मंगलवार, 26 जुलाई 2022

'मूल्यहीन' ( बहुमूल्य) उपहार और खुशियाँ

 ऋचा बाजार से लौटी तो तमाम सामान के साथ एक बहुत सुन्दर बार्बी डॉल भी थी .

मैंने पूछा –यह गुड़िया किसलिये ?”

भूल गईँ आप , आज शाम को संदीप ने बुलाया है न . वे लोग जब हमारे यहाँ आए थे किंशू के लिये कार लाए थे . मैंने सोचा उसकी बेटी के लिये भी कुछ ले चलूँ


. बच्चियों को डौल सबसे ज्यादा पसन्द होती है ?”

सन्दीप अमन का दोस्त है . वह भी एक सॉफ्टवेयर कम्पनी में इंजीनियर है . घर में पत्नी दिशा और एक पाँच साल की बेटी है .शान्वी बार्बी डॉल पाकर खुशी से चहकी—"थैंक्यू आंटी .

और फिर वह अपनी उस नई डौल से खेलने लगी . नई इसलिये कहा कि उसके पास ऐसी ही सुन्दर और मँहगी लगभग पच्चीस-तीस बार्बी डौल पहले से थीं , जो उसके खिलौने वाले कॉर्नर में बहुत ही अस्तव्यस्त तरीके से पड़ी थीं . किसी के बाल बुरी तरह बिखरे थे किसी का टॉप गायब तो किसी का स्कर्ट . किसी के कपड़े बहुत घिस पिट गए थे जैसे शान्वी का अब उनसे कोई वास्ता नहीं था . 

इतनी सारी डौल्स ?” –-मैंने बिखरी पड़ी डौल्स को समेटते हुए कहा . मेरा विस्मय स्वाभाविक था . एक तो ये डौल मँहगी होती हैं , फिर इतनी सारी अनावश्यक भी हैं . बच्ची कितनी गुड़ियों से खेलेगी उसके पास और भी बहुत सारे खिलौने हैं .. दिशा हँसते हुए बोली --आंटी ये हमने खरीदी नहीं हैं . कुछ इसके बर्थ डे पर गिफ्ट में मिलीं और कुछ किसी के बर्थडे पर रिटर्न गिफ्ट में मिली .

पर सारे गिफ्ट उसे देते भी गए ?” मेरा विचार है कि खाना उतना ही लेना चाहिये जितनी भूख हो . इसी तरह बच्चों के पास खेलने के लिये खिलौनों के भी अधिक विकल्प नहीं होने चाहिये . ज़रूरत से अधिक चीजें और उन्हें चुनने के विकल्प खुशी की बजाय खुशी में व्यवधान बनते है .  

क्या करें आंटी ?”--–सन्दीप मेरे सिद्धान्त को एक तरह से नकारकर बोला –--"  गिफ्ट को शान्वी जब तक खोल नहीं लेती रो रोकर बुरा हाल कर लेती है . हैं तो सब उसी के लिये ..हमने जिस तंगी में बचपन जिया है ,अपनी बेटी को नहीं जीने देंगे . अब गिफ्ट उससे बड़े तो नहीं हैं न ?”

आज युवावर्ग जिस विचारों के साथ जीवन को स्वरूप दे रहा है , उसके अनुसार सन्दीप का उत्तर अप्रत्याशित तो नहीं था क्योंकि यह यूज एण्ड थ्रो का युग है . आज साधन प्रमुख हैं साध्य नहीं . लेकिन यह सोचनीय है . वे नहीं समझ रहे कि इस तरह वे बच्चों को असहनशील , एकाकी और कमजोर बना रहे हैं .

सवाल है कि क्या खुशी मंहगे और इतने सारे खिलौनों से मिलती है ? क्या खुशी के लिये साधन का इतना बहुमूल्य और बहुल होना आवश्यक है ?

