शनिवार, 12 जुलाई 2014

सूखा --तीन चित्र

लेकिन वे दिन गए जब सावन का नाम लेते ही  बादल , वर्षा ,बिजली ,हरियाली मोर पपीहा आदि सब आँखों में सजीव होउठते थे । अब सावन तो आगया है । पर गलियों में धूल ही नही उड़ रही , कान-कनपटियों को थपेड़े मारती लू भी चल रही है । सुबह आठ बजे ही धूप इस तरह तपाती है तो दोपहर की तपन कैसी होगी । शाम छह बजे तक धूप जैसे कोड़े बरसाती रहती है ।
यह कविता सन् 1984 में लिखी थी इसलिये इसमें नयापन तो नही है पर प्रासंगिक है । आज यहाँ ( ग्वालियर मुरैना क्षेत्र में ) यही हाल है ।
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(1)
लगभग निर्वस्त्र सा
निरभ्र आसमान 
उम्मीदों को चिढ़ाता
दिन में दर्पण दिखा दिखाकर
आँखें चुँधियाता 
गर्म साँसों से
तम मन झुलसाता
रात में निर्लज्जता से
तारों के रोम दिखाता
आषाढ़-सावन के खुले मैदान में
सरेआम हरियाली की चूनर खींच रहा है
विवश त्रस्त धरती पांचाली 
पुकारती है 'घनश्याम' को ।
(2)
सूरज के आतंक से त्रस्त
भेज रही है चिट्ठियाँ 
सहमी सिकुड़ी नदी तलैयाँ
लेकिन बादलों का रवैया
आलसी पुलिस की तरह
आते हैं आते हैं--कहकर 
सिर्फ बहलाते हैं
(3)
शैशव में ही सूखाग्रस्त
दुर्बल बच्चे सी फसलें
बीमार ,मुरझायी खड़ी हैं ।
कुपोषण से घबराई
उपचार के लिये
जैसे फर्श पर ही
पड़ी है ।
पर बादलों का व्यवहार ,
किसी चलताऊ दवाखाने का उपचार ।

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

देवता प्यासे ही सोगए !

देवशयनी एकादशी। देवताओं के सोने का दिन । माना जाता है कि अब देवता शयन करेंगे । चार माह बाद 'देवउठनी' एकादशी (दीपावली के ग्यारहवे दिन) को उनकी नींद टूटेगी। तब तक सगाई-ब्याह आदि शुभकार्य कार्य सम्पन्न नही हो सकेंगे। ये चार महीने (चौमासा) बरसात के हैं। कहा जासकता है कि देवशयनी एकादशी वर्षाऋुतु के आगमन की विधिवत् सूचना है। इसके साथ ही शुभकार्यों  के अलावा भी मनचाहे खान-पान , रहन-सहन आदि पर भी प्रतिबंध रहता है। मुझे याद  है दीपावली से पहले बेंगन , गोभी , कढ़ी ,हरे पत्तों  वाली सब्जियां , गन्ना आदि निषिद्ध  थे ।इन मान्यताओं  के पीछे  के कारणों पर अलग से बहुत कुछ लिखा जा सकता है ।
हमारे क्षेत्र में  देवशयनी की एक रोचक मान्यता है। 
सुबह नहाकर खुले आँगन में गोबर से लीपकर शुद्ध मिट्टी से बनाकर पाँच देवताओं को स्थापित किया जाता है ।
(' तीन देवता तो सुने हैं। ये पाँच देवता कौनसे हैं'---इस जिज्ञासा का समाधान गाँव के एक पंडित जी कुछ यों देते हैं --
"सदा 'भवानी' दाहिनी गौरी पुत्र 'गणेश' ,पाँच देव रक्षा करें 'ब्रह्मा विष्णु महेश।'" दाहिनी यानी अनुकूल)

