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मान्या का लिखना तो देखो
मान्या का लिखना तो देखो
काम उसे कितना तो देखो
पेन किसी का हाथ लगा है
यहां वहां घिसना तो देखो
गड़बड़ गोल मकड़जालों सी
गुड़िया के गुच्छे बालों सी
आड़ी-तिरछी सी रेखाऐं
झरनों और नदी नालों सी
पढ़ो पढ़ सको नई इबारत
समझो इसे न सिर्फ शरारत
बचपन की चंचल कविता है
कोमल सी मासूम कहावत
कापी से क्या होगा
उसको छत भी पड़े न पूरी
आंगन चबूतरा लिख डाले
फिर भी बात अधूरी
रचदी हें सारी दीवारें
मम्मी की साड़ी सलवारें
पीठ खुली पापा की देखी
पल में खींची कई कतारें
चाचा की जो मिली डायरी
नन्हे हाथों नई शायरी
आसमान मांगेगी एक दिन
तारे-चांद लिखेगी अनगिन