मंगलवार, 13 सितंबर 2016

ग्यारहवीं कक्षा में हिन्दी का पीरियड .

यह लघुकथा उच्च कक्षाओं में भी हिन्दी की स्थिति बताने के लिये काफी है .कहीं छात्र पढ़ना नही चाहते और कहीं शिक्षक पढ़ाना नही चाहते या जानते . किसी एक को उत्तरदायी नही कहा जा सकता . ऐसे में हिन्दी दिवस मनाने का आडम्बर छोड़कर जरूरत है विद्यालयों में प्रारम्भ से ही हिन्दी अध्यापन की जड़ें मजबूत करने की .क्योंकि विद्यालय ही वह संस्था है जहाँ भाषा सीखने का औपचारिक आरम्भ होता है .
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छात्रो ,आज हम नौका विहार पढेंगे । सभी छात्र पुस्तक में यह पाठ निकाल लें .”
सर हम लोग किताब नहीं लाए .”
मैं भी नहीं लाया ...
और मैं भी ..
“ पाठ्य-पुस्तक जरूर लाया करें यह मैंने कई बार बताया है . खैर जो लाए हैं उन्ही के साथ मिलकर देखलो .
यस सर ,कौनसे पेज पर है ?”
बेटा ,विषय-सूची में दिया हुआ है । जरा देखो .”
विषय-सूची कहाँ है सर ?”
किताब के शुरु में ही है बेटा .शायद आज पहली बार आए हो । मैं अक्सर बताता रहता हूँ कि विषय-सूची देखकर किस तरह अन्दर का कोई भी पाठ निकाला जा सकता है .... निकाल लिया ? अच्छी बात है।.... यह छायावाद के प्रसिद्ध कवि सुमित्रानन्दन पन्त की कविता है .इन्हें प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है . ये छायावाद के चार प्रमुख कवियों में से एक हैं .”
सर अब ये छायावाद क्या है ?”
दो दिन पहले ही तो मैंने इसके बारे में विस्तार से बताया था .
एक छात्र--“सर मेरे सामने नहीं बताया .
तुम आए नहीं होगे खैर....कविता के इतिहास में आधुनिक काल की ही एक अवधि है जो द्विवेदी युग के बाद सन् 1920 से प्रारम्भ होती है . इसे फिर एक बार अलग से पढ़ लेंगे .
सर क्या यह पेपर में आएगा ?”
बेटा पेपर में आएगा यह तो नही कहा जासकता लेकिन यह कई तरह से बहुत महत्त्वपूर्ण कविता है । छायावाद की सारी विशेषताएं इसमें हैं जिन्हें में साथ ही साथ तुम्हें समझाता जाऊँगा । पाठ के साथ यह जानना भी उपयोगी रहेगा .पेपर के प्रारम्भ में जो पच्चीस प्रश्न आते हैं उनमें ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं . फिर हर पाठ तो पेपर में नही आ सकता तो क्या उसे हम पढ़ेंगे नहीं .”
"लेकिन सर पहले तो किसी ने यह सब नही पढ़ाया और हम बढ़िया नम्बरों से पास भी होगए ."
"लेकिन .... ." 
एक छात्र (ऊब कर बीच में ही)--"सर आप तो पाठ पढ़ाइये .."
"हाँ हम वही करने जा रहे हैं . तो कविता है---
शान्त स्निग्ध ज्योत्स्ना उज्ज्वल ,अपलक अनन्त नीरव भूतल...
एक छात्र---सर ,नौका विहार का क्या मतलब है ?”
नौका यानी नाव और विहार यानी सैर करना .”
नाव की सैर ! सर इन लोगों के पास और कोई काम नही था ? खुद नाव में सैर की और कविता लिख डाली ..कितनी टफ है यार ?”
शिक्षक आवेश को दबाकर हँसते हुए --“पहले पाठ को पढ़ तो लें बेटा ,फिर दूसरी बातें करें .
ठीक है सर . आप तो पाठ पढ़ाइये .
 “हाँ.., तो कवि जिस समय नौका विहार के लिये गए ,वह रात्रि का समय था । चारों ओर बड़ी कोमल सी उजली चाँदनी फैली हुई थी । आसमान बिल्कुल साफ था और धरती पर किसी तरह का कोई शोर नही था । चारों ओर शान्ति छाई थी ……”
सर जी , डिटेल रहने दो . आप तो हमें बस इम्पौर्टेंट, इम्पौर्टेंट बता दीजिये . सभी सर हमें केवल इम्पौर्टेंट बताते हैं .”
तभी चपरासी आकर बताता है कि उन्हें प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं .इन शिक्षक महाशय को बीच में कक्षा छोड़ना अच्छा नहीं लगता लेकिन संस्था-प्रधान के आदेश को न मानने का तो सवाल ही नहीं उठता . जाकर हाथ बाँधे नतसिर खड़े होगए .
जी सर !”
अरे कौशिक ,टाइम-टेबल में थोड़ा चेंज किया है .
जी ..!”
हिन्दी का पीरियड पाँचवा ठीक रहेगा .
सर पाँचवे तक तो छात्र रुकते ही नहीं . चौथे पीरियड के बाद ही कोचिंग चले जाते हैं .
तभी तो...हिन्दी तो बच्चे वैसे ही पढ़कर पास होजाते हैं . पहले मैथ्स , साइंस और इंगलिश  जरूरी है . अभी सक्सेना जी को अंग्रेजी पढ़ाने दीजिये ..