हल्दी ,रोली ,दूब, अक्षत आदि से पूजा कर हलुआ-पूरी का भोग लगाया जाता है लेकिन जल नहीं दिया जाता। सामान्यतः भोग लगाने के बाद जल तो समर्पित किया ही जाता है। बचपन में मैंने एक दिन जब मां  देवताओं को भोग लगा रही थीं मैंने माँ को जल से भरा 'गंगासागर' लाकर दिया । मैंने सोचा कि माँ भूल गईं हैं । हमेशा 'अग्यारी' करने के बाद जल तो चढ़ाती ही हैं लेकिन वे लोटा को दूर ही रखने का संकेत करती हुई बोलीं---"आज देवताओं को केवल भोजन कराना है पानी नही पिलाना है ।"
"अरे ! ऐसा कही होता है कि खाना खिलादो और पानी मत दो ! भला पानी कहाँ से पिएंगे तुम्हारे देवता?" -मैं हंस पड़ी तो मां गंभीरता से बोलीं --
"पानी वे अपनेआप पियेंगे।"
"कहाँ से? कैसे?"
"बादलों से माँगकर और क्या ।"
मैं चकित । लेकिन तब और भी अचरज हुआ कि शाम होने से पहले ही पानी बरस गया । इतना कि मिट्टी से बने 'देवता' बहकर  पूरे आँगन में फैल गए ।
इतना विश्वास ! ऐसी अधिकारपूर्ण हठ ! कि उसे टालने का सवाल ही न उठे । मैंने वर्षों तक यही होते देखा कि किसी और दिन बरसे या न बरसे लेकिन देवशयनी एकादशी जरूर पानी में सराबोर होती।
दादी कहतीं थीं कि "देवता बरसा के जल से ही 'तिरपत' होते हैं।" चातक के लिये भी यही कहा जाता था ।
मुझे लगा कि परम्पराएं जब गहन विश्वास के साथ निभाई जातीं हैं तो वे व्यर्थ नही जातीं। ईश्वर की आराधना में भी यही बात है। क्योंकि विश्वास ईश्वर का ही एक रूप है ।
हमारे गाँव में इसी तरह की एक और प्रथा थी। जिस वर्ष वर्षा की प्रतीक्षा सहनशीलता के पार होने लगती थी तब इन्द्र देवता को मनाने के लिये 'रोटी बनाने' का आयोजन होता था । चौकीदार पूरे गाँव में सूचना कर देता था कि आज अमुक मैदान या खलिहान में 'रोटी' बनेगी । उस दिन न कोई ऊँचा होता न नीचा । न अमीर न गरीब । सभी परिवार ( स्त्री-पुरुष मिलकर) एक साथ बनजारों की तरह गाँव से दूर पेड़ों के नीचे उपले जलाकर अपनी रोटियाँ बनाते थे। साथ में सब्जी , नही तो आलू या बैंगन का भुर्ता ही सब्जी का काम देता। उसीसे भगवान को भोग लगाते । प्यासी गायों की रँभाते हुए बादलों को पुकारते और फिर निर्जल ही कीर्तन करने बैठ जाते --"अब मेरी लै लेउ खबर गिरधारी ...।" 
ढोलक ,मंजीरा, झींका ,चिमटा (वाद्य ) के साथ भजनों का समां बँधता और ऐसी तल्लीनता से कि वह बादलों की गड़गड़ाहट और मोटी-मोटी बूँदों के स्पर्श से ही रुकता था। लोग अपना गीला सीला सामान बड़ी प्रसन्नता के साथ समेटकर भीगते हुए ही घर लौटते थे । 
नानी बताती थी (मैंने भी देखा) कि "ऐसा कभी नही हुआ कि इस आयोजन के बाद पानी नही बरसा हो।" 
अब रोटी बनाने की प्रथा है या नही और सफल होती है या नही ,मुझे नही मालूम ,लेकिन देवताओं के खुद पानी पी लेने की बात अब नही है क्योंकि आज देवता प्यासे ही सोगए । फोन से मालूम हुआ कि गाँव में भी पानी की एक बूँद तो क्या आसमान में बादल का एक टुकड़ा तक नही है। 
अब लोगों की पुकार में वह बात नही । वैसा विश्वास नही । देवता भी शायद कुछ तय नही कर पाते कि प्रार्थना कहाँ होरही है ,वरदान कहाँ देना है ।कि अपराध कोई करता है और सजा किसी को सुना दीजाती है ।


फिर भी हे देव ,भला सगुन की कुछ बूँदें तो गिरा देते। कंकरीट के भवन और सड़कों को  तुम्हारी प्यास की चिन्ता है या नही लेकिन खेतों की माटी को चिन्ता भी है और प्रतीक्षा भी । प्रथा के विश्वास को बनाए रखने कुछ फुहारें तो बरसा देते । हे देव ! इस तरह भी कोई बिना पानी पिए सोता है ? 


