अभी कुछ दिन पहले ही महीनाभर पूना रह कर लौटी हैँ । मुझे तो फिर भी दोनों छह माह बाद मिल रहे हैं । वैसे भी मेरी अपनी कोई बेटी नही है । विनीता ही मेरी बहू भी है और बेटी भी । कबसे उसके आने का इन्तजार था । उसके आने से घर कैसा भरा-भरा लगरहा है ।पहले कितनी सारी बातें सोच रखी थी मैंने । दोनों को --क्या बना कर खिलाऊँगी । कहाँ-कहाँ चलेंगे । कितनी सारी बातें करेंगे । और भी कितना कुछ । पर यह क्या ..विनीता ने आते ही माँ के पास जाने की योजना बना ली । मुझे बताए बिना ही .....।
ये सारी बातें सोचते हुए मैंने स्नेह व कुछ अधिकार से कहा ---
बेटी अभी तो हम लोग ठीक से मिले बैठे भी नहीं हैं । साकेत नगरभी चली जाना । पहले मेरे साथ तो....
आपके साथ तो रहूँगी ही-----विनीता ने मेरी पूरी बात सुने बिना ही कुछ उदासी के साथ कहा-----पर मम्मी अकेली हैं । भाभी मायके चली गईं हैं ।...मम्मी की तबियत भी ठीक नही है । इसलिये मैं सोच रही थी कि ....।
बातें सहज-स्वाभाविक होते हुए भी मुझे झिंझोड गईँ ।मायके जाने के पीछे विनीता के तर्क नही , वह आत्मीयता व संवेदना प्रमुख थी जो एक बेटी की माँ के लिये होती है । ये सारी समस्याएं मेरी भी हो सकतीं थीं यदि विनीता मेरी बेटी होती । पहली बार मुझे बेटी की कमी खली । बहू और बेटी के इस फर्क को स्वीकार करते हुए मैंने विनीता के जाने को सहज रूप में ले लिया । मेरे पास और कोई चारा भी तो नही था ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)