जी सर जैसा आप कहें ..  

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

विश्वास की विजय

शिक्षक-दिवस पर विशेष
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बात सन् 1973 के दिसम्बर माह की है जब मैं पहाड़गढ़ पढ़ने जाती थी . उस समय दसवीं कक्षा में थी और अर्द्धवार्षिक परीक्षाएं शुरु होगईं थीं. वैसे तो मैं पढ़ने के लिये गाँव से ही जाती थी पर परीक्षा और कुछ कड़कती ठंड के कारण काकाजी ने अपने एक सुपरिचित शिक्षक के मकान में किराए पर एक कमरा ले लिया था .जहाँ मैं और मेरा छोटा भाई रह रहे थे , ग्यारहवीं में पढ़ रही एकमात्र लड़की उर्मिला मकान मालिक की भतीजी और परिवार के ही कुछ लड़के भी थे .
वे रोज नकल करके खूब कॉपियाँ भरने की डींगें हाँका करते थे . और मुझे सत्यवादी हरिश्चन्द्र की नानी कहकर चिढ़ाया करते थे . इसका कारण था कि मैं उनकी नकल वाली बात का विरोध करती रहती थी . काकाजी ने शुरु से ही हमें नकल से दस कोस दूर रहने की सीख दी थी . मुझे खूब याद है जब मैं उनके साथ बड़बारी में थी तब पाँचवी बोर्ड की परीक्षा में एक शिक्षक ने अपने साथी शिक्षक ( मेरे पिताजी )की बेटी होने के कारण एक उत्तर बताना चाहा तो पिताजी ने उसे लगभग डाँटते हुए कहा था--- सिकरवार मेरी बेटी अगर फेल भी होती है तो होजाने दो पर उसे बताने की जरूरत नहीं . वह जो भी लिखती है उसे खुद लिखने दो .
बचपन में सीखी बात दिल-दिमाग में जैसे चिपककर रह जाती है . मैंने खुद कभी नकल का सहारा नहीं लिया न ही अपने बच्चों को लेने दिया . आज भी जबकि परीक्षाओं में नकल के इतिहास बनते हैं , मैं छात्रों को नकल के भरोसे न रहने की सलाह देती रहती हूँ  . खैर...
जिस दिन नागरिक शास्त्र का पेपर था मेरे एक दो पाठ तैयार नहीं थे . यह विषय मुझे बड़ा उबाऊ लगता था ( आज भी ) .शायद इसलिये कि पढ़ाने वाले सर कभी समझाकर पढ़ाते नहीं थे . विषय कोई कठिन नहीं होता अगर उसे सही तरीके से पढ़ाया जाय . नागरिकशास्त्र में मुझे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का चुनाव और मौलिक अधिकारों में संवैधानिक उपचारों का अधिकार बन्दी-प्रत्यक्षीकरण, परमादेश वगैरा जरा भी समझ में नहीं आते थे .प्रजातंत्र की परिभाषा भी केवल लिंकन वाली याद थी .पर जनता द्वारा ,जनता के लिये जनता का शासन क्या पहेली है समझ में नहीं आता था  . मेरी कमजोरी उन साथियों को मालूम थी सो पेपर के एक दिन पहले ही मेरे सामने उन्होंने विस्तार से नकल--महात्म्य पढां . कई तर्क दिये कि—
तू दिन रात रटती रहती है तब भी उतने नम्बर नहीं ला पाती जितने हम लोग एक रात की मेहनत में ले आते हैं .”
कि जब बिना मेहनत के ठीक ठाक नम्बर मिल जाते हैं तो फिर रटने में आँखें फोड़ने से क्या फायदा ?”
चल हम यह नहीं कहते कि नकल के भरोसे रहो , पर जहाँ एक दो नम्बर से ही परसेंटेज डाउन हो रहा हो वहाँ थोड़ी बहुत नकल तो चलती है .
और सच्ची बताना क्या तुझे अच्छा लगेगा जब कम पढ़ने वाले नकल करके तुझसे ज्यादा नम्बर मार लेंगे . सर लोग तुझे कैसे होशियार बताते रहते हैं .... भैया हम तो तेरे भले की कह रहे हैं .मान या न मान तेरी मर्जी .