( गाँव में वर्षा के और दूसरे उपायों का ,जो पहले हुआ करते थे ,वर्णन अगली कड़ी में )


रविवार, 6 जुलाई 2014

वह घर मुझे आज भी अपनी ओर खींचता है ।

यह सच है कि जहाँ बचपन व्यतीत होता है वहाँ से एक अटूट लगाव होता है लेकिन उस घर में मेरा बचपन नही बीता । छोटे भाई ने आने में ऐसी जल्दबाजी दिखाई कि मुझे माँ की गोद और अपना जन्मगृह छोड़कर नानी की शरण लेनी पड़ी । इस तरह बचपन ननिहाल बड़बारी ,बानमोर रामपुर आदि कई गाँवों में टुकड़ा-टुकड़ा गुजरा। ये सभी स्थान मेरी यादों में तो हैं लेकिन उस घर की याद व अनुभूतियाँ कभी अलग होती ही नही हैं।

मिट्टी के कच्चे घरोंदों वाले उस घर में हालांकि खास सुविधाएं नही हैं । कभी प्रतिष्ठा का पर्याय रहा वह घर ,अब जर्जर खपरैल , टुकडा-टुकडा गिरती दीवारों और विपन्नता का प्रतीक बन गया है लेकिन उसमें एक जादू है जो आज भी बरकरार है और जो मुझे खींचता है . यही नहीं खुश रहने की एक जो अभावों और समस्याओं के बीच भी सबको हँसने और उन्मुक्त रहने की दुर्लभ प्रवृत्ति भी  बनाए हुए है . मैंने देखा है कि जब सब लोग मिलते हैं तो सिर्फ उन्मुक्त होकर ठहाके लगाते हैं , गीत गाते हैं . मैं मानती हूँ कि अगर आपको खुलकर हँसना आता है तो चिन्ताएं आपसे दूर खड़ी ताकती रहेंगी . निश्चिन्त रहने का यह गुण दुर्लभ है और यह सम्पन्नता से उत्पन्न  नहीं होता .

मैं अपने पैतृक गाँव मामचौन (मुरैना) की बात कर रही हूँ, जहाँ मेरा जन्म हुआ। जन्म के एक-डेढ़ साल और छठवीं-सातवीं के दो वर्षों के अलावा मुझे वहाँ रहने का अवसर नही मिला। अभी पाँच वर्ष बाद गई ( रात तो लगभग बीस साल बाद बिताई) तो  देखा घर की हालत और भी बदतर होगई है। 
छोटे ताऊजी दो माह पहले 11 मई के दिन सबको अलविदा कह ही गए। 
आँगन और दीवारें आँसू बहाती हुई सी प्रतीत हुईं ,लेकिन मूँज की रस्सी से बुनी हुई खटिया और बडी जिया ( मौसी ,ताई भी )के हाथों की बनाई दरी पर लेटते हुए समय के इस अन्तराल की जरा सी भी अनुभूति नही हुई . लगा जैसे कि मैं सदा से ही वहाँ  रही हूँ हर मौसम और ऋतु को जीते हुए । 
विगत बीस सालों में हुए परिवर्तन बात करें तो काफी कुछ बदल गया है। अब गाँव तक पक्की सड़क है । दो तीन बसें चलती हैं। मुझे बचपन के दिनों की याद है जब आवागमन का कोई साधन नही था ,तब हम लोग नहर के किनारे ( चम्बल निचली मुख्य नहर ) पैदल ही आते जाते थे। (ननिहाल से मेरा पैतृक गाँव लगभग नौ-दस किमी है।) नहर पर बने पुलों को गिनते हुए कि यह पहाड़गढ़ वाला पुल है फिर धूरकूड़ा का पुल ,अब सगौरिया का पुल आगया आगे कोंड़ा और फिर मामचौन। चलते-चलते हम बच्चे भगवान से किसी वाहन के आने की प्रार्थना करते थे और कभी संयोग से कोई बैलगाड़ी या जीप निकलती और उसका दयालु चालक हमारे कुम्हलाए चेहरे देख बिठा लेता तो हमें ईश्वर के होने का पक्का विश्वास होजाता था । 
रसोईघर में चूल्हे की ओट के लिये बनाई दीवार   
अब बस से बीस-पच्चीस मिनट में ही गाँव में पहुँच जाते हैं। सचमुच आवागमन के साधनों का विकास क्षेत्र के विकास की पहली आवश्यकता होती है। 
हमारे घर के आसपास लगभग सभी मकान पक्के और सर्वसुविधायुक्त बन चुके हैं । खरंजा ( गली का फर्श ) तह पर तह इतनी बार बन चुका है कि गली हमारे घर की देहरी से कुछ ही नीची रह गई है । मुझे याद है कि गली से घर की बाहरी देहरी और चबूतरा इतना ऊँचा था कि उस पर बच्चे नही चढ़ पाते थे। गली से पौर के दरवाजे तक तक पाँच-छह सीढ़ियाँ थीं । विकास की यही गति रही तो एक दिन गली घर से ऊँची हो जाएगी। 
अनाज की कोठी का दूसरा हिस्सा जिसका अब रूप बिगड़ गया है ।
मौसी ( बड़ी जिया) के हाथ की पुरानी साड़ियों से बुनी गई दरी ।
लेकिन विकास की दौड़ में , स्वार्थ व धनलिप्सा बढ़ने के चलते कुछ बदलाव बहुत ही अखरने वाले भी हैं । जो सबसे बुरी बात लगी वह थी पेड़ों की कमी ।  सबसे अधिक अखरती है इमली के दो बड़े पेड़ों की कटाई की जो गाँव की पहचान दूर से ही कराते थे। मुझे याद है इमली के पेड़ों की घनी छाँव तले माध्यमिक विद्यालय चलता था जिसमें मैं भी दो वर्ष पढ़ी थी । सावन के महीने में इमली की मजबूत शाखाओं में कितने ही झूले डाले जाते थे । सारा वातावरण सुरीली मल्हारों से गूँज उठा था । मेरी दादी बहुत अच्छा गातीं थीं । हर ठिक-त्यौहार के गीत उन्हें आते थे । पर थीं बड़ी अभिमानिनी। बड़ी मनुहारों के बाद ही वे कोई गीत सुनातीं थीं वह भी अधूरा । उन्होंने किसी को अपने गीत नही दिये । मेरी माँ ने जरूर कुछ गीत सीख लिये थे जिनमें से सावन के गीतों को मैंने अपने तीन आलेखो में लिया है । अफसोस कि मैं उनसे कुछ और गीत संचित करूँ मेरी माँ की याददाश्त लगभग चली गई है।


