मंगलवार, 15 जून 2010

मान्या का लिखना तो देखो


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मान्या का लिखना तो देखो

मान्या का लिखना तो देखो
काम उसे कितना तो देखो
पेन किसी का हाथ लगा है
यहां वहां घिसना तो देखो

गड़बड़ गोल मकड़जालों सी
गुड़िया के गुच्छे बालों सी
आड़ी-तिरछी सी रेखाऐं
झरनों और नदी नालों सी

पढ़ो पढ़ सको नई इबारत
समझो इसे सिर्फ शरारत
बचपन की चंचल कविता है
कोमल सी मासूम कहावत

कापी से क्या होगा
उसको छत भी पड़े  पूरी
आंगन चबूतरा लिख डाले
फिर भी बात अधूरी

रचदी हें सारी दीवारें
मम्मी की साड़ी सलवारें
पीठ खुली पापा की देखी
पल में खींची कई कतारें
चाचा की जो मिली डायरी
नन्हे हाथों नई शायरी
आसमान मांगेगी एक दिन
तारे-चांद लिखेगी अनगिन

शनिवार, 5 जून 2010

मेरे आँगन नीम

बरसों से आँगन में मौजूद यह नीम का पेड़ कई मुश्किलों का घर होने के बावजूद हमारे साथ है । मुश्किलें--जैसे कि हर समय कचरा होते रहना । पक्षियों का कुछ न कुछ (हड्डी,माँस,कुतरे फल आदि )गिराते रहना ।बरसात में तो और भी कई दिक्कतें होतीं हैं ।पति इसे कटवाने के विरोधी इसलिये रहे कि इसे मयंक के जन्म के साल ही (1985) सास जी ने अपने हाथों से लगाया । यानी यह मयंक की उम्र का है .  बच्चे ,खास तौर पर गुल्लू(प्रशान्त)इसे कटवाने का ही नहीं छँटवाने तक का विरोध इसलिये करता रहा है कि पेड़ कट गया तो इतनी सारी चिडियों व गिलहरियों का आश्रय मिट जायेगा ..सबसे बड़ी मुश्किल पड़ोस की छत और आँगन में  पत्तों के झरने से  जब तब उत्पन्न होते तनाव की है...पर क्या करूँ , बेवशी अनुभव तो करती हूँ पर यह नीम हमारे जीवन का अहम् हिस्सा है । कुछ इस तरह -----


मेरे आँगन नीम,
धूप में छतरी जैसा है ।
गर्मी धूल प्रदूषण में यह,
प्रहरी जैसा है ।

चिडियाँ करतीं यहाँ बसेरा ।
गिलहरियों का लगता फेरा ।
कौवे तोते करें किलोलें,
गूँजे हर पल आँगन मेरा ।
देता रहता पता हवा का ,
खबरी जैसा है ।

पत्ता-पत्ता बतियाता है ।
टहनी-टहनी से नाता है ।
छाया माँ के आँचल सी है ,
सिर पर हाथ पिता का सा है ।
कितना कुछ बाँधे ,
दादी की गठरी जैसा है ।

कितना ही कचरा फैलाए।
पतझड़ में पत्ते बरसाए ।
बसा हुआ है यह साँसों में,
हरियाली है अहसासों में ।
सबसे अच्छी ,
अपने घर की देहरी जैसा है ।
मेरे आँगन नीम ,
धूप में छतरी जैसा है ।
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गुरुवार, 3 जून 2010

पहली--बारिश -कुछ क्षणिकाएं

(1)
बारिश की बूँदें,
पत्तों पर पडीं ऐसे-
प्रसाद की रेबडी,
हथेली पर अम्मा रख देती हैं जैसे ।
(2)
बारिश की पहली फुहार।
कई दिनों के फाकों के बाद ,
रमुआ को मिली ,
पहली पगार।
(3)
लगते हैं ऐसे,
ये छींटे बौछार के।
बोले किसी ने हैं,
दो बोल प्यार के ।
(4)
वह पौधा था अभी तक,
रूठा और मुरझाया।
खिल गया..
बूँदों ने कानों में
कुछ तो कहा ।
(5)
आसमां के धरती को,
स्नेहमय पत्र,
बाँट रहे बादल,
यत्र-तत्र-सर्वत्र ।
(6)
बादलों की डायरी में ,
ऐसी कहानी --
कि प्यासों की भीड है ,
और चुल्लू-भर पानी ।
(7)
तपती धरती पर
बूँदों का असर कुछ ऐसा पडा,
कि भूख से बिलबिलाते बच्चे को ,
रोटी का एक टुकडा ।