कहते हैं कि बार बार बोला गया झूठ भी सच्चा प्रतीत होने लगता है . मुझे भी लगा कि संवैधानिक उपचारों की एक चिट बनाकर रखलूँ . जब ये सब लोग हमेशा नकल करते हैं तो मेरा एक बार करना बहुत गलत तो नहीं होगा . सो चूड़ीदार पायजामा की कमर मोड़कर एक चिट रख ही ली .और इस बात से अनजान कि यह बात न केवल प्रकाश वगैरा को मालूम है बल्कि उन्होंने कक्षा के एक शरारती लड़के को बता भी दी है . मैं आराम से अपनी डेस्क पर बैठ गई . उस दिन हमारे कमरे में मूँदड़ा सर की ड्यूटी थी . यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि स्कूल में दो लोग श्री डी एस मिश्रा और श्री ओपी मूँदड़ा बहुत ही शानदार तरीके से स्कूल आते थे . साफ-सुथरे शानदार कपड़े , चमचमाते जूते ,..उनके आते ही क्लासरूम महक से भर जाता था . उतने ही शानदार तरीके से पढ़ाते भी थे .मिश्रा जी हिन्दी के और मूँदड़ा जी इतिहास के लेक्चरर थे . पर मूँदड़ा जी अपेक्षाकृत छात्रों के अधिक निकट थे . वे छात्रों से हँसी-मजाक और हल्की-फुल्की छेड़छाड़ भी करते रहते थे और जब पढ़ाते तो इस तरह जैसे दादी नानी कहानियाँ सुनाया करती हैं . चाहे वह फ्रांस की क्रान्ति हो , इंगलैण्ड का उद्भव या नेपोलियन का पराभव... वे क्लास में घूम घूम कर मौखिक सुनाते थे .हम सब दम साधे सुनते रहते थे . मैं उनसे बहुत प्रभावित थी . वास्तव में वे क्लास में यह कहकर अक्सर मेरा हौसला भी बढ़ाया करते थे कि देखो छोटी सी लड़की अकेली इतनी दूर पैदल चलकर गाँव से पढ़ने आती है और पढ़ाई पर पूरा ध्यान देती है ,यह कितनी अच्छी बात है . 
उस दिन में अजीब सा अनुभव कर रही थी . पहली बार चोरी या कत्ल करने वाले की तरह . उस पर जब कॉपी पेपर लेकर कक्ष में मूँदड़ा सर आए तो मेरी घबराहट और बढ़ गई . लगा जैसे वे ऐक्स-रे की तरह कपड़े में छुपी चिट को भी देखलेंगे . वैसे भी जो सर कक्षा में पढ़ाते हुए बड़े सहज रहते थे वे परीक्षा में ड्यूटी देते समय अपने चेहरे पर हैरान कर देने वाली खास किस्म की कठोरता और अजनबियत चिपका लेते थे कि कुछ पूछते हुए भी डर लगे . फिर वे सर थे मूँदड़ा जी जिनके प्रति आदर और भय का मिश्रित भाव था . सर ने पेपर बाँट दिये तो थोड़ी बहुत चल रही खुसर-फुसर भी बन्द होगई . केवल सर के जूतों की चाप सुनी जा रही थी . पेपर देखकर मेरी घबराहट तो कम होगई . पेपर सरल था . चिट वाला प्रश्न उसमें था ही नहीं पर होता तो भी मैं चिट निकालने की सोच भी नहीं सकती थी पर पायजामा में रखी चिट लाल चींटी की तरह काट रही थी . और तभी यह हुआ कि उस शरारती लड़के ने बड़ी धृष्टता के साथ गाइड का एक पेज सामने फैला लिया .वह क्लास में मुझसे कड़ी स्पर्धा ( द्वेष भी कह सकते हैं ) रखता था और किसी न किसी तरह मुझे पीछे छोड़ने की फिराक में भी रहता था .कुछ दिन पहले सर ने मेरे कारण ही उसको डाँटा भी था .
इस तरह सरेआम सामने नकल रखी देख मूँदड़ा सर को हैरानी भी हुई और क्रोध भी आया .
क्यों बे !...क्या है यह ?”
नकल है सर .—वह ढिठाई के साथ बोला .
अयं !...ऐसी हिम्मत ! कमाल है . लगता है आगे पढ़ना नहीं है तुझे .
मैं ही क्यों सर आगे वाले लोग भी तो लाए हैं नकल .
आगे तो किसी के पास नहीं है .
तलाशी लेकर देखलो सर , नहीं निकले तो फिर आपके जूते और मेरा सिर .”--उसने कहा तो मेरे नीचे की जमीन जैसे धँसकने लगी .  
किसकी बात कर रहा है , सामन्त की ?”
नहीं सर और आगे .
रमेश ?”
और आगे .
उसके आगे कहने के साथ ही सर मेरे पास आकर रुक गए . मेरी साँसें थम सी गईं . अगर सर पूछते तो मैं निश्चित ही स्वीकार कर लेती क्योंकि मुझे झूठ बोलना नहीं आता . कभी कोशिश की भी है तो पकड़ी गई हूँ . सर ने एक बार मुझे ध्यान से देखा और फिर पीछे उस लड़के के पास जाकर कड़ककर बोले—स्डैण्ड अप
क्यों सर ? मैंने क्या किया ? बस नकल ही तो बताई है .
गलत बताई है क्योंकि वह लड़की नकल नहीं ला सकती .
आपको इतना भरोसा है ?”
भरोसा है . वह नकल के भरोसे रहने वालों में नहीं है . और बेटा यह काम तेरा नहीं है . चुपचाप पेपर करो नहीं तो कॉपी देकर अपने घर जाओ .

