शनिवार, 21 जनवरी 2012

'आर्ट ऑफ लिविंग'--एक यात्रा प्रसंग .

बैंगलोर आते-जाते रहने के कारण कर्नाटक ऐक्सप्रेस से एक रिश्ता सा बन गया है . हर बार यात्रा में कोई न कोई यादगार अनुभव होता ही है . इस बार भी ऐसा ही हुआ . 
खण्डवा से हमारे कोच में एक साथ बहुत से लोग आगए । बहुत खास से लगने वाले लोग । अगर मौसी, बुआ, ताऊ ,चाचा, जीजा ,साले मामा, भांजे ,पास-पडौसी आदि से मिल कर परिवार बने वे सब एक ही परिवार के थे । मैंने उन्हें खास इसलिये नही़ कहा कि वे द्वितीय श्रेणी के वातानुकूलित कोच में ऐसे आए थे जैसे यह उनका घर--आँगन हो । या कि वे सब काफी धनी वर्ग के थे बल्कि मैंने उन्हें खास इसलिये कहा कि वे सब अतिरिक्त रूप से विनम्र और सभ्य लग रहे थे । खाससौर एक लम्बे बालों वाले सज्जन जो जींस और कुरता पहने थे । उम्र भले ही पैंतीस-चालीस की होगी पर चेहरे पर सत्तर साल वाला अनुभव दमक रहा था । कद जैसा लम्बा था ,मुस्कान वैसी ही चौडी थी एकदम अभ्यस्त । सुविधा के लिये उन्हें क कहसकते हैं । अपनी ही सीट को खाली करवाने के लिये भी वे हाथ जोडकर निवेदन कर रहे थे --"भैयाजी !..
.अंकलजी !..बहनजी...आप जरा कष्ट करेंगी ..यह सीट हमारी है । हालाँकि वे इतना जोर न भी देते तो भी लोग अपने आप ही हटने वाले थे । एक सज्जन अड़ गए--
"भाई साहब यह सीट तो हमारी है ।"
"ना ..ना भैया जी--वे सज्जन मुस्कान को और गहरी करते हुए बोले-- "हमने सीट दिल्ली से करवाई है 'पर' सीट हजार रुपए ऐक्स्ट्रा खर्च करके..। क्या...आपको कोपरगाँव जाना है ? लेकिन भैयाजी आपकी सीट यही तक कन्फर्म थी । अब यह हमारी है । क्या...? आपने भी सीट के लिये अतिरिक्त पैसा दिया ? तो इसकी शिकायत टी.सी. से करें ..। हमें तो हमारी सीट चाहिये । है कि नही ?"
बातों-बातों में पता चला कि वे भी लोग बैंगलोर जा रहे हैं । एक साथ जा रहे पूरे सत्तर लोग हैं । जो दो-तीन बोगियों में बैठे हैं । शायद कोई शादी-समारोह होगा --इस अनुमान का खण्डन उन्ही में से एक महिला ने सगर्व किया--"गुरुदेव का शिविर है ..आर्ट ऑफ लिविंग के बारे में तो आपने सुना ही होगा । क्या..?? नही सुना ??..अरे..!1"----वह मेरी ओर चकित होकर देखने लगी ।
"श्री श्री रविशंकर जी महाराज के बारे में नहीं सुना ? वे तो 'बल्ड' फेमस हैं । आप क्या टी.वी. नही देखती ? समाचार नही पढतीं ?"
मुझे अपनी अल्पज्ञता पर प्रायः अफसोस करना पडता है तब भी करना पड़ा । वह आगे कहने लगीं---"आप उनका एक कैम्प अटैण्ड करके तो देखिये ! कैसे सारी प्राब्लम्स हल होजातीं हैं । कैसे आप एक स्माइल से ही हर मुश्किल को आसान बना सकते हैं । हम तो उनका हर कैंम्प अटैण्ड करते हैं चाहे कहीं भी हो ।"
