गुरुवार, 4 सितंबर 2014

दो लघुकथाएं

(1)
सम्मान
एक बड़े प्रतिष्ठान ने प्राचार्य से योग्य शिक्षकों के नाम देने को कहा ताकि शिक्षक दिवस पर उन्हें सम्मानित किया जा सके । प्राचार्य ने हिसाब लगाया कि कौन इस समय उनके काम का है कौन नहीं। व्याख्याता 'स' उनके सारे बिलों पर बिना किसी आपत्ति के 'पेड बाई मी' लिख देता है । 'प' किफायती दामों में स्कूल का सामान उपलब्ध कराता है जिससे काफी बचत होजाती है । श्रीमती 'ल' को तो जरूर लिया जाना चाहिये । वह कहीं भी जाती है उपहार लाना नही भूलती और हमेशा विनम्रता की हद तक झुककर रहती है । और 'अ' को तो छोड़ा ही नही जासकता क्योंकि उस जैसा वाक्पटु कोई नही । जेडी साहब के सामने अपने स्कूल और प्राचार्य की ऐसी बात रखी कि साहब खुश होकर चले गए । ऐसे शिक्षकों को सम्मान जरूर मिलना चाहिये ।
"और सर ये रामकुमार और कुसुम ....?"
"अरे इन्हें छोड़ो "--प्राचार्य ने अपने खास सलाहकार नलिन की बात को गीले कपड़े की तरह झटक दिया ।
"ये संस्था के किसी काम के नही । बस रजिस्टर लेकर कक्षा में जाने और पढ़ाने के अलावा कोई काम नही करते । संस्था ऐसे लोगों के भरोसे नही चलती । हाँ तुम अपना नाम भी लिख लेना ..।"
"जी सर ।" नलिन ने खुश होकर कहा और जल्दी-जल्दी प्राचार्य जी द्वारा प्रस्तावित नामों को टाइप करने लगा ।
( सन् 2006 में )
(2)
प्रतिफल 
गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़े गजानन बाबू ने बेचारगी के साथ शिक्षा-विभाग की उस तिमंजिला इमारत को देखा जिसमें अधिकारी और बाबुओं की तो बात ही क्या है , चपरासी तक उन्हें भाव नही दे रहा था । बारह बजे से अब चार बजे तक तक चार बार लौटाए जा चुके थे ।हर बार एक ही उत्तर---"माड़साब , आपसे कितनी बार कहें कि अभी बड़े बाबू नही हैं कुर्सी पर ! कल-सल फिर चक्कर लगा जाना ।"
पीछे मास्टर जी उसकी बड़बड़ाहट को साफ सुन रहे थे ---"बड़े चेंटूराम हैं । पता नही क्यों रिटायर होने के साथ आदमी की अकल भी रिटायर होजाती है ।" 
घर में पत्नी भी यही कहती ह--"जिन्दगी भर बच्चों को पढ़ाते रहे पर खुद काम का कुछ नही सीखा ।  इतना भी नही है कि दफ्तर में ही अपने रुके कामों को करवा लें । चप्पल घिस रहे हैं फालतू ही...।"
" पत्नी शायद ठीक ही कहती है "---गजाननबाबू कभी कभी निराशा के अँधेरे में घिर जाते हैं ।
सचमुच बच्चों को पढ़ाने और महीना बाद वेतन के रुपए गिनने के अलावा उन्होंने कुछ नही जाना । कब कौनसी किश्त लगी , किस माह में कितने रुपए ,क्यों कट गए जानने की जरूरत नहीं समझी । हाँ अध्यापन कार्य में कभी शिथिलता या गिरावट नही आने दी । लेकिन क्या हुआ ! पेंशन प्रकरण को लेकर दफ्तर के चक्कर लगाते दो माह होने को आए पर कोई सुनवाई नही । वे साथी जो खुद कभी कक्षाओं में नही गए और गजाननबाबू के अध्यापन का मजाक उड़ाया करते थे ,अधिकारियों के साथ ठाठ से गाड़ियों में घूम रहे हैं ।
"तो क्या उनकी कार्यनिष्ठा गलत साबित होगई है ? क्या अब मूल्यों व आदर्शों का कोई महत्त्व नही रह गया है ? क्या उनके परिश्रम और ईमानदारी का यही प्रतिफल है ?" 
इन सवालों में उलझे हुए से गजानन बाबू हताश होकर लौटने का विचार कर रहे थे । उनके धुले सफेद कपड़े धूल से मलिन हो रहे थे । होठों पर पपड़ियाँ जम रही थी । चेहरे पर निराशा भरी थकान की कालिमा थी ।
इस तरह तो उन्हें कोई पूछने वाला नही है । यह सोचकर वे लौट ही रहे थे कि एक सरकारी जीप बगल से गुजरी । कुछ आगे गई, फिर पीछे लौटी । ड्राइवर सीट से ही कोई खिड़की में से झाँका । शायद कोई बड़ा अधिकारी था । 
"आप यहाँ !"--कहकर वह नीचे उतरा और पैरों में झुकगया । गजाननबाबू हक्के-बक्के से खड़े थे । 
"आपने मुझे नही पहचाना लेकिन मैंने तो देखते ही जान लिया ।"
"कौन ?...राजीव ?"
"बिल्कुल सही । आपकी कक्षा का सबसे शरारती और सबसे ज्यादा डाँट खाने वाला राजीव । आपने जो कुछ मुझे दिया उसी के कारण आज मैं यहाँ हूँ । आप यहाँ किसी काम से आए होंगे न ? लेकिन अब आपको चिन्ता करने की जरूरत नही है।" 
गजाननबाबू चकित और गद्दगद् हदय से इस आकस्मिक भारी परिवर्तन को देख उनकी आँखें भर आई । अपने कार्य का इससे बड़ा प्रतिफल किसी शिक्षक के लिये और क्या होसकता है । 
(सन् 1994 में रचित )
शुभ-तारिका में प्रकाशित)

