गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

संकल्प एक सास का


एक हैं पुष्पा जीजी । मेरे गाँव की हैं । धन-बल और कुलीन सम्पन्न एक ऐसे परिवार की बेटी जहाँ उनके समय में बहू-बेटियों को बहुत ही निचले दर्जे पर रखा जाता था ( अब तस्वीर कुछ बदली है हालांकि ज्यादा नही )। रूढिवादिता के चलते पुष्पाजीजी शायद पाँचवी पास भी नही कर पाईं कि उनका विवाह होगया । यों विवाह तो मेरा भी बहुत जल्दी कर दिया गया लेकिन तब तक मैंने ग्यारहवीं कक्षा तो पास कर ही ली थी और बाद में इस समझ के साथ कि पढना ही सही अर्थों में कुछ हासिल करना है , स्कूल में बच्चों को पढाते-पढाते खुद भी जैसे तैसे बी ए और फिर एम ए की परीक्षाएं भी पास कर ली लेकिन पुष्पाजीजी परम्परागत बहुओं की तरह अपनी भरी-पूरी ससुराल के प्रति समर्पित होगईं ।
 कुछ साल तक हमारा मेल-मिलाप न के बराबर ही रहा । 
एक साल पहले उनसे जो भेंट हुई तो मिलने का सिलसिला चल निकला । उन्होंने यहीं आनन्दनगर  में भी एक मकान खरीदा है । इसलिये आनाजाना बना रहता है । 
तीन बहुओं की सास और चार पोते-पोतियों की दादी बनने के बावजूद पुष्पाजीजी में तन मन और बोलचाल से कोई खास बदलाव नही है । हाँ अब एक नई चमक है आँखों में । गर्व और पुलक से भरी चमक । मुझे याद है सालभर पहले जब हम मिले थे उन्होंने कहा था--  
"गिरिजा ,हमाई मनीसा कौ गाइवौ तौ सुनिकैं देखियो ।" 
मनीषा ,उनकी बडी बहू । देहात की सीधी सादी लडकी । अब दो बच्चों की माँ । गाती होगी जैसे कि गाँव की दूसरी बहू-बेटियाँ भजन-कीर्तन गातीं हैं । मैंने तब लापरवाही के साथ यही कुछ सोचा इसलिये ज्यादा उत्सुकता नही दिखाई । लेकिन पुष्पाजीजी को बडी उत्सुकता थी । 
जल्दी ही वह अवसर भी मिल गया । कुछ दिनों पहले उनके यहाँ सुन्दरकाण्ड-पाठ का आयोजन था । आयोजन बडा ही सरस और मधुर संगीतमय था । तीन घंटे कब बीत गए पता ही न चला । इसे कहते हैं मानस-पाठ अन्यथा मानस-पाठ के नाम पर लोग कैसे भी गा गाकर पर जो अत्याचार करते हैं वह कम कष्टप्रद नही होता । उसी रात मनीषा ने भी गाया । गाया क्या ,निःशब्द कर दिया कुछ पलों के लिये । क्या वे कोई साधारण भजन थे ? जिनके हमने सिर्फ नाम सुने हैं वे 'यमन ,भैरव ,मधुवन्ती , वृन्दावनी-सारंग, कौशिक आदि रागों की बन्दिशें थीं और आवाज ??..क्या बताऊँ ! मन्द्र के तीसरे काले से तारसप्तक के पाँचवे काले तक ( जैसा कि संगीत के जानकार कहते हैं ) बेरोकटोक चढती उतरती खनकती हुई मीठी आवाज । सधे हुए अभ्यस्त सुर । गाना नही आता तो क्या हुआ ,उसकी परख तो थोडी बहुत है ही । जिस त्वरित गति से वह तानें बोल रही थी आलाप ले रही थी , मैं चकित अपलक देख रही थी । कोई चमत्कार सा था मेरे सामने । 

"पुष्पाजीजी क्या है यह ?" 
"कुछ नही बहन । एक दिन इसे एक 'उस्ताज्जी' ने एसे ही भजन गाते सुन लिया था सो घर आए और बोले कि अगर यह बेटी मेहनत करले तो नाम कमाएगी । साक्षात् सरस्वती बैठी है इसके कण्ठ में । बस मैंने कह दिया कि कि ऐसा है तो घर का काम मैं सम्हालूँगी । मनीषा चाहे जितना समय सीखने में लगाए । अब वे ही इसे सिखा रहे हैं । बच्चों और घर के काम को मैं और छोटी बहू सम्हाल लेती है । 'उस्ताज्जी' कहते हैं कि अगर यह लगन से गाती रही तो बडी बात नही कि एक दिन तानसेन समारोह में गाए । सो बहन मैंने तो सोच लई है कि मुझसे जो बनेगा करूँगी पर मनीषा को उसके लच्छ (लक्ष्य) तक पहुँचाने में पूरी कोसिस करूँगी । "
ग्रामीण अभिजात्य और संकीर्ण परम्परावादी परिवार की अनपढ कही जाने वाली पुष्पाजीजी धर्म और जाति के भेद को ,बहू-बेटा के अन्तर को मिटा कर अपनी बहू को एक कुशल तबलावादक और संगीतज्ञ उस्ताद जी से संगीत शिक्षा दिलवा रही हैं । 
पुष्पाजीजी , तुम्हें अनपढ कहने वाले अनपढ हैं । तुम्हारी समझ के आगे हमारी पढाई-लिखाई छोटी पडगई । मनीषा की साधना और तुम्हारा संकल्प जरूर पूरा होगा ।

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

जाने क्यों ?

दिल में वो ज़ज़बात नही हैं जाने क्यों ?
सुधरे कुछ हालात नही हैं जाने क्यों ?
कहते हैं ,कोशिश की थी पूरे दम से, 
तीन ढाक के पात वही हैं जाने क्यों ?

वो भी दिन थे ,जब पैदल ही जाते थे ।
मुँह बाँधे बस मिर्च-पराँठे खाते थे ।
हर दुकान किस तरह बुलाती थी हमको,
कैसे हर हसरत को रोक दबाते थे ।  
अब पैसा है ,फुरसत है ,सुविधाएं भी हैं 
पर मेले में वो बात नही है जाने क्यों ?

भीग ठिठुरते तलाशते सूखा कोना ।
कीट-केंचुआ गीली लकडी का रोना ।
जहाँ टपकती बूँद , कटोरा रखते थे
कितना मुश्किल सीली कथरी पर सोना ।
पक्का है घर अब , छत बालकनी भी है 
पर वैसी बरसात नही है जाने क्यों ?

है विकास की गूँज शहर और गाँवों में ।
टीवी ,अखबारों ,भाषण ,प्रस्तावों में ।
फैल गया बाजार गली घर आँगन तक ,
हर कोई अब चतुर हुआ है भावों में ।
सुख-सुविधाएं अब पहले से ज्यादा हैं 
चिन्ता का अनुपात वही है जाने क्यों ?


मंगलवार, 26 नवंबर 2013

एक दिन --दो गीत

आज प्रशान्त (गुल्लू) का जन्मदिन है । मेरे लिये एक अत्यन्त शुभ-दिन दिन । अनेक आशीषों और वरदानों का दिन । पहली रचना उसी के लिये । दूसरी कविता अपने वीर जवानों के लिये जो देश की रक्षा और संकट के समय प्राणों की बाजी लगा देते हैं ।
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(1)
क्या लिखूँ आज तेरे लिये
मेरे प्रथम कोमल गीत 
मेरे वत्स !
मेरे मीत !
अवाक् हूँ
फिसल जाते हैं शब्द
पारे की बूँदों की तरह
मेरी उँगलियों से ।
अव्यक्त है वह अहसास 
,जो होता है 
याद कर तेरी सस्मित आँखों को ।

तेरी आवाज  

धूप की तरह बिखर जाती है 
सुबह-सुबह 
भर देती है उजाला 
घर के कोने-कोने में 
अँधेरे बन्द कमरों में भी ।

साफ कर देती है धूल ।
जो जमी होती है अलमारियों में
सोफा ,शीशा किताबों और डायरियों पर 
रात के अँधेरों में लग गए जाले ,
जो लिपट जाते हैं चेहरे पर, बालों में 
उतार देती है ,
रोज की अभ्यस्त कामवाली की तरह

चाहती हूँ लौटाना तुझे वह सब 

जो दिया है तूने मुझे सबसे पहले  
मिले तुझे वह सब 
जो मेरे मन में है  हमेशा । 
और क्या दूँ तुझे 
मेरे वत्स , मेरे मीत
 मेरे प्रथम कोमल गीत ।


  जन्मदिन--26 नवम्बर 1978
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मुम्बई के आतंकी हमले में काम आए वीरों के सम्मान में----
(2)
मातृ-भूमि का ऋण उतार कर वीर जवान गए 
कर्म भूमि का पथ सँवार कर हो कुर्बान गए ।

दुश्मन ने आतंक मचाया
निर्दोषों का खून बहाया ।
धधक रहीं थीं जब दीवारें 
सहमे प्राण ,देश थर्राया ।
कूद पड़े वे तूफां बन कर 
अमर हुए वे जीवन देकर 
देकर राह गए ।

सिखा गए वे हमको ,चुप रहना ,डर जाना है 
समझौतों पर चलते ही रहना, मर जाना है ।
लगे समझने जब उदारता को कोई कमजोरी 
चोरी करके भी शैतान दिखाए सीनाजोरी 
ईँट लगे तो फेंको पत्थर ,
हम सबको इतना समझाकर 
हो कुर्बान गए ।

छोड़ो स्वार्थ और समझौते दो जैसे को तैसा । 
सबको समझादो ,यह देश नही है ऐसा वैसा 
स्वार्थ और सत्ता से ऊपर हों अपनी सीमाएं ।
अब गद्दार रहे ना हरगिज अपने दाँए-बाँए । 
बैंगलोर मुम्बई या जयपुर 
रहे न कोई भी यों डरकर  
गाए गीत नए ,वीर जवान गए ।

किसी शहादत पर भी ना हो कोरी नारेबाजी ।
आन बान का सौदा है यह नही है कोई भाजी ।
दिन में स्वप्न देखने वालों की निंदिया को तोड़ो ।
आस्तीन के साँपों को अब दूध पिलाना छोड़ो । 
जीवन का मकसद पूरा कर ,
यही सबक हम सबको देकर ,
वीर जवान गए ,हो कुर्बान गए ।

(15 दिस 2008 को रचित) 

गुरुवार, 21 नवंबर 2013

'हेडा-होडा' और बच्चे ।

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बाल-फिल्म महोत्सव के अन्तर्गत विभाग द्वारा स्कूल के बच्चों को कुछ बाल-फिल्में दिखाई गईं । प्राचार्य जी का आदेश हुआ कि हम लोग टाकीज पर ही जाकर केन्द्र के शिक्षकों को टिकिट उपलब्ध कराएं । आदेश कुछ अजीब तो लगा पर आदेश का पालन तो करना ही था । चूँकि उन फिल्मों में मकडी ,या ब्लू-अम्ब्रेला जैसी फिल्में नही थीं बल्कि एकदम अपरिचित से नाम थे इसलिये जहाँ दूसरे शिक्षकों ने फिल्म के प्रति उपेक्षा-भाव रखा वहीं मैंने जिज्ञासावश कि आखिर 'बाल-फिल्म महोत्सव' में बच्चों को कैसी फिल्में दिखाई जातीं हैं, फिल्म देखने का मन बना लिया ।
मुझे जिस टाकीज पर भेजा गया था वहाँ दिखाई जाने वाली फिल्म थी--'हेडा-होडा' ।
स्टाफ के कुछ लोगों ने अनुमान लगाया कि फिल्म शायद किसी होड पर आधारित होगी । होड यानी प्रतिस्पर्धा । मुझे बच्चों की फिल्म (उनकी नजर में स्तरहीन) देखने उत्सुक पाकर कुछ साथी मुस्कराए -- "लीजिये ,मैडम कुछ नही तो बच्चों की फिल्म ही देख रहीं हैं । चलो मुफ्त में दिख जाएगी । क्या बुरा है ।" 
सिनेमा-हाल में छोटे-बडे बच्चों का बेहद शोर था । उनके शिक्षक--शिक्षिका उन्हें हाल में बिठा कर या तो बाहर खडे थे या घर चले गए थे कि फिल्म खत्म होने से पहले आजाएंगे । खैर कुछ देर बाद जैसे ही फिल्म शुरु हुई हाल में शान्ति छागई लेकिन कुछ पलों के लिये ही । इसके बाद जो कुछ फिल्म के अन्त तक होता रहा उसे बताने से पहले हम फिल्म की बात करते हैं । 
यह राजस्थान के एक सीमान्त गाँव 'हेडा' के मासूम और बहादुर बच्चे सोनू पर केन्द्रित कहानी है जो जिज्ञासु और खोजी प्रवृत्ति का है । उसको ऊँट चराने का काम मिला हुआ है । इसलिये नाश्ता करके सुबह ही ऊँटों को लेकर निकल जाता है । उसे अपने ऊँटों से उसे बेहद लगाव है । और ऊँटों को भी उससे । एक दिन उसके तीन ऊँट चोरी होजाते हैं । काफी कोशिशों के बाद सुराग मिलता है कि ऊँट सीमा पार पाकिस्तान ले जाये गए हैं । इससे मामला काफी उलझ जाता है । सोनू बहुत परेशान होता है । उसे पिता की डाँट का नही अपने ऊँटों के खोजाने का गम है । वह चुपचाप उन्हें तलाशता हुआ पाकिस्तान के एक गाँव 'होडा' ( फिल्म का नाम इसलिये हेडा--होडा है ) पहुँच जाता है । हालाँकि होडा गाँव के एक सज्जन (परीक्षित साहनी ) सोनू को स्नेह के साथ सान्त्वना देते हैं और ऊँटों की तलाश में उसकी मदद भी करते हैं । तभी उन्हें पता चलता है कि उनके साले ने ही सोनू के ऊँटों को चुरा कर अपने घर बाँध लिया है । तब वे जैसे-तैसे अपने साले को समझा कर ऊँट लौटाने पर राजी भी कर लेते हैं पर बात जब अफसरों के हाथ में पहुँचती है तो राजनैतिक प्रश्न बन जाती है । कई नियम-कानून रुकावट पैदा करते हैं और लगता है कि अब सोनू को अपने ऊँट शायद ही मिल पाएंगे । वे निराश अपनी सीमा पर बैठे कोई उपाय सोचते हैं तभी उसकी बहन की नजर आसमान में उडते पंछियों पर पडती है । वह सोचती है कि अगर पंछियों के लिये कोई सरहद नहीं है तो ऊँटों के लिये कैसे हो सकती है । फिर क्या वे अपने ऊँटों को उनके नामों से पुकारना शुरु करते हैं। वह दृश्य वाकई बेहद खूबसूरत है जब सोनू के तीनों ऊँट अपने मालिक दोस्त की पुकार सुनकर बापस आते हैं तब कैसी सरहदें और कैसे बँटवारे । सारे अफसर हैरान से ऊँटों को जाते हुए देखते रह जाते हैं । फिल्म रोचक है । सोनू व उसकी बहन का अभिनय जानदार है ।     
          अब बात करें हमारे बाल-दर्शकों की ,तो उन्हें यह बाल फिल्म कोई खास रुचिकर नहीं लगी । सबसे बडा कारण तो यह था कि कलाकार अधिकतर अपरिचित थे । न तो उसमें शाहरुख-आमिर थे न ही कैट-करीना । न गीत न डांस । केन्द्रीय विद्यालय की एक छात्रा कह रही थी --यार बोर होरहे हैं इससे तो अच्छा था कि कहीं पार्टी कर लेते । हाँ शिवाजी साटम को देख कर ,जो सोनू के पिता की भूमिका में हैं, जरूर चिल्लाये --सी आई डी --सीआईडी----।
     इससे पता चलता है कि टीवी चैनलों के कारण बच्चे इतने बडे होगये हैं कि वे बच्चों की चीजें देखना पसन्द नहीं करते । मजेदार बात तो तब हुई जब एक बच्ची ने मेरे मुँह से फिल्म की प्रसंशा सुन कर मुझे पलट कर ऐसे देखा मानो उसे मेरी अक्ल पर सन्देह हो । हाँ गरीब तबके के बच्चों ने जिन्हें टीवी पर सिर्फ राष्ट्रीय चैनल देखना नसीब है फिल्म अवश्य रुचि से देखी । शायद विभाग ने मध्याह्न-भोजन की तरह यह बाल-फिल्मोत्सव का कार्यक्रम भी उन्ही बच्चों के लिये रखा था ।  
  बेशक इसमें बच्चों का नहीं हमारा दोष है। हम एक बार भी नहीं सोच रहे कि बच्चों को क्या देना चाहिये पर क्या दिया जारहा है । बाल-फिल्में दिखाने का यह आयोजन अच्छा है पर साथ ही उन उपायों की भी आवश्यकता है जो किसी तरह बच्चों के बचपन को सुरक्षित रख सकें। 

सोमवार, 11 नवंबर 2013

सुकुमार कल्पनाओं का सलोना संसार

Sushil Shukla's profile photoएक हैं सुशील शुक्ल । वर्त्तमान में  'चकमक 'के सम्पादक । पहले भी बता चुकी हूँ कि चकमक मेरे लिये कई अर्थों में बेहद खास पत्रिका है । पहला तो यही कि इसका रचनात्मक स्वरूप पहले अंक से ही स्तरीय रहा है । दूसरा चकमक से ही पहली बार मेरी किसी रचना का प्रकाशन हुआ । मेरी पहली प्रकाशित रचना थी --'मेरी शाला चिडियाघर है ।' तब चकमक के सम्पादक थे श्री राजेश उत्साही ।  
कहने की आवश्यकता नही कि मेरी बाल-रचनाओं के पीछे चकमक की बडी भूमिका रही है । कुछ कहानियाँ 'अपनी खिडकी से' तथा 'मुझे धूप चाहिये' में आप देख ही चुके हैं । लगभग सत्तर कविताएं और कुछ और कहानियाँ संग्रहीत होने की प्रतीक्षा में है । अभी जून 2013 के अंक में मेरी एक झींगुर वाली कविता है--'मुझको तो गाना है ।
हाँ...तो आजकल चकमक के सम्पादक हैं सुशील शुक्ल । 
ये महाशय शुरुआत के दिनों में चकमक के नन्हे पाठक हुआ करते थे ।लेकिन आज चकमक का आसमान बने हुए हैं ।चाँद--सितारों वाला आसमान । रंगीन पतंगों व गुब्बारों वाला आसमान और चिडियों की चहकार वाला और बादलों की फुहार वाला आसमान । 
सुशील छोटे-बडे सभी पाठकों के लिये अनूठी और प्यारी रचनाएं भी लिखते रहते हैं । मुझे सम्पादक से कही ज्यादा उनके रचनाकार ने प्रभावित किया है । 
स्वाभाव से बहुत ही कोमल और सौम्य लगने वाले सुशील की रचनाएं भी उतनी ही कोमल ,अनूठी और सबसे अलग हैं । उनकी कोमल कल्पनाएं जाने किस स्वप्न-लोक से उतरतीं हैं मासूम अप्सराओं जैसी । पल्लवों से बूँद-बूँद झरती निर्मल-नाजुक ओस जैसी । रेशमी रश्मियों के जाल से छनकर आती चाँदनी की फुहारों जैसी । 
चकमक के अन्तिम (पिछला ) पृष्ठ पर आजकल नियमित रूप से आ रहे हर माह के विवरण को जिसे उन्होंने बचपन की बिल्कुल अछूती ,अनौखी और मासूम नजर से देखते हुए लिखा है ,पढकर मुझे कुछ ऐसा ही महसूस होता है । 
यहाँ जून ,जुलाई और अगस्त के कुछ अंश हैं । बाकी आप चाहें तो चकमक में पढ सकते हैं जो इन्टरनेट पर उपलब्ध है ।
जून--- 'जून दो फाँकों से बना होता ...एक हिस्से में धूप दिखती तो दूसरे में बादल ..। जल्दबाज बादल पहली बारिश से पहले ही छाने चले आते ।.......गर्मियों में सूरज का मछुआरा पानी को बादलों के जाल में फाँसता फिरता । जब बादलों में नदी तालाबों से खूब पानी इकट्ठा होजाता तो...कहीं का कही गिरता । किसी नदी का पानी किसी तालाब में गिरता तो किसी नदी का पानी किसी खेत में ....शायद मछलियों को इसकी पहचान होती हो कि इस बार उनकी नदी में बाजू वाले तालाब का पानी आया है ...कोई पानी बहुत सालों बाद अपने ही ताल में लौटता होगा तब मछलियाँ सारे काम छोड कर उस पानी से किस्से-कहानियाँ सुनने बैठ जाती होंगी ..। पानी उन्हें खेत कुआ, नदियों भैंसों और तमाम परिन्दों की कहानियाँ सुनाता होगा । कोई छोटी मछली जिद करती होगी कि अगली बार वह भी घूमने जाएगी तो पानी उसे पीठ पर बिठा कर कहता होगा --हाँ जरूर चलना ..।'
जुलाई--....'जुलाई में पानी रास्तों से ऊपर बहता चला जाता । रास्ते दिखना बन्द होजाते । कभी लगता कि कहीं रास्ते पानी के साथ बह न गए हों । पानी पर पाँव रखते तो पाँव रास्ते पर ही पडता । हम यह सोचकर खुश होते कि रास्ता अपनी जगह पर ही ठहरा हुआ है ।...अगर रास्ते बह सकते तो सब के सब बह कर हमारी नदी में पहुँच जाते । मछुआरे के जाल में कोई रास्ता फँसा चला आता । मछुआरा उसे फिर वही बिछाने जाता । कभी वह जान बूझकर कहीं का रास्ता कहीं बिछा देता तब किसी के घर के लिये निकला कोई किसी और के घर पहुँच जाता ....स्कूल जाने वाला रास्ता खेल के मैदान वाले रास्ते से बदल जाता । बच्चे स्कूल की जगह खेल के मैदान में पहुँच जाते और मैदान में बच्चों को ढूँढने निकले बडे स्कूल पहुँच जाते ।.'......    
अगस्त---.....'अगस्त में झीलें तालाब भर जाते । ...उनके ऊपर तैरता आसमान होता । जगह--जगह पनप आए छोटे तालाबों में छोटे-छोटे आसमान तैरते मिलते । हम हथेलियों की कटोरी बनाकर उनसे पानी भरते । मेरा दोस्त पानी में तैर रहे आसमान को उठाकर मेरी जेब में डाल देता...जेबें आसमानों से भर जातीं...।
हम नदी में जाते और आसमान को छूकर देखते.....अगस्त में बारिश कुछ को भिगाती और कुछ को सुखाती क्योंकि उनके पास कोई काम न होता वे बेकार बैठे रहते ...।'    
कल्पनाओं की सुकुमारता में सुशील कहीं मुझे पन्त का प्रतिरूप प्रतीत होते हैं तो ऩएपन और अनूठेपन में गुलजार जी का । नीचे सुशील की कुछ बाल कविताएं भी हैं जो इस बात को और भी विश्वसनीय बनातीं हैं ----
(1) पतझड
---------
डाल-डाल से हाथ छुडाकर
पत्ते गदबद भागे ।
पीपल का सबसे पीछे था 
नीम का सबसे आगे ।
सुबह पेड ने देखा जो ,
कुछ पत्ते तो गायब हैं 
गिने चार सौ तेरह कम हैं 
और बाकी तो सब हैं ।
............
कई दिनों सूनी शाखों ने 
चप्पे-चप्पे छाने ।
पत्तों के फोटो चिपकाए 
जाकर थाने थाने 
किए बरामद नीम के पत्ते 
आम के घर पहुँचाए । 
आम की टहनी बोली 
ये साहब किसको ले आए ।

(2)
घर से सिकुडी रात उठाई 
धूल झडा छत पर बिछवाई 
बादल ने पाण्डाल सजाए 
उसमें कुछ तारे टँकवाए ।
हवा ने दो घोडे दौडाए 
ठण्डक पैदल कैसे आए ।
.....
मुझे जरा बडा एक तारा 
अपने सारे कंचे हारा ।
बिस्तर से जब सुबह गिरे थे 
आसपास कंचे बिखरे थे ।
(3)
मेरे घर की छत के काँधे 
सिर रखकर एक आम 
चिडियों से बातें करता है
रोज सुबह और शाम ।
आम के सिर पर एक शहर है 
उसमें एक चिडिया का घर है ।
उसमें  रहते बच्चे दो ।
बस सोए रहते हैं जो ।
कहाँ-कहाँ वे जाएंगे 
जब उनके पर आएंगे ।..।
(4)
नदी बादलों की गुल्लक है 
कि जिसमें बूँदों की चिल्लर पडी है ।
नदी है कि बादलों की लडी है ।
नदी एक बहता हुआ शहर है 
नदी जाने कितनों का घर है
नदी में हम सबकी प्यास रहती है 
नदी में मछलियों की साँस बहती है ।
नदी घडियालों की घडी है 
नदी है कि बादलों की लडी है ।...
(5)
उस दिन धूप बहुत थी 
बादल छाते ताने 
निकल पडे थे 
पहली-पहली बारिश लाने ।
दो झोले पानी के 
टाँगे-टाँगे निकल पडे 
आसमान की सडक थी चिकनी 
दोनों फिसल पडे ।
पानी गिरना था केरल में 
गर गया राजस्थान में 
बुद्धू हो तुम , बादल बोला 
एक ऊँट के कान में ।
(6) 
दोना पत्तल पत्ते की 
दो ना पत्तल पत्ते की 
पत्ती एक एक बित्ते की 
कोई न पूछे कित्ते की ।
बित्ता थोडा बडा है ।
बडा दही में पडा है । 
(7)
किट किट किट किट 
किट किट किट किट 
कीडा बोला घास में 
बोलो एक साँस में 

फर फर फर फर 
फर फर फर फर 
चिडिया उडी आकाश में 
बोलो एक साँस में 

छुक छुक छुक छुक 
छुक छुक छुक छुक
ट्रेन रुकी देवास में 
बोलो एक साँस में ।

बुधवार, 6 नवंबर 2013

भैया-दौज----भाई-बहन के अटूट स्नेह की कथा

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बचपन में भाई दौज की सुबह से ही हमें याद करा दिया जाता था कि दौज की कहानी सुने बिना और भाई को टीका किए बिना पानी भी नही पीना है । जब हम नहा-धोकर तैयार होजातीं तब दादी या नानी तुलसी के चौरा के पास आसन डाल कर ,घी का दिया जलाकर हमारे हाथ में घी-गुड़ देकर दौज की कहानी शुरु करतीं थीं । कहानी के दौरान कई बार उनका गला भर आता था और कहानी के अन्त में जब वे कहतीं कि जैसा प्रेम उनमें था वैसा भगवान सबमें हो, वे अक्सर पल्लू से आँखें पौंछती मिलतीं थी । बहुत छोटी उम्र में तो हमें नानी--दादी की वह करुणा पल्ले नही पड़ती थी पर उम्र के साथ कहानी में समाए भाई बहन के स्नेह की तरलता की अनुभूति अन्तर को भिगोती गई । आज भी कथा सुनाते दिल भर आता है |पता नही ये लोक-कथाएं किसने लिखीं । कैसे लिखीं ?  लेकिन हमारे जीवन  में गहराई से जुड़ी हैं । जड़ की ही तरह संवेदनाओं का पोषण करती हुई । तभी तो अलिखित होते हुए भी ये पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होती रहीं हैं । इस कथा को यहाँ देने का मेरा उद्देश्य भी यही है ।
हर भाई को हृदय से शुभकामनाएं देते हुए उस कहानी को ,जिस रूप में मैंने अपनी दादी नानी और माँ से सुनी है ,यहाँ दे रही हूँ । हालाँकि हर  कथा की तरह स्थानीय प्रभाव से निश्चित ही थोड़ा--बहुत अन्तर तो होगा ही लेकिन कथ्य में कोई अन्तर नहीं है .
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    वह अपनी माँ की आँखों का तारा और बहन का इकलौता दुलारा भाई था 'निकोसी पूत' ( जिसे किसी ने कभी कोसा न हो अभिशाप न दिया हो कहते हैं ऐसे व्यक्ति को बुरी नजर जल्दी लगती है काल भी जैसे उसके लिये तैयार रहता है )  
'भाई दौज' आई तो वह माँ से बोला --"माँ मैं बहन से टीका कराने जाऊँगा ।" माँ कैसे भेजे !  बहुत ही प्यारा और बूढी माँ का इकलौता सहारा था । ऊपर से रास्ता बड़े खतरों से भरा । जाने कितनी 'अलहें' (अनिष्ट) .
"बेटा ना जा । बहन परदेश में है । तू अकेला है ,रस्ता बियाबान है । तेरे बिना मैं भी कैसे रहूँगी ? "
"जैसे भी हो ,रह लेना मैया! बहन मेरी बाट देखती होगी । "
बेटा आखिर चल ही दिया । पर जैसे ही दरवाजे से निकला दरवाजे की ईँटें सरकीं । यह पहली अलह (अनिष्ट) थी .
"तुम्हें मुझे दबाना है तो ठीक है | पर पहले मैं बहन से टीका तो कराके आजाऊँ, फिर मजे में दबा देना..।" निकोसी ने कहा तो दरवाजा मान गया । एक वन पार किया तो शेर मिला । निकोसी को देखते ही उस पर झपटा ।
"अरे भैया ठहरो ! मेरी बहन टीका की थाली सजाए भूखी बैठी होगी । पहले मैं बहन से टीका करा के लौट आऊँ तब मुझे ज़रूर खा लेना ।" 
शेर मान गया । आगे चला तो दूसरा बियाबान जंगल मिला | जंगल के बीच एक नदी मिली । निकोसी जैसे ही नदी पार करने लगा नदी उमड़ कर उसे डुबाने चली ।
"ओ नदी मैया , मुझे शौक से डुबा लेना पर पहले मैं बहन से टीका तो करवा आऊँ । वह मेरी बाट देखती होगी ।" --यह सुनकर नदी भी शान्त होगई ।
आखिर भाई बहन की देहरी पर पहुँच गया । बहन अपने भाई के आंवड़े-पाँवड़े ( कुशलता की प्रार्थना) बाँचती चरखा कात रही थी कि तभी तागा टूट गया । वह तागा जोड़ने लग गई । अब न तागा जुड़े न बहन भाई को देखे । भाई द्वार पर खड़ा  खिन्न मन सोचने लगा कि मैं तो इतनी मुसीबतें पार कर आया हूँ और बहन को देखने तक की फुरसत नही । वह लौटने को हुआ तभी तागा जुड़ गया | बहन उठ खड़ी हुई , बोली--"अरे भैया  ! मैं तो चरखा चलाती हुई तेरे नाम के ही आँवडे-पाँवडे बाँच रही थी |"
बहन ने भाई को बिठाया । दौड़ी-दौड़ी पड़ोसन के पास गई | पूछने लगी --
" जीजी सबसे प्यारा पाहुना आए तो क्या करना चाहिये ?"
"करना क्या है , गुड़ से लीपदे , घी में चावल डालदे |" 
बहिन ने वैसा ही किया पर न गुड़ में लिपे न घी में चावल सीजे ( पके)|  तब वह सास के पास गई ,पूछा--"अम्मा-अम्मा सबसे प्यारा पाहुना आया है  तो क्या करूँ ?" 
सास ने कहा कि " बहू गोबर माटी से आँगन लीपले और दूध में चावल डालदे ..।" बहन ने झट से आँगन लीपा ,दूध औटा कर खोआ--खीर बनाई । भाई की आरती, उतारी टीका किया । पंखा झलते हुए भाई को भोजन कराया ।
दसरे दिन तड़के ही 'ढिबरी'( चिमनी, लैम्प) जलाकर बहन ने गेहूँ पीसे । रोटियाँ बनाई और अचार के संग कपड़े में बाँधकर भाई को दे दीं । भाई को भूख कहाँ । आते समय सबसे कितने--कितने 'कौल वचन' हार कर आया था । बस मन में एक तसल्ली थी कि बहन से टीका करवा लिया । बहन से विदा लेकर लौट पड़ा .
उधर उजाला हुआ । बच्चे जागे । पूछने लगे---"माँ , मामा के लिये तुमने क्या बनाया ?"  बच्चों को देने के लिये बहन ने बची हुई रोटियाँ उजाले में देखीं तो रोटियों में साँप की केंचुली दिखी । कलेजा पकड़कर बैठ गई -- "हाय राम ! मैंने अपना भाई अपने हाथों ही मार दिया ।"
बस दूध चूल्हे पर और पूत पालने में छोड़ा और जी जान से भाई के पीछे दौड़ पड़ी । कोस दो कोस जाकर देखा ,भाई एक पेड़ के नीचे सो रहा है और 'छाक' ( कपडे में बँधी रोटियाँ) पेड़ से टँगी है । बहन ने चैन की साँस ली . भगवान को हाथ जोड़े . फिर भाई को जगाया । भाई ने अचम्भे से बहन को देखा | 'बहिन यहाँ कैसे ,क्यों !'
 बहन ने भरी आँखों से पूरी बात बताई । भाई बोला---"तू मुझे कहाँ-कहाँ बचाएगी बहन ? " 
बहन बोली--"मुझसे जो होगा ,मैं करूँगी  पर अब तुझे अकेला नही जाने दूँगी ।"
भाई ने लाख रोका, समझाया पर बहन न मानी ,चल पड़ी भाई के साथ । चलते-चलते रास्ते में वही नदी मिली । भाई को देख जैसे ही उमड़ने लगी । बहन ने नदी को 'नई-नकोर' चुनरी चढ़ाई । नदी शान्त होगई । आगे चले तो वन में शेर मिला | बहिन ने उसे बकरा दिया । शेर भी जंगल में चला गया । घने जंगल में चलते-चलते बहन को प्यास लगी ।
भाई ने कहा--"बहन मैंने पहले ही मना किया था । राह में कितने ही संकट हैं अब इस बियाबान जंगल में पानी कहाँ मिलेगा ? बहन बोली-- "मिलेगा कैसे नही ,देखो दूर चीलें मँडरा रहीं हैं वहाँ जरूर पानी होगा ।" 
"ठीक है ,मैं पानी लेकर आता हूँ ।"
बहन बोली--- " पानी पीने तो मैं ही जाऊँगी ? अभी पीकर आती हूँ । तब तक तू पेड़ के नीचे आराम करना ।"  
बहन जहाँ पानी पीने गई ,वहाँ कुछ लोग एक बड़ी भारी शिला गढ़ रहे है । 
"भैया ये क्या बना रहे हो ?"
"तुझे मतलब ? पानी पीने आई है तो पानी पी और अपना रस्ता देख ।"
एक आदमी ने झिड़ककर कहा तो बहन के कलेजे में सुगबुगाहट हुई । जरूर कोई अनहोनी है । बोली- "भैया बतादो ये शिला किसके लिये गढ़ रहे हो ? मैं पानी तभी पीऊँगी ।"
"बड़ी हठी औरत है । चल नही मानती तो सुन । एक निकोसी पूत है । उसी की छाती पर सरकाने के लिये ऊपर से हुकम हुआ है ।"
सुनकर बहन को काटो तो खून नही । माँ-जाए के लिये हर जगह काल बैरी बन कर खड़ा है । 
"उसने ऐसी क्या गलती करी है जो....?"
"तुझे आम खाने कि पेड़ गिनने ? तू पानी पी और अपना रास्ता देख ।" दूसरा आदमी चिल्लाकर बोला पर वह नही गई । वही खड़ी गिड़गिड़ाने लगी --"सुनो भैया ! वह भी किसी दुखियारी माँ का लाल होगा । किसी बहन का भाई होगा । तुम्हें दौज मैया की सौगन्ध । बताओ ,क्या उसे बचाने का कोई उपाय नही है ?"
"है क्यों नहीं ? उपाय तो है ।"
आदमी हार मानकर बोला--"उसे किसी ने कभी कोसा नही है । अगर कोई कोसना शुरु करदे तो 'अलह' टल सकती ।" 
बस बहन को कैसी प्यास ! कहाँ का पानी ! उसी समय से उसने भाई को कोसना चालू कर दिया और कोसती-कोसती भाई के पास आई---"अरे , नासमिटे , तू मर जा । 'धुँआ सुलगे' ...'मरघट जले'...।"
" हे भगवान ! मेरी अच्छी--भली बहन बावली भी होगई ! मैंने कितना मना किया था कि मत चल मेरे संग । नही मानी ।"---भाई ने दुखी होकर सोचा । जैसे-तैसे दोनों घर पहुँचे | बेटी को इस हाल में देखा तो माँ हैरान । अच्छी भली बेटी को कौनसा प्रेत लग गया है ? कौनसे भूत-चुडैल सवार होगए हैं, जो भाई को कोसे जा रही है ? लड़की तो बावरी होगई ? 
"माँ कोई बात नही । बावरी है ,भूतरी है, जैसी भी है तो मेरी बहन । तू नाराज मत हो ।"
माँ चुप होगई | बहन रोज उठते ही भाई को कोसती और दिन भर कोसती रहती । ऐसे ही 'कोसते-कासते' कुछ दिन गुजर गए । एक दिन भाई की सगाई आई । बहन आगे आ गई---"इस 'जनमजले' की सगाई कैसे होगी ? पहले तिलक मेरा होगा |"
"हें... ??" सबको  बड़ी हैरानी हुई , बुरा भी लगा पर भाई ने कहा --"मेरी बहन की किसी बात का कोई बुरा मत मानो । वह जैसी भी है, मेरी बहन है वह जो चाहती है वही करो ।" 
पहले बहिन का टीका किया | लगुन भी पहले उसी के हाथ रखी गई | 
फिर तो हर रस्म पर बहन इसी तरह आगे आकर भाई को रोकती रही टोकती रही और कोसती रही । 
भाई का ब्याह होगया ।
अब आई सुहागरात । बहन पहले ही पलंग पर जाकर लेट गई ।
"यह अभागा सुहागरात कैसे मनाएगा ? मैं भी वही सोऊँगी ।"
"हे भगवान ! और सब तो ठीक,  पर सुहागरात में कैसे ,क्या होगा ? ऐसी अनहोनी तो न कभी देखी न सुनी |"  पर भाई ने कहा --"कोई बात नही । मेरी बावरी बहन है । मैं उसका जी नही दुखाऊँगा ।हम जैसे भी रात काट लेंगे ।" फिर कोई क्या कहता ।
बहन रात में भाई और भौजाई के बीच लेट गई । पर पलकों में नींद कहाँ से आती । सोने का बहाना करती रही । आधीरात को भगवान का नागदेवता को हुकम हुआ कि फलां घर में एक नया-नवेला जोड़ा है , उसमें से दूल्हा को डसना है । नागदेवता आए । पलंग के तीन चक्कर लगाए पर जोड़ा  कहीं न दिखे | ऊपर देखे तो तीन सिर दिखें और नीचे की ओर छह पाँव । जोड़ा होता तो डसता । बहन सब देख-समझ रही थी । चुपचाप उठी । तलवार से साँप को मारा और ढाल के नीचे दबा कर रख दिया । और भगवान का नाम लेकर दूसरे कमरे में चली गई । 
सुबह उसने सबको मरा साँप दिखाया और बोली--"मैं बावरी आवरी कुछ नही हूँ । बस अपने भाई की जान , मैया की गोद और भौजाई का एहवात ( सुहाग) बचाने के लिये यह सब किया । जो भूल चूक हुई उसे माफ करना ।"
भाई-भौजाई ने बहन का खूब मान-पान रखा । बहन खुशी-खुशी अपने घर चली गई । 
जैसे इस बहन ने भाई की रक्षा की और भाई ने बहन का मान रखा वैसे ही सब रखें । जै दौज मैया की । 

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

कहानी-सम्राट के बहाने

पिछला सप्ताह अपेक्षाकृत कुछ अलग और उल्लासमय रहा । आदरणीय श्री जगदीश तोमर जी ने कई माह पहले ही मुझे बता दिया था कि आपको उज्जैन चलना है । 
सेवा-निवृत्त प्राचार्य श्री तोमर 'सृजन-संवाद' के सम्पादक ,बाल-साहित्य के रचनाकार , निष्पक्ष व प्रबुद्ध समालोचक ,मध्यभारत हिन्दी-साहित्य सभा ग्वालियर के अध्यक्ष होने के साथ प्रेमचन्द सृजन पीठ उज्जैन के निदेशक भी हैं । कहानी व उपन्यास के सम्राट प्रेमचन्द की जन्मतिथि व पुण्यतिथि के अवसर पर सृजन पीठ द्वारा कथा-गोष्ठी ,कहानी लेखन प्रतियोगिता के साथ अन्य साहित्यिक गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं । 
मेरे अनिश्चय को देखकर वे बोले कि "अरे आपको तो आना चाहिये । अच्छा रहेगा ।" मैं यह जानकर आश्वस्त हुई कि ग्वालियर से श्रीमती चतुर्वेदी भी जा रहीं थीं । हालांकि वे अपने पति को भी साथ ले जा रहीं थीं और वहाँ वे अलग स्पेशल कमरे में रहने वालीं थीं इसलिये उनका मेरा कोई खास मेल तो नही था । लेकिन ट्रेन में तो हम साथ ही जाने वालीं थीं फिर शिवपुरी से डा. पद्मा शर्मा भी जा रही थीं । खुशी की बात यह भी थी कि वहाँ मुझे मीनाक्षी स्वामी मिलने वालीं थीं ।
सुश्री डा. मीनाक्षी स्वामी इन्दौर के शासकीय महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं । वे अपनी कृतियों ( भूभल ,नतोsहं आदि ) के लिये अनेक पुरस्कारों से सम्मानित भी हो चुकीं हैं । पर मेरे लिये उनका मिलना साहित्यिक की अपेक्षा व्यक्तिगत रूप से अधिक महत्त्वपूर्ण था । वे लखनऊ में आयोजित बाल-साहित्य लेखन की दो कार्यशालाओं में मेरे साथ थीं । मधु बी. जोशी जी ,मीनाक्षी और मैंने वहाँ काफी आत्मीय क्षण बिताए थे । उन पलों को फिर से जीने के साथ यह भी देखूँगी कि इतने सारे पुरस्कारों से सुसज्जित होकर अब मीनाक्षी कैसी दिखती हैं । मैं चलने के लिये तैयार होगई । सुयोग से प्रिंसिपल मैडम ने भी अवकाश स्वीकृत करने में कोई बेरुखी नही दिखाई ।

जिस सुबह हम उज्जैन पहुँचे मन उल्लास से भरा था । पहली बार महाकाल की नगरी देखने का अवसर जो मिला था । मुझे यह देखकर काफी अच्छा लगा कि उज्जैन सादा और शान्त शहर है । हम लोग जहाँ भी गए बहुमंजिला इमारतें देखने नही मिलीं । हाँ मन्दिर कदम-कदम पर हैं ।
स्टेशन से विक्रम विश्वविद्यालय का अतिथि-गृह ,जहाँ हम ठहरे थे ,ज्यादा दूर नही है । हमारे साथ शिवपुरी से पत्रकार श्री प्रमोद भार्गव और मुरैना से श्री रामबरन शर्मा भी थे । मेरी नजरें मीनाक्षी को तलाश रहीं थीं । पता चला कि 'मैडम जी' अपनी कार से आ रहीं हैं और आज ही अपनी कहानी पढ़कर वापस भी चली जाएंगी ।
 धत्.. मैं आज भी वही ठेठ देहातिनों जैसे विचार रखती हूँ कि पुरानी सहेलियों की तरह रात में एक साथ जागकर ढेर सारी बातें करेंगे । कुछ यादें ताजा करेंगे । मैं लेखन विषयक कुछ सूत्र जानूँगी कि वह लिखने के लिये कब और कितना समय देतीं हैं । उपन्यास लिखने के लिये भी कुछ निर्देश लूँगी । लोग धड़ाधड़ उपन्यास लिख डालते हैं और मैं हूँ कि बीस साल से एक उपन्यास को लेकर सिर्फ सोच रही हूँ । शायद लेखकों से मिलने का यह सबसे बडा लाभ होता है कि कलम चल पड़ती है । पर ऐसा कुछ नही हुआ । मीनाक्षी गोष्ठी से कुछ ही समय पहले आईं और कथा-पाठ के बाद जाने के लिये तैयार भी होगई । लेकिन यह देख अच्छा लगा कि मीनाक्षी अब भी वैसी ही हैं । अपनी सी । इन बारह सालों में उसकी खूबसूरती में कोई अन्तर नही आया । पर मुझे देखते ही वह विस्मित हुई---"अरे यह तुम हो ? लखनऊ में तो लगता था कि हवा के साथ कहीं उड न जाओ । हर समय बीमार लगतीं थीं । अब तो अच्छी खासी सेहत है ।" और हँसने लगीं । मन एकदम हल्का होगया । 
पहले दिन कथा-गोष्ठी 'कालीदास--अकादमी' में थी । शाम को जब मीनाक्षी जाने लगीं तो मुझे कुछ खालीपन का अनुभव हुआ । पता नही क्यों मैं ही मैत्री के लिये इतनी लालायित रहती हूँ । मुझे ही लगता है कि मुझे अभी बहुत कुछ सीखना है । और यह भी कि मुझे एक अच्छे साथी और निर्देशक की जरूरत है । 
मैं अपने कमरे में लौटी ही थी कि अचानक मीनाक्षी ने फोन किया--"जल्दी बाहर आओ । जरूरी काम है ।" बाहर आई तो आदेश मिला--"गाड़ी में बैठो ।" फिर ड्राइवर से बोली--"चलो ।"
"अरे ..अरे कहाँ ? मुझे पद्मा और दूसरे लोगों को तो बताने दो ।" मैं इस आकस्मिक और अप्रत्याशित सी 'घटना' पर हैरान हुई ।
"चुपचाप बैठो "--मीनाक्षी ने रौब से कहा--"तुम्हें किडनैप कर इन्दौर ले जा रही हूँ ।" और फिर हँस पडीं । बोली---"अरे तुमसे बातें ही नही होपाईं । सोचा कि काल-भैरव के दर्शन भी करलें इसी बहाने कुछ समय भी साथ बितालेंगे ।"
रास्ते में हम अपने अलावा लखनऊ में साथ रहे कुछ और साथियों की बातें भी करते रहे । मीनाक्षी ने 'नतोsहं' की रचना के बारे में कई बातें बताईं कि यह पूरी तरह उज्जैन और सिंहस्थ मेले पर केन्द्रित है । कि इसके लिये उन्हें इन्दौर से उज्जैन के सैकडों चक्कर लगाने पड़े । कि इसके लिये साधु-सन्यासियों , अघोरियों व पुजारियों से भी संवाद रखने पड़े वगैरा..वगैरा..। 
कालभैरव को शराब का भोग लगता है । पुजारी ने बोतल में से थोड़ी सी शराब निकाली और कालभैरव की प्रतिमा के होठों से लगादी । शराब बेचने वालों और पुलिस के बीच धर-पकड़ और लुकाछिपी का नाटक कुछ पलों के लिये ही चला । जैसे ही पुलिस की गाडी मुडी, बोतलें फिर से निकल आईं । 
"तुम्हें एक छुट्टी और लेकर आना था ।" मैंने कहा तो बोली----"अरे यार मकान का चक्कर है । छुट्टियाँ भी कहाँ मिल रहीं हैं । फिर जितना समय मिल जाए काफी है । पर तुमसे मिलकर अच्छा लग रहा है ।"
"मेरी कहानी तो सुन लेतीं । कुछ कमियाँ बतातीं । कुछ....।" मैंने कहा तो वह मेरे कन्धे को दबाकर बोली--
"रहने दो । मैंने तुम्हारी कुछ कहानियाँ पढीं हैं ।" 
मैंने पाया कि मीनाक्षी आज भी वैसी ही है । रचनाकार से पहले वह एक 'महिला' है मेरे जैसी यानी किसी भी आम महिला जैसी ही स्नेह ,विश्वास से भरी , आत्मीयता  की आकांक्षाओं और आशंकाओं से रची बुनी । एकदम बच्चों जैसी ...। क्षितिज के पार देखती सी आँखों में एक मासूमियत..। 
डा. पद्मा शर्मा के दो कहानी संग्रह आ चुके हैं जिनका विमोचन उनके कथनानुसार प्रख्यात आलोचक डा.नामवरसिंह और ममता कालिया ,पद्मा सचदेव आदि जैसी कथाकारों द्वारा किया गया है । यह अपनेआप में बडी उपलब्धि है जिसकी अनुभूति उनके व्यक्तित्त्व से बखूबी छलक रही थी । वे भी शाम को लौट गईं । मुझे निराशा हुई कि कहानी के मर्मज्ञ रचनाकार तो चले ही गए । मेरी कहानी को पता नही कौन सुनेगा । सुनेगा भी या नही । 
दूसरे दिन सुबह बडी आसानी से हमने महाकालेश्वर के दर्शन किए । वहीं पोहा-जलेबी का नाश्ता किया जो वहाँ का एक आदर्श व स्वादिष्ट नाश्ता है । क्षिप्रा को देखना बहुत सुखद नही था । हालांकि घाट सुन्दर बने हैं । अभी तो पानी भी भरपूर है । पर निर्मलता का अनुभव नही हो रहा था । सुबोध दीदी का अनुकरण करते हुए मैंने अंजुरी में जल लेकर अपने ऊपर छिडक लिया । नहाने का विचार तो वैसे भी नही था ,पर होता तो भी वहाँ पहुँचकर छोडना ही पडता । सिर्फ धार्मिक भावना-वश मैं ऐसी जगह स्नान नही कर सकती जहाँ गन्दे पानी की बदबू आ रही हो । हम नदियों को माता भी मानते हैं और उनके साथ बिना किसी अपराध बोध के दुर्व्यवहार भी करते हैं ।मानव समाज की तरह ही जिसमें माँ और कन्या को पूजनीया कहा जाता है पर मात्र शब्दों में ।व्यवहार में उनकी हालत भी नदियों जैसी ही है । नहाने धोने व सींचने के साथ गन्दगी बहाने का भी साधन, नदियाँ हमारी 'पूजनीया माँ !!' 
दोपहर बारह बजे से विक्रम विश्व विद्यालय के हिन्दी विभाग में कहानी व लघुकथाओं का वाचन होना था । गणमान्य श्रोता-समीक्षकों में विक्रम विश्वविद्यालय और माधव महाविद्यालय के हिन्दी के तीन विद्वान प्रोफेसर, राष्ट्रीय साहित्य परिषद् के संगठनमंत्री श्री श्रीधर पराडकर जी ,ऋषिकुमार मिश्र (मुम्बई रेलवे) और बहुत सारे कथाकार थे । तीन-चार कहानियों में से सुनाने के लिये कहानी का चयन करना मुझे काफी उलझन भरा लगा । अन्त में कर्जा-वसूली कहानी पढना सुनिश्चित किया । 
कहानी पर उनकी टिप्पणियों को यहाँ देना अनावश्यक है । यहाँ महत्त्वपूर्ण है सर्वाधिक अपेक्षित आपकी राय । कहानी कृपया पढें ।
शाम को हमें इन्टरसिटी से वापस ग्वालियर आना था । 
बुधवार की सुबह ग्वालियर स्टेशन पर उतरते समय मन में भी कहानी-सम्राट को याद करने के बहाने की गई उज्जैन की य़ात्रा के खूबसूरत पलों की धूप खिल रही थी ।