इस घर में मेरा जन्म हुआ 
मेरे दादाजी श्री निरंजनलाल श्रीवास्तव बहुत ही सरल सज्जन ,एक रियासत में कर्मचारी थे। हमारे पूर्वज कभी जमींदार हुआ करते थे। माँ बताती हैं कि दादाजी के किसी रिश्तेदार की कुप्रवृत्तियों के कारण सारी उनकी सम्पत्ति कुर्क होगई और बाद में मेरी दादी ने खुद अपने हाथों से यह घर बनाया कच्ची दीवारों वाला लेकिन बेहद कलात्मक और सुरुचिपूर्ण। कच्ची दीवारें भी इतनी सुडौल व सपाट कि सीमेंट के प्लास्टर का भान करातीं थीं । लाल मिट्टी से लिपे हुए आँगन में जब दादी या मौसी खडिया के घोल से चौक पूरती थीं तो आँगन में जैसे चाँद-सितारे उतर आते थे । जो भी देखता देखता ही रह जाता था। बड़े ताऊजी ने दादी की विरासत पाई थी । उनके जीवित रहने तक घर में अनौखी सजावट रहती थी । रसोईघर की दीवार पर महालक्ष्मी जी का चित्र ,मिट्टी के खूबसूरत कँगूरों और बेलबूटों वाला तुलसीघर ,अनाज रखने की मिट्टी की कोठियाँ जो एक तरफ से अनाज भरने के काम आतीं तो दूसरी तरफ सुन्दर अलमारी का काम देतीं थी। हमारा घर त्यौहारों , सांस्कृतिक कार्यक्रमों और बाहर से आए विशिष्टजनों के लिये शानदार मेजबान होता था।  

बड़ी जिया जो मेरी मौसी भी हैं और  ताई भी।

अब घर का वह रूप नही रहा । न ही कोई वैसा परिश्रमी और कलाकार । न वह शान ,जो दादी और ताऊजी के समय रहा करती थी । दीवारें और आँगन ऊबड़-खाबड़ है। बड़े होकर उड़ गए पंछियों के बाद खाली रह गए घोंसले जैसा ही सूनापन उन घरोंदों में है। यह सूनापन वहाँ रहने वाले स्वजनों--भैया भाभी आदि--के भीतर भर रहे सूनेपन व निष्क्रियता का ही प्रतीक है, लेकिन मुझे भुरभुराकर गिरती दीवारों से , जर्जर खपरैलों से आज भी उतना ही लगाव है . एक असीम तृप्ति मिलती है उस आँगन में . 
मैंने छोटे ताऊजी का बँगला देखा , उनका चित्र लिया जो अभी-अभी उनके जाने के बाद बनवाया गया है। अपने जन्म वाला 'किवारी वाला घर' देखा। कुछ देर दादी वाली कोठरी में बैठी। 
घर के पिछवाड़े बेर के पेड़ के नीचे छितराई सी छाँव में राहत का कोरा सा अनुभव करती उदास गाय देखी । 
जर्जर दीवारों में लिखे विगत के शानदार गीत पढ़े। ताऊजी के चित्र व मूर्तियों को जो अब नही हैं ,यादों में उतारा .
और जलती दोपहर में आँगन के नीम की छाँव में पडी खटिया पर बैठे-बैठे एक असंभव की चाह जागी-- काश वे दिन लौट आते । 
और  रात में तारों से भरे आसमान का वैभव देखा ,मन और आँखों में भरा आसमान में इतने तारे शहर में तो कभी नहीं दिखते . वर्षों बाद गीदड़ों की आवाज सुनकर बड़ा अच्छा लगा  . शहर में पले बढ़े बच्चों के लिये यह जानवर और उसकी आवाज केवल कहानियों में मिलेगी .
वह घर आज भी मुझे अपनी ओर खींचता है . तभी तो सुबह वहाँ से चलते हुए मुझे कुछ अन्दर से कुछ निकलकर वही छूटता हुआ महसूस हुआ और मेरी आँखें अनायास ही भर आईं ।  