मैं ग्लानि से भर उठी . और कई दिनों तक खुद से आँखें चुराती रही . वह मेरा पहला और अन्तिम प्रयास था . गाँव में लगभग बीस साल सर्विस करने के बाद जब मैंने 1997 में ग्वालियर स्थानान्तरण के लिये आवेदन किया तब भाग्य से उपसंचालक पद पर श्री मूँदड़ा जी थे . वे मुझे तुरन्त पहचान गए और मेरे बिना कुछ कहे मेरा स्थानान्तरण कर दिया . आज वे नहीं हैं पर उनके विश्वास ने मुझे एक सही दिशा दी . जो लोग सिर्फ कमियाँ या बुराइयाँ ढूँढ़ते रहते हैं वे उनके बारे में कई तरह की बातें करते हैं . लेकिन मेरे हृदय में आज भी वे मेरे श्रद्धेय आदर्श गुरु हैं .   

बुधवार, 31 अगस्त 2016

अधपकी दाल

एक ऑडिटोरियम का शानदार मंच ,सुन्दर सजावट ,लाइट ,कैमरा ..कथित सभ्य शिक्षित वर्ग के दर्शक ..कुल मिलाकर किसी राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम जैसी तैयारी जहाँ फिल्मी गीतों पर छोटे छोटे बच्चों की डांस-परफॉर्मेंस थी . वह कोई निर्णायक या प्रतियोगिता जैसा आयोजन नहीं था . उसका उद्देश्य केवल बच्चों के माता-पिता को दिखाना भर था कि बच्चे कितना और कैसा सीख रहे हैं .इसी बहाने कोरियोग्राफर को भी अपना हुनर दिखाना था  खैर.... बच्चों ने जितना सीखा ,उतना दिखाया . हर प्रस्तुति के बाद तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ,उद्घोषक-द्वय   ऑसम ,सुपर ,माइण्डब्लोइंग ऐक्सीलेंट, ग्रेट जॉब , वा..व वेलडन किड्स जैसे भारी भारी शब्दों द्वारा बच्चों के प्रयासों को गरिमा प्रदान कर रहे थे .
हालाँकि अपने मासूम बच्चों को वयस्कों के रोमांटिक गीतों पर थिरकते -उछलते और वैसा ही अभिनय करते देखकर ताली पीटते और निहाल होते माता पिता को यह बात अजीब लग सकती है कि बच्चों को अभी इस तरह प्रस्तुत करना उनके हित में नही है , क्योंकि वे अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं .
सीखने के बीच परीक्षा या प्रदर्शन का आयोजन सीखने की गति और स्तर ,दोनों को प्रभावित करता है . समय की दृष्टि से भी और मानसिकता की दृष्टि से भी . क्योंकि जो समय सीखने का होता है वे प्रदर्शन की तैयारी में जुट जाते हैं . यह बिना पढ़े या बहुत कम पढ़े ही परीक्षा देने जैसा है . अपर्याप्त ज्ञान का प्रदर्शन हो या परीक्षा दोनों ही अनावश्यक  हैं .
अक्सर होता यह है जब कम प्रयास में ही उन्हें तालियों की गड़गड़ाहट ,और प्रशंसा में के साथ सुन्दर कीमती प्रमाण-पत्र मिल जाते हैं तो उनका ध्यान सीखने की बजाय सहज ही प्रदर्शन और पुरस्कार पर अटक जाता है .वे जो कुछ करते हैं ,पुरस्कार के लिये करते हैं . दक्षता या ज्ञान के लिये नहीं . इस तरह अनजाने में ही वे समय से पहले और अपर्याप्त कौशल के साथ ही चकाचौंध के अँधेरे में धकेल दिये जाते हैं , जहाँ मिलता है उन्हें एक भ्रम . बहुत कुछ सीख लेने का भ्रम .बहुत कुछ कर पाने का भ्रम .
इस तरह वे प्रशंसा के आदी भी होजाते हैं .कमियों को स्वीकार करने की प्रवृत्ति पनप ही नहीं पाती जो किसी के भी सुधार और विकास के लिये बेहद जरूरी है .
यह सही है कि बच्चों की प्रतिभा को पहचानना , उसे प्रेरणा ,प्रोत्साहन और एक सही दिशा मिलना बहुत जरूरी है .लेकिन साथ ही यह समझना भी जरूरी है कि चाहे शिक्षा हो या कोई भी कला ,उसे हासिल करने के लिये परिश्रम के साथ धैर्य भी बहुत आवश्यक है .
यहाँ मुझे दादी की सीख याद आती है कि जब दाल पक रही हो तब उसमें बार बार चम्मच डालकर देखना नहीं चाहिये कि गली या नही . इससे दाल गलने में देर लगती है . और उतना स्वाद भी नही आ पाता . 
सीखने के सन्दर्भ में यह बात काफी प्रासंगिक है .
दुर्भाग्य से अब ऐसा धैर्य आमतौर पर नहीं देखा जाता . बीच बीच में ढक्कन खोलकर दाल या चावल को टटोलने और अधपकी दाल परोसने की प्रवृत्ति बढती जा रही है . यही हाल स्कूली शिक्षा का है .जिसमें पढ़ाई कम और परीक्षाएं ज्यादा होतीं हैं .
सितम्बर में त्रैमासिक ,दिसम्बर में अर्द्धवार्षिक ,जनवरी के तीसरे या फरवरी के प्रथम सप्ताह में प्री-बोर्ड और फरवरी के अन्तिम या मार्च के प्रारम्भ से ही वार्षिक परीक्षाएं ..यानी पढ़ाई ठीक से हो नहीं पाती कि विभाग से परीक्षा की तिथि आ जाती है . हर परीक्षा में परीक्षा लेने से लेकर कापियों के मूल्यांकन , रिजल्ट , पालकों के साथ संवाद जैसे औपचारिक कार्यों में लगभग पन्द्रह दिन तो लगते ही हैं .यानी पूरे सत्र में कम से कम 45-50 दिन परीक्षा की भेंट चढ़ जाते हैं .
ऐसा नहीं है कि परीक्षा व्यर्थ है . परीक्षा आवश्यक भी है और महत्त्वपूर्ण भी पर पाठ्यक्रम के सही अध्ययन- अध्यापन के बाद . बेहतर हो कि वह समय पढ़ने-पढ़ाने में खर्च हो . परीक्षा की बजाय अध्ययन अध्यापन की सार्थकता पर बल दिया जाए . शिक्षक की योग्यता व पढ़ाने के तरीकों को देखा जाए और देखा जाए कि शिक्षक के दिये ज्ञान को छात्र कितना ग्रहण कर पा रहा है . जब पढ़ाई सुचारु होगी तो परीक्षा में सफलता तो स्वतः ही मिलेगी .   