मुझे याद आता है कि हमें बचपन में बाजार से खरीदा हुआ शायद ही कोई खिलौना मिला हो .पर क्या खुशियों की हमारे पास कोई  कमी थी ? बबूल के काँटे में कोई पत्ता फँसाकर बनाई गई फिरकनी ..(चकरी)  किल किल काँटे , पँचगुट्टे ,चंगा पै ,माटी के दियों की बनी तराजू , और घर में ही कपड़े से बनी पुत्तो ( पुतरिया, गुड़िया ) आदि .. सबसे हमें इतना ही आनन्द , बल्कि इससे कहीं अधिक आनन्द मिलता था .

सादा कपड़े की वह पुतरिया मेरे लिये दुनिया का सबसे मँहगा खिलौना थी क्योंकि हमारे पास उसका कोई विकल्प नहीं था . मैने कहा न कि विकल्प आपको किसी एक चीज पर पूरा ध्यान नहीं देने देते .  

आज लोगों के पास पैसा है वे अपने बच्चों के लिये बहुत सारी मँहगी चीजें खरीदकर अपना प्यार जताते हैं . लेकिन बहुलता के कारण साधन मँहगे होकर भी मूल्यहीन और प्रभावहीन सिद्ध होते हैं जैसे पेट बहुत भरा होने पर स्वादिष्ट व्यंजन .

शान्वी ने तो थोड़ी देर बाद ही नई डौल को भी एक तरफ डाल दिया और दूसरे तमाम खिलौनों को उठाने पटकने लगी . फिर न जाने किस बात पर रोने भी लगी ...सन्दीप और दिशा उसे मनाने की कोशिश में कह रहे थे –बेबी डोन्ट क्राइ डियर , वी विल बाइ अ न्यू वन ...

बुधवार, 13 जुलाई 2022

सिडनी डायरी --4



 

सफेद रेगिस्तान

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सब कुछ स्वप्नलोक जैसा . दूर दूर तक केवल बर्फ ही बर्फ .. विस्फारित से नयन हिम का निस्सीम सा वैभव विस्तार देखने आतुर ..मिट्टी पत्थर मैदान पहाड़ पौधे झाड़ियाँ ...सब हिमाच्छादित.. शुभ्रवसना माँ जैसे धवल चादर ओढ़कर आराम कर रही हो . कहीं कहीं उगे पौधे और झाड़ियाँ चंचल शिशु जैसे माँ के लाख ढँकने के बावज़ूद चादर से मुँह निकालकर देख रहे हों ..

यह विवरण आस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स में स्थित स्नोई माउंटेन’ (snowy mountain)  की पेरिशर वैली का है .आस्ट्रेलिया की यह उच्चतम पर्वत श्रंखला 'ग्रेट डिवाइडिंग रेंज ' की  एक श्रंखला है ) जहाँ हम पिछले सप्ताह गए थे . इन दिनों अदम्य के स्कूल की छुट्टियाँ चल रही है . स्नोई माउंटेन जाने का उसका आग्रह बहुत समय से लम्बित था . हालाँकि मयंक श्वेता का स्वास्थ्य इसकी अनुमति नहीं दे रहा था पर पहले की बुकिंग थी ,जिसे स्थगित करने का कोई विकल्प नहीं था उधर अदम्य जिस उल्लास से अपने कपड़े खिलौने सूटकेस में जमा रहा था योजना को रद्द करना मुश्किल था इसलिये 7 जुलाई 2022 को मयंक ने कार की स्टेयरिंग सम्हाली और हम लोगों ने अपनी-अपनी सीट .सिडनी से पेरिशर वैली तक का यह  लगभग 500 किमी का है  . लेकिन सफर है काफी सुन्दर और सुविधाजनक . सपाट निर्बाध सड़क , दोनों तरफ पेड़ ; पेड़ हरे भरे भी और वसन्त का इन्तज़ार करते सूने उजड़े से पत्रविहीन भी . लगभग 150 किमी चलने के बाद हम लोग कॉफी के लिये (चाय नहीं मिलती ) ओलिव व्यू कैफे में रुके . जैसा कि नाम से स्पष्ट है यहाँ ओलिव यानी जैतून का बड़ा फार्म है . यह जगह बहुत ही खूबसूरत है . कॉफी और घर से बनाकर लाई गईं मूँगदाल की कचौड़ियाँ खाकर
ताजगी मिली तो मयंक ने दुगने उत्साह के साथ कार स्टार्ट कर दी .


