यह कविता सन् 1984 में लिखी थी इसलिये इसमें नयापन तो नही है पर प्रासंगिक है । आज यहाँ ( ग्वालियर मुरैना क्षेत्र में ) यही हाल है ।
शनिवार, 12 जुलाई 2014
सूखा --तीन चित्र
यह कविता सन् 1984 में लिखी थी इसलिये इसमें नयापन तो नही है पर प्रासंगिक है । आज यहाँ ( ग्वालियर मुरैना क्षेत्र में ) यही हाल है ।
मंगलवार, 8 जुलाई 2014
देवता प्यासे ही सोगए !
(' तीन देवता तो सुने हैं। ये पाँच देवता कौनसे हैं'---इस जिज्ञासा का समाधान गाँव के एक पंडित जी कुछ यों देते हैं --
"सदा 'भवानी' दाहिनी गौरी पुत्र 'गणेश' ,पाँच देव रक्षा करें 'ब्रह्मा विष्णु महेश।'" दाहिनी यानी अनुकूल)
हल्दी ,रोली ,दूब, अक्षत आदि से पूजा कर हलुआ-पूरी का भोग लगाया जाता है लेकिन जल नहीं दिया जाता। सामान्यतः भोग लगाने के बाद जल तो समर्पित किया ही जाता है। बचपन में मैंने एक दिन जब मां देवताओं को भोग लगा रही थीं मैंने माँ को जल से भरा 'गंगासागर' लाकर दिया । मैंने सोचा कि माँ भूल गईं हैं । हमेशा 'अग्यारी' करने के बाद जल तो चढ़ाती ही हैं लेकिन वे लोटा को दूर ही रखने का संकेत करती हुई बोलीं---"आज देवताओं को केवल भोजन कराना है पानी नही पिलाना है ।"
"अरे ! ऐसा कही होता है कि खाना खिलादो और पानी मत दो ! भला पानी कहाँ से पिएंगे तुम्हारे देवता?" -मैं हंस पड़ी तो मां गंभीरता से बोलीं --
"पानी वे अपनेआप पियेंगे।"
"कहाँ से? कैसे?"
"बादलों से माँगकर और क्या ।"
मैं चकित । लेकिन तब और भी अचरज हुआ कि शाम होने से पहले ही पानी बरस गया । इतना कि मिट्टी से बने 'देवता' बहकर पूरे आँगन में फैल गए ।
इतना विश्वास ! ऐसी अधिकारपूर्ण हठ ! कि उसे टालने का सवाल ही न उठे । मैंने वर्षों तक यही होते देखा कि किसी और दिन बरसे या न बरसे लेकिन देवशयनी एकादशी जरूर पानी में सराबोर होती।
दादी कहतीं थीं कि "देवता बरसा के जल से ही 'तिरपत' होते हैं।" चातक के लिये भी यही कहा जाता था ।
मुझे लगा कि परम्पराएं जब गहन विश्वास के साथ निभाई जातीं हैं तो वे व्यर्थ नही जातीं। ईश्वर की आराधना में भी यही बात है। क्योंकि विश्वास ईश्वर का ही एक रूप है ।
हमारे गाँव में इसी तरह की एक और प्रथा थी। जिस वर्ष वर्षा की प्रतीक्षा सहनशीलता के पार होने लगती थी तब इन्द्र देवता को मनाने के लिये 'रोटी बनाने' का आयोजन होता था । चौकीदार पूरे गाँव में सूचना कर देता था कि आज अमुक मैदान या खलिहान में 'रोटी' बनेगी । उस दिन न कोई ऊँचा होता न नीचा । न अमीर न गरीब । सभी परिवार ( स्त्री-पुरुष मिलकर) एक साथ बनजारों की तरह गाँव से दूर पेड़ों के नीचे उपले जलाकर अपनी रोटियाँ बनाते थे। साथ में सब्जी , नही तो आलू या बैंगन का भुर्ता ही सब्जी का काम देता। उसीसे भगवान को भोग लगाते । प्यासी गायों की रँभाते हुए बादलों को पुकारते और फिर निर्जल ही कीर्तन करने बैठ जाते --"अब मेरी लै लेउ खबर गिरधारी ...।"