मंगलवार, 24 जून 2014

शायद...

हर ज़ख्म को सहेजा,
उम्मीद में कि कुछ भी,
आहों से फूट निकले 
शायद कि गीत हो ।

बाज़ार में सडक पर 

जो भी मिला विहँसकर 
हमने उसे पुकारा,
शायद कि मीत हो ।

अपनों के रूठने पर ,

कुछ पथ में छूटने पर
मानी है हार , उसमें 
शायद कि जीत हो ।

अन्तर खरोंच उमडी 

जो आँसुओं की धारा 
हमने कभी न रोकी 
शायद कि प्रीति हो ।

अब टूटती है डोरी 

बिखरी किताब कोरी 
माना है ज़िन्दगी की 
शायद ये रीति हो ।
(2006)

मंगलवार, 17 जून 2014

वनवास हुए हम

आखिरी पल में जीने की आस हुए हम ।
धुँधलाए नयनों की प्यास हुए हम ।

सौतेली माँ सी रही जिन्दगी 
इसलिये उम्रभर का वनवास हुए हम ।

हमें महकने खिलने की चाहत तो थी 
मगर रेशा-रेशा कपास हुए हम ।

रही लहलहाने की फितरत कहाँ 
पठारों पे सूखी सी घास हुए हम ।

गुजर जाएंगे गुल खिलाए बिना 
बियाबान मरु का मधुमास हुए हम ।

न देखा न जाना पर माना उन्हें 
कहा सबने अन्धा विश्वास हुए हम ।

बरसने लगें कब किसे है खबर 
उमडते पावस का आकाश हुए हम  ।
(1997)

रविवार, 1 जून 2014

कितने पास, कितने दूर !