मैं उनकी बातें दिलचस्पी के साथ सुनती रही । मेरी नानी कहतीं थीं कि जहाँ ज्ञान की दो बातें मिलें जरूर सुननी चाहिये । मेरी जगह कोई बुद्धिजीवी होता तो बीच सड़क पर कितने ही गतिरोधक खड़े कर देता कि क्या कहा ? एक स्माइल से समस्याओं का हल ? कि अभावों व कठिनाइयों से जूझते लोगों की समस्याएं हल हो सकेंगी एक स्माइल से ? और क्या आम आदमी के पास इतना समय होता है कि आधारभूत समस्याओं से ,जो एक स्माइल से नही ,उसके लिये खून-पसीना बहाने से, उद्यम से हल होतीं हैं ,  , ऊपर जाकर आर्ट ऑफ लिविंग के बारे में सोचें भी.....  वगैरा-वगैरा...।
मुझमें ऐसी तर्क-शक्ति नही । मैं मान लेती हूँ कि लाखों अनुयायी जिस राह पर चल रहे हैं उसमें कोई तो बात है । मैं अभी तक अनभिज्ञ हूँ तो क्या हुआ ,अब बहुत कुछ जान सकूँगी । लेकिन बैंगलोर तक की यात्रा में मैंने विस्मय के साथ देखा कि अपने गुरुदेव के सूत्रों का उपयोग उनके अनुयायी किस रूप में करते हैं .
हमारे सामने वाली सीट पर एक निहायत ही सीधे-सच्चे पति-पत्नी बैठे थे । दिल्ली से हिन्दूपुर जा रहे थे । उनकी दो सीटें दूसरी जगह थीं जिन पर उनके परिवार के दो बच्चे थे । क महाशय को जब इसका पता चला तो वे आकर बड़ी सरस व आत्मीय मुस्कान के साथ निवेदन करने लगे---"भैयाजी , आपकी बड़ी मेहरबानी होगी अगर आप पिछले कम्पार्टमेंट में जहाँ आपके रिलेटिव्स भी हैं, हमारी सीटों पर चले जाएं ..। क्या है कि आपको अपने रिलेटिव्स के साथ बैठने मिल जाएगा और हमारे दो लोग उधर से इधर हमारे साथ आजाएंगे । ..नही..नही ..आपको कोई दिक्कत न हो तो..।"
दिल्ली वाले वे सज्जन जो दूसरों को सुविधा देने के भाववश पहले ही काफी देर तक अपनी सीट से विस्थापित रह चुके थे ,कुछ हिचकिचाए तो क ने उन्हें हौसला देते हुए कहा --"भाई साहब आप चिन्ता न करें वहाँ हमारी दो सीटें हैं आपके लिये और यहाँ हम आपकी सीटों पर ऐडजस्ट हो जाएंगे । एक दूसरे की सुविधाओं का खयाल रखना भी गुरुदेव की शिक्षा का एक रूप है । जय गुरुदेव ।"
तब दिल्ली वाले सज्जन अपना सामान लेकर बच्चों के पास चले गए । उनकी सीटों पर दो महिलाएं आ जमीं ।लेकिन कुछ ही देर बाद वे उदास चेहरा लिए वापस आए---
"भाई साहब आप तो कह रहे थे कि वहाँ आपकी दो सीटें हैं पर वहाँ तो अहमदनगर जाने वाले दो लोग बैठे हैं ।"
"अरे तो अहमदनगर है ही कितनी दूर भैयाजी ! बस दो घंटे का ही तो रास्ता है । आप तो परेशान होगए ।" '' महाशय बडप्पन और गरिमा के साथ बोले ।
"बात यह नही ,लेकिन आपने हमसे झूठ क्यों बोला कि आपकी सीटें हैं । इससे तो अच्छा है कि हम अपनी ही सीट पर बैठें ." दिल्ली वाले सज्जन ने असहाय सी नजर अपनी छिनी हुई सीट पर डाली जहाँ दो महिलाएं आसनगत थीं और खाने के लिये पूडियाँ ,अचार व मठरियाँ निकाल चुकीं थीं । वे पति-पत्नी कुछ देर असहाय से खड़े उनके हटने का इन्तजार करने लगे . पर उन्होंने उस दम्पत्ति को पूरी तरह अनदेखा कर दिया .
मुझसे नही रहा गया . कहा कि ,'भाई ,आप उन्हें या तो सीट दिलाएं या फिर उन्हें उनकी सीट पर बैठने दें .'