अगली कड़ी में ---परीक्षा केन्द्रित शिक्षा के नुक्सान 

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

कैसे भूलूँ और कैसे याद करूँ ..

अब से पहले हम बहनें या तो माँ के पास अपने गाँव चली जातीं थीं या मैं गाँव को यादों में ही जी लिया करती थी . गाँव, जहाँ सावन का अर्थ ही रक्षाबन्धन होता था या रक्षा-बन्धन का मतलब सावन का पूरा महीना होता था और सावन का मतलब उमड़-घुमड़ते बादल , बादलों को देख पंख पसारे नाचते मोर , हरे भरे खेत, मैदान, कूल-किनारे ,रिमझिम रिमझिम वर्षा से गदबदाती धरती , कीचड़ की किचपिच.. जरा तेज बारिश हुई कि किनारों तक उमड़ उठती छोटी सी सोननदी , नीम शीशम इमली की शाखों में पड़े झूले ,मल्हारें ,कोयल पपीहे की पुकार और भी कितना कुछ जो रोम रोम को सावन बना देता था .
मन में गाँव की यही तस्वीर बसी है . कुछ धूमिल हो भी गई है तब भी इस शहर से तो ,जहाँ आत्मीय रिश्तों के बीच भी ऑफिस है , लम्बा ट्रैफिक है , दूरियाँ है ,जगह की भी और मन की भी ,वह तस्वीर लाख गुना बेहतर है . 
मुझे याद है कि राखी पर भाई बहिन को मिलने से न झमाझम बारिश रोक पाती थी  न कोई दूसरा व्यवधान .तब अपना निजी साधन खरीदना इतना सुलभ नही हुआ था फिर भी ठसाठस भरी बसों में किसी तरह जगह बनाकर , बस न मिलें तो ट्रैक्टर-ट्रक में ही सही ,बहनें पीहर आतीं थीं अपने माँजाये को राखी बाँधने . आशीष के रूप में भुजरिया देने . और भाई भी सारे काम छोड़कर सारा समय बहन भान्जों के लिये बचाकर रखते थे .ये सारी बातें और स्मृतियाँ मेरे मन आँगन में फुहारों की तरह बरसती थीं . 
अब इतनी दूर बैठी हूँ वहाँ जाना तो बहुत दूर की बात है लेकिन अब तो याद करने की भी हिम्मत नहीं . कैसे करूँ याद और किसके लिये करूँ .
वहाँ अब कौन है जो मुझे लेने सड़क तक आएगा और मीठी सी मुस्कान बिखेरते हुए हुलस कर कहेगा –"अरे मेरी बेटी आगई."..अब कहाँ है वह वात्सल्यभरा अंचल जो कोमलता के साथ आच्छादित हो जाता था मेरे तन-मन पर . 
जिया !मेरी माँ ! व्यर्थ हैं वे गलियाँ तुम्हारे बिना .  
दरवाजा जो कभी बन्द नही होता था .
सावन के महीने में मन हुलसकर तुम्हारी गोद में जा छुपने को आतुर होजाता था . "आ हा मेरी लाड़ली आई है ."–कहती हुई तुम हनुमान जी के मन्दिर या सड़क तक मुझे लेने आजातीं थीं और मेरे बस से उतरने से पहले ही बैग मेरे हाथ से ले लेतीं थीं . गाँव में मेरा या हममें से किसी बाई-बहिन का पहुँचना तुम्हारे लिये उत्सव जैसा होता था . तब न तो नदी पार जाकर खेतों से ताजी सब्जी लाने में तुम्हारे पाँव दुखते थे और न यहाँ वहाँ से चीजें जुटाते तुम्हारा मन भरता था . उस आँगन में एक जादू था कि मैं अधेड़ उम्र की औरत भी बिल्कुल छोटी सी बच्ची बन तुम्हारे ममत्त्व से महकते आँचल की सुगन्ध में डूब जाती थी . 
जिया मेरी माँ जिनके बिना अब सब कुछ सूना लगता है 
कहाँ है वह मीठी सी मुस्कान , स्नेहभरा आमन्त्रण जो किसी को भी आदर और स्नेह से भर देता था और जिसके कारण घर का दरवाजा कभी बन्द नहीं होता था .आने जाने वालों का ताँता लगा रहता था . "भुआ राम राम." और "बहन जी नमस्कार , कब आईं ?" जैसे संवाद दिनभर चलते ही रहते थे गाँवभर की मौसी ,जीजी ,और तमाम सहेलियाँ गैलरी में बैठी ठहाके लगातीं अपने रोचक किस्से सुनाती रहतीं थीं .और तुम हँसी-खुशी की उस अविरल धारा में डूबती उतराती रहतीं थीं ,तुम्हारे साथ मैं भी .
कहाँ मिलेगी अब वह तृप्ति जो तारों की छाँव में खटिया पर लेटे मन जाने कितनी बातें करते हुए मिलती थी . अब तुम नही हो माँ तो शेष नही है कुछ भी . न स्नेह न उल्लास ... 
अब सावन में काली घटाएं आसमान को भले ही सुर्मई दुशाला उढ़ाती रहें . मेघ-मालाएं आकर धरती माँ से गले मिलती रहें . नदी के किनारे कास और सरपत लहलहाते रहें .आम जामुन के पेड़ों में मोर--पपीहा बोलते रहें ,मुझे क्या! 
मुझे तो इतना मलूम है कि अब नीम इमली की शाखें मेरे मन की तरह सूनी पड़ी होंगी और अमराई बिना मल्हारों के गूँगी—बहरी और बेजान होगी .अब उजियाली रातों में नीम की डाली पर कोई ननद भावज झूला नहीं झूलती होगी . न ही चार-छह औरतें मल्हारें गा गाकर रात में मिठास भरती होगी .,.मेहँदी के कंच हरियल पत्तों को घोंट-पीस कर मेहँदी रचाने की फुरसत अब किसी को नही होगी और नही इस बार बौछारों ने आँगन भिगोया होगा . तुलसी का बिरवा जरूर सूख सिसक रहा होगा . चूल्हें में ठंडी राख भरी होगी . अब कोई भावज पल्लू से देहरी छूकर  पालागन करने नहीं आई होगी . राखी पर पीहर आई बहन बेटियाँ सहेलियाँ सूना द्वार देख देखकर आँसू पौंछती हुई लौटगई होंगी . तुम्हारे बिना कहाँ कैसी खुशियाँ !कैसा सावन ! कैसी उमंग और किस बात का उल्लास !