जैतून का फार्म

जैतून की कतारें

'कुमा' और 'केनबरा' को पार करते हुए , स्थान के साथ ही धीरे धीरे रंगरूप बदलते जा रहे पेड़ों को निहारते हुए हम तीन बजे
जिन्दबाइन पहुँच गए . एक बड़ी और खूबसूरत झील के किनारे बसा हुआ यह शहर पेरिशर वैली तक के लम्बे सफर के बीच एक आरामदेह पड़ाव है . यहाँ हमें रात्रि विश्राम के अलावा बर्फीले मौसम के अनुकूल कपड़े जूते कार की चेन आदि सामान लेना था . 'मॉन्स्टर्स-डिपो'( monster depot) में गोरी, तन्वंगी ,अल्पवय और सुदर्शना युवतियाँ जिस तत्परता और सस्मित संवाद के साथ सबको सामान दे रही थीं , सामान के लिये दो घंटे की प्रतीक्षा मुझे बिल्कुल नहीं अखरी . यहाँ अठारह साल के बाद बच्चे ,लड़के हों या लड़कियाँ , अपना खर्च खुद उठाते हैं . सबसे बड़ी बात कि माता पिता को बेटियों की सुरक्षा की चिन्ता नहीं करनी पड़ती .

जिन्दबाइन झील



जिन्दबाइन टाउन




सामान लेने के बाद तय हुआ कि किसी रेस्टोरेंट में बैठकर पेट-पूजा की जाय लेकिन पर्यटकों की इतनी अधिकता कि जहाँ भी गए कोई सीट खाली नहीं थी . वेटिंग भी डेढ़ से दो घंटे ..पूरा  एक घंटा तलाश करने पर एक जगह स्वीकृति मिली वह भी एक घंटे बाद की .  हालाँकि घर से बनाकर लाया खाना ,फल, ब्रेड ,सब रखा था पर बाहर ताजा गरम पिज्ज़ा ( यहां शाकाहारियों के लिये एकमात्र यही भोज्य है ) खाने की इच्छा ने खूब भटकाया ..खैर 

  

8 जुलाई को सुबह नौ बजे हम लोग पेरिशर वैली को चल पड़े . जिन्दबाइन से पेरिशर वैली तक का सफर 30-35 मिनट का है . कुछ किमी चलने पर जंगल शुरु होगया . असल में यह पूरा क्षेत्र कॉजियस्को नेशनल पार्क (kosciuzko national park) का ही हिस्सा है . आस्ट्रेलिया का यह कठोर और वीरान क्षेत्र जून से अक्टूबर तक बर्फ और हिमपात के कारण पर्यटकों के लिये बेहद आकर्षक और रोमांचक रहता है .अक्टूबर से गर्मियाँ प्रारम्भ होजाती हैं .