ऐसे बीच में बोलना नाहक माना जाता है । पूरी सम्भावना थी कि क महोदय मुझे बीच में न बोलने की हिदायत देते हुए अपना विरोध दर्ज कराते लेकिन वे निहायत ही शराफत से बोले--"जी ..जरूर ,यह तो हमारा फर्ज़ है । आइये भाई साहब । आइये । अरे आप तो खामखां परेशान होगए !"
यह कहकर वे सज्जन उन पति-पत्नी को साथ ले गए . उन्होंने अहमदनगर जाने वालों से पता नही क्या कुछ कहकर उन्हें सीट पर बिठाकर क इधर आए और बैठ कर पहले कोई मंत्र-जाप किया ,फिर खाना खाने लगे । कुछ ही देर बाद मैंने देखा कि दिल्ली वाले सज्जन ठगे से गेट पर खडे थे । अपनी जगह खोकर । उन्हें 'आर्ट ऑफ सेविंग सीट' भी नहीं आती थी जिन्हें आती थी वे आराम से अपनी जगह सुरक्षित कर चुके थे ।
इधर उसी ग्रुप की दो महिलाएं जिनमें '' युवा ,छरहरी और चुस्त थी तथा '' अधेड, स्थूल और मोटापे से ग्रस्त थी, एक अलग समस्या से उलझीं थीं जिसमें कथित स्माइल नाकाम सिद्ध हो रही थी ।
थोडी देर पहले तक वे भजनों और सत्संग वाणी के भाव-सागर में आकण्ठ निमग्न थीं । गुरुदेव की महिमा गाते-गाते थक नहीं रहीं थीं । गुरुदेव की कृपा से सहज-समाधि उनके लिये खेल बन चुकी है । अब उन्हें कोई प्राब्लम हर्ट नही करती । एक स्माइल ही सारे फसादों को मिटा देती है यह गुरुदेव की महिमा का प्रभाव है वगैरा..वगैरा ।
"आप भी आइये न । बैंगलोर में उनका बहुत बडा भव्य आश्रम है ।"
"सोचूँगी"--मैंने कहा । मैं किसी की आलोचना नही करती । अविश्वास भी नही करती लेकिन किसी के मार्ग का अनुशरण करने लायक भी अपने-आपको नही पाती ।
"अरे सोचना क्या ! आपकी जो भी चिन्ता या समस्या हो ,हर समस्या ,हर व्यथा गुरुदेव के दर्शनों से ही दूर हो जाएगी ।"
मेरी व्यथा-वेदना क्या है, वह किसके दर्शनों से दूर होगी । वेदना के मूल में क्या है उसे मैं अच्छी तरह जानती हूँ । फिर मैं समाधान अन्यत्र क्यों खोजूँ ---मैं कहना चाहती थी पर नही कहा । और कुछ ही देर में मैंने उन्हें आपस में ही उलझते हुए पाया-
"सुनो बेटा, तुम्हारी सीट कौनसी है ?"
"लोअर । क्यों आंटी ?"
अरे मेरी अपर-बर्थ है । मुझे जरा प्राब्लम है । घुटनों में दर्द है । चढने में परेशानी होती है ।--यह कह कर आंटी ने स को आशापूर्ण होकर देखा । पर बात को प्रभावहीन पाकर वह समझ गई कि स साहित्य के 'ध्वनि-सिद्धान्त' और व्यंजना से जरा भी परिचित नही है । इसलिये सीधे ही प्रस्ताव रखना पडा---"बेटा ऐसा करलें कि तुम ऊपर वाली सीट पर सोजाओ । यंगेज हो ,आराम से चढ जाओगी..। और मैं ...।"
"अरे नही आंटी ! मेरी भी कमर में दर्द है। मैंने तो उनसे खास तौर पर कह कर लोअर-बर्थ रिजर्व करवाई है..।"
"सफर में तो एक दूसरे की हैल्प करते हैं गुरुदेव ही तो कहते हैं कि...। थोडा तो ऐडजस्ट कर लिया जाता है ..।"
"ऐसा थोडी होता है आंटी ! आप भी दूसरों की परेशानी देखिये न !"--स तपाक से बोली ।
आंटी असहाय सी उसे देखती रह गई . मेरी समझ में उनका आर्ट ऑफ लिविंग आ गया . वे पति-पत्नी अभी तक गेट पर निरीहता के साथ खड़े थे . उन्हें आर्ट ऑफ लिविंग जो नही आती थी .

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

दो बाईयन की वार्ता

"नए साल की राम-राम ।"

"राम-राम 'भैन' , इधर कहाँ जाती है काम करने ?"

"गान्धीनगर में ।"

"तब तो खूब बढिया काम मिल गया है तुझे । कितने घर कमा रही है ?"

"यही कोई चार-पाँच घर हैं ।"
"
वहाँ तो बडे-बडे लोग रहते हैं ।पगार भी अच्छी होगी । एक घर से हजार--आठ सौ से क्या कम मिलता होगा ।"

"हओ ,काम भी तो खूब होता है । संझा--सुबेरे दोनों टैम तो पूरे घर में पौंछा लगता है । गली तक धुलाई होती है । कुकर कढाई परात भगौनी..सबके के चार-चार जोड पडे हैं ।गिलास कटोरियों का पार नही है सो जरूरत का बरतती जाती हैं और माँजने को पटकतीं जाती हैं । सबेरे जब पौंहचती हूँ तब अंबार लगा होता है बासनों का । यों भी नही कि पानी डालदें । सूख जाते हैं । जरा कहो तो कहतीं हैं अरे बाई इतना टाइम होता तो तुम्हें काहे लगाते । उनसे पूछे कोई कि टीवी देखने को टैम कहाँ से आता है । एक चम्मच के लिये भी बैठे रहते हैं कि बाई आएगी तभी धोएगी ।"

"अब काम तो सब जगह होता है कही कम तो कही ज्यादा पर पगार के संग खाना-कपडा भी अच्छा ही मिलता होगा ।"

"हाँ...सो तो है पर बहना एक बात तो है ,बडे लोगों के नाम बडे दरसन छोटे होते हैं । एक अरोरा मैडम हैं । साब तो बाहर रहते हैं । पर घर में किसी चीज की कमी नही । दो दो कारें खडीं हैं पर पैसे देने में नम्बर एक की कंजूस है । सबजी वाले से एक-एक रुपए के पीछे झिकझिक करतीं रहती हैं । सास को 'काग-बिडान्नी' करके रक्खा है । उसका पैसा तो सारा का सारा अपने 'अण्डर' में कर लिया है । और चाय तक कप गिन-गिन कर देती है । बाहर जाती है तो दूध अखबार सब बन्द कर जाती है । बिचारी बूढी मुझसे कहती है -री इमित्ती बगल से अखबार ले आना जरा.। बूढी अम्मा को अखबार पढे बिना चैन नही मिलता । भगवान ऐसे बडे आदमी होने का क्या फायदा .."

"पर तुझे तो फायदा है न । तुझे तो कोई कमी नही रखती ।"

"रख कैसे लेगी । जरा भी कसर दिखती है या जादा रौब झाडती है तो कह देती हूँ कि कल से नही आऊंगी कोई और बाई तलास लो .."

"ए बाबरी होगई है । ऐसे काम छूट जाय तो ?"

"नही री ,मेरे बिना उनका एक दिन भारी पड जाता है । एक टैम भी नही आती तो दस फोन होजाते हैं मेरे घर । मुझसे बिगाड कर अपना नुक्सान थोडी कराएगी । समझ ले कि उनके घरों में मेरे बिना चाय तक नही बन पाती । खाने का तो औडर ही करना पडता है । चल ..मेरी छोड अब अपनी बता तू कहाँ काम करती है ?"

"मैं तो एक मौहल्ला के पाँच--छह घरों में जाती हूँ । वहाँ तेरी जैसी कमाई नही है । तू तो जानती है मौहल्ला में पुराने बासिन्दे रहते हैं । छुट्टी करने पर भी कोई ऐसा गजब नही होता । काम छोडने की धौंस चल नही सकती । अगर ऐसी कोसिस करी भी तो तुरन्त सुनने मिल जाएगा ---देख रतिया काम तू नही करेगी तो यह मत समझना कि काम होगा नही हमारे हाथ-पाँव गल नही गए । सो भैन हमें तो ऐसे घरों में काम चइये जहाँ बाई के बिना काम ठप्प होजाए । मुझे भी तू अपने जैसे घर दिलवा दे कही ।"

"काम बहुत करना होगा सोचले ।"

"कर लूँगी ।"

"छुट्टी नही कर पाएगी ।"

"न कर पाऊँ..। पर धौंस तो रहेगी ..।"

"ठीक है सोचूंगी । अच्छा राम-राम !"