ढोलक ,मंजीरा, झींका ,चिमटा (वाद्य ) के साथ भजनों का समां बँधता और ऐसी तल्लीनता से कि वह बादलों की गड़गड़ाहट और मोटी-मोटी बूँदों के स्पर्श से ही रुकता था। लोग अपना गीला सीला सामान बड़ी प्रसन्नता के साथ समेटकर भीगते हुए ही घर लौटते थे ।
नानी बताती थी (मैंने भी देखा) कि "ऐसा कभी नही हुआ कि इस आयोजन के बाद पानी नही बरसा हो।"
अब रोटी बनाने की प्रथा है या नही और सफल होती है या नही ,मुझे नही मालूम ,लेकिन देवताओं के खुद पानी पी लेने की बात अब नही है क्योंकि आज देवता प्यासे ही सोगए । फोन से मालूम हुआ कि गाँव में भी पानी की एक बूँद तो क्या आसमान में बादल का एक टुकड़ा तक नही है।
अब लोगों की पुकार में वह बात नही । वैसा विश्वास नही । देवता भी शायद कुछ तय नही कर पाते कि प्रार्थना कहाँ होरही है ,वरदान कहाँ देना है ।कि अपराध कोई करता है और सजा किसी को सुना दीजाती है ।
फिर भी हे देव ,भला सगुन की कुछ बूँदें तो गिरा देते। कंकरीट के भवन और सड़कों को तुम्हारी प्यास की चिन्ता है या नही लेकिन खेतों की माटी को चिन्ता भी है और प्रतीक्षा भी । प्रथा के विश्वास को बनाए रखने कुछ फुहारें तो बरसा देते । हे देव ! इस तरह भी कोई बिना पानी पिए सोता है ?
( गाँव में वर्षा के और दूसरे उपायों का ,जो पहले हुआ करते थे ,वर्णन अगली कड़ी में )
रविवार, 6 जुलाई 2014
वह घर मुझे आज भी अपनी ओर खींचता है ।
मिट्टी के कच्चे घरोंदों वाले उस घर में हालांकि खास सुविधाएं नही हैं । कभी प्रतिष्ठा का पर्याय रहा वह घर ,अब जर्जर खपरैल , टुकडा-टुकडा गिरती दीवारों और विपन्नता का प्रतीक बन गया है लेकिन उसमें एक जादू है जो आज भी बरकरार है और जो मुझे खींचता है . यही नहीं खुश रहने की एक जो अभावों और समस्याओं के बीच भी सबको हँसने और उन्मुक्त रहने की दुर्लभ प्रवृत्ति भी बनाए हुए है . मैंने देखा है कि जब सब लोग मिलते हैं तो सिर्फ उन्मुक्त होकर ठहाके लगाते हैं , गीत गाते हैं . मैं मानती हूँ कि अगर आपको खुलकर हँसना आता है तो चिन्ताएं आपसे दूर खड़ी ताकती रहेंगी . निश्चिन्त रहने का यह गुण दुर्लभ है और यह सम्पन्नता से उत्पन्न नहीं होता .
मैं अपने पैतृक गाँव मामचौन (मुरैना) की बात कर रही हूँ, जहाँ मेरा जन्म हुआ। जन्म के एक-डेढ़ साल और छठवीं-सातवीं के दो वर्षों के अलावा मुझे वहाँ रहने का अवसर नही मिला। अभी पाँच वर्ष बाद गई ( रात तो लगभग बीस साल बाद बिताई) तो देखा घर की हालत और भी बदतर होगई है।
छोटे ताऊजी दो माह पहले 11 मई के दिन सबको अलविदा कह ही गए।
आँगन और दीवारें आँसू बहाती हुई सी प्रतीत हुईं ,लेकिन मूँज की रस्सी से बुनी हुई खटिया और बडी जिया ( मौसी ,ताई भी )के हाथों की बनाई दरी पर लेटते हुए समय के इस अन्तराल की जरा सी भी अनुभूति नही हुई . लगा जैसे कि मैं सदा से ही वहाँ रही हूँ हर मौसम और ऋतु को जीते हुए ।
विगत बीस सालों में हुए परिवर्तन बात करें तो काफी कुछ बदल गया है। अब गाँव तक पक्की सड़क है । दो तीन बसें चलती हैं। मुझे बचपन के दिनों की याद है जब आवागमन का कोई साधन नही था ,तब हम लोग नहर के किनारे ( चम्बल निचली मुख्य नहर ) पैदल ही आते जाते थे। (ननिहाल से मेरा पैतृक गाँव लगभग नौ-दस किमी है।) नहर पर बने पुलों को गिनते हुए कि यह पहाड़गढ़ वाला पुल है फिर धूरकूड़ा का पुल ,अब सगौरिया का पुल आगया आगे कोंड़ा और फिर मामचौन। चलते-चलते हम बच्चे भगवान से किसी वाहन के आने की प्रार्थना करते थे और कभी संयोग से कोई बैलगाड़ी या जीप निकलती और उसका दयालु चालक हमारे कुम्हलाए चेहरे देख बिठा लेता तो हमें ईश्वर के होने का पक्का विश्वास होजाता था ।
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| रसोईघर में चूल्हे की ओट के लिये बनाई दीवार |
हमारे घर के आसपास लगभग सभी मकान पक्के और सर्वसुविधायुक्त बन चुके हैं । खरंजा ( गली का फर्श ) तह पर तह इतनी बार बन चुका है कि गली हमारे घर की देहरी से कुछ ही नीची रह गई है । मुझे याद है कि गली से घर की बाहरी देहरी और चबूतरा इतना ऊँचा था कि उस पर बच्चे नही चढ़ पाते थे। गली से पौर के दरवाजे तक तक पाँच-छह सीढ़ियाँ थीं । विकास की यही गति रही तो एक दिन गली घर से ऊँची हो जाएगी।
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| अनाज की कोठी का दूसरा हिस्सा जिसका अब रूप बिगड़ गया है । |
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| मौसी ( बड़ी जिया) के हाथ की पुरानी साड़ियों से बुनी गई दरी । |
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| इस घर में मेरा जन्म हुआ |
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| बड़ी जिया जो मेरी मौसी भी हैं और ताई भी। |
अब घर का वह रूप नही रहा । न ही कोई वैसा परिश्रमी और कलाकार । न वह शान ,जो दादी और ताऊजी के समय रहा करती थी । दीवारें और आँगन ऊबड़-खाबड़ है। बड़े होकर उड़ गए पंछियों के बाद खाली रह गए घोंसले जैसा ही सूनापन उन घरोंदों में है। यह सूनापन वहाँ रहने वाले स्वजनों--भैया भाभी आदि--के भीतर भर रहे सूनेपन व निष्क्रियता का ही प्रतीक है, लेकिन मुझे भुरभुराकर गिरती दीवारों से , जर्जर खपरैलों से आज भी उतना ही लगाव है . एक असीम तृप्ति मिलती है उस आँगन में .
मैंने छोटे ताऊजी का बँगला देखा , उनका चित्र लिया जो अभी-अभी उनके जाने के बाद बनवाया गया है। अपने जन्म वाला 'किवारी वाला घर' देखा। कुछ देर दादी वाली कोठरी में बैठी।
घर के पिछवाड़े बेर के पेड़ के नीचे छितराई सी छाँव में राहत का कोरा सा अनुभव करती उदास गाय देखी ।
जर्जर दीवारों में लिखे विगत के शानदार गीत पढ़े। ताऊजी के चित्र व मूर्तियों को जो अब नही हैं ,यादों में उतारा .
