Tuesday, January 31, 2012

एक पूरी मौत

30 जनवरी की एक कविता

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बापू को किसने मारा
इसका उत्तर उतना ही जाना पहचाना है
जितना कि हमारे देश को मिली आजा़दी का दिन ।
छह दशक बीत चुके कबके
सब जानते हैं कि
गोडसे ने गोली मार कर
मौत दे दी थी बापू को ।
लेकिन बहुत से यह भी मानते होंगे कि
बापू की वह मौत
एक अधूरी मौत थी ।
मार नही सकता कोई
इतनी आसानी से 
बापू  या उन जैसे महामानवों को
नष्ट करके केवल उनका शरीर
बल्कि सच तो यह है कि बलिदान
उन्हें बना देता है अधिक अविस्मरणीय अविनश्वर..।
तब लोगों ने कहा था --
"बापू अमर हैं ।
क्योंकि वे केवल एक व्यक्ति नही
पूरा जीवन दर्शन हैं ।
विचार और चिन्तन हैं ।
वे रहेंगे हमारे बीच हमेशा "
बापू होगए और भी मुखरित ।
देश की माटी के कण-कण में
समागई जैसे उन्ही की छबि सस्मित ।
और सचमुच तब लगा था कि ,
गोडसे ने गोली मार कर
मारा है उन्हें सिर्फ शरीर से ।
शरीर जिसे मिटना ही होता है अन्ततः
लेकिन आज हैरान होता गोडसे भी
कि शेष रहे बापू को दे दी गई है अब
एक पूरी मौत ।
लोग करते हैं उनके नाम पर राजनीति
तलाशते हैं उनके प्रेम-पत्र
उठाते हैं चरित्र पर उँगली ।
उनकी दृढता व निष्ठा पर अविश्वास
करते हैं तर्क--बहस
कि गान्धी ऐसा नही करते तो वैसा नही होता
गान्धी वैसा करते तो ऐसा हो सकता था ।
गले नही उतरते उनके सिद्धान्त
उडाते हैं मखौल
कहते हैं उन्हें 'टकला' 'बुड्ढा'
देते हैं मजबूरी का नाम...
देश के विभाजन का जिम्मेदार ।
अवशेषों के रूप में बची हैं धूल से ढँकी
उनकी तस्वीरें ,प्रतिमाएं
पौंछी जातीं हैं दो अक्टूबर को
चढाए जाते हैं फूल
सिर्फ रस्म निभाने ।
लगाने लेबल 
गान्धीवादी होने का केवल
लेकिन किसी का गान्धीवादी होना भी आज
होगया है सिर्फ स्वार्थपूर्ण आडम्बर ।
क्योंकि गान्धीवाद  
सुख-सुविधाओं की दौड में,
एक मार्ग काँटों कंकडों वाला 
गले न उतर सकने वाला निवाला 
एक अविश्वसनीय सा बुढिया--पुराण
आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा के युग में
सर्वथा अप्रासंगिक ।
बापू को तो मरना ही था,
शरीर से ही नही विचारों से भी 
एक पूरी मौत 

पूरी मौत नही मरते 

तो करते अनशन मन ही मन  
हर अनाचार पर ,
ईमानरहित विचार पर 

नही होपाते बेशुमार घोटाले बेझिझक
कुछ ग्लानि तो जरूर होती 
गला काटने में ।
देश को बाँटने में 
कठिनाई होती थूककर चाटने में। 
निस्संकोच अन्याय करने में ।
सिर्फ अपनी जेबें भरने में
छीन कर जरूरतमन्दों से ।
काले धन्धों से होजाता चैन हराम 
मार दिया गया है अब बापू को
एक पूरी मौत ।

याद किये जाएंगे वे

केवल दो अक्टूबर 
और तीस जनवरी को 
मुस्कराएंगे सिर्फ तस्वीरों और प्रतिमाओं में 
क्योंकि तस्वीरें बोलतीं नही
प्रतिमाएं टोकतीं नही 

बापू अब कभी जीवित नही होंगे 
यदि होंगे भी तो मार दिया जाएगा 
उन्हें फिर से ।

Thursday, January 26, 2012

गज़ल या गीत ?