"राम--राम ।"

शनिवार, 31 दिसंबर 2011

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

कुछ नही तो यही सही

आजकल कुछ नया नही सूझ रहा । इसलिये पुरानी रचनाओं को देकर ही रिक्ति-पूर्ति की जारही है । यहाँ यह लगभग पन्द्रह वर्ष पुराना गीत है ।
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मेरे दिल का हाल ,न पूछो
कितना क्यूं बेहाल ,न पूछो
हर संवेदनशील आदमी
क्यूं रद्दी रूमाल ,न पूछो ।

क्या अपने क्या बेगाने
चाहा सबसे बस अपनापन
पर इस बस्ती में रहते हैं
सब कितने कंगाल ,न पूछो
मेरे दिल का हाल ,न पूछो।

करे कोई अपराध
सजा मिल जाती और किसी को
कैसे-कैसे मिल जाती है
हत्यारों को ढाल न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

केवल दर्द मिलेगा तुमको
जहां जुडोगे दिल से
ह्रदय की राहों में बिखरे हैं
कितने जंजाल न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

सब उगते सूरज के गायक
यह ढलती संन्ध्या का
साथी दुखी अकेलों का,
इस मन की उल्टी चाल पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो ।

बूंद-बूंद को तरसे पाखी
धूल उडी आंखों में
उजडे शुष्क मरुस्थल में
अब कैसे नदिया-ताल ! न पूछो
मेरे दिल का हाल न पूछो

मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

सुख तथा कुछ और क्षणिकाएं

सुख
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(1)
सुख--
एक नकचढा मेहमान,
और मैं.....
झुग्गी-झोपडी वासी
अकिंचन मेजबान
उसे कहाँ बिठाऊँ !
कैसे सम्हालूँ !!
(2)
सुख--
चौराहे पर ,
कभी-कभी मिलजाने वाला
कोई परिचित्
तुरन्त एक यंत्र-चालित सी स्मित्
"क्या हाल हैं ?"
"ठीक हैं "
और फिर नितान्त अपरिचित्
(3)
सुख --
जैसे बीच सडक पर,
गैर-जिम्मेदार भाग्य द्वारा
चलते-खाते
लापरवाही से फेंका गया
छिलका ।
फिसलता है ,गिरता है
मन....बार-बार ,
होता है शर्मसार

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कुछ क्षणिकाएं
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(1)
पलटती रहती है
अतीत के पन्ने
बूढी हुई जिन्दगी ।
(2)
तुम हो आसपास
तो जीवित हैं
हर अहसास ।
(3)
स्नेह की ओट में
छुपालो
यूँ नफरत से बचालो ।
(4)
सुख
अगर सुख नही
तो दुख
बेशक दुख नही ।
(5)
प्रतीक्षा की धूप में
पत्ते पकने लगे
पल एक-एक कर
झरने लगे ।
(6)
गलत को नही कहा
तुमने गलत
तो फिर बेशक
तुम गलत ।
(7)
तुम हो चाहे
दुख का कारण
या दुख के कारण ।
हर समस्या का
तुम्ही हो निवारण ।
(8)
न कोई क्लाइमेक्स
न कलरफुल साइट
जिन्दगी का चित्र
केवल ब्लैक एण्ड व्हाइट ।
(9)
स्नेह का व्यापार
बेकार मन को
बढिया रोजगार

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

एक सुरमय सुरम्य पर्व


ग्वालियर को गालव ऋषि की तपोभूमि , वीरांगना लक्ष्मीबाई की अन्तिम कर्मभूमि के साथ तानसेन नगरी होने का गौरव भी मिला हुआ है ।
वही संगीत-सम्राट तानसेन जिनके लिये सूरदास जी ने कहा था-"विधना यह जिय जानिकै शेषहि दिये न कान ,धरा ,मेरु सब डोलिहैं तानसेन की तान ।" वही तानसेन जो अकबर के दरबार के नौ रत्नों में से एक थे और वही तानसेन जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के पर्याय माने जाते हैं ।
तानसेन उनका नाम नही बल्कि उपाधि है जो बाँधवगढ के राजा रामचन्द्र ने उन्हें दी थी । कहते हैं कि उनका मूल नाम तन्ना मिश्र ( कुछ लोग पाण्डे भी कहते हैं ) था । उनका जन्म ग्वालियर के पास ही बेहट ग्राम में संवत् 1563 में हुआ था । उस समय ग्वालियर में कला निपुण संगीत रसिक राजा मानसिंह तोमर का शासन था इसलिये ग्वालियर संगीतकला का विख्यात केन्द्र था और बैजू बक्सू कर्ण और मेहमूद जैसे संगीताचार्य व गायक एकत्र थे । अनुमान है कि तानसेन ने इन्ही से प्रारम्भिक संगीत शिक्षा ली होगी । राजा मानसिंह के बाद वह संगीत-मण्डली बिखर गई और तानसेन वृन्दावन चले गए । वहाँ उन्होंने स्वामी हरिदास से संगीत की उच्चशिक्षा ली थी । बाद में अष्टछाप के संगीताचार्य गोविन्दस्वामी से भी गायन सीखा था । वे क्रमशः दौलत खाँ, राजा रामचन्द्र तथा अकबर के दरबार की शोभा रहे थे ।
तानसेन ध्रुपद शैली के विख्यात गायक व दीपक राग के विशेषज्ञ थे । जनश्रुति है कि जब वे दीपक राग गाते थे तब अग्नि प्रज्ज्विलित हो जाती थी । इस बात में कितना तथ्य है यह तो नही मालूम लेकिन यह तय है कि तानसेन को संगीत कला का पर्याय माना जाता है । उन्होंने संगीतसार व रागमाला नामक दो ग्रन्थों की तथा अनेक ध्रुपदों की रचना की । तानसेन की इस नगरी में किले के अलावा अनेक दर्शनीय मन्दिर मकबरे व दरगाह हैं(जिनसे आगे कभी परिचय करेंगे) जिनकी दीवारें और मीनारें आज भी जैसे गुनगुनातीं हैं । हर पत्थर से सुरों की झंकार गूँजती है और प्रतिवर्ष दिसम्बर माह में तो माटी का कण-कण राग-रंजित हो उठता है ,हवा का हर झोंका लय ताल में बहता है,जब तानसेन-समारोह में देश भर से शास्त्रीय संगीत के विशिष्ट कलाकार यहाँ आकर अपनी कला बिखेरते हैं और स्वयं को धन्य मानते हैं । यहाँ देश के लगभग सभी शीर्षस्थ और महान शास्त्रीय गायक प्रस्तुतियाँ दे चुके हैं ।संगीत-सम्राट की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिये इस समारोह का आयोजन उस्ताद अलाउद्दीन खाँ संगीत व कला अकादमी तथा मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद् व संस्कृति विॆभाग करता है ।
बैजाताल का एक दृश्य---


इस बार 9 दिसम्बर से 12 दिसम्बर तक तानसेन--समारोह चला । यह 87 वां समारोह था । प्रतिवर्ष यह तानसेन के समाधि-स्थल (हजीरा) पर ही सम्पन्न होता था जहाँ मोहम्मद गौस का खूबसूरत मकबरा भी है । मोहम्मद गौस तानसेन के अत्यन्त श्रद्धास्पद थे । लेकिन इसबार यह समारोह बैजाताल पर सम्पन्न हुआ । ग्वालियर में अनेक प्राचीन इमारतों के अलावा ,सिन्धिया घराने का भी जो वास्तु-वैभव जहाँ-तहाँ बिखरा है, बैजाताल उसका एक सुन्दर उदाहरण है । समारोह में इसकी साज-सज्जा विशेष रूप से की गई ।
रात्रि के समय बैजाताल का दृश्य---


फिर भी कहा जासकता है कि संगीत कला है ,हृदय व आत्मा का विषय है । इसे बाहरी साज-सज्जा नही बल्कि कला-साधकों की प्रस्तुति विशिष्ट बनाती है । कलाकार साज-सज्जा से नही श्रोताओं के ध्यान से प्रभावित होता है । अन्तिम दिन सुरों की फुहारें बेहट गाँव की माटी को भिगोतीं हैं । आखिर संगीत का वह मधुर स्वप्न यहीं तो साकार हुआ था ।
इसबार बनारस घराने की प्रसिद्ध ख्याल व ठुमरी-गायिका सुश्री सविता देवी को तानसेन अलंकरण से अलंकृत किया गया । इनके अलावा श्री कमलकामले,गौरी पाठारे ,सलिल भट्ट समरेश चौधरी अश्विनी भिडे ,मोइनुद्दीन खाँ आदि प्रख्यात कलाकारों ने मनमोहक गायन-वादन से श्रोताओं को डुबोदिया । यहाँ बिहारी का यह दोहा प्रासंगिक है कि, "तन्त्री नाद ,कवित्त रस, सरस राग रति रंग,अनबूडे बूडे, तरै जे बूडे सब अंग ।"
तानसेन समारोह हर संगीत-प्रेमी के लिये एक अद्भुत सुरम्य सुरमय पर्व है । राग जैसे साकार होकर श्रोता को अपने कुहुक में बाँध लेते हैं और लेजाते हैं कहीं दूर किसी स्वप्न-लोक में ,जहाँ हम सिर्फ अपने साथ होते हैं ।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

पियक्कड

रात के लगभग ग्यारह बजे थे । पूरे मोहल्ले में ज्यादातर लोग सोगए थे । केवल ठाकुर धीरसिंह की हवेली से टी.वी. चलने की आवाज आरही थी या अपने साथ हुई किसी ज्यादती को याद कर, रह-रह कर रो उठते बच्चे की तरह गली में एक-दो कुत्ते भौंक उठते थे । अचानक गली में बलवा सा होता लगा । किसी औरत की चीख-पुकार, भाग--दौड ,गाली--गलौज ,बर्तन फेंकने की आवाज ...और मिली--जुली हुंकारें--
"मारो साले को ..हरामी कही का ..,'मूत' पीकर आए दिन नौटंकी दिखाता रहता है । धक्के मार कर बाहर करो ,माहौल खराब कर रहा है मोहल्ले का..पियक्कड साला...।"
देखा जाए तो इस मोहल्ले में इस तरह का माहौल कोई नया नही । शराब पीकर जरा-जरा सी बात पर कट्टा, तलवारें निकालना ,बोतल, ईंट और पत्थर फेंकना, औरतों को पीटना ,चीख-चीख कर माँ-बहन की गालियाँ देना आम रहा है । चूँकि ये लडाइयाँ पूरी तरह शुद्ध शाब्दिक और अहिंसक होती हैं, किसी को खरोंच तक नही आती सो लोग झगडों की ज्यादा चिन्ता नहीं करते । जिन्हें झगडे का तमाशा देखने में रुचि होती वे लोग दर्शक बन कर या बीच-बचाव का श्रेय लेने वहाँ पहुँच भी जाते ।
लेकिन यह झगडा न सिर्फ शाब्दिक था न ही शुद्ध रूप से अहिंसक ।
"यह सब किस्सू के कारण हो रहा है । जब से आया है आए दिन कुछ न कुछ फसाद होता ही रहता है ।" -लोग कह रहे थे । हालाँकि एक-दो लोग इसके लिये कंची( उसकी घरवाली) को जिम्मेदार मानते हैं ।
किस्सू यानी किसनलाल । गाँव से काम की तलाश में आया एक मजदूर । पर शहर में आकर उससे कोई काम न बना । किसी दुकान पर बैठा तो चीजें कम कीमत पर बेच दीं । हलवाई के यहाँ काम मिला तो दूध जला दिया या शक्कर की चासनी बनाने की बजाय बूरा बना दिया । और दूध बेचना शुरु किया तो भैंस वाला पहले ही इतना पानी मिला देता कि लाभ की जगह उसे शिकायतें व गालियाँ मिलीं । शरीर की हालत बिना पानी की फसल सी होगई है सो हम्माली या ईंट-गारा ढोने का काम तो कर नही सकता था । हाँ कभी-कभी किसी टेम्पोवाले का सहायक बन कर पाँच-पचास रुपए ले आता है । ज्यादा पढा-लिखा तो है नही । कुल मिला कर वह अब निकम्मे की उपाधि लेकर या तो अक्सर घर में बैठा घरवाली कंची और बेटी गुड्डन की , जिसकी उम्र रोम-रोम से वसन्त की कोंपल की तरह फूटने लगी है ,रखवाली करता रहता है या नुक्कड पर दिनभर ताश खेलते लोगों की चालें देखता रहता है । कंची लाली-पौडर लगाए देहरी में बैठी दिन भर बीडी बनाती है और उसे ताने और जली-कटी भी सुनाती रहती है ।
"कहाँ यह खूसट सा किस्सू और कहाँ बेचारी कंची , एकदम नरम लौकी सी । बन्दर के हाथों नारियल लगना और किसे कहते हैं ! शराबियों की औरतों की तो जिन्दगी ही नरक है । लोगों की सहानुभूति कंची के साथ है ।
"देखना ,अब भी वही कंची पिट रही होगी ।"---कोई अनुमान लगा रहा था । जिसका उत्तर तुरन्त ही आया---
"तो भैया तुम मोहल्ले में रहते भी हो या नही । अब वो दिन नही रहे । गट्टू और मंगल के होते किस्सू की इतनी हिम्मत नही है कि कंची पर हाथ उठा जाए...।"
गट्टू और मंगल मोहल्ले के दादा हैं । कई काण्ड करके जेल जा चुके हैं । ठाकुर रायसिंह के मकान में एक कमरा किराए से उन्होंने ही किस्सू को दिलवाया है । गट्टू ने कंची को बहन माना है । और मंगल ने भौजाई । अब उनकी बहन--भावज को कोई टेढी नजर से भी देख तो जाए । किस्सू की क्या शामत आई है ।
तब तो सचमुच किस्सू की शामत ही आई थी । वह कंची को पीट रहा था । दरअसल वह गुड्डन के बारे में पूछ रहा था कि वह रोज जाती कहाँ है । उससे बिना पूछे-बताए लडकी को कौनसे काम पर लगा दिया है जो लौटने में रोज दस--ग्यारह बज जाते हैं । और उसके पास ये नए-नए कपडे ,सैंडिल, कहाँ से आए ।
"यह सब तो वह पूछे जो कमा कर खिलाए"---कंची ने जो यह जबाब दिया तो किसनलाल तिलमिला उठा ।बस दो हाथ जमाए ही थे कि कंची की चीख गट्टू और मंगल के कानों तक पहुँच ही गई । दोनों तुरन्त आगए । आते ही गालियों की बौछार करते हुए किस्सू पर पिल पडे । और लगा कि मोहल्ले में बलवा होगया ।
किस्सू जमीन पर अधलेटा पडा रिरिया रहा था---"मंगल भैया ,गट्टू भैया मेरी बात तो सुनलो ..।"
"क्या सुनें तेरी हरामखोर.!"----मंगल पूरी ताकत से चिल्लाया ।--- "साला दो घूँट पीकर आए दिन नौटंकी करता रहता है । बीबी--बच्चों का खयाल नही है । दो लात पडेंगी तभी सही होगा । अब वो जमाना नही रहा कि मर्द औरत को जानवर की तरह पीटता रहे और लोग चुपचाप तमाशा देखते रहें । खास तौर पर मैं तो टाँग तोड कर हाथ में पकडा दूँगा समझे ।"
"मेरी बात सुनलो मंगल भैया फिर जो सजा दोगे मंजूर है '---किसुनलाल लडखडाते हुए मंगत के पैरों में गिर गया । शराबी की हेकडी तभी तक कायम रहती है जब तक कोई धमकाता नही । एक घुडकी उसे जमीन पर ले आती है
मंगल भैया , मेरी बेटी..मेरी गुड्डन अभी तक नही लौटी है । 'राँड' बताती नही है कि लडकी कहाँ गई है । फिर पीटूँ नही तो क्या पूजा करूँ इसकी !"
पहले ,चल दूर हट---मंगत ने पाँव झटका--- बडा आया लडकी की चिन्ता करने वाला ... चुपचाप जाकर अन्दर सो जा । वरना दो लपाडे धर दूँगा तो आँखें बाहर निकल आएंगी कौडियों की तरह..।
एक तो कुछ कमाता धमाता नही है और घरवाली को आए दिन पीटता रहता है । साले की रिपोट लिखादी तो जाएगा महीनों के लिये जेल में ...।
"अर् र् रे ऐसे कैसे कर दोगे रिपोट ! लडकी के मामा चाचा बने फिरते हो और....। मेरे क्या जबान नही है । मैं भी सब बता दूँगा कि मेरी लडकी को कौन बरगला रहा है । मुझे सब पता है । किस् सी से डरता नही हूँ "---किस्सू ने सीना तान कर खडे होने की कोशिश की । फिर लडखडा कर गिर पडा ।
अरे यह ऐसे नही मानेगा---मंगत और गट्टू ने उसे पकड -घसीट कर कमरे में बन्द कर दिया ।
कमरे में से बर्तनों के पटकने--फोडने की आवाज किस्सू की नशे में लडखडाती चीखें सुनाई देरही थी ---"अर् रे ,कोई तो सुन लेता मेरी बात । अरे 'अधरमियो' ! कीडे पडेंगे तुम्हारे । दगाबाजो ..!"
"चलो..चलो ..स्साला , पियक्कड है । पियक्कडों की बात का क्या भरोसा । रात भर ऐसे ही नाटक करेगा ,सुबह सही होजाएगा ।"---मंगल ने कहते हुए सबको धकेला और नाटक का पटाक्षेप कर दिया ।