हम लोग जैसे जैसे बढ़ते गए , पेड़ों के बीच बर्फ का विस्तार भी बढ़ता गया साथ ही हमारा उत्साह व रोमांच भी . और ..अन्ततः हम बहुप्रतीक्षित सर्वत्र हिमाच्छादित विशाल पेरिशर वैली में थे . हमने जिन्दबाइन से लिये कोट ,बूट ,ग्लब्ज पहने ,जो बर्फ के लिये खासतौर पर तैयार किये गए होते हैं .हमारे उत्साह का कोई ठिकाना न था . सब बच्चों की तरह किलक रहे थे . बर्फ का ऐसा वैभव पहली बार सामने था . दूर तक केवल प्रकृति का धवल हास ..मानो किसी ने सफेद नरम कालीन बिछा दिया हो . उजला कालीन जिस पर कठोर बूट रखते संकोच होता था . उसी समय और.. हिमपात (स्नो फॉलिंग) भी शुरु होगया .. अहा.. धवल फुहारों में खड़े हम... ,चेहरे पर , कपडों पर,  हिमकणों स्पर्श ...वह सचमुच एक अपूर्व अनुभव था .ऐसी फुहारें जो भिगो नहीं रहीं थीं . जैसे किसी ने रेशा रेशा कपास बिखराकर उड़ा दिया हो . पैरो के नीचे बर्फ का ढेर था ..शिलाखण्ड जैसी कठोर नहीं , रेत जैसी भुरभुरी और  गीली बर्फ जिसके गोले बनाकर लोग एक दूसरे पर फेंक रहे थे .हवा में हिमकण रेत की तरह उड़ रहे थे, ..जैसे हम बर्फ के रेगिस्तान में खड़े हों ..दूर दूर तक ठंडा सफेद रेगिस्तान जिसे पार करना  दुष्कर हो . पाँव मन मन भारी होरहे थे पर उत्साह ऐसा कि रोम रोम  ऊर्जा से भरा जा रहा था . हम जी भरकर फिसले , दौड़े , बर्फ के गोले बनाकर एक दूसरे पर फेंके ..लोग स्कीइंग कर रहे थे . जो अभ्यस्त थे वे दूसरे हिस्से में रोप वे से ऊपर जाकर स्कीइंग का आनन्द ले रहे थे 

बर्फ में बहुत देर तक रहना व चलना निश्चित ही हमारी क्षमता से ऊपर था . पास ही बने कैफे में कॉफी पीते हुए मैं उन लोगों के बारे में सोच रही थी जिन्हें महीनों बर्फ में ही रहना पड़ता है . हमारे जवानों को भी देश की सीमाओं पर दुश्मन से ही नहीं बर्फीले तूफानों से भी दो दो हाथ करने होते हैं . कितना कठिनाई भरा जीवन होता है उनका ! सोचकर मन कृतज्ञता से भर गया . 

जिन्दबाइन लौटते शाम होगई . पिछली शाम भूख मिटाने जिस तरह हमें जगह जगह भटकना पड़ा , तय हुआ कि स्टोव मिल जाए तो दाल चावल खुद ही बनालें . श्वेता सारा सामान साथ लाई थी . वह इंजीनियर होने के साथ साथ एक अच्छी गृहणी भी है .काफी प्रयास के बाद बीस डॉलर किराए पर एक घंटे के लिये स्टोव मिल गया . मैंने कहा एक घंटे के लिये बीस डालर ? (लगभग1150 रुपए  मेरे दिमाग में हमेशा रुपया रहता है ) श्वेता हँसकर बोली –"माँ कल खाना तो सौ डालर का था .  

9 जुलाई को हम जैसे ही जिन्दबाइन से चलने लगे अदम्य महाशय का रोना शुरु होगया . काफी पूछने पर बोले—"मुझे घर नहीं जाना ."

"तो फिर ?"

"मुझे स्नोई माउंटेन ही और जाना है .” 

वहाँ उसने खूब मस्ती की थी .पर यह संभव नहीं था .  उसे किसी तरह मनाया और केनबरा रुकने और बहुत सारी चीजें दिखाने का वादा करके चुप काराया .

पार्लियामेंट ऑफ ऑस्ट्रेलिया का अग्रभाग

पत्रविहीन पेड़ जो वसन्त में फूलों से लद जाएंगे .

केनबरा में पहले से बुकिंग नहीं थी इसलिये कोई होटल नहीं मिला .
हमें पार्लियामेंट हाउस देखकर ही सन्तोष करना पड़ा . लेकिन केनबरा एकबार फिर आना होगा जब वसन्त होगा और पत्रहीन खड़े बेशुमार पेड़ लाल गुलाबी फूलों से भर जाएंगे ..केनबरा से चलते पाँच बज गए . इन दिनों सूर्यास्त होते ही अँधेरा होने लगता है  . घर लौटने तक धूमिल आसमान के नीचे सारा शहर जगमगा रहा था .  

मंगलवार, 5 जुलाई 2022

सिडनी डायरी ---3



 
हरा भरा हैरिस गार्डन

पैरामेटा में एक उन्नीस मंजिला बिल्डिंग में अठारहवीं मंजिल पर दो कमरों वाला फ्लैट जिसमें सबसे सुन्दर है बड़ी बाल्कनी जहाँ से सुदूर तक विहंगम देखा जा सकता है . यहाँ सभी इमारतों में शीशे के पर्दे हैं जिनके आरपार स्पष्ट देखा जा सकता है . मैं जहाँ बैठी हूँ मेरा व अदम्य का कमरा है . इसमें भी बड़ी सी खिड़की जिसे खिड़की की बज़ाय दरवाजा कहना अधिक उपयुक्त है . पलंग पर लेटे या बैठे मैं शीशे के पार सुदूर सब कुछ देख सकती हूँ . 

कमरे में चांद
 एक साथ कितने रंग 
मेरे सामने बड़ा सा पार्क और चर्च है .पार्क ऊँचे सघन वृक्षों से घिरा हुआ है .वृक्ष भी कितने प्रकार और कितने रंगों के . हरियाली में ही हल्की से गहरी तक कितनी छायाएं हैं .. वृक्षों का वैभव तो देखते ही बनता है . कोई इतना सघन कि धूप पत्तों के बीच से नीचे उतरने की कोशिश करके हार जाती है . घनी टहनियों में गुँथे हुए से पत्ते धूप को हाथों हाथ या कहें आड़े हाथ लेकर लौटा देते हैं .अधिकतर वृक्ष सदाबहार हैं .उनके गहरे हरे और चिकने पत्ते जैसे हमेशा ऐसे ही बने रहने का वरदान लेकर आए हैं . पर कहीं कुछ पेड़ सारे पत्ते उतार कर अवधूत की तरह भी जमे हैं . 
सघन विरल का साथ 

बेशुमार कलियाँ जो फूल बनने तैयार हैं .

किसी पेड़ के पत्ते , हर हाल कुर्सी से चिपके रहने की लालसा वाले नेताओं की तरह ,सूख जाने पर भी टहनियों में अटके हुए हैं . कोई पेड़ पतझड़ में लाल हुआ जा रहा है तो कोई पीला . किसी पेड़ की टहनियों में पत्तों को हटाकर छोटी छोटी बेशुमार कलियाँ आकर जम गई हैं और कुछ ही दिनों में हल्के गुलाबी .फूलों में बदल जाने वाली हैं . कहीं छोटी छोटी झाड़ियाँ फूलों की लड़ियाँ गला में डाले इतराती हुई लगती हैं .

सामने छोटी सी नदी है जो शहर के केन्द्र 

तक पहुँचते पहुँचते समुद्र हो जाती है .  

नदी किनारे खूबसूरत जोड़ा 

नदी के किनारे पेड़ों से घिरा बहुत ही हराभरा मैदार है .नदी के साथ साथ सुन्दर फुटपाथ हैं जहाँ इक्का दुक्का  लोग टहलते दौड़ते मिल जाते हैं . भीड़ नहीं हैं क्योंकि जगह ज्यादा और लोग कम हैं . नदी में नियमित रूप से स्टीमर चलते हैं ,जिन्हें फेयरी कहा जाता है . पैरामेटा से सिटी तक जाने के लिये यह एक बहुत सुन्दर सुहाना साधन है . 


सजने के अजब ढंग

यहाँ सबसे 

फेयरी 

अच्छी बात है सड़क के साथ फुटपाथ जो पूर्ण सुरक्षित है . बस सड़क पार करने के लिये दस से पन्द्रह सेकण्ड रुककर सिग्नल के दौड़ते हुए आदमी के हरे होने की की प्रतीक्षा करनी है . फिर पार करने के बीच भले ही सिग्नल लाल होगया हो , गाड़ियाँ तब तक रुकी रहती हैं जब तक पार करने वाला सड़क पार न कर जाय . बिना सिग्नल निकलने वालों पर भारी जुर्माना लगता है चाहे वह गाड़ी वाला हो या पैदल चलने वाला . तो सही व्यवस्था लोगों की जागरूकता से कहीं अधिक सजा का डर है . फिर लोग नियम से चलने के आदी हो ही जाते हैं . राज्य कानून सजा की आवश्यकता है ही इसलिये .तभी स्पेंसर ने राज्य को बुराई मानते हुए भी आवश्यक कहा है .

सोमवार से शुक्रवार यहाँ दिनचर्या एक सी है . सुबह चाय नाश्ते के बाद अदम्य को स्कूल छोड़कर श्वेता मयंक का ऑफिस वर्क शुरु हो जाता है . मैं टहलने के लिये आधे से एक घंटा पार्क में या नदी किनारे निकल जाती हूँ . जहाँ अपने देश के बहुत से लोग मिलते हैं . संवाद न हो तो भी स्वदेशी होने का एहसास हो जाता है . वातावरण काफी साफ सुथरा और सुन्दर है . शनिवार रविवार अवकाश का होता है . आसपास ही मयंक और श्वेता के कई मित्र हैं . अमर , शिवम् ,सौरभ , रवि आदि ..ये दोनों दिन अक्सर इन्हीं मित्र-परिवारों के साथ खाते पीते हँसते खेलते गुजरते हैं . और तब सब भूल जाते हैं कि हम अपने देश में नहीं हैं ....

जारी.......

बुधवार, 29 जून 2022

अगर प्रेम विश्वास रहे

 

अगर प्रेम विश्वास रहे तो

साथ न छूटेगा .

अन्तर को जोड़ा जिसने

वो तार न टूटेगा .

 

संकल्पों के बीज भरी

फसलें लहराती हों

मोड़ मोड़ पर जहाँ हवाएं

फागुन गाती हों .

वहाँ लुटेरा कोई भी

खलिहान न लूटेगा .

अगर प्रेम विश्वास रहे...

 

यहाँ वहाँ से टुकड़े ले

जो भवन खड़ा करते हैं

सहज प्रवाहित धारा में

चट्टान अड़ा करते हैं .

होंगे वे निःशब्द 

समय जब कारण पूछेगा .

 

मनमानी को जो अपना

अधिकार समझते हैं .

पकी फसल पर जो

बनकर अंगार बरसते हैं

पर कब तक ,एक दिन तो

घट कच्चा है ,फूटेगा .

 

सोमवार, 20 जून 2022

कुछ कमी सी है .

 

हवाओं में आज कुछ नमी सी है .

खिड़कियों पर धुन्ध आकर जमी सी है.


ओप सूरज की सिमटती जा रही है ,   

फुनगियों पर धूप भी अनमनी सी है .


राह में आकर मिला जबसे समन्दर ,

धार नदिया की तभी से थमी सी है.


पेड़ ,पंछी ,फूल ,मौसम खुशनुमा हैं .

कौन फिर जिसके बिना कुछ कमी सी है ?


'भाव मेरा जो , वही उसका भी होगा  . '

सोच मेरी अब गलतफहमी सी है .


छूटकर पीछे कहीं कुछ रह गया है ,

सोच सारी उसी में ही रमी सी है .


उजड़ता ,बसता ,उगा लेता है फसलें ,

फितरतें मन की बहुत कुछ ज़मीं सी हैं .  

 

शनिवार, 7 मई 2022

मैं उन जैसी हूँ , पर नहीं हूँ .

 जब कभी मैं अपने जीवन के स्वरूप की तुलना करती हूँ तो माँ के जीवन से बहुