बड़े हुए तो जिन्दगी
ने कड़वे-तीखे अनुभव कराए , हँसाया ,रुलाया और डराया भी पर कुछ स्नेहमय हाथ थे जिन्होंने थाम लिया , गले लगाकर सम्बल दिया . तब से पता ही न चला कि कितना पानी बह गया नदियों में . कितने वसन्त पतझड़
गुजर गए ...आज मैं मुड़कर देख रही हूँ तो लगता है ,मैं एक उजाड़ में खड़ी हूँ जहाँ
अब किसी पेड़ की छाँव नहीं बची . समय के ठेकेदार ने घर आँगन में खड़े पाँच के
पाँचौ सघन वृक्ष काट डाले हैं . चारों ओर वैशाख जेठ की धूप है . पीहर की देहरी आज कितनी सूनी और उदास है....
बड़े ताऊजी ,काकाजी
(पिताजी), छोटे ताऊजी ,जिया ( माँ ) और अब
....बड़ी जिया भी चली गईं .एक पीढ़ी जो एक सुनहरा वर्त्तमान थी , अब अतीत हो गई है
. जीते-जागते लोगों का यों इतिहास में बदल जाना कितनी असहनीय सी घटना है हालाँकि
वह अनिवार्य है . हम जीवन के अन्त को रोक नहीं सकते , रोज देख भी रहे हैं
जिन्दगियों को जाते हुए पर अपनों का जाना कितना विशिष्ट और पीड़ादायक होता है .
ज्ञानी कहते हैं कि मोह दुख का कारण है .पर मुझे आत्मज्ञान नही हुआ .मैं अभी तक अनुराग
और मोह से ग्रस्त हूँ . रक्त और स्नेह के सम्बन्ध की जड़ें बहुत गहरी होतीं हैं
,जब पेड़ उखड़ता है तो उतना ही गहरा गड्ढा बनता है जिसे भरने के लिये जाने कितनी
बारिशों की दरकार होती है . बचपन
लम्बा कद ,गोरा रंग
,अनुभवों की चमक लिये भोली सी आँखें और विशाल हृदय वाली स्नेहमयी बड़ी जिया , जिया (
मेरी माँ ) से लगभग छह सात वर्ष बड़ी थीं . दोनों बहिनों में अटूट स्नेह था पर
सहोदरा होकर भी अनेक बातों में दोनों अलग थीं . माँ जहाँ साहित्य धर्म ,पौराणिक
कथाओं , परमार्थ ,समाज सेवा आदि से प्रेरित थीं ,वैसा ही उनका जीवन था .जिन्दगी की
शुरुआत ही अनेक दायित्त्वों और चुनौतियों से हुई थी . अस्त्र-शस्त्र विहीन योद्धा
की तरह वे मुश्किलों से लड़तीं रहीं . आराम से बैठकर सोचने समझने की अनुमति उन्हें
जिन्दगी ने कभी दी ही नही . माँ से हमें आदर्शों से परिपूर्ण जीवन-दिशा व संस्कार
मिले वहीं बड़ी जिया से स्नेह और नियंत्रण-मुक्त बचपन की अनुभूति, जिसे हर बच्चा
चाहता है . वे बच्चों को ज्यादा रोकतीं टोकतीं नहीं थीं . हम जो भी करना चाहते वे
कहतीं ठीक है पर ध्यान रखना कहीं चोट
न लगा लेना .प्यार और संरक्षण बचपन के लिये ठोस जमीन तैयार करता है जो बड़ी जिया ने हम सबको बखूबी दिया. मैंने कभी उन्हें नाराज होते नहीं देखा . ज्यादा से ज्यादा आँखों में ,वह भी पल भर में मुस्कान का रूप ले लेता था .
बड़ी जिया बीस साल पहले |
बड़ी जिया एक अच्छी
गृहणी थीं . उनकी सीमा रेखा बच्चे घर-परिवार की व्यवस्था ही थी . जब लक्ष्य और
सीमाएं छोटी होती हैं तो प्राप्ति सरल और व्यवस्था सुचारु होती है .एक ओर बहुमुखी प्रतिभा की स्वामिनी दादी का
कठोर अनुशासन और दूसरी ओर धीर गंभीर ताऊजी का स्नेहमय और दायित्त्वपूर्ण संरक्षण . इसलिये उन्हें
जीवन को समझने का पर्याप्त समय मिला .स्नेह और अनुशासन में ढली बारह
साल की बालिका-वधू से लेकर 86-87 वर्ष की कुल मिलाकर दर्जन भर नन्हे मुन्नों की परदादी
और परनानी बड़ी जिया ने जीवन के सभी रंग देखे . जीवन के यथार्थ को अपनेपन के साथ जिया .काफी कुछ सीखा .
उनके हाथों में गजब
की कला थी .कला चाहे रसोई की हो या कसीदाकारी और चौक पूरने की हो, उनका कोई जबाब
नहीं था . उनके हाथों के बने तमाम तरह के अचार ,पापड़, दही बड़े ,जलेबी आज भी
कहावत की तरह इस्तेमाल होते हैं . उनके हाथों की बुने आसन दरी ,चटाइयाँ ,पंखे
,कागज की टोकरियाँ हस्तकला का बेहतरीन नमूना हैं . सफेद खद्दर की सस्ती साड़ी को
भी रँगकर लेस या बूटों से सज्जित कर इतनी सुन्दर बनाकर पहनतीं थीं कि कीमती
साड़ियाँ शर्मिन्दा हो जाएं . 2006 तक (
ताऊजी के रहते ) कभी न उनकी ऐड़ियों से महावर छूटा न हाथों की मेहदी .उन दिनों की उनकी बड़ी बड़ी झुमकियाँ, पाजेब ,लाख के नग जड़े कंगन सब मुझे आज भी किसी खूबसूरत दृश्य की तरह याद हैं .
माँ की तरह ही प्यारी बड़ी जिया के साथ रहने का मुझे बहुत कम समय मिला पर जितना भी मिला उसकी अनुभूति आज भी सुहानी ताजी हवा की तरह यादों के गलियारे से गुजर जाती है .
माँ की तरह ही प्यारी बड़ी जिया के साथ रहने का मुझे बहुत कम समय मिला पर जितना भी मिला उसकी अनुभूति आज भी सुहानी ताजी हवा की तरह यादों के गलियारे से गुजर जाती है .
समझदार लोग कहते
हैं कि वर्त्तमान में जिओ अतीत को मत देखो और भविष्य को मत सोचो लेकिन अतीत के
बिना वर्त्तमान अधूरा है और भविष्य अँधेरे में . अतीत और वर्त्तमान ही भविष्य तय
करते हैं . अतीत में जीते रहना निस्सन्देह ठीक नहीं लेकिन उसे भूलकर जीना यथार्थ से पलायन करना है . अपनी
जड़ों को नकार कर जीना है . बिना जड़ के कोई वृक्ष भला कितना हराभरा और स्थिर रह
सकता है . बचपन की जमीन वृक्ष को पोषण और संरक्षण देती है .
बड़ी जिया महाप्रयाण से एक माह पहले |
अब वे सब कुछ केवल सजल यादों के रूप में हैं लेकिन अनवरत पढ़े जाने वाले एक पाठ की तरह ,जो जीवन की तमाम परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के लिये अनिवार्य है , एक एलबम की तरह , एक सन्दूक जैसी जिसमें बहुत सारी बहुमूल्य वस्तुएं संजो रखी हों . और अब चारा ही क्या है .
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आपने अत्यंत ही स्नेह और आदर के साथ लिखा है यह मार्मिक संस्मरण ! बड़ी जिया को सादर श्रद्धांजलि !
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18-06-2019) को "बरसे न बदरा" (चर्चा अंक- 3370) पर भी होगी।
जवाब देंहटाएं--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
आभार आदरणीय शास्त्री जी
हटाएंबहुत सुन्दर संसरण, पढ़ कर अपनी एक कविता याद आ गयी. आपसे लिंक साझा कर रहा हूँ.
जवाब देंहटाएंकहते जहाँ इतिहास नहीं है
जीवन का उल्लास नहीं है
जहाँ भूत की रास नहीं है
वर्त्तमान की फाँस वही है
रथ कुपथ! पथिक हो लथपथ
जीवन शकट सड़क को खोता
काश! अतीत मेरा भी होता
https://vishwamohanuwaach.blogspot.com/2014/12/blog-post.html
कितना अपनापन है इस रिश्ते में जो आगे की पीढ़ियों के लिए सपना ही हो जाने वाला है...
जवाब देंहटाएंनमन आपकी जिया को !
ब्लॉग बुलेटिन की दिनांक 17/06/2019 की बुलेटिन, " नाम में क्या रखा है - ब्लॉग बुलेटिन“ , में आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
जवाब देंहटाएंसजल यादों के वे सहारे....
जवाब देंहटाएंबहुत ही खूबसूरत जिन्दगी के लम्हों का बेहतरीन उत्कीर्णन किया है आपने।
क्यूँ न दोबारा यही जिन्दगी जीने की चाहत हो।
बहुत-बहुत शुभकामनाएँ ।
कितनों को याद करके आपने जीवन को पुनः जी लिया है जैसे ...
जवाब देंहटाएंये सच है की पीढ़ी जब बदलती है तो एक साथ कितना कुछ होता चला जाता है ... हम उम्र लोग ही होते हैं जो मिल के पीढ़ी बनाते हैं और उन सब का जुड़ाव एक भरपूर जीवन जो देखते देल्हते ही असल जीवन से यादों में समा जाता है ...
यादों में लौटाती हुयी पाती है आपकी पोस्ट ... दिल को छूती हुयी ...
अपनेपन,प्यार,आदर एवं महकती यादों का अपूर्व वृत्तांत है गिरिजा जी आपके इस संस्मरण में ! बड़ी जिया की पुनीत यादों को सादर नमन ! इस संसार से वे भले ही चली गयी हों लेकिन आपके अंतस्तल में वे सदैव जीवित रहेंगी एक सघन कल्पवृक्ष की तरह जो कभी नहीं मुरझाता ! अत्यंत भावपूर्ण एवं हृदयस्पर्शी !
जवाब देंहटाएंआप सबका बहुत आभार
जवाब देंहटाएंप्रिय बहिन लेख में जो तुम्हें महारथ हांसिल है वो अपने परिवार व सगे सम्वंधियों में किसी पर नहीं गद्य हो या पद्य उसमें प्राण फूंकना कोई तुमसे सीखे भावुकता व गद्य पद्य द्वारा हृदय मेंअपनास्थान आरक्षित करना मन को आकर्षित करना,साहित्यिक शब्दों को सुंदर ढंग से संकलित करने की विशेष कला की तुम बहुत समय से उपासक व धारक रही हो दोनों मां ओं की स्मृति को कितने अच्छे ढंग से हकीकत को पेश किया है कि में आंसुओं को रोक पाने में असमर्थ होगया हमेशा प्रगति पथगामी रहो यही प्रभु से प्रार्थना 🌹🌹🙏
जवाब देंहटाएंबहुत आभार भैया यहाँ आने का और अपनी प्रतिक्रिया देने का . संवेदना और अनुभूतियों में मैं तुम्हारी तरह ही तो हूँ .
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