"आप कहाँ से हैं ?"
परिचय के बिना पास बैठा व्यक्ति भी कितना दूर होता है ,पार्क में बैठी उस अधेड़ उम्र की महिला ने उस दिन यही महसूस किया जब पास ही बेंच पर बैठी युवती ने उसकी ओर एक बार भी नही देखा जबकि कस्बाई परिवेश से आई वह महिला युवती से परिचय के लिये काफी उत्सुक थी। एक तो उसके लिये यह शहर नया ही था । फिर साथ बैठे दो व्यक्ति एक दूसरे से बात न करें ,खासतौर पर जबकि वे महिलाएं हों , यह स्वीकार कर लेने वाली बात नही है ।
 लेकिन युवती का ध्यान सिर्फ अपने मोबाइल फोन पर था और आधुनिक शिष्टाचार की दृष्टि से  उस अपरिचित महिला का इस तरह बात करना अनावश्यक ही नही अशिष्ट भी कहा जासकता था । जींस-टाप पहने वह युवती जो 'वॉक' के बाद कुछ देर के लिये बेंच पर बैठ गई थी, काफी खूबसूरत थी। उतनी ही निरपेक्ष भी । लेकिन महिला का मन नही माना और पूछ ही लिया –
आप यहीँ की हैं या फिर ...। वैसे कहाँ से हैं ?”
"यूपी से ।"--युवती ने संक्षिप्त उत्तर देते हुए कन्धों पर झूलते बालों को समेटकर जूड़ा बनाया और अगले ही पल उँगलियाँ मोबाइल पर सरकने लगीं । वह एक अनजान और पुराने विचारों की लगने वाली महिला से बात करने जरा भी उत्सुक नही थी । लेकिन उस सवाल का कारण जानने की इच्छावश पूछा----" क्यों ?"  
"नही ऐसे ही पूछा है ।--महिला एक पल के लिये झिझकी । यूपी भर कह देने से क्या पता चलता है । परिचय हो तो फिर इतना अधूरा सा क्यों हो?
"यूपी में कौनसी जगह...?"
"आगरा "---युवती ने बेमन ही झटके के साथ जबाब दिया जैसे वह उसका आखिरी संवाद हो। 
महिला को लगा जैसे यह सूचना कोई बहुत दूर से दे रहा हो लेकिन कुछ देर बाद जब युवती ने पलट कर पूछा--"और आप ?" तो महिला को वह आवाज पास आती हुई प्रतीत हुई । उत्साहित होकर बोली- 
"मैं शिवपुरी से यहाँ बेटी के पास आई हूँ।" और फिर विस्तार से बताने लगी--"बेटी इंजीनियर है । अभी तीन-चार महीने पहले ही नौकरी लगी है ।यही एक बेटी है । बडे शहर में पहली बार आई है । चिन्ता तो होती है न । आप भी सर्विस करती होंगी ?"
"नही मेरे हसबैंड । वे भी इंजीनियर हैं ।"
"हसबैंड ? यानी यह शादीशुदा है?"---महिला चकित हुई---"आजकल पहनावे और रंग-ढंग से पता ही नही चलता कि कोई महिला लड़की है या औरत । विवाहिता है या कुँवारी । न बिन्दी न चूड़ी । न बिछुआ । बहुत हुआ तो माथे के ऊपर बालों में लाल लकीर खींचली बस । सब समय का असर है ।"   
" कौनसी कम्पनी में हैं आपके मिस्टर ?"
"विप्रो में ।"
"अरे ,विप्रो में तो मेरी ममेरी बहिन का बेटा भी है।
"होगा..। यहाँ बाहर से ज्यादातर इंजीनियर ही आते हैं।"
"बहुत बड़ा शहर है ।"--महिला अपने आप से कहने लगी---"पता नही कहाँ रहता होगा । जीजी से पता ले आती तो उससे भी मिल लेती ।"
युवती ने बात को जैसे सुना ही नही । पर महिला ने बोलना जारी रखा।
"आप यहाँ कहाँ रहती हैं ?"
"आज़ाद नगर में ।"
"अरे मेरी बेटी भी तो आज़ाद नगर में ही है । आप यहीं रहतीं हैं तो आपने अल्पना अपार्टमेंट तो देखा होगा ।"
"हाँ  ?"--अब युवती कुछ जाग्रत हुई ।---"मैं भी वहीं रहती हूँ ?"
"अर्..रे वाह , फिर तो हम पडोसनें हुईं ।"--महिला एकदम चमत्कृत सी होगई--  
" पर आपको वहाँ कभी देखा नही ।"
"हाँ वो...एक तो दूसरी लिफ्ट से आना-जाना होता है फिर....।" युवती अब भी बातों में विशेष रुचि लेती नही लग रही थी ।
"फिर ! दरवाजे भी हमेशा बन्द रहते हैं। "--महिला ने हँसकर बात पूरी की। इसके बाद दोनों साथ-साथ आईं । युवती ने महिला को शिष्टाचारवश एक कप चाय पीने का निमन्त्रण दिया तो महिला बिना किसी औपचारिकता के सम्मोहित सी उसके पीछे चली गई । कालबेल दबाने के बाद दरवाजा खोलकर जो युवक सामने आया तो सचमुच एक चमत्कार सा हुआ । वह कुछ पहचानने की कोशिश करने के बाद चकित हुआ बोला--
"अरे ,मौसी आप यहाँ कैसे ?"
" ये लो ..बगल में छोरा ,नगर में ढिंढोरा ..।---उस महिला ने युवती की ओर आश्चर्य और खुशी के अतिरेक के साथ देखा और चहककर कहा---बेटी ,यही तो अभिषेक है। कुसमजीजी का बेटा ।"--
अगले पल वह महिला के पैरों में झुक गया । युवती भी ।
"यहाँ रीतिका आगई है न । कुसमजीजी से तेरा पता और नम्बर लेना भूल गई बेटा । पर तू इतने पास होगा यह तो कमाल होगया । बडी आसानी से मुझे बहू भी मिल गई ।"


महिला खुशी से विह्वल होकर कहती रही---" लेकिन अगर पार्क में मैं बातचीत की कोशिश न करती तो इतने पास रहकर भी शायद तुम लोग दूर ही रहते । नही ?"

सोमवार, 19 मई 2014

कै हंसा मोती चुगै...

19 मई 2014 (पाँचवीं पुण्य तिथि)
पिछली  स्मृतियाँ  जारी....

अपने सिद्धांतों के प्रति काकाजी में जो खंड था उसका प्रभाव अच्छा हो रहा था ऐसा नहीं था। वे अपने विश्वास में धोखे खाजाते थे। खरीददारी में कच्चे दाल-मसालों की हो या भाभियों के लिए सबसे बड़े शौकीन की , साकी ने उन्हें बहुत ठगा था। उन्हें ठगना कोई मुश्किल नहीं था। केवल समन से वैज्ञानिक कहते हैं--- "मास्टरसाहब , विश्वास करना यह चीज है , इस दाम पर सिर्फ आपके लिए है। क्या आप सामान झूठ बोलेंगे ?"   इस पर भी जब सामान खराब निकलता है और मां कहती है कि सामान देख-पकड़कर ले लो तो नाराज हो जाते थे। कहो कि "उसने तो अच्छा दिखाया था। लोग झूठे मूर्तियाँ और फाउल हैं मैं क्या कर सकता हूँ ?" या कि "आइंदा उनसे सामान लाऊंगा ही नहीं।" और अंत में यह कि "ठीक है फिर तुम्हें ले आओ करो।" है ना अजीब तर्क ? लेकिन वे ऐसे ही थे। मजे की बात यह है कि उनके हर सिद्धांत के समर्थन में उनका कोई भी उद्धरण नहीं था। ऐसे में वे कहते हैं-- " कबिरा तुम ठगिए और न ठगिए कोय। तुम ठोगे सुख उपजे और ठगे दुख होय।" दूसरी वे गुड़िया उस बात पर जोर देते थे जिसे दूसरे लोग नहीं मानते थे। और जिसे सब मानते थे वे उसे भेड़चाल में बंद कर देते थे। जैसे अगर हर साल साल के लिए ' पुन्न ' ( धार्मिक भोज का आयोजन) कर रहे हों तो काकाजी जरूर अपना विरोध करेंगे। ऐसे भोज का आयोजन करने से भगवान प्रसन्न नहीं होते। का पैसा बरबादी है। वे अक्सर हमें यह दोहा भी सुनाते रहते थे-- " लाइक-लीक गाड़ी चलै लीक चलै कपूत। लाइक छोड़ो तीमारदार शायर सिंह सपूत।" उनके लाइक को फिर से शुरू करने की सनक ने अपनी (हम कंपनी) मुश्किलें भी बहुत बढ़ा दी। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था कि अपने इन सिद्धांतों के कारण काकाजी को बेरोजगारी भत्ता उठाना पड़ा था। पर उन्हें जरा भी पछतावा नहीं होता था। रिश्वत शब्द से तो वे इतनी दूर थे कोई कट्टर वैष्णव सामिषाहार से। इस सन्दर्भ में उदाहरण स्वरूप बहुत सी घटनाएँ हैं। लेकिन यहां सन् 1990 की एक घटना ही सत्य है। गाँव जहाँ हमारा घर है उसके बायीं ओर ब्राह्मणों के घर हैं और ऊपर और कुशवाहों (ठाकुर नहीं) के हैं। जहां ब्राह्मणों से हम सामाजिक रूप से जुड़े थे वहीं खेती के लिए कुशवाह समाज पर प्रतिबंध थे। जब दोनों पक्षों में एकता का कोई विरोध नहीं था तब सब कुछ बड़ी सहजता से चल रहा था लेकिन कुशवाह समाज की एक बेटी की निर्मम हत्या ने सब कुछ पलट कर रख दिया। कुशवाहों ने ब्राह्मण समाज पर लगाया हत्या का आरोप। हालात इतने बड़े हैं कि काकाजी की शानदार शिक्षकीय भूमिका और माँ के सामाजिक सहयोग को भुलाकर और हमारी बात सुने समझे बिना ही कुशवाहों ने हमारी ज़मीन छोड़ने का निर्णय लिया। हमारे सिद्धांत की स्थिति यह है कि यहां केवल कुशवाह लोग ही खेती कर सकते हैं। आसपास के सारे खेत उन्ही के हैं। क्योंकि लाठी " भुज भुजंग की बैसंगिनी भुजंगिनी सी..."हमेशा उनके हाथों में रहता था। सिक्का फरसा उनका सम्बल था। विरोध करने वाले की खेती करने की कोई और सोच भी नहीं हो सकती थी।



  
 
 




 
 
 
तो हुआ यह कि आषाढ़ की पहली वर्षा साथ ही में (हैसियत और नीड के अनुसार) जहां हल-बैलों और साज़िशों का मेला सा लगा , जुताई-बुवाई से खेत आबाद हो गए वहीं हमारे खेत बिसूरते हुए से खाली सूने पड़े थे। हमने सोचा कि हमारे सार्वभौम में अब संपत्ति तो है , रबी की फसल भी शायद ही हो क्योंकि कुशवाहों को कोई समझा नहीं सकता। काकाजी ने उन्हें पूरी तरह से गलत तत्व दिए थे, बजाय इसके कि उनसे दूरियां बनाई गईं, ठीक माना जाता था लेकिन यहां तो सालभर के फल का सवाल था। " ऐसी ही एक बात बन सकती है मास्टरसाहब।"

कुशवाहों की ओर से एक आदमी आया। काकाजी ने अपनी ओर से ऐसा देखा जैसे कुछ सुना ही नहीं जा सकता---"मास्टरसाब ये तो बुरा हो रहा है। खेत सुने रहिए। मेरी मानो तो फलां आदमी से बात करो। सौ-दो सौ रुपए अपने साथियों में रखदो। उसकी बात कुछ नहीं हो सकती। काचियों में तो उनके ' पेसाब से भी दिए जलते ' हैं , ब्राह्मणों में भी उनकी धाक कम नहीं है माड़साब।" " किससे ? मुकंदी को ?? " यह भी पता चला कि आर्थिक रूप से हम पर काफी प्रतिबंध थे। काकजी को वेतन बहुत ही मामूली सा था। " उस गद्दार और शैतान आदमी को सौ रुपए तो क्या एक फूटी कौड़ी भी न दंगले। तू ने यहां भेजा था। यहां से चल जा। कह दे कि मुंदियों की सरकार काछियों--ब्राह्मणों में घूमेगी। यहां नहीं। खेत एक क्या चार साल पड़े रहो।" " हे भगवान् !"----माँ का चेहरा फ़क्क । "गुस्से में देखें न ताव। आदर्श ब्राह्मणों को समागम की क्या आवश्यकता थी ?"  लेकिन काकाजी ऐसी परवाह कब करते थे। " मैं तो माड़साब आपके भले के लिए कह रहा था। खेत ऐसे ही रह गए थे तो धरती मैया ' सराफ ' देवी।" " मुझे शाप मत दो, तुम लोग मुझे धोखा दो, क्योंकि तुम लोग मुझे धोखा देते हो। मैं तुम लोग मुझे धोखा देता हूं ? और वह मनुष्य क्या पसन्द करता है... ? कभी नहीं।" कुछ हितैषियों और व्यवहारकुशल लोगों ने काकाजी को बताया कि , " माड़साब ' नाकुछ ' रुपये हैं जबकि घाटा हजारों का होगा। फेकदो उसके सामने और निर्देश को आबाद दो।" " मैंने गलत आदमी को अपने हित के लिए गलत दवा का इस्तेमाल नहीं किया। ' कै हंसा मोती चुगाई कै लंघनी मर जाए '... " इस सूक्ति को काकाजी बार-बार बड़े गौरव के साथ अपना संबल बक बात अपनी पर अड़े रहते थे। तो हुआ ये कि हमारे खेत उस साल जुताई-बुवाई का इंतज़ाम करते ही रह गए। लोगों ने कहा--"मास्टर कंजूस और सनकी है। दो सौ रुपये के उफान के फेर में हजारों का नुक्सान कर लिया। ऐसी हेकड़ी किस काम की ?" लेकिन काकाजी ऐसे ही थे। उन्होंने तो अगले साल एक ठाकुर को काकाजी की बात बताते हुए कहा कि अपने बाली पर कुशवाहों को चुनौती देते हुए सरकार ने बीजारोपण किया। और लगातार चार साल तक पूरे कुशवाह समाज को चुनौती देते रहे हमारे खेत आबाद रहे। बाद में धीरे-धीरे जब दैत्य समाप्त हो गया तो कुशवाहों ने अपनी शांतिचित्त काकाजी से खेत मांग ली। काकाजी के ऐसे विचार का सबसे अधिक प्रभाव डाला गया। अच्छा भी और बुरा भी। अच्छा तो यही है कि मेरे पास हमेशा के लिए गलत के प्रति विद्रोह हो रहा है। विद्रोह निश्चित ही ऊर्जावान भाव है जो कभी सृजनात्मक भी होता है और कभी विध्वंसक भी। लेकिन जैसा कि उन मुस्लिम अदिगता, निरपेक्षता और निर्भयता नहीं आ अशिक। काश अजाती....