अब इस सावन का मैं भी क्या करूँ.. कैसे पाँव धरूँ उस सूनी देहरी पर ,आँगन ,रसोई और गैलरी में जहाँ कण कण में तुम्हारी यादों के तीखे शूल बिछे हैं . माँ तुम्हारे बिना मैं एक अँधेरी सूनी राह पर खड़ी हूँ अकेली ही आँसुओं में डूबी अपने दर्द के साथ ..
काकाजी की सूनी कचहरी

घर आँगन छत देहरी सूनी,
सूना है मन तुम बिन माँ !
तुम्ही नहीं तो 
क्या घर आँगन !
कैसी वर्षा , कैसा सावन !
बादल भर भर बरस रहे हैं 
फिर भी धूल उड़ी है आँगन.
कौन पुकारे साँझ सकारे
उजियारे को ,
तुम बिन माँ !

तुम नदिया सी बहते बहते
छोड़ गईं सब कूल किनारे .
हर पल जेठ दुपहरी सा है ,
पाखी उड़ गई पाँख पसारे .
पात लुटा बैठा है बरगद  ,
छाँव कहाँ है तुम बिन माँ .


था अपार विस्तार तुम्हारा ,
छोटी सी मेरी बाँहें .
समा सकीं ना , 
सिर्फ बचीं हैं ,
मेरे अंचल में आहें .
आज खड़ी हूँ पार उतरने ,
टूट गया पुल तुम बिन माँ !



शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

संयोग ऐसे भी होते हैं .

26 जुलाई को मैं दिल्ली होते हुए बैंगलोर आ रही थी .
हवाईयात्रा समय की दृष्टि से एक तरह का चमत्कार ही होती है . चालीस-बयालीस घंटे का सफर मात्र ढाई घंटे में ! जिनके पास पैसा है पर समय नहीं है उनके लिये तो हवाई यात्रा एक वरदान ही है ,लेकिन हवाई यात्रा के बाद ऐसा लगता है मानो किसी ने आँखों पर पट्टी बाँधकर गन्तव्य तक पहुँचा दिया हो . कैसा रास्ता ,कौनसा मोड़ ,कुछ पता नहीं . धरती से हजार किमी ऊपर चारों ओर सिर्फ शून्य होता है या फिर बादलों की तैरती जमीन अस्थिर आधारहीन बेरंग...रात में तो वह भी नहीं . जबकि ट्रेन में चलते हुए आप कितने ही पहाड़ों नदियों पुल और जंगलों से बातें करते चलते हैं...
भाई सलिल जी (सलिल वर्मा)  ने कह रखा था कि जब भी मैं दिल्ली होकर जाऊँ तो उन्हें अवश्य बताऊँ .मैंने उन्हें बता तो दिया था लेकिन उनसे मिलना बिल्कुल संभव नहीं था .ट्रेन 'निजामुद्दीन' तक ही थी और वहाँ से टैक्सी सीधे एयरपोर्ट जाने वाली थी . बड़े शहरों में इस तरह मिलना आसान भी नहीं होता . खैर..
कोयम्बटूर एक्सप्रेस के स्लीपर कोच में ग्वालियर से दिल्ली तक पाँच घंटे भीषण तपन और लू जैसी हवा के साथ गुजरे . भरे सावन में मौसम की इस बेमुरब्बती पर कुढ़ते हुए मुझे अपनी एक पैंतीस साल पुरानी कविता की कुछ पंक्तियाँ याद आ रही थीं जो सही मायनों में अब चरितार्थ हो रही थीं कि –
"सूरज के आतंक से त्रस्त
सूखा और कुपोषण से ग्रस्त
पेड़-पौधे, फसलें..
सहमी सिकुड़ी नदी तलैया
उस पर बादलों का रवैया
कि किसी नेता की तरह आते हैं
भाषणों सा गरजते हैं
और बिना बरसे ही चले जाते हैं ...."

हाँ फरीदाबाद तक आते आते बादल दिखे और निजामुद्दीन पर उतरते ही ,जबकि जरूरत नहीं थी, बारिश ने घेर लिया .उस पर टैक्सी वालों की हड़ताल का असर . यानी कोढ़ में खाज .
हड़ताल का पता वैसे तो ट्रेन में ही चल गया था . कुछ सहयात्री सलाह भी दे रहे थे कि मैं किसी ट्रेन से नई दिल्ली तक पहुँचूँ वहाँ से मैट्रो द्वारा एयरपोर्ट . लेकिन प्रशान्त ने कहा कि मम्मी चिन्ता की कोई बात नहीं है . टैक्सी बुक होगई है .आप कॉमजॉम होटल तक पहुँच जाएं वहीं टैक्सी मिलेगी . यह कॉमजॉम कहाँ है? दिल्ली मेरे लिये लगभग अपरिचित ही है सो कुली की सहायता ली .उसने सौ रुपए लेकर मुझे निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा दिया .
लेकिन टैक्सी तो यहाँ नहीं है ?” मैंने पूछा तो प्रशान्त ने कहा—“मम्मी आपको बस स्टैण्ड तक ,जो सामने कुछ ही दूरी पर है, जाना होगा .लोग टैक्सी को उधर आने नहीं दे रहे हैं .
मुझे पैदल चलने की खूब आदत है .बस स्टैण्ड सामने दिख भी रहा था लेकिन बारिश में एक बड़ा और एक लैपटॉप बैग लेकर वहाँ तक जाना बहुत मुश्किल था . मैंने फिर एक कुली की सहायता ली . उसने भी बस-स्टैंड तक के सौ रुपए लिये . खैर अब मैं टैक्सी वाले को तलाश रही थी . रिमझिम जारी थी . काफी देर बाद फोन पर उसकी थकी हुई सी आवाज आई – मैडम आप और आगे आ जाइये . गाड़ी पंक्चर है . मैंने जाकर देखा कि किसी ने गाड़ी के दोनों पहियों में कील ठोक दी थी .यानी हड़ताल पूरे यौवन पर थी .
अब क्या करेंगे ?”
देखते हैं मैड़म . नहीं तो आप दूसरे साधन से चली जाइये .
यह क्या बात हुई ? मैं सोच रही थी हालाँकि इसमें टैक्सीवाले का कोई दोष नहीं था .  
यों तो दिल्ली में विवेक ( मँझला बेटा) की ससुराल है . गुड़गाँव में हनी और बंटी भैया है .प्रशान्त और मयंक के कई अच्छे मित्र हैं जो सूचना मिलते ही हाजिर होने वालों में हैं लेकिन उन्हें अचानक आने में निश्चित ही कुछ असुविधा होती फिर सलिल भैया फोन पर लगातार जानकारी ले ही रहे थे. उन्होंने कहा कि दीदी आप किसी तरह सुप्रीम कोर्ट तक आ जाइये .मैंने कहा तो टैक्सी वाला खतरा उठाकर चलने तैयार होगया . उसने मुझे समझा दिया कि अगर कोई रोके तो इसे आप अपनी निजी गाड़ी बताना .
लेकिन कुछ ही दूरी चलने पर पता चला कि टैक्सी के चारों पहिये एकदम पिचके हुए हैं . गाड़ी अब बिल्कुल आगे नहीं जा सकती थी . उस समय मुझे अवश्य ही कुछ विवशता का अनुभव हुआ (चिन्ता नहीं .फ्लाइट 9.40 की थी मेरे पास कम से कम तीन घंटे थे) मुश्किल यह थी कि उस समय तेज बारिश हो रही थी और कोई ऑटो या टैक्सी वाला बात सुनना तो दूर रुकने तक भी तैयार नहीं था .उन्हें रोकने के प्रयास में टैक्सीवाला भीगे जा रहा था . मेरे कपड़े भी कुछ भीग गए थे .सलिल भैया मैट्रो से ऑफिस आते हैं इसलिये उनके पास भी आने का कोई साधन नहीं था कि आकर मुझे ले जाते हालाँकि वे प्रयास कर रहे थे पर ऑटो टैक्सी वाले हड़ताल के लिये पूरी तरह कमर कसे हुए थे .लगभग आधा घंटा यों ही बीत गया . टैक्सी वाला सचमुच बहुत भला था . उसने लगातार प्रयास करके एक टैक्सीवाले को रोक ही लिया . उसने मुझे सरोजिनी हाउस पहुँचा दिया .वहाँ गेट पर ही सलिल भैया प्रतीक्षा में खडे थे . मजे की बात यह कि तब बारिश भी बन्द होगई जैसे फिल्मों में कोई भयानक ,त्रासद या संकट के दृश्य में बारिश बिजली आँधी अँधेरा और न जाने क्या क्या होता है और संकटकाल टलते ही धूप खिल जाती है . पेड़-पौधे झूम उठते हैं वगैरा वगैरा ..जैमिनी फिल्मों की तरह अन्त भले का भला की तरह सब ठीक होगया .

सलिल भैया से मिलकर लगा ही नहीं कि हम पहली बार मिल रहे हैं . यही नहीं उन्होंने ऑफिस में भी बता रखा था कि हमारी दीदी आने वाली हैं . वे जितने सहृदय है उतने ही अच्छे व्यावहारिक भी हैं .उनका रचनाकौशल तो आप सबने देखा ही है .जिसे वे अपना मानते हैं उसका वे बहुत अच्छी तरह ध्यान रखते हैं . उन्होंने भाई चैतन्य आलोक जी को भी बता दिया था सो वे भी आगए . ये दोनों बहुत अच्छे मित्र हैं . दोनों का ही अपनत्त्व मुझे अभिभूत कर गया . यकीन नहीं हो रहा था कि मैं इतनी बड़ी और महत्त्वपूर्ण भी हूँ . या कि ये लोग ही ऐसे हैं जिनके पास देने के लिये केवल आदर और सम्मान है
लगभग शाम के छह बजे सलिल भैया मुझे एयरपोर्ट छोड़ने गए . तब मुझे महसूस हुआ कि संयोग होता है तो रास्ता अपने आप निकल आता है . यह भी कि कुछ लोग रिश्ते मात्र कहने के लिये ही नहीं बनाते उन्हें दिल से निभाते भी है .भाई सलिल उन्ही में से हैं .यह सफर सचमुच एक यादगार सफर रहा .  

रविवार, 1 मई 2016

कुछ ना कुछ तो....

चौराहे पर भीड़ लगी है ,
कुछ ना कुछ तो बात हुई है .

कैसे ये खिड़कियाँ खुली हैं ,
कुछ ना कुछ तो बात हुई है .

सूखा कहीं तबाही भीषण ,
ऐसी तो बरसात हुई है .

उगता सूरज कैसे लिखदूँ ,
दिन में ही जब रात हुई है .

निकली कहाँ ,कहाँ गुम होगई ,
एक नदी जज़बात हुई है .

अपनापन 'अनमोल' होगया ,
मँहगी हर सौगात हुई है .

हार जीत का खेल बनी अ
राजनीति बदजात हुई है .

जो समझा था, धोखा छल था

सच्चाई अब ज्ञात हुई है .

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

तुम बिन माँ !


घर आँगन छत देहरी सूनी,
सूना है मन तुम बिन माँ !
तुम्ही नहीं तो 
क्या घर आँगन !
कैसी वर्षा , कैसा सावन !
बादल भर भर बरस रहे हैं ,
फिर भी धूल उड़ी है आँगन .
कौन पुकारे साँझ सकारे
उजियारे को ,
तुम बिन माँ !

तुम नदिया सी बहते बहते
छोड़ गईं सब कूल किनारे .
हर पल जेठ दुपहरी सा है ,
पाखी उड़ गई पाँख पसारे .
पात लुटा बैठा है बरगद  ,
छाँव कहाँ है तुम बिन माँ .


था अपार विस्तार तुम्हारा ,
छोटी सी मेरी बाँहें .
समा सकीं ना , 
सिर्फ बचीं हैं ,
मेरे अंचल में आहें .
आज खड़ी हूँ पार उतरने ,
टूट गया पुल तुम बिन माँ !
( स्वर्गारोहण 4 अप्रैल 2016)