सोमवार, 19 मई 2014

कै हंसा मोती चुगै...

19 मई 2014 (पाँचवीं पुण्य तिथि)
पिछली  स्मृतियाँ  जारी....

अपने सिद्धांतों के प्रति काकाजी में जो खंड था उसका प्रभाव अच्छा हो रहा था ऐसा नहीं था। वे अपने विश्वास में धोखे खाजाते थे। खरीददारी में कच्चे दाल-मसालों की हो या भाभियों के लिए सबसे बड़े शौकीन की , साकी ने उन्हें बहुत ठगा था। उन्हें ठगना कोई मुश्किल नहीं था। केवल समन से वैज्ञानिक कहते हैं--- "मास्टरसाहब , विश्वास करना यह चीज है , इस दाम पर सिर्फ आपके लिए है। क्या आप सामान झूठ बोलेंगे ?"   इस पर भी जब सामान खराब निकलता है और मां कहती है कि सामान देख-पकड़कर ले लो तो नाराज हो जाते थे। कहो कि "उसने तो अच्छा दिखाया था। लोग झूठे मूर्तियाँ और फाउल हैं मैं क्या कर सकता हूँ ?" या कि "आइंदा उनसे सामान लाऊंगा ही नहीं।" और अंत में यह कि "ठीक है फिर तुम्हें ले आओ करो।" है ना अजीब तर्क ? लेकिन वे ऐसे ही थे। मजे की बात यह है कि उनके हर सिद्धांत के समर्थन में उनका कोई भी उद्धरण नहीं था। ऐसे में वे कहते हैं-- " कबिरा तुम ठगिए और न ठगिए कोय। तुम ठोगे सुख उपजे और ठगे दुख होय।" दूसरी वे गुड़िया उस बात पर जोर देते थे जिसे दूसरे लोग नहीं मानते थे। और जिसे सब मानते थे वे उसे भेड़चाल में बंद कर देते थे। जैसे अगर हर साल साल के लिए ' पुन्न ' ( धार्मिक भोज का आयोजन) कर रहे हों तो काकाजी जरूर अपना विरोध करेंगे। ऐसे भोज का आयोजन करने से भगवान प्रसन्न नहीं होते। का पैसा बरबादी है। वे अक्सर हमें यह दोहा भी सुनाते रहते थे-- " लाइक-लीक गाड़ी चलै लीक चलै कपूत। लाइक छोड़ो तीमारदार शायर सिंह सपूत।" उनके लाइक को फिर से शुरू करने की सनक ने अपनी (हम कंपनी) मुश्किलें भी बहुत बढ़ा दी। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि अपने इन सिद्धांतों के कारण काकाजी को बेरोजगारी भत्ता उठाना पड़ा था। पर उन्हें जरा भी पछतावा नहीं होता था। रिश्वत शब्द से तो वे इतनी दूर थे कोई कट्टर वैष्णव सामिषाहार से। इस सन्दर्भ में उदाहरण स्वरूप बहुत सी घटनाएँ हैं। लेकिन यहां सन् 1990 की एक घटना ही सत्य है। गाँव जहाँ हमारा घर है उसके बायीं ओर ब्राह्मणों के घर हैं और ऊपर और कुशवाहों (ठाकुर नहीं) के हैं। जहां ब्राह्मणों से हम सामाजिक रूप से जुड़े थे वहीं खेती के लिए कुशवाह समाज पर प्रतिबंध थे। जब दोनों पक्षों में एकता का कोई विरोध नहीं था तब सब कुछ बड़ी सहजता से चल रहा था लेकिन कुशवाह समाज की एक बेटी की निर्मम हत्या ने सब कुछ पलट कर रख दिया। कुशवाहों ने ब्राह्मण समाज पर लगाया हत्या का आरोप। हालात इतने बड़े हैं कि काकाजी की शानदार शिक्षकीय भूमिका और माँ के सामाजिक सहयोग को भुलाकर और हमारी बात सुने समझे बिना ही कुशवाहों ने हमारी ज़मीन छोड़ने का निर्णय लिया। हमारे सिद्धांत की स्थिति यह है कि यहां केवल कुशवाह लोग ही खेती कर सकते हैं। आसपास के सारे खेत उन्ही के हैं। क्योंकि लाठी " भुज भुजंग की बैसंगिनी भुजंगिनी सी..."हमेशा उनके हाथों में रहता था। सिक्का फरसा उनका सम्बल था। विरोध करने वाले की खेती करने की कोई और सोच भी नहीं हो सकती थी।



  
 
 




 
 
 
तो हुआ यह कि आषाढ़ की पहली वर्षा साथ ही में (हैसियत और नीड के अनुसार) जहां हल-बैलों और साज़िशों का मेला सा लगा , जुताई-बुवाई से खेत आबाद हो गए वहीं हमारे खेत बिसूरते हुए से खाली सूने पड़े थे। हमने सोचा कि हमारे सार्वभौम में अब संपत्ति तो है , रबी की फसल भी शायद ही हो क्योंकि कुशवाहों को कोई समझा नहीं सकता। काकाजी ने उन्हें पूरी तरह से गलत तत्व दिए थे, बजाय इसके कि उनसे दूरियां बनाई गईं, ठीक माना जाता था लेकिन यहां तो सालभर के फल का सवाल था। " ऐसी ही एक बात बन सकती है मास्टरसाहब।"

कुशवाहों की ओर से एक आदमी आया। काकाजी ने अपनी ओर से ऐसा देखा जैसे कुछ सुना ही नहीं जा सकता---"मास्टरसाब ये तो बुरा हो रहा है। खेत सुने रहिए। मेरी मानो तो फलां आदमी से बात करो। सौ-दो सौ रुपए अपने साथियों में रखदो। उसकी बात कुछ नहीं हो सकती। काचियों में तो उनके ' पेसाब से भी दिए जलते ' हैं , ब्राह्मणों में भी उनकी धाक कम नहीं है माड़साब।" " किससे ? मुकंदी को ?? " यह भी पता चला कि आर्थिक रूप से हम पर काफी प्रतिबंध थे। काकजी को वेतन बहुत ही मामूली सा था। " उस गद्दार और शैतान आदमी को सौ रुपए तो क्या एक फूटी कौड़ी भी न दंगले। तू ने यहां भेजा था। यहां से चल जा। कह दे कि मुंदियों की सरकार काछियों--ब्राह्मणों में घूमेगी। यहां नहीं। खेत एक क्या चार साल पड़े रहो।" " हे भगवान् !"----माँ का चेहरा फ़क्क । "गुस्से में देखें न ताव। आदर्श ब्राह्मणों को समागम की क्या आवश्यकता थी ?"  लेकिन काकाजी ऐसी परवाह कब करते थे। " मैं तो माड़साब आपके भले के लिए कह रहा था। खेत ऐसे ही रह गए थे तो धरती मैया ' सराफ ' देवी।" " मुझे शाप मत दो, तुम लोग मुझे धोखा दो, क्योंकि तुम लोग मुझे धोखा देते हो। मैं तुम लोग मुझे धोखा देता हूं ? और वह मनुष्य क्या पसन्द करता है... ? कभी नहीं।" कुछ हितैषियों और व्यवहारकुशल लोगों ने काकाजी को बताया कि , " माड़साब ' नाकुछ ' रुपये हैं जबकि घाटा हजारों का होगा। फेकदो उसके सामने और निर्देश को आबाद दो।" " मैंने गलत आदमी को अपने हित के लिए गलत दवा का इस्तेमाल नहीं किया। ' कै हंसा मोती चुगाई कै लंघनी मर जाए '... " इस सूक्ति को काकाजी बार-बार बड़े गौरव के साथ अपना संबल बक बात अपनी पर अड़े रहते थे। तो हुआ ये कि हमारे खेत उस साल जुताई-बुवाई का इंतज़ाम करते ही रह गए। लोगों ने कहा--"मास्टर कंजूस और सनकी है। दो सौ रुपये के उफान के फेर में हजारों का नुक्सान कर लिया। ऐसी हेकड़ी किस काम की ?" लेकिन काकाजी ऐसे ही थे। उन्होंने तो अगले साल एक ठाकुर को काकाजी की बात बताते हुए कहा कि अपने बाली पर कुशवाहों को चुनौती देते हुए सरकार ने बीजारोपण किया। और लगातार चार साल तक पूरे कुशवाह समाज को चुनौती देते रहे हमारे खेत आबाद रहे। बाद में धीरे-धीरे जब दैत्य समाप्त हो गया तो कुशवाहों ने अपनी शांतिचित्त काकाजी से खेत मांग ली। काकाजी के ऐसे विचार का सबसे अधिक प्रभाव डाला गया। अच्छा भी और बुरा भी। अच्छा तो यही है कि मेरे पास हमेशा के लिए गलत के प्रति विद्रोह हो रहा है। विद्रोह निश्चित ही ऊर्जावान भाव है जो कभी सृजनात्मक भी होता है और कभी विध्वंसक भी। लेकिन जैसा कि उन मुस्लिम अदिगता, निरपेक्षता और निर्भयता नहीं आ अशिक। काश अजाती.... 

रविवार, 11 मई 2014

रहत अचम्भा जानिये ।

सोचा था कि काकाजी के लिये कुछ लिखूँ ।आधा-अधूरा कुछ लिखा भी लेकिन पोस्ट यह संस्मरण हुआ , क्यों हुआ ?
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"ताऊजी ,मैंने सुना है कि आप पहली कक्षा में ही स्कूल छोड़ आए थे ।"--मैंने एक बार उनसे पूछा --यही नही आपने मास्टर जी की मूँछें भी काट दी थीं ।"
" तो क्या करता ! ससुरे मास्टर ने पहले दिन ही ऐसी संटी मारी कि खाल उधड गई थी पीठ की । बस हमने सोच लई कि इसका बदला तो लैना पड़ैगा आखिर किस गलती पर उसने हमको मारा ।" 
"तो वह  बदला कैसे किया ताऊजी ?"
"हमने रात में जब मास्टर जी खर्राटे भर रहे थे , कैंची उठाई और चुपचाप उनकी लम्बी-लम्बी 'पूरा' ( घास का गट्ठर) जैसी 'गोंछ' कतर डालीं । सोचा सबेरे की सबेरे देखी जाएगी । " 
"फिर क्या हुआ ?"
"होता क्या अम्मा ने मास्टर से कह दिया कि लड़का पढने भेजा था , पिटने नही । हमें ना पढवानों ।"
फिर आगे कभी नही पढ़े ?"
"अरे बिटिया ,तब जे 'साटीफिकट' नही आदमी का हुनर देखा जाता था । देख आज मैं पोस्टमास्टर का ढोल टाँग कर मजे में चैन की बंसी बजा रहा हूँ अपने बँगला में , कि नही ? ये दोनों ( भाई )पढ़ लिये बहुत है पर बेटी, जो काम मैं कर सकता हूँ , न बाबू ( मेरे पिताजी ) कर सकता है न भैया ( बड़े ताऊजी भूपसिंह) । भोपाल मंत्रालय तक में बड़े बड़े अफसर उठकर हाथ में से बैग ले लेते हैं ।साथ बैठाकर चाय पिलाते हैं और काम तो चुटकियों में कर देते हैं । "
कुछ समय पहले ही ये संवाद हुए थे मेरे अपने छोटे ताऊजी श्री रतनलाल श्रीवास्तव के साथ ,जो आज अपनी जीवन-लीला शान के साथ पूरी कर अपने दोनों भाइयों से जा मिले हैं । 
शाम पाँच बजे यह घटना मामचौन, (मुरैना जिले का एक सुदूर गाँव) में घटी है और मैं ढाई हजार किमी दूर बैंगलुरु में  सजल आँखों और भरे हदय से उन्हें याद कर रही हूँ ।
 छोटी बहिन ने बताया कि वे बीमार नही थे । बस एक-दो दिन खाना नही खाया । हम सभी का यह पक्का विश्वास था कि एक बार तो अपनी हेकड़ी में वे मौत को भी दुत्कारकर भगा देंगे । कहेंगे कि " जा री जा , फिर आना । अभी मेरा मन नही है जाने का ."
 लेकिन सच वही है जो कबीरदास ने कहा है ---
" नव द्वारे का पींजरा ,तामें पंछी पौन ।
 रहत अचम्भा जानिये ,गए अचम्भा कौन ।" उसके आगे भला किसी की हेकड़ी चलती है ?" 
दादी के तीन बेटे थे । सबसे बड़े श्री भूपसिंह (किशोर भैया के पिताजी )और सबसे छोटे मेरे पिताजी श्री बाबूलाल । ये  ( श्री रतनलाल ) मँझले थे । और आदतों व विचारों में विरले भी । अनपढ, लेकिन पढ़े-लिखों की बोलती बन्द कर देने वाले ।
आज़ाद खयाल ऐसे कि विवाह का बन्धन ही कभी स्वीकार नही किया । अपने भाइयों की सन्तानों में ही अपना ममत्त्व बाँटकर सन्तुष्ट थे । वे गाँव के पहले पोस्टमास्टर होने का बाकायदा आत्मसम्मान भी रखते थे । 
 मुझे नही पता कि जनसंघ के एक नेता , जिनके साथ अक्सर वे जाते रहते थे , यहाँ उनकी कितनी पहुँच थी या कि बिना स्कूल में पढ़े और बिना किसी सर्टिफिकेट के वे पोस्टमास्टर कैसे बने । पर लोगों के बीच उनके रौब और हमारे दरवाजे पर लगी लाल पत्र-पेटिका और सुबह शाम फर्श पर बिखरे रहते कार्ड ,अन्तर्देशीय पत्र और लिफाफे ,रजिस्ट्रियाँ , तार  चपडी ,ठप्पा ,काली स्याही आदि उनकी ताकत और नौकरी का पक्का प्रमाण थे । हम उनके कार्यक्रमों को कौतूहल से देखा करते थे ।  
उनकी बढ़ चढ़कर बोलने की आदत थी । बड़े ताऊजी और पिताजी को यह जरा भी पसन्द नही था । पर वे इसे अपनी राजसी प्रवृत्ति का जरूरी भाग मानते थे । हम सब ताऊजी की ऐसी शेखियों पर खूब हँसते थे पर कभी शर्मिन्दा भी होना पडता था । मैं जब भी गाँव में अपने घर जाती थी , वे गाँव वालों से मेरा परिचय कराते,  कहते---" देखो हमारी बेटी , कालेज में लेक्चरार है ।"
"ताऊजी!"--मैं शर्म से पानी-पानी होजाती थी --"मैं अभी सिर्फ प्राइमरी की मास्टरनी हूँ । लेक्चरर नही .....।" ( तब मैं प्राइमरी स्कूल में ही थी )
" अरे आज नही है तो क्या , कल हो जाएगी, देखना ।'--वे विश्वास से कहते -" पता है, इससे मेरी शान कितनी बढ़ जाती है ।"
कच्ची लेकिन थोड़ी बड़ी पाटौर ( खपरैल) को वे बँगला कहते थे . वही उनका डाकघर भी था । जो हमेशा कन्नौजी इत्र से महकता रहता था । वे उसमें उसी शान से रहते थे जिस शान से बीते दिनों में जमींदार-जागीरदार रहते  । जब भी बाहर निकलते थे ,किसी बड़े विशिष्ट व्यक्ति की तरह । नील-टिनोपाल से झकाझक हुए सफेद धोती-कुरता , बालों में ब्राह्मी आँवला तेल ,कानों में 'कदम्ब' या 'काला-भूत' का फाहा और हाथों में चमड़े का काला बैग । भले ही उसमें उनके केवल लँगोट-तौलिया ही रखे हों और अपनी कुलीनता के गर्व से भरे सीना ताने झूमती हुई चाल । 
राह चलते जब कोई उन्हें सिर झुकाकर  "लालाजी राम राम" कहता तो वे उसे अभयदान देने की मुद्रा में सिर हिलाकर उत्तर देते थे । उन दिनों फर्श, गैस लालटेन हारमोनियम ,ढोलक जैसी चीजें केवल ताऊजी के बँगला में ही मिलती थीं । और इसका उन्हें बराबर भान था । अपनी कीमत कैसे कायम रखी जाती है कोई उनसे सीखता । 
हम चार भाई-बहिन हालाँकि उनके सान्निध्य में कम रहे । पिताजी कुछ कारणों से हम सबको लेकर घर छोडकर चले गए थे जबकि बड़े ताऊजी (जो प्रकृति से कलाकार शान्त और लड़ाई-झगड़ों से दूर रहने वाले थे ) की छहों सन्तानें छोटे ताऊजी की छत्रछाया में पलीं । उन सभी पर छोटे ताऊजी की बेबाकी ,ज़िन्दादिली और हर तरह के संघर्ष के लिये तत्पर रहने का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है । वे अपने पक्ष के लिये जितने अडिग और मजबूत दिखाई देते हैं , हम लोग नही । छोटे ताऊजी से दूर रहकर हमें उपलब्धियाँ तो मिलीं पर एक बड़ी हानि भी हुई । 
। आज उस पीढ़ी के तीनों ही भाई नही हैं । मामचौन में लालाओं का इकलौता घर छत-विहीन सा होगया है । बँगला अब बँगला नही रह गया । हारमोनियम के सुर टूट गए हैं । दीवारें भुरभुराकर गिर रहीं हैं । आँगन टुकड़ों में बिखर गया है ।
लेकिन इससे उन्हें क्या । वे तो "जियो तो ऐसे जियो कि सब तुम्हारा है " ,वाली सोच के साथ जिए और उसी फकीराना अन्दाज़ के साथ दुनिया को छोड़ गए कि दुनिया री अब तू हमारे लायक नही रही । जा रहे हैं । तू भी क्या याद करेगी कि कोई था । 
उनके समग्र व्यक्तित्त्व के लिये मुझे आज ठाकुर रोशनसिंह( काकोरी काण्ड) की पंक्तियाँ याद आ रही हैं---- 
"जिन्दगी जिन्दादिली को जान ए रोशन 
वरना कितने पैदा होते हैं कितने चले जाते हैं ।" 

गुरुवार, 24 अप्रैल 2014

आश्वस्ति

मैं विश्वास करना चाहती हूँ 
कि तुम्हारी मुस्कान के पीछे 
नही है कोई दुरभि-सन्धि ।
कि तुम बातोंबात 
बैठे साथ-साथ
निर्वासित कर मुझे रातोंरात 
नही मनाओगे विजय का उत्सव 

मुझे सन्देह या अनुमान में 

रहने की आदत नही है 
असहज होजाती हूँ झूठ से । 
इसलिये..
मैं पूरी तरह आश्वस्त होना चाहती हूँ
थामकर सच का हाथ
निभाना चाहती हूँ रिश्तों को 
सहजता  और निश्चिन्तता के साथ ।
मुझे आश्वस्त करो ,  
कि तुमने जो मुझमें विश्वास दिखाया 
अपनत्त्व जताया 
एक पूरा सच है ।

अधूरा सच गले नही उतरता 
रूखी-सूखी रोटी की तरह ।
मैं जीना चाहती हूँ ,
विश्वास में---पूरे सच के साथ । 
विश्वास कि ,
'मैं तुम पर विश्वास कर सकती हूँ 
आँखें बन्द करके भी ।
या...विश्वास कि ,
मुझे तुम पर विश्वास नही करना चाहिये ,
खुली आँखों से भी..।

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

'कुछ ठहरले और मेरी जिन्दगी '

बावज़ूद इसके कि हम जैसी चाहते हैं ज़िन्दगी अक्सर वैसी नही होती उसे बलात् ही खूबसूरत मानने , बनाए रखने या फिर वैसी कल्पना करने से पीछे नही हटते । मेरी कविताएं भी मेरे ऐसे ही कुछ प्रयासों का परिणाम रही हैं । यह गीत--संग्रह 'कुछ ठहरले और मेरी जिन्दगी' ऐसी ही कुछ रचनाओं का संकलन है जो अभी-अभी ज्योतिपर्व प्रकाशन से आया है । 
कहते हैं कि कविता के लिये संवेदना व भावों की तीव्रता ही पहला आधार है । जो लोग पीडा की नदी में डूब कर कविता लिखते है वे ही पूर्ण अभिव्यक्ति का किनारा पाते हैं । ऐसी नदी से गुजरते हुए ही अनेक कवियों ने कालजयी कविताएं लिखी हैं और लिख रहे हैं ,लेकिन अपने इन गीतों के लिये मेरा ऐसा दावा बिल्कुल नही है । विशेषकर जब आज की विसंगतियों व पीडाओं को प्रखरता से व्यक्त करने में मुक्त-छन्द अधिक सफल और प्रभावशाली सिद्ध हो रहा है । मैंने छन्दमुक्त रचनाएं भी लिखी हैं जिनमें से कुछ आपने यहाँ पढी भी हैं ( संग्रह के कुछ गीत भी )। इस संग्रह में केवल गीत व छन्दबद्ध कविताएं ही हैं । 
वैसे तो मेरे पास (बाल-कविताओं के अलावा) लगभग तीन सौ पचास गीत व कविताएं हैं ,लेकिन उनमें अधिकतर रचनाएं व्यक्तिगत प्रलाप मानी जा सकतीं हैं । 
प्रतिकूल हवाओं में जीने की विवशता ने सृजन का कक्ष तो तलाश लिया पर उसमें खिडकियाँ नहीं थीं । अपने ही अँधेरे में घिर कर, उजाले की कल्पनाएं करते-करते लिखी गईं कविताओं में से इन गीतों को मैंने प्रकाशन योग्य समझा , लेकिन मेरी मान्यता कितनी सही है इसे आप सुधी पाठक ही तय कर सकते हैं ।
मेरे विचार से कोई कवि या लेखक जन्म से इतना पटु नही होता । उसकी प्रतिभा को प्रेरणाएं निखारतीं हैं । अवसर तराशते हैं । काव्य-साहित्य का अध्ययन एक दिशा देता है । मेरे पास यह सब नही रहा । या कि मैंने इस दिशा में कभी सोचा ही नही । 
यही कारण है कि मेरे ये गीत मेरी संवेदना के साक्षी तो हैं जिनमें कुछ पाने की छटपटाहट है ,और न पा सकने की तिलमिलाहट भी , विरोध की आँच है और प्रेम की फुहार भी, लेकिन ये गीत हिन्दी कविता के इतिहास में कोई कीर्तिमान बनाएंगे, ऐसी सुन्दर कल्पना मैंने नही पाली है । हाँ कहीं न कहीं पाठकों के हदय का कोई कोना छू सकेंगे ऐसी आशा तो रखती ही हूँ । इतनी सी उपलब्धि की अपेक्षा भी । यहाँ शीर्षक गीत है ,जो मैंने 1994 में लिखा था---
कहीं तो कोई पुकारेगा हमें 
कुछ ठहरले और मेरी जिन्दगी 
कुछ सँवरले और मेरी जिन्दगी ।

बोझ ढोते सफर कितना तय किया 
भूल जा सब ,क्या मिला है क्या दिया 
याद रखने को बहुत है एक पल 
जो मधुर अहसास में तूने जिया ।
स्वप्न,संभ्रम आस में विश्वास में 
कुछ बहल ले और मेरी जिन्दगी ।

फिक्र क्या है हो न हो चाहे सबेरा ।
अजनबी है ,इसलिये बोझिल अँधेरा 
हौसला रखना पडेगा कुछ तुझे 
और कुछ देंगी हवाएं साथ तेरा ।
हार कर यूँ लौट जाना बुजदिली है 
सोच, करले गौर मेरी जिन्दगी ।

दर्द को मत बाँट यूँ मायूस होकर
यह मिला उम्मीद और अपनत्त्व खोकर 
ना चुभन से डर ,जरा अभ्यस्त हो ले 
निकलते हैं शूल अब तो आम बोकर 
मीत ही अब मुँह छुपाकर वार करते 
कुछ सबक ले और मेरी जिन्दगी । 

(संग्रह एक दो दिन बाद किताबघर जिन्सीपुल ग्वालियर पर देखा जा सकेगा । )

शनिवार, 5 अप्रैल 2014

यों मिलना जिन्दगी से


वक्त को काटना-- 
उस तरह नही जिस तरह 
किसान काटता है पकी फसल 
या दर्जी काटता है कपडा 
बल्कि ,जिस तरह काटता है चूहा 
कागज या लकडी को--
यकीनन ,जीना नही 
बस जीने का निर्वाह करना है 
व्यर्थ सा ।
जाने क्यों 
अपने लिये ,मुझे लगता है 
कुछ ऐसा ही ।

मिलती हूँ जिन्दगी से ,  
उस तरह नही ,
जिस तरह मिलती है 
ससुराल से आई बेटी ,
अपनी माँ से 
बहुत दिनों बाद । 
बल्कि ,जिस तरह 
अपरिचित चौराहे की भीड से 
निकल भागने के लिये 
रास्ता पूछता है कोई  
किसी दुकानदार से ।

मैं जल की गहराई पर 
लिखना चाहती हूँ
एक गहरी कविता 
नदी में उतरे बिना ही 
डरती हूँ डूबने से ।
देखती हूँ लहरों को 
उजाडते हुए अपना ही घर 
गैरों की तरह  
दूर पुल से गुजरते हुए 
यों अपने आप से 
बचकर निकलना तो
जीना है झूठ के साथ 
सिर्फ हवाओं में ।

रविवार, 30 मार्च 2014

ऐसा नव-नवसंवत्सर हो ।

नव-संवत्सर आप सबके लिये मंगलमय हो ।

जाग गया मौसम जैसे 
सर्दी की फेंक रजाई ।
टहनी-टहनी पल्ल्व पीके,
महकी उठीअमराई ।
जैसे जागे जल्दी भोर   
सजाए रंगोली ।
द्वार क्षितिज के सबसे पहले 
बिखराए रोली ।

वैसे ही जागें,विचार अब 
वैसे ही महकें व्यवहार अब
पलकों में एक अम्बर हो 
ऐसा नव संवत्सर हो 

औरों के पीछे ना भागें

खुद को ही पहचानें 
अपनी क्षमताओं को समझें 
भूलों को भी जानें ।
जहाँ कही हो अनाचार 
विद्रोह वहाँ तो खुल कर हो 
ऐसा नव-संवत्सर हो ।

रिश्वत का व्यापार रुके 

व्यापक भ्रष्टाचार रुके 
बैठे--ठाले नाम कमाने का 
यह कारोबार रुके ।
अपना हर दायित्त्व निभाने को 
हर कोई तत्पर हो 
ऐसा नव--संवत्सर हो ।

अँग्रेजी की आदत क्यूँ हो ?

इण्डिया माने भारत क्यूँ हो ? 
ह्रदय न समझे मतलब जिसका 
ऐसी जटिल इबारत क्यूँ हो ?
सरल भाव हों , सरल छन्द हों 
अपनी लय अपना स्वर हो 
ऐसा नव--संवत्सर हो ।

चमक-दमक के पीछे

घना तिमिर है , ध्यान रहे 
पथ में दीप जलाने वालों का
सम्मान रहे ।
ईंट फेंकने वालों को 
देने फौलादी उत्तर हो ।
ऐसा नव--संवत्सर हो 
ऐसा नव-संवत्सर हो ।
(संवत्सर 2060 गुडीपडवा के उपलक्ष्य में रचित )

बुधवार, 19 मार्च 2014

गुजरी तारीख

कब तक बाट निहारते भटकेगा अविराम !
रे मनवा अब लौट चल, घिर आयी है शाम ।

क्यों लहरों को कोसता ,यह तूफानी मौन !

नाम लिखा कर रेत पर अमिट हुआ है कौन !

अनजाने भेजा गया बिना पते का पत्र

अनबूझा यों उड रहा यत्र-तत्र-सर्वत्र ।

सीखा कभी न तैरना गहरा पारावार

दो अक्षर की नाव पर हम उतरे मँझधार ।

बुला रहा कोई कहीं ,था कोरा अन्दाज 

पर्वत लौटाते रहे ,मेरी ही आवाज ।

अनजाना यह शहर है भीड भरा बाजार

कोई अपना सा हमें मिल जाता एक बार ।

टहनी-टहनी फूटती है पल्लव सी पीर

रोम-रोम चुभने लगा बनकर शूल समीर ।

पर्वत रहते बेअसर क्या वर्षा तूफान

क्या धरती की वेदना , क्या सागर का मान ।

रटीरटायी सी कोई एक उबाऊ सीख

रहे कैलेन्डर में सदा हम गुजरी तारीख ।

 बूटे-बूटे में लिखा है यह किसका नाम

चप्पे-चप्पे में घुला रंग वही अभिराम ।