सोमवार, 1 सितंबर 2014

"अबे 'होगा' क्यों ? "

बात उन दिनों की है  जब मुझे पर्व और त्यौहारों की बड़ी उल्लासमय प्रतीक्षा रहती थी । यह उल्लास बचपन के कारण था या अनूठे उत्सव-आयोजनों के कारण यह पूरी तरह अलग करके तो नही कह सकती लेकिन इसमें कोई सन्देह नही कि उन दिनों हमारे गाँव में हर त्यौहार को मनाने के लिये विशेष तैयारियाँ होतीं थी । चाहे होली हो , दशहरा हो ,कृष्ण-जन्माष्टमी हो या गणेश-उत्सव ।
गणेश-उत्सव के आठ दिनों की झाँकियों की योजना बहुत पहले ही तैयार कर ली जाती थी जिसके निर्माता--निर्देशक ताऊजी ही होते थे । उनके द्वारा तैयार की गई झाँकियाँ अदुभुत हुआ करती थीं । जैसे एक बार उन्होंने कैलाश पर ध्यानमग्न शिव की झाँकी सजाई ।
" शिवजी निराधार बैठे ध्यान मग्न हैं ।( ध्यान रहे कि शिव प्रतिमारूप नही बल्कि सजीव हैं । किशोर भैया से छोटे देवेन्द्र को शिव के रूप में इतनी कलात्मकता से सजाया गया कि देखने वाले मंत्र-मुग्ध हुए देखते ही रह गए थे और लगभग बारह वर्ष के देबू भाई का आँखें बन्द कर घंटों तक शान्त व निश्चल  बैठे रहना भी कम आश्चर्य नही था ) जटाओं से गंग-धार फूट रही है । उनका धरती से स्पर्श केवल फर्श में गड़े त्रिशूल के द्वारा है,जिसे उन्होंने थाम रखा है । चकित दर्शक आजू-बाजू झाँकते हैं कि आखिर शिवजी अधर में बैठे किस तरह है ।"
हर दिन एक नई और अनूठी झाँकी होती थी । कभी भगवान विष्णु के क्षीरसागर-शयन की कभी माखनचोरी की तो कभी खेत में बीज बोते किसान-दम्पत्ति की ।   
आरती व प्रसाद के बाद भजन गाए जाते थे । उन दिनों गाँव में गाँव के ही बहुत अच्छा गाने-बजाने वालों की भजन-मण्डली थी दो-चार लोग बाहर से भी आजाते थे । और श्रोता भी कम रस-मर्मज्ञ नही थे । ताल और मात्राओं की जरा सी गलती पकड़ लेते थे । 
ऐसे ही एक थे बापू ।
 उन्हें गिरवर बौहरे के नाम से नई पीढ़ी का शायद ही कोई व्यक्ति जानता हो । हर कोई उन्हें बापू ही कहता था । बापू बड़े स्पष्टवादी , सरल और सहृदय थे । गोरा तांबई रंग । उच्च ललाट । लगभग पैंसठ-सत्तर वर्ष की उम्र । कसा हुआ शरीर और निश्चिन्त मुखर हँसी । उन्होंने दो-चार किताबें (कक्षाएं) ही पढ़ी होंगी लेकिन मानस-पाठ सुनते हुए वे दोहा--चौपाइयों का बड़ी गहन और व्यापक व्याख्या करते थे । जितनी आसानी से वे अपनी त्रुटि या अल्पज्ञता को स्वीकार कर लेते थे उतनी ही स्पष्टता से वे आलोचना भी करते थे । वे हर तरह के सांस्कृतिक--आयोजनों में श्रोता बनकर बैठना और प्रस्तुतियों की आवश्यक प्रशंसा या आलोचना करना कभी नही छोड़ते थे । आलोचना भी उनकी कम तीखी नही होती थी । यही कारण था कि उनके सामने गाने के लिये लोग गीत-भजनों का चुनाव सोच-समझकर करते थे । एक दिन शर्माजी बड़ी मेहनत के बाद स्वयं एक फिल्मी गीत की तर्ज पर भजन रचकर लाए ।

फिल्मी गीतों की तर्ज पर भजन बनाने और गाने की परम्परा ने मौलिक ,पारम्परिक भजन व गीतों को विलुप्त सा कर दिया है । जो गीत चल पड़े हैं उन्ही पर किसी भगवान का नाम जोड़कर भजन का नाम दे दिया जाता है । मुझे याद है यह फिल्मी गीतों की तर्ज पर बने भजन मैं बचपन से ही सुनती आ रही हूँ । हालाँकि इसका विस्तार अधिक सुनाई देता है . अनेक प्रसिद्ध और प्रतिभाशाली गायक भी  इस तरह बने भजन खूब गा रहे हैं . 
दूसरे कई लोगों की तरह मैं भी इस परम्परा को ठीक नही मानती क्योंकि कई लोग तो मात्र गीत के मुखड़ें में मनपसन्द भगवान का नाम जोड़कर धड़ाधड़ नए नए भजन बनाकर गाते रहते हैं । महिला-मण्डलियों में गाए जाते गीतों के कुछ उदाहरण देखिये---"हम तो चले आए भोले तुमको मनाने , चाहे तू माने चाहे न माने ।" ( हम तो तेरे आशिक..)
"आज तुम्हारी पूजा का खयाल दिल में आया है इसीलिये अम्बेरानी का दरबार सजाया है ।"( शायद मेरी शादी का खयाल) 
"आई हो मैया मन्दिर में तुम बहार बनके "( आए हो मेरी जिन्दगी में ) 
"मेला लगाsss"( काँटा लगा..,यह तो प्रसिद्ध भजन गायक का गीत है )
फिल्मी तर्ज पर लोग धड़ाधड़ नए नए भजन बनाकर गा रहे हैं । एलबम निकाल रहे हैं । हालाँकि गीत बनाना आसान है जबकि उसे संगीत देना बेशक कठिन काम है । 
इसलिये आसान राह यही लगती है कि फिल्मी तर्ज का इस्तेमाल कर भजन या किसी भी तरह का गीत बना लिया जाय । बड़े-बड़े संगीतकार भी तो कहीं से नकल करके या अपनी ही पुरानी धुनों में जरा सा हेरफेर करके नए गीतों की धुनें तैयार कर रहे हैं । 
हाँ तो शर्माजी एक स्वरचित भजन लेकर आए ।शर्माजी को गाने का शौक है । "गाना आए या न आए गाना चाहिये" , के सिद्धान्त पर चलते हुए वे न केवल हर जगह गाते हैं बल्कि मानते भी हैं कि उनको गाने का पर्याप्त ज्ञान व अभ्यास है । वे औरों से अच्छा गा सकते हैं ,गाते हैं । सो उन्होंने सबसे पहले हारमोनियम अपने हस्तगत किया और दो तीन बार खखारकर गला साफ करते हुए शुरु किया----
"गणपति कीर्त्तन में आना होगा , भक्तों को दर्शन देना होगा ।
मेरा सुन्दर सपना पूरा करना होगा ...।" 
उन दिनों 'जीवन-मृत्यु' का गीत-"झिलमिल सितारों का.", 'बिनाका गीतमाला' में धूम मचा रहा था । 
अब समस्या यह थी कि " आंगन sss होगा और " सितारों का.." कहते हुए लता जी का स्वर-कौशल व माधुर्य कानों में जितना रस घोलता है वहीं "आना होगा " ,में शर्मा जी का कंण्ठ को भीचकर "आना..इ होगा "....कहना दाल में आए कंकड़ की तरह अखर रहा था और ऊपर से गणेश जी पर 'आना होगा' का दबाब..धौंस । बार-बार 'आना होगा' ..'लाना होगा' , 'देना होगा ' जैसे टुकड़ों को सुनते-सुनते बापू अपने आप को किसी तरह नियंत्रित करते हुए बैठे तो रहे लेकिन जैसे ही शर्मा जी उठकर चले गए ,उनका आक्रोश फूट पड़ा----"वाह री गवैया की पूँछ । 'धीय कौ मुरगा' ( बेटी का बेटा । बेवकूफ । हिकारत को व्यक्त करता स्थानीय शब्द। प्रायः बेटी की सन्तान को दूसरे कुल की माना जाता है इसलिये पोते-पोतियों से कमतर भी ) ..."आना होगा "...अबे,  होगा क्यों ?...का भगवान तेरे बाप का कर्जदार है कि तेरा नौकर, जो तेरी धौंस सुनकर दौड़ा चला आएगा ? 
दर्शक हँस हँसकर बेहाल थे पर बापू की भौंहें जो चढ़ी तो फिर दो चार कर्णप्रिय भजन सुनकर ही उतरीं ।
बापू के उस विरोध का ही प्रभाव था कि लोगों ने गीत रचते समय भावों का भी ध्यान रखना शुरु किया ।कई बार ऐसा होता है कि गीत की धुन बहुत ही अच्छी लगती है लेकिन शब्द हर जगह गाने लायक नही होते ।तब भी फिल्मी तर्ज का सहारा ले लिया जाता है ।पर वह कला की कंगाली ही कही जाएगी ।
उसी धारा में बहते हुए मैंने भी दुर्गाजी की आराधना में कुछ गीत लिखे हैं । लेकिन मैंने वे ही गीत चुने हैं ,जिनमें लोकधुनों का रंग है या  जिनके श्रोता अब ज्यादा लोग नही हैं । कम से कम नई पीढ़ी तो नही । जैसे एक पुराना गीत --"तेरे सदके बलम..." मुझे बहुत प्रिय है उसे गाने के लिये मैंने भजन बनाया था--

"मेरे देखो न गुण, रखलो शरण ,
अम्बे सुनलो अब मेरी पुकार ।
आखिरी आसरा तेरा द्वाsssर ...।

टूटी है नैया ,सुन मेरी मैया 
सागर है गहरा अपार ।
उल्टी हवाएं गुम हैं दिशाएं कैसे मैं जाऊँगी पार.. ।।
देखो मैया  जाऊँगी कैसे मैं पा....र । मेरे देखो न ...।

सुख हो या दुख हो ,तू ना विमुख हो 
हर पल रहे तेरा ध्यान 
चलती रहूँ मैं ,गाती रहूँ मैं टूटे न लय और तान ।
अम्ब मेरी टूटे न लय और ता....न । मेरे देखो न गुन..।"
(एक कड़ी और भी है)
शब्दों और भावों के प्रति यहाँ जो चैतन्यता दिख रही है उसके पीछे कहीं न कहीं बापू के उस सवाल " होगा क्यों"  से मिली प्रेरणा भी है । ऐसे लोग अब बहुत कम रह गए हैं ।



शनिवार, 23 अगस्त 2014

तमाशा

सोनपुरा मोहल्ला में जैसे ही किसी लोकल-चैनल के रिपोर्टर पहुँचने की सूचना मिली महिलाएं ,बच्चे ,जवान, बूढ़े उसी तरह आशा ,उल्लास व कौतूहल से भर गए जैसे सुदूर अंचल में  साड़ी बेचने वाले या बिसाती के जाने पर महिलाएं हुलास से भर उठतीं हैं । 
लोग इस तरह दौड़ पड़े मानो उन्हें पानी का टैंकर आने का समाचार मिल गया हो । 
जो जिस हाल में था वह वहाँ आगया जहाँ कैमरा व माइक सम्हाले दो मीडियाकर्मी खड़े थे । 
"हम शहर के इस उत्तर पश्चिम इलाके सोनपुरा में खड़े हैं "--माइक सम्हाले एक भारी-भरकम आदमी ने बोलना शुरु किया-- "अब मैं एक एक करके लोगों से यहाँ की समस्याओं के बारे में जानकारी लेने जा रहा हूँ ।"
कुछ लोग एकदम सम्हल गए । कैमरे के सामने तरीके से खड़ा होना चाहिये । कुछ लड़के हँस रहे थे और कुछ इस तरह की मुद्रा बनाए थे मानो वे इस कार्यक्रम की खास शख्सियत हैं । उनके मोहल्ला में टीवी के रिपोर्टर आए हैं यह क्या कम है ।
"हाँ माताजी आप बताएं"--मीडियाकर्मी ने बहुत ही शिष्टाचार व विनम्रता से कहते हुए एक महिला के सामने माइक बढ़ाया हालाँकि महिला की उम्र गहरे रंग वाले स्थूलकाय व्यक्ति से कुछ कम ही होगी ।
"पानी गन्दौ आइ रऔ है । भारी बदबू ..।" 
"और बताइये..।"
"बरसा होती है तब पानी घरों में भर जाता है। बिजली 'भौत' कम आती है।"
"और क्या-क्या परेशानियाँ है...?"
मीडियावाले को एक ही जगह सवाल करते देख एक युवकनुमा आदमी अपने बालों पर हाथ फेरते हुए और शर्ट का कॉलर ठीक करते हुए माइक के सामने आया कि कहीं उसका मौका न चूक जाए । बीच में ही बोला---- "समस्या साहब एक थोड़ी है । पानी तो फुल सीवर का आ रहा है। गन्दगी आप देख ही रहे हैं । मैं कार्यालय के पच्चीस चक्कर लगा चुका मेरा आईडी नम्बर कोई नही दे रहा । सर आप ही कुछ......
"आप बताएं अम्माजी "----मीडिया वाले ने युवक की बात पूरी होने से पहले ही माइक एक बुढ़िया के सामने कर दिया । बुढ़िया काँपती हुई बोली----"बे..टा का बताऊँ ! 'पेंसिल' ना मिल रई चारि महीना ते । भूखनि मरिबे की नौबति आइ गई है । 'सिकात' लेकर गई तो एक आदिमी नै दरबज्जे से ही भजाइ दई । कोऊ सुनिबो बारौ नईं हैं ।...मेरौ जबान बेटा तो 'अकसीडेंट' में....।" 
बूढ़ी अम्मा रोने लगती इससे पहले ही वह दूसरी तरफ चला गया । कैमरे की ओर देखकर बोलने लगा । 
"जी हाँssss आप देख रहे हैं.... आप देख सकते हैं कि यह है बाssर्ड ग्यारह और मेरे बाईं तरफ है बाssर्ड दस । ग्यारह और दस के बीच फँसे हैं येsssलोग । गन्दा पानी पीने मजबूर । बिजली की समस्या भी है । जैसा कि आप देख सकते हैं कि लोग किस तरह परेशान हैं । कोईssssसुनने वाला नही है । 
इस बीच कैमरा अपनी ओर आते देख लोग हाथ हिलाकर ऐसे मुस्करा रहे थे जैसे उन्हें कोई अवार्ड मिल गया हो । जिनकी तरफ कैमरा नही जा रहा था वे धक्का-मुक्की करके आगे आना चाह रहे थे । तभी एक अधेड़ बिना बुलाए सामने आगया और मीडिया कर्मी से बोला--"साहब ,आपकी तरह और भी लोग यहाँ की रिपोर्ट ले गए हैं पर कुछ नही हुआ । हमारी बिनती है कि आप पार्षद अलोपी सिंह को पकड़ें । हम लोग नरक की जिन्दगी जी रहे हैं और वह मजे में ए सी में सो रहा है । आप कहें तो उसके मुँह पर कहदूँ कि पक्का खाऊ है । क्या इसके लिये जिताया था । जीतने के बाद इधर सूरत दिखाने तक नही आया ..।"
"देखिये "---मीडिया-कर्मी सतर्क हुआ और सधे हुए स्वर में बोला---" हम आपकी परेशानी समझ रहे हैं पर आप सम्हलकर बोलें । सधे हुए शब्दों में अपनी बात कहें ।टीवी पर आपको लोग देख रहे हैं । शिष्ट भाषा का प्रयोग करें । किसी के लिये अपशब्द या गाली जैसे शब्दों का प्रयोग न करें ।" 
"साहब मैंने गाली तो दी नही है । सही बात को आप गाली कहते हैं !हम जिस दिन गाली पर उतर आए तो.... "--आदमी कहता रहा लेकिन मीडिया कर्मी पहले ही उसकी तरफ से माइक हटा चुका था और अब वह खुद कैमरे को अपनी बात सुना रहा था---
"आप देख रहे हैं लोगों में गुस्सा है । लोग परेशान हैं । हम इसी तरह शहर की समस्याओं से आपको रूबरू कराते रहेंगे । आप देखते रहिये 'आजकल'  । हम फिर किसी बार्ड की समस्या को लेकर आपके सामने फिर हाजिर होंगे । कैमरामैन नकुल के साथ मैं तिलकराज । याद रखिये कल इसी समय इसी चैनल पर । नमस्कार ।" 
कुछ ही पलों में गाड़ी ढेर सारा धुँआ छोड़कर चली गई और साथ ही  उस गन्दी सी बस्ती में एक हलचल ,जो काई जमे पानी पर फेंके कंकड़ से हुए सूराख सा अल्पकालिक ही सही,लोगों को ऊब से राहत देता है । लोग इस बात से उत्साहित थे कि कल वे टीवी पर दिखाई देंगे । और इसी बहाने वे कुछ देर अपनी समस्याओं को भूल गए थे । 

     


शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

मातृभूमि के पहरेदारो !


मातृभूमि के पहरेदारो !
मेरा तुम्हें नमन ।
शौर्य और साहस के तारो !
मेरा तुम्हें नमन ।

पर्वत--घाटी तुमको क्या हैं !
क्या है रेगिस्तान !
धँसे हुए दलदल में पर 
नजरों में हिदुस्तान ।
कदम कदम पर रोड़ों का
निर्मम हो करें दमन ।
मातृभूमि के पहरेदारो !
मेरा तुम्हें नमन ।

जहाँ हवा भी जम जाती है 

तुम भरते हुंकार ।
नज़र जमाए दुश्मन पर
हर आहट पर टंकार ।
सर्दी-गर्मी आँधी क्या हैं !
तुम कर्त्तव्य मगन ।
मातृभूमि के पहरेदारो !
मेरा तुम्हें नमन ।

तुम ही पहले भगतसिंह ,
अशफाक ,बोस, आजाद ।
भारत माँ की आन बान 
तुमने रक्खी आबाद । 
खुली हवा में साँस लेरहा 
इसीलिये जन जन ।
मातृभूमि के पहरेदारो !
मेरा तुम्हें नमन ।
   
हम सब ऋणी तुम्हारे 
सबल सहारे, वीर अजेय 
भाव तुम्हारा सा सबका हो 
बस इतना हो ध्येय ।
पंथ तुम्हारे पुष्प बना मन 
करता अभिनन्दन ।
मातृभूमि के पहरेदारो !
मेरा तुम्हें नमन । 

स्वतन्त्रता दिवस की आप सबको हार्दिक बधाई  ।

शनिवार, 12 जुलाई 2014

सूखा --तीन चित्र

लेकिन वे दिन गए जब सावन का नाम लेते ही  बादल , वर्षा ,बिजली ,हरियाली मोर पपीहा आदि सब आँखों में सजीव होउठते थे । अब सावन तो आगया है । पर गलियों में धूल ही नही उड़ रही , कान-कनपटियों को थपेड़े मारती लू भी चल रही है । सुबह आठ बजे ही धूप इस तरह तपाती है तो दोपहर की तपन कैसी होगी । शाम छह बजे तक धूप जैसे कोड़े बरसाती रहती है ।
यह कविता सन् 1984 में लिखी थी इसलिये इसमें नयापन तो नही है पर प्रासंगिक है । आज यहाँ ( ग्वालियर मुरैना क्षेत्र में ) यही हाल है ।
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(1)
लगभग निर्वस्त्र सा
निरभ्र आसमान 
उम्मीदों को चिढ़ाता
दिन में दर्पण दिखा दिखाकर
आँखें चुँधियाता 
गर्म साँसों से
तम मन झुलसाता
रात में निर्लज्जता से
तारों के रोम दिखाता
आषाढ़-सावन के खुले मैदान में
सरेआम हरियाली की चूनर खींच रहा है
विवश त्रस्त धरती पांचाली 
पुकारती है 'घनश्याम' को ।
(2)
सूरज के आतंक से त्रस्त
भेज रही है चिट्ठियाँ 
सहमी सिकुड़ी नदी तलैयाँ
लेकिन बादलों का रवैया
आलसी पुलिस की तरह
आते हैं आते हैं--कहकर 
सिर्फ बहलाते हैं
(3)
शैशव में ही सूखाग्रस्त
दुर्बल बच्चे सी फसलें
बीमार ,मुरझायी खड़ी हैं ।
कुपोषण से घबराई
उपचार के लिये
जैसे फर्श पर ही
पड़ी है ।
पर बादलों का व्यवहार ,
किसी चलताऊ दवाखाने का उपचार ।

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

देवता प्यासे ही सोगए !

देवशयनी एकादशी। देवताओं के सोने का दिन । माना जाता है कि अब देवता शयन करेंगे । चार माह बाद 'देवउठनी' एकादशी (दीपावली के ग्यारहवे दिन) को उनकी नींद टूटेगी। तब तक सगाई-ब्याह आदि शुभकार्य कार्य सम्पन्न नही हो सकेंगे। ये चार महीने (चौमासा) बरसात के हैं। कहा जासकता है कि देवशयनी एकादशी वर्षाऋुतु के आगमन की विधिवत् सूचना है। इसके साथ ही शुभकार्यों  के अलावा भी मनचाहे खान-पान , रहन-सहन आदि पर भी प्रतिबंध रहता है। मुझे याद  है दीपावली से पहले बेंगन , गोभी , कढ़ी ,हरे पत्तों  वाली सब्जियां , गन्ना आदि निषिद्ध  थे ।इन मान्यताओं  के पीछे  के कारणों पर अलग से बहुत कुछ लिखा जा सकता है ।
हमारे क्षेत्र में  देवशयनी की एक रोचक मान्यता है। 
सुबह नहाकर खुले आँगन में गोबर से लीपकर शुद्ध मिट्टी से बनाकर पाँच देवताओं को स्थापित किया जाता है ।
(' तीन देवता तो सुने हैं। ये पाँच देवता कौनसे हैं'---इस जिज्ञासा का समाधान गाँव के एक पंडित जी कुछ यों देते हैं --
"सदा 'भवानी' दाहिनी गौरी पुत्र 'गणेश' ,पाँच देव रक्षा करें 'ब्रह्मा विष्णु महेश।'" दाहिनी यानी अनुकूल)

हल्दी ,रोली ,दूब, अक्षत आदि से पूजा कर हलुआ-पूरी का भोग लगाया जाता है लेकिन जल नहीं दिया जाता। सामान्यतः भोग लगाने के बाद जल तो समर्पित किया ही जाता है। बचपन में मैंने एक दिन जब मां  देवताओं को भोग लगा रही थीं मैंने माँ को जल से भरा 'गंगासागर' लाकर दिया । मैंने सोचा कि माँ भूल गईं हैं । हमेशा 'अग्यारी' करने के बाद जल तो चढ़ाती ही हैं लेकिन वे लोटा को दूर ही रखने का संकेत करती हुई बोलीं---"आज देवताओं को केवल भोजन कराना है पानी नही पिलाना है ।"
"अरे ! ऐसा कही होता है कि खाना खिलादो और पानी मत दो ! भला पानी कहाँ से पिएंगे तुम्हारे देवता?" -मैं हंस पड़ी तो मां गंभीरता से बोलीं --
"पानी वे अपनेआप पियेंगे।"
"कहाँ से? कैसे?"
"बादलों से माँगकर और क्या ।"
मैं चकित । लेकिन तब और भी अचरज हुआ कि शाम होने से पहले ही पानी बरस गया । इतना कि मिट्टी से बने 'देवता' बहकर  पूरे आँगन में फैल गए ।
इतना विश्वास ! ऐसी अधिकारपूर्ण हठ ! कि उसे टालने का सवाल ही न उठे । मैंने वर्षों तक यही होते देखा कि किसी और दिन बरसे या न बरसे लेकिन देवशयनी एकादशी जरूर पानी में सराबोर होती।
दादी कहतीं थीं कि "देवता बरसा के जल से ही 'तिरपत' होते हैं।" चातक के लिये भी यही कहा जाता था ।
मुझे लगा कि परम्पराएं जब गहन विश्वास के साथ निभाई जातीं हैं तो वे व्यर्थ नही जातीं। ईश्वर की आराधना में भी यही बात है। क्योंकि विश्वास ईश्वर का ही एक रूप है ।
हमारे गाँव में इसी तरह की एक और प्रथा थी। जिस वर्ष वर्षा की प्रतीक्षा सहनशीलता के पार होने लगती थी तब इन्द्र देवता को मनाने के लिये 'रोटी बनाने' का आयोजन होता था । चौकीदार पूरे गाँव में सूचना कर देता था कि आज अमुक मैदान या खलिहान में 'रोटी' बनेगी । उस दिन न कोई ऊँचा होता न नीचा । न अमीर न गरीब । सभी परिवार ( स्त्री-पुरुष मिलकर) एक साथ बनजारों की तरह गाँव से दूर पेड़ों के नीचे उपले जलाकर अपनी रोटियाँ बनाते थे। साथ में सब्जी , नही तो आलू या बैंगन का भुर्ता ही सब्जी का काम देता। उसीसे भगवान को भोग लगाते । प्यासी गायों की रँभाते हुए बादलों को पुकारते और फिर निर्जल ही कीर्तन करने बैठ जाते --"अब मेरी लै लेउ खबर गिरधारी ...।" 
ढोलक ,मंजीरा, झींका ,चिमटा (वाद्य ) के साथ भजनों का समां बँधता और ऐसी तल्लीनता से कि वह बादलों की गड़गड़ाहट और मोटी-मोटी बूँदों के स्पर्श से ही रुकता था। लोग अपना गीला सीला सामान बड़ी प्रसन्नता के साथ समेटकर भीगते हुए ही घर लौटते थे । 
नानी बताती थी (मैंने भी देखा) कि "ऐसा कभी नही हुआ कि इस आयोजन के बाद पानी नही बरसा हो।" 
अब रोटी बनाने की प्रथा है या नही और सफल होती है या नही ,मुझे नही मालूम ,लेकिन देवताओं के खुद पानी पी लेने की बात अब नही है क्योंकि आज देवता प्यासे ही सोगए । फोन से मालूम हुआ कि गाँव में भी पानी की एक बूँद तो क्या आसमान में बादल का एक टुकड़ा तक नही है। 
अब लोगों की पुकार में वह बात नही । वैसा विश्वास नही । देवता भी शायद कुछ तय नही कर पाते कि प्रार्थना कहाँ होरही है ,वरदान कहाँ देना है ।कि अपराध कोई करता है और सजा किसी को सुना दीजाती है ।


फिर भी हे देव ,भला सगुन की कुछ बूँदें तो गिरा देते। कंकरीट के भवन और सड़कों को  तुम्हारी प्यास की चिन्ता है या नही लेकिन खेतों की माटी को चिन्ता भी है और प्रतीक्षा भी । प्रथा के विश्वास को बनाए रखने कुछ फुहारें तो बरसा देते । हे देव ! इस तरह भी कोई बिना पानी पिए सोता है ? 


( गाँव में वर्षा के और दूसरे उपायों का ,जो पहले हुआ करते थे ,वर्णन अगली कड़ी में )


रविवार, 6 जुलाई 2014

वह घर मुझे आज भी अपनी ओर खींचता है ।

यह सच है कि जहाँ बचपन व्यतीत होता है वहाँ से एक अटूट लगाव होता है लेकिन उस घर में मेरा बचपन नही बीता । छोटे भाई ने आने में ऐसी जल्दबाजी दिखाई कि मुझे माँ की गोद और अपना जन्मगृह छोड़कर नानी की शरण लेनी पड़ी । इस तरह बचपन ननिहाल बड़बारी ,बानमोर रामपुर आदि कई गाँवों में टुकड़ा-टुकड़ा गुजरा। ये सभी स्थान मेरी यादों में तो हैं लेकिन उस घर की याद व अनुभूतियाँ कभी अलग होती ही नही हैं।

मिट्टी के कच्चे घरोंदों वाले उस घर में हालांकि खास सुविधाएं नही हैं । कभी प्रतिष्ठा का पर्याय रहा वह घर ,अब जर्जर खपरैल , टुकडा-टुकडा गिरती दीवारों और विपन्नता का प्रतीक बन गया है लेकिन उसमें एक जादू है जो आज भी बरकरार है और जो मुझे खींचता है . यही नहीं खुश रहने की एक जो अभावों और समस्याओं के बीच भी सबको हँसने और उन्मुक्त रहने की दुर्लभ प्रवृत्ति भी  बनाए हुए है . मैंने देखा है कि जब सब लोग मिलते हैं तो सिर्फ उन्मुक्त होकर ठहाके लगाते हैं , गीत गाते हैं . मैं मानती हूँ कि अगर आपको खुलकर हँसना आता है तो चिन्ताएं आपसे दूर खड़ी ताकती रहेंगी . निश्चिन्त रहने का यह गुण दुर्लभ है और यह सम्पन्नता से उत्पन्न  नहीं होता .

मैं अपने पैतृक गाँव मामचौन (मुरैना) की बात कर रही हूँ, जहाँ मेरा जन्म हुआ। जन्म के एक-डेढ़ साल और छठवीं-सातवीं के दो वर्षों के अलावा मुझे वहाँ रहने का अवसर नही मिला। अभी पाँच वर्ष बाद गई ( रात तो लगभग बीस साल बाद बिताई) तो  देखा घर की हालत और भी बदतर होगई है। 
छोटे ताऊजी दो माह पहले 11 मई के दिन सबको अलविदा कह ही गए। 
आँगन और दीवारें आँसू बहाती हुई सी प्रतीत हुईं ,लेकिन मूँज की रस्सी से बुनी हुई खटिया और बडी जिया ( मौसी ,ताई भी )के हाथों की बनाई दरी पर लेटते हुए समय के इस अन्तराल की जरा सी भी अनुभूति नही हुई . लगा जैसे कि मैं सदा से ही वहाँ  रही हूँ हर मौसम और ऋतु को जीते हुए । 
विगत बीस सालों में हुए परिवर्तन बात करें तो काफी कुछ बदल गया है। अब गाँव तक पक्की सड़क है । दो तीन बसें चलती हैं। मुझे बचपन के दिनों की याद है जब आवागमन का कोई साधन नही था ,तब हम लोग नहर के किनारे ( चम्बल निचली मुख्य नहर ) पैदल ही आते जाते थे। (ननिहाल से मेरा पैतृक गाँव लगभग नौ-दस किमी है।) नहर पर बने पुलों को गिनते हुए कि यह पहाड़गढ़ वाला पुल है फिर धूरकूड़ा का पुल ,अब सगौरिया का पुल आगया आगे कोंड़ा और फिर मामचौन। चलते-चलते हम बच्चे भगवान से किसी वाहन के आने की प्रार्थना करते थे और कभी संयोग से कोई बैलगाड़ी या जीप निकलती और उसका दयालु चालक हमारे कुम्हलाए चेहरे देख बिठा लेता तो हमें ईश्वर के होने का पक्का विश्वास होजाता था । 
रसोईघर में चूल्हे की ओट के लिये बनाई दीवार   
अब बस से बीस-पच्चीस मिनट में ही गाँव में पहुँच जाते हैं। सचमुच आवागमन के साधनों का विकास क्षेत्र के विकास की पहली आवश्यकता होती है। 
हमारे घर के आसपास लगभग सभी मकान पक्के और सर्वसुविधायुक्त बन चुके हैं । खरंजा ( गली का फर्श ) तह पर तह इतनी बार बन चुका है कि गली हमारे घर की देहरी से कुछ ही नीची रह गई है । मुझे याद है कि गली से घर की बाहरी देहरी और चबूतरा इतना ऊँचा था कि उस पर बच्चे नही चढ़ पाते थे। गली से पौर के दरवाजे तक तक पाँच-छह सीढ़ियाँ थीं । विकास की यही गति रही तो एक दिन गली घर से ऊँची हो जाएगी। 
अनाज की कोठी का दूसरा हिस्सा जिसका अब रूप बिगड़ गया है ।
मौसी ( बड़ी जिया) के हाथ की पुरानी साड़ियों से बुनी गई दरी ।
लेकिन विकास की दौड़ में , स्वार्थ व धनलिप्सा बढ़ने के चलते कुछ बदलाव बहुत ही अखरने वाले भी हैं । जो सबसे बुरी बात लगी वह थी पेड़ों की कमी ।  सबसे अधिक अखरती है इमली के दो बड़े पेड़ों की कटाई की जो गाँव की पहचान दूर से ही कराते थे। मुझे याद है इमली के पेड़ों की घनी छाँव तले माध्यमिक विद्यालय चलता था जिसमें मैं भी दो वर्ष पढ़ी थी । सावन के महीने में इमली की मजबूत शाखाओं में कितने ही झूले डाले जाते थे । सारा वातावरण सुरीली मल्हारों से गूँज उठा था । मेरी दादी बहुत अच्छा गातीं थीं । हर ठिक-त्यौहार के गीत उन्हें आते थे । पर थीं बड़ी अभिमानिनी। बड़ी मनुहारों के बाद ही वे कोई गीत सुनातीं थीं वह भी अधूरा । उन्होंने किसी को अपने गीत नही दिये । मेरी माँ ने जरूर कुछ गीत सीख लिये थे जिनमें से सावन के गीतों को मैंने अपने तीन आलेखो में लिया है । अफसोस कि मैं उनसे कुछ और गीत संचित करूँ मेरी माँ की याददाश्त लगभग चली गई है।


इस घर में मेरा जन्म हुआ 
मेरे दादाजी श्री निरंजनलाल श्रीवास्तव बहुत ही सरल सज्जन ,एक रियासत में कर्मचारी थे। हमारे पूर्वज कभी जमींदार हुआ करते थे। माँ बताती हैं कि दादाजी के किसी रिश्तेदार की कुप्रवृत्तियों के कारण सारी उनकी सम्पत्ति कुर्क होगई और बाद में मेरी दादी ने खुद अपने हाथों से यह घर बनाया कच्ची दीवारों वाला लेकिन बेहद कलात्मक और सुरुचिपूर्ण। कच्ची दीवारें भी इतनी सुडौल व सपाट कि सीमेंट के प्लास्टर का भान करातीं थीं । लाल मिट्टी से लिपे हुए आँगन में जब दादी या मौसी खडिया के घोल से चौक पूरती थीं तो आँगन में जैसे चाँद-सितारे उतर आते थे । जो भी देखता देखता ही रह जाता था। बड़े ताऊजी ने दादी की विरासत पाई थी । उनके जीवित रहने तक घर में अनौखी सजावट रहती थी । रसोईघर की दीवार पर महालक्ष्मी जी का चित्र ,मिट्टी के खूबसूरत कँगूरों और बेलबूटों वाला तुलसीघर ,अनाज रखने की मिट्टी की कोठियाँ जो एक तरफ से अनाज भरने के काम आतीं तो दूसरी तरफ सुन्दर अलमारी का काम देतीं थी। हमारा घर त्यौहारों , सांस्कृतिक कार्यक्रमों और बाहर से आए विशिष्टजनों के लिये शानदार मेजबान होता था।  

बड़ी जिया जो मेरी मौसी भी हैं और  ताई भी।

अब घर का वह रूप नही रहा । न ही कोई वैसा परिश्रमी और कलाकार । न वह शान ,जो दादी और ताऊजी के समय रहा करती थी । दीवारें और आँगन ऊबड़-खाबड़ है। बड़े होकर उड़ गए पंछियों के बाद खाली रह गए घोंसले जैसा ही सूनापन उन घरोंदों में है। यह सूनापन वहाँ रहने वाले स्वजनों--भैया भाभी आदि--के भीतर भर रहे सूनेपन व निष्क्रियता का ही प्रतीक है, लेकिन मुझे भुरभुराकर गिरती दीवारों से , जर्जर खपरैलों से आज भी उतना ही लगाव है . एक असीम तृप्ति मिलती है उस आँगन में . 
मैंने छोटे ताऊजी का बँगला देखा , उनका चित्र लिया जो अभी-अभी उनके जाने के बाद बनवाया गया है। अपने जन्म वाला 'किवारी वाला घर' देखा। कुछ देर दादी वाली कोठरी में बैठी। 
घर के पिछवाड़े बेर के पेड़ के नीचे छितराई सी छाँव में राहत का कोरा सा अनुभव करती उदास गाय देखी । 
जर्जर दीवारों में लिखे विगत के शानदार गीत पढ़े। ताऊजी के चित्र व मूर्तियों को जो अब नही हैं ,यादों में उतारा .
और जलती दोपहर में आँगन के नीम की छाँव में पडी खटिया पर बैठे-बैठे एक असंभव की चाह जागी-- काश वे दिन लौट आते । 
और  रात में तारों से भरे आसमान का वैभव देखा ,मन और आँखों में भरा आसमान में इतने तारे शहर में तो कभी नहीं दिखते . वर्षों बाद गीदड़ों की आवाज सुनकर बड़ा अच्छा लगा  . शहर में पले बढ़े बच्चों के लिये यह जानवर और उसकी आवाज केवल कहानियों में मिलेगी .
वह घर आज भी मुझे अपनी ओर खींचता है . तभी तो सुबह वहाँ से चलते हुए मुझे कुछ अन्दर से कुछ निकलकर वही छूटता हुआ महसूस हुआ और मेरी आँखें अनायास ही भर आईं ।