साखी में गज़ल पर हुई लम्बी बहस को पढने के बाद मैं इतना तो समझ गई हूँ कि गज़ल लिखना आसान काम नही है इसलिये इन रचनाओं को गज़ल कहने साहस नही कर सकती । आप इन्हें किसी विधा में रखे बिना ही पढें ।
(1)
जाने क्यूँ वीराना ही
अब सच्चा लगता है
खूब पकाया , धीरज का घट
कच्चा लगता है ।
बडे , अनुभवी कहलाते थे ,
जब थे गाँवों में ।
शहर में आकर हर अनुभव
एक बच्चा लगता है ।
जाने कैसी दूरी लाती
नजदीकी उनकी
इससे तो यादों में रोना
अच्छा लगता है ।
किया किसी ने छल हमसे
विश्वास नही होता
खुद ही दिल के हाथों
खाया गच्चा , लगता है
(2)
मौसम बदल रहा है हर शाम क्या करें !
उपवन उजड रहा है सरेआम क्या करें !
है कौन किसके आगे यह जंग सी छिडी है !
हरसूँ सुनाई देता कोहराम क्या करें !
बैठे रहे वो अब तक हाथों पे हाथ रख कर !
अब रोपते हथेली पे आम ,क्या करें !
कारण कोई न समझे तह तक कोई न जाए !
सब देखते हैं केवल अंजाम क्या करें !
वोटों की भीख माँगी कितने करार करके
भूले जो जीत कर वो आवाम क्या करे !
निर्माण में भवन के बस एक ईंट रख कर
अखबार में छपाते वो नाम क्या करें !
काँधों पे जिनके सदियों से यह जमीं टिकी है,
वे ही सदा रहे हैं गुमनाम क्या करें !
(3)
खबरों के लिये जुर्म कुछ संगीन चाहिये ।
हलचल मचाने वाले कुछ 'सीन' चाहिये ।
अन्दर भले लिखा हो काला -सफेद कुछ भी ,
पर आवरण सभी को रंगीन चाहिये ।
मतभेद और विभाजन हम में रहा सदा से
हाँ एकता को पाक या फिर चीन चाहिये ।
चलते रहे हैं लेकर वो साथ में हमें भी
मीठे के साथ कुछ तो नमकीन चाहिये ।
सुख कर रहे हैं अपनों को आदमी से दूर
लाने करीब माहौल गमगीन चाहिये ।
तिकडम से कामयाबी मिलती है चन्द दिन ही
कुछ कर दिखाने ईमानो-दीन चाहिये ।



Saturday, January 21, 2012

'आर्ट ऑफ लिविंग'

खण्डवा से हमारे कोच में एक साथ बहुत से लोग आगए । बहुत खास से लगने वाले लोग । अगर मौसी, बुआ, ताऊ ,चाचा, जीजा ,साले मामा, भांजे ,पास-पडौसी आदि से मिल कर परिवार बने वे सब एक ही परिवार के थे । मैंने उन्हें खास इसलिये नही कहा कि वे द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित कोच में ऐसे आए थे जैसे यह उनका घर--आँगन हो । या कि वे सब काफी धनी वर्ग के थे बल्कि मैंने उन्हें खास इसलिये कहा कि वे सब अतिरिक्त रूप से विनम्र और सभ्य लग रहे थे । खाससौर एक लम्बे बालों वाले सज्जन जो जींस और कुरता पहने थे । उम्र भले ही पैंतीस-चालीस की होगी पर चेहरे पर सत्तर साल वाला अनुभव दमक रहा था । कद जैसा लम्बा था ,मुस्कान वैसी ही चौडी थी एकदम अभ्यस्त । सुविधा के लिये उन्हें क कहसकते हैं । अपनी ही सीट को खाली करवाने के लिये भी वे हाथ जोडकर निवेदन कर रहे थे --"भैयाजी !..

.अंकलजी !..बहनजी...आप जरा कष्ट करेंगी ..यह सीट हमारी है । हालाँकि वे इतना जोर न भी देते तो भी लोग अपने आप ही हटने वाले थे । एक सज्जन अड गए--

"भाई साहब यह सीट तो हमारी है ।"

"ना ..ना भैया जी--वे सज्जन मुस्कान को और गहरी करते हुए बोले-- "हमने सीट दिल्ली से करवाई है 'पर' सीट हजार रुपए ऐक्स्ट्रा खर्च करके..। क्या आपको कोपरगाँव जाना है ? लेकिन भैयाजी आपकी सीट यही तक कन्फर्म थी । अब यह हमारी है । क्या आपने भी सीट के लिये अतिरिक्त पैसा दिया ? तो इसकी शिकायत टी.सी. से करें ..। हमें तो हमारी सीट चाहिये । है कि नही ?"

बातों-बातों में पता चला कि वे लोग बैंगलोर जा रहे हैं । एक साथ जा रहे पूरे सत्तर लोग हैं । जो दो-तीन बोगियों में बैठे हैं । शायद कोई शादी-समारोह होगा --इस अनुमान का खण्डन उन्ही में से एक महिला ने सगर्व किया--"गुरुदेव का शिविर है ..आर्ट ऑफ लिविंग के बारे में तो आपने सुना ही होगा । क्या..?? नही सुना ??..अरे..!1"----वह मेरी ओर चकित होकर देखने लगी ।

श्री श्री रविशंकर जी महाराज । वे तो बल्ड फेमस हैं । आप क्या टी.वी. नही देखती या समाचार नही पढतीं ।

मुझे अपनी अल्पज्ञता पर प्रायः अफसोस करना पडता है तब भी करना पडा । वह आगे कहने लगीं---"आप उनका एक कैम्प अटैण्ड करके तो देखिये । कैसे सारी प्राब्लम्स हल होजातीं हैं । कैसे आप एक स्माइल से ही हर मुश्किल को आसान बना सकते हैं । हम तो उनका हर कैंम्प अटैण्ड करते हैं चाहे कहीं भी हो ।"

मैं उनकी बातें दिलचस्पी के साथ सुनती रही । मेरी नानी कहतीं थीं कि जहाँ ज्ञान की दो बातें मिलें जरूर सुननी चाहिये । मेरी जगह कोई बुद्धिजीवी होता तो जरूर कहता कि एक स्माइल से समस्याएं हल करने का गुर चार-पाँच हजार रुपए खर्च करके एक मध्यवर्गीय व्यक्ति तो सीखने से रहा ( निम्न वर्ग तो है किस खेत की मूली ) वैसे भी अभावों व कठिनाइयों से जूझते लोगों की समझ आने वाला हुनर यह है ही नही । हो तब भी उनके पास इतना समय भी नही होता कि आधारभूत समस्याओं से ( जो महज एक स्माइल से हल नही होतीं ,उसके लिये खून-पसीना बहाना पडता है) ऊपर जाकर आर्ट ऑफ लिविंग के बारे में सोचें भी । वगैरा-वगैरा...।

मुझमें ऐसी तर्क-शक्ति नही । मैं मान लेती हूँ कि लाखों अनुयायी जिस राह पर चल रहे हैं उसमें कोई तो बात है । मैं अनभिज्ञ हूँ तो क्या । लेकिन अपने गुरुदेव के सूत्रों का उपयोग उनके अनुयायी किस रूप में करते हैं यह जानना भी कम रोचक नही है ।

हुआ यों कि हमारे सामने वाली सीट पर एक निहायत ही सीधे-सच्चे पति-पत्नी बैठे थे ।दिल्ली से हिन्दूपुर जा रहे थे । उनकी दो सीटें दूसरी जगह थीं जिन पर उनके दो रिश्तेदार थे । क महाशय को जब इसका पता चला तो वे आकर बडी सरस व आत्मीय मुस्कान के साथ निवेदन करने लगे---"भैयाजी , आपकी बडी मेहरबानी होगी अगर आप पिछले कम्पार्टमेंट में हमारी सीटों पर चले जाएं ..। क्या है कि आपको अपने रिलेटिव्स के साथ बैठने मिल जाएगा और हमारे दो लोग उधर से इधर हमारे साथ आजाएंगे । ..नही..नही ..आपको कोई दिक्कत न हो तो..।"

दिल्ली वाले वे सज्जन जो दूसरों को सुविधा देने के भाववश पहले ही काफी देर तक अपनी सीट से विस्थापित रह चुके थे ,कुछ हिचकिचाए तो क ने उन्हें हौसला देते हुए कहा --"भाई साहब आप चिन्ता न करें वहाँ हमारी दो सीटें हैं आपके लिये और यहाँ हम आपकी सीटों पर ऐडजस्ट हो जाएंगे । एक दूसरे की सुविधाओं का खयाल रखना भी गुरुदेव की शिक्षा का एक रूप है । जय गुरुदेव ।"

तब दिल्ली वाले सज्जन अपना सामान लेकर बच्चों के पास चले गए । उनकी सीटों पर दो महिलाएं आ जमीं ।लेकिन कुछ ही देर बाद वे उदास चेहरा लिए वापस आए---

"भाई साहब आप तो कह रहे थे कि वहाँ आपकी दो सीटें हैं पर वहाँ तो अहमदनगर जाने वाले दो लोग बैठे हैं ।"

"अरे तो अहमदनगर है ही कितनी दूर भैयाजी ! बस दो घंटे का ही तो रास्ता है । आप तो परेशान होगए ।" '' महाशय बडप्पन और गरिमा के साथ बोले ।

बात यह नही ,लेकिन आपने हमसे झूठ क्यों बोला कि आपकी सीटें हैं । इससे तो अच्छा है कि हम अपनी ही सीट पर बैठें । दिल्ली वाले सज्जन ने असहाय सी नजर अपनी छिनी हुई सीट पर डाली जहाँ दो महिलाएं आसनगत थीं और खाने के लिये पूडियाँ ,अचार व मठरियाँ निकाल चुकीं थीं ।

मुझसे नही रहा गया । कहा कि भाई ,आप उन्हें या तो सीट दिलाएं या फिर उन्हें उनकी सीट पर बैठने दें ।

ऐसे बीच में बोलना नाहक माना जाता है । पूरी सम्भावना थी कि क महोदय मुझे बीच में न बोलने की हिदायत देते हुए अपना विरोध दर्ज कराते लेकिन वे निहायत ही शराफत से बोले--"जी ..जरूर ,यह तो हमारा फर्ज़ है । आइये भाई साहब । आइये । अरे आप तो खामखां परेशान होगए !"

अहमदनगर जाने वालों से पता नही क्या कुछ कहकर उन्हें सीट पर बिठाकर क इधर आए और बैठ कर पहले कोई मंत्र-जाप किया ,फिर खाना खाने लगे । कुछ ही देर बाद मैंने देखा कि दिल्ली वाले सज्जन ठगे से गेट पर खडे थे । अपनी जगह खोकर । उन्हें आर्ट ऑफ लिविंग जो नहीं आती थी जिन्हें आती थी वे आराम से अपनी जगह सुरक्षित कर चुके थे ।

इधर उसी ग्रुप की दो महिलाएं जिनमें '' युवा ,छरहरी और चुस्त थी तथा '' अधेड, स्थूल और मोटापे से ग्रस्त थी, एक अलग समस्या से उलझीं थीं जिसमें कथित स्माइल नाकाम सिद्ध हो रही थी ।

थोडी देर पहले तक वे भजनों और सत्संग वाणी के भाव-सागर में आकण्ठ निमग्न थीं । गुरुदेव की महिमा गाते-गाते थक नहीं रहीं थीं । गुरुदेव की कृपा से सहज-समाधि उनके लिये खेल बन चुकी है । अब उन्हें कोई प्राब्लम हर्ट नही करती । एक स्माइल ही सारे फसादों को मिटा देती है यह गुरुदेव की महिमा का प्रभाव है वगैरा..वगैरा ।

"आप भी आइये न । बैंगलोर में उनका बहुत बडा भव्य आश्रम है ।"

"सोचूँगी"--मैंने कहा । मैं किसी की आलोचना नही करती । अविश्वास भी नही करती लेकिन किसी के मार्ग का अनुशरण करने लायक भी अपने-आपको नही पाती ।

"अरे सोचना क्या ! आपकी जो भी चिन्ता या समस्या हो ,हर समस्या ,हर व्यथा गुरुदेव के दर्शनों से ही दूर हो जाएगी ।"

मेरी व्यथा-वेदना क्या है, वह किसके दर्शनों से दूर होगी । वेदना के मूल में क्या है उसे मैं अच्छी तरह जानती हूँ । फिर मैं समाधान अन्यत्र क्यों खोजूँ ---मैं कहना चाहती थी पर नही कहा । और कुछ ही देर में मैंने उन्हें आपस में उलझते हुए पाया-

"सुनो बेटा, तुम्हारी सीट कौनसी है ?"

"लोअर । क्यों आंटी ?"

अरे मेरी अपर-बर्थ है । मुझे जरा प्राब्लम है । घुटनों में दर्द है । चढने में परेशानी होती है ।--यह कह कर आंटी ने स को आशापूर्ण होकर देखा । पर बात को प्रभावहीन पाकर वह समझ गई कि स साहित्य के 'ध्वनि-सिद्धान्त' से जरा भी परिचित नही है । इसलिये सीधे ही प्रस्ताव रखना पडा---"बेटा ऐसा करलें कि तुम ऊपर वाली सीट पर सोजाओ । यंगेज हो ,आराम से चढ जाओगी..। और मैं ...।"

"अरे नही आंटी ! मेरी भी कमर में दर्द है। मैंने तो उनसे खास तौर पर कह कर लोअर-बर्थ रिजर्व करवाई है..।"

"सफर में तो एक दूसरे की हैल्प करते हैं गुरुदेव ही तो कहते हैं कि...। थोडा तो ऐडजस्ट कर लिया जाता है ..।"

"ऐसा थोडी होता है आंटी ! आप भी दूसरों की परेशानी देखिये न !"--स तपाक से बोली ।

आंटी असहाय सी उसे देखती रह गई । यह भी एक तरह की आर्ट ऑफ लिविंग ही तो थी ।

Thursday, January 12, 2012

दो बाईयन की वार्ता

"नए साल की राम-राम ।"

"राम-राम 'भैन' , इधर कहाँ जाती है काम करने ?"

"गान्धीनगर में ।"

"तब तो खूब बढिया काम मिल गया है तुझे । कितने घर कमा रही है ?"

"यही कोई चार-पाँच घर हैं ।"
"
वहाँ तो बडे-बडे लोग रहते हैं ।पगार भी अच्छी होगी । एक घर से हजार--आठ सौ से क्या कम मिलता होगा ।"

"हओ ,काम भी तो खूब होता है । संझा--सुबेरे दोनों टैम तो पूरे घर में पौंछा लगता है । गली तक धुलाई होती है । कुकर कढाई परात भगौनी..सबके के चार-चार जोड पडे हैं ।गिलास कटोरियों का पार नही है सो जरूरत का बरतती जाती हैं और माँजने को पटकतीं जाती हैं । सबेरे जब पौंहचती हूँ तब अंबार लगा होता है बासनों का । यों भी नही कि पानी डालदें । सूख जाते हैं । जरा कहो तो कहतीं हैं अरे बाई इतना टाइम होता तो तुम्हें काहे लगाते । उनसे पूछे कोई कि टीवी देखने को टैम कहाँ से आता है । एक चम्मच के लिये भी बैठे रहते हैं कि बाई आएगी तभी धोएगी ।"

"अब काम तो सब जगह होता है कही कम तो कही ज्यादा पर पगार के संग खाना-कपडा भी अच्छा ही मिलता होगा ।"

"हाँ...सो तो है पर बहना एक बात तो है ,बडे लोगों के नाम बडे दरसन छोटे होते हैं । एक अरोरा मैडम हैं । साब तो बाहर रहते हैं । पर घर में किसी चीज की कमी नही । दो दो कारें खडीं हैं पर पैसे देने में नम्बर एक की कंजूस है । सबजी वाले से एक-एक रुपए के पीछे झिकझिक करतीं रहती हैं । सास को 'काग-बिडान्नी' करके रक्खा है । उसका पैसा तो सारा का सारा अपने 'अण्डर' में कर लिया है । और चाय तक कप गिन-गिन कर देती है । बाहर जाती है तो दूध अखबार सब बन्द कर जाती है । बिचारी बूढी मुझसे कहती है -री इमित्ती बगल से अखबार ले आना जरा.। बूढी अम्मा को अखबार पढे बिना चैन नही मिलता । भगवान ऐसे बडे आदमी होने का क्या फायदा .."

"पर तुझे तो फायदा है न । तुझे तो कोई कमी नही रखती ।"

"रख कैसे लेगी । जरा भी कसर दिखती है या जादा रौब झाडती है तो कह देती हूँ कि कल से नही आऊंगी कोई और बाई तलास लो .."

"ए बाबरी होगई है । ऐसे काम छूट जाय तो ?"

"नही री ,मेरे बिना उनका एक दिन भारी पड जाता है । एक टैम भी नही आती तो दस फोन होजाते हैं मेरे घर । मुझसे बिगाड कर अपना नुक्सान थोडी कराएगी । समझ ले कि उनके घरों में मेरे बिना चाय तक नही बन पाती । खाने का तो औडर ही करना पडता है । चल ..मेरी छोड अब अपनी बता तू कहाँ काम करती है ?"

"मैं तो एक मौहल्ला के पाँच--छह घरों में जाती हूँ । वहाँ तेरी जैसी कमाई नही है । तू तो जानती है मौहल्ला में पुराने बासिन्दे रहते हैं । छुट्टी करने पर भी कोई ऐसा गजब नही होता । काम छोडने की धौंस चल नही सकती । अगर ऐसी कोसिस करी भी तो तुरन्त सुनने मिल जाएगा ---देख रतिया काम तू नही करेगी तो यह मत समझना कि काम होगा नही हमारे हाथ-पाँव गल नही गए । सो भैन हमें तो ऐसे घरों में काम चइये जहाँ बाई के बिना काम ठप्प होजाए । मुझे भी तू अपने जैसे घर दिलवा दे कही ।"

"काम बहुत करना होगा सोचले ।"

"कर लूँगी ।"

"छुट्टी नही कर पाएगी ।"

"न कर पाऊँ..। पर धौंस तो रहेगी ..।"

"ठीक है सोचूंगी । अच्छा राम-राम !"

"राम--राम ।"