और जलती दोपहर में आँगन के नीम की छाँव में पडी खटिया पर बैठे-बैठे एक असंभव की चाह जागी-- काश वे दिन लौट आते ।
और रात में तारों से भरे आसमान का वैभव देखा ,मन और आँखों में भरा आसमान में इतने तारे शहर में तो कभी नहीं दिखते . वर्षों बाद गीदड़ों की आवाज सुनकर बड़ा अच्छा लगा . शहर में पले बढ़े बच्चों के लिये यह जानवर और उसकी आवाज केवल कहानियों में मिलेगी .
वह घर आज भी मुझे अपनी ओर खींचता है . तभी तो सुबह वहाँ से चलते हुए मुझे कुछ अन्दर से कुछ निकलकर वही छूटता हुआ महसूस हुआ और मेरी आँखें अनायास ही भर आईं ।
मंगलवार, 24 जून 2014
शायद...
उम्मीद में कि कुछ भी,
आहों से फूट निकले
शायद कि गीत हो ।
बाज़ार में सडक पर
जो भी मिला विहँसकर
हमने उसे पुकारा,
शायद कि मीत हो ।
अपनों के रूठने पर ,
कुछ पथ में छूटने पर
मानी है हार , उसमें
शायद कि जीत हो ।
अन्तर खरोंच उमडी
जो आँसुओं की धारा
हमने कभी न रोकी
शायद कि प्रीति हो ।
अब टूटती है डोरी
बिखरी किताब कोरी
माना है ज़िन्दगी की
शायद ये रीति हो ।
(2006)
मंगलवार, 17 जून 2014
वनवास हुए हम
धुँधलाए नयनों की प्यास हुए हम ।
सौतेली माँ सी रही जिन्दगी
इसलिये उम्रभर का वनवास हुए हम ।
हमें महकने खिलने की चाहत तो थी
मगर रेशा-रेशा कपास हुए हम ।
रही लहलहाने की फितरत कहाँ
पठारों पे सूखी सी घास हुए हम ।
गुजर जाएंगे गुल खिलाए बिना
बियाबान मरु का मधुमास हुए हम ।
न देखा न जाना पर माना उन्हें
कहा सबने अन्धा विश्वास हुए हम ।
बरसने लगें कब किसे है खबर
उमडते पावस का आकाश हुए हम ।
(1997)
रविवार, 1 जून 2014
कितने पास, कितने दूर !
महिला को लगा जैसे यह सूचना कोई बहुत दूर से दे रहा हो लेकिन कुछ देर बाद जब युवती ने पलट कर पूछा--"और आप ?" तो महिला को वह आवाज पास आती हुई प्रतीत हुई ।
सोमवार, 19 मई 2014
कै हंसा मोती चुगै...
पिछली स्मृतियाँ जारी....
अपने सिद्धांतों के प्रति काकाजी में जो खंड था उसका प्रभाव अच्छा हो रहा था ऐसा नहीं था। वे अपने विश्वास में धोखे खाजाते थे। खरीददारी में कच्चे दाल-मसालों की हो या भाभियों के लिए सबसे बड़े शौकीन की ,
साकी ने उन्हें बहुत ठगा था। उन्हें ठगना कोई मुश्किल नहीं था। केवल समन से वैज्ञानिक कहते हैं--- "मास्टरसाहब ,
विश्वास करना यह चीज है , इस दाम पर सिर्फ आपके लिए है। क्या आप सामान झूठ बोलेंगे ?" इस पर भी जब सामान खराब निकलता है और मां कहती है कि सामान देख-पकड़कर ले लो तो नाराज हो जाते थे। कहो कि "उसने तो अच्छा दिखाया था। लोग झूठे मूर्तियाँ और फाउल हैं मैं क्या कर सकता हूँ ?"
या कि "आइंदा उनसे सामान लाऊंगा ही नहीं।" और अंत में यह कि "ठीक है फिर तुम्हें ले आओ करो।" है ना अजीब तर्क ? लेकिन वे ऐसे ही थे। मजे की बात यह है कि उनके हर सिद्धांत के समर्थन में उनका कोई भी उद्धरण नहीं था। ऐसे में वे कहते हैं-- " कबिरा तुम ठगिए और न ठगिए कोय। तुम ठोगे सुख उपजे और ठगे दुख होय।" दूसरी वे गुड़िया उस बात पर जोर देते थे जिसे दूसरे लोग नहीं मानते थे। और जिसे सब मानते थे वे उसे भेड़चाल में बंद कर देते थे। जैसे अगर हर साल साल के लिए ' पुन्न ' ( धार्मिक भोज का आयोजन) कर रहे हों तो काकाजी जरूर अपना विरोध करेंगे। ऐसे भोज का आयोजन करने से भगवान प्रसन्न नहीं होते। का पैसा बरबादी है। वे अक्सर हमें यह दोहा भी सुनाते रहते थे-- " लाइक-लीक गाड़ी चलै लीक चलै कपूत। लाइक छोड़ो तीमारदार शायर सिंह सपूत।" उनके लाइक को फिर से शुरू करने की सनक ने अपनी (हम कंपनी) मुश्किलें भी बहुत बढ़ा दी। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि अपने इन सिद्धांतों के कारण काकाजी को बेरोजगारी भत्ता उठाना पड़ा था। पर उन्हें जरा भी पछतावा नहीं होता था। रिश्वत शब्द से तो वे इतनी दूर थे कोई कट्टर वैष्णव सामिषाहार से। इस सन्दर्भ में उदाहरण स्वरूप बहुत सी घटनाएँ हैं। लेकिन यहां सन् 1990 की एक घटना ही सत्य है। गाँव जहाँ हमारा घर है उसके बायीं ओर ब्राह्मणों के घर हैं और ऊपर और कुशवाहों (ठाकुर नहीं) के हैं। जहां ब्राह्मणों से हम सामाजिक रूप से जुड़े थे वहीं खेती के लिए कुशवाह समाज पर प्रतिबंध थे। जब दोनों पक्षों में एकता का कोई विरोध नहीं था तब सब कुछ बड़ी सहजता से चल रहा था लेकिन कुशवाह समाज की एक बेटी की निर्मम हत्या ने सब कुछ पलट कर रख दिया। कुशवाहों ने ब्राह्मण समाज पर लगाया हत्या का आरोप। हालात इतने बड़े हैं कि काकाजी की शानदार शिक्षकीय भूमिका और माँ के सामाजिक सहयोग को भुलाकर और हमारी बात सुने समझे बिना ही कुशवाहों ने हमारी ज़मीन छोड़ने का निर्णय लिया। हमारे सिद्धांत की स्थिति यह है कि यहां केवल कुशवाह लोग ही खेती कर सकते हैं। आसपास के सारे खेत उन्ही के हैं। क्योंकि लाठी " भुज भुजंग की बैसंगिनी भुजंगिनी सी..."हमेशा उनके हाथों में रहता था। सिक्का फरसा उनका सम्बल था। विरोध करने वाले की खेती करने की कोई और सोच भी नहीं हो सकती थी।
तो हुआ यह कि आषाढ़ की पहली वर्षा साथ ही में (हैसियत और नीड के अनुसार) जहां हल-बैलों और साज़िशों का मेला सा लगा , जुताई-बुवाई से खेत आबाद हो गए वहीं हमारे खेत बिसूरते हुए से खाली सूने पड़े थे। हमने सोचा कि हमारे सार्वभौम में अब संपत्ति तो है , रबी की फसल भी शायद ही हो क्योंकि कुशवाहों को कोई समझा नहीं सकता। काकाजी ने उन्हें पूरी तरह से गलत तत्व दिए थे, बजाय इसके कि उनसे दूरियां बनाई गईं, ठीक माना जाता था लेकिन यहां तो सालभर के फल का सवाल था। " ऐसी ही एक बात बन सकती है मास्टरसाहब।"
कुशवाहों की ओर से एक आदमी आया। काकाजी ने अपनी ओर से ऐसा देखा जैसे कुछ सुना ही नहीं जा सकता---"मास्टरसाब ये तो बुरा हो रहा है। खेत सुने रहिए। मेरी मानो तो फलां आदमी से बात करो। सौ-दो सौ रुपए अपने साथियों में रखदो। उसकी बात कुछ नहीं हो सकती। काचियों में तो उनके ' पेसाब से भी दिए जलते ' हैं , ब्राह्मणों में भी उनकी धाक कम नहीं है माड़साब।" " किससे ? मुकंदी को ?? " यह भी पता चला कि आर्थिक रूप से हम पर काफी प्रतिबंध थे। काकजी को वेतन बहुत ही मामूली सा था। " उस गद्दार और शैतान आदमी को सौ रुपए तो क्या एक फूटी कौड़ी भी न दंगले। तू ने यहां भेजा था। यहां से चल जा। कह दे कि मुंदियों की सरकार काछियों--ब्राह्मणों में घूमेगी। यहां नहीं। खेत एक क्या चार साल पड़े रहो।" " हे भगवान् !"----माँ का चेहरा फ़क्क । "गुस्से में देखें न ताव। आदर्श ब्राह्मणों को समागम की क्या आवश्यकता थी ?" लेकिन काकाजी ऐसी परवाह कब करते थे। " मैं तो माड़साब आपके भले के लिए कह रहा था। खेत ऐसे ही रह गए थे तो धरती मैया ' सराफ ' देवी।" " मुझे शाप मत दो, तुम लोग मुझे धोखा दो, क्योंकि तुम लोग मुझे धोखा देते हो। मैं तुम लोग मुझे धोखा देता हूं ? और वह मनुष्य क्या पसन्द करता है... ? कभी नहीं।" कुछ हितैषियों और व्यवहारकुशल लोगों ने काकाजी को बताया कि , " माड़साब ' नाकुछ ' रुपये हैं जबकि घाटा हजारों का होगा। फेकदो उसके सामने और निर्देश को आबाद दो।" " मैंने गलत आदमी को अपने हित के लिए गलत दवा का इस्तेमाल नहीं किया। ' कै हंसा मोती चुगाई कै लंघनी मर जाए '... " इस सूक्ति को काकाजी बार-बार बड़े गौरव के साथ अपना संबल बक बात अपनी पर अड़े रहते थे। तो हुआ ये कि हमारे खेत उस साल जुताई-बुवाई का इंतज़ाम करते ही रह गए। लोगों ने कहा--"मास्टर कंजूस और सनकी है। दो सौ रुपये के उफान के फेर में हजारों का नुक्सान कर लिया। ऐसी हेकड़ी किस काम की ?" लेकिन काकाजी ऐसे ही थे। उन्होंने तो अगले साल एक ठाकुर को काकाजी की बात बताते हुए कहा कि अपने बाली पर कुशवाहों को चुनौती देते हुए सरकार ने बीजारोपण किया। और लगातार चार साल तक पूरे कुशवाह समाज को चुनौती देते रहे हमारे खेत आबाद रहे। बाद में धीरे-धीरे जब दैत्य समाप्त हो गया तो कुशवाहों ने अपनी शांतिचित्त काकाजी से खेत मांग ली। काकाजी के ऐसे विचार का सबसे अधिक प्रभाव डाला गया। अच्छा भी और बुरा भी। अच्छा तो यही है कि मेरे पास हमेशा के लिए गलत के प्रति विद्रोह हो रहा है। विद्रोह निश्चित ही ऊर्जावान भाव है जो कभी सृजनात्मक भी होता है और कभी विध्वंसक भी। लेकिन जैसा कि उन मुस्लिम अदिगता, निरपेक्षता और निर्भयता नहीं आ अशिक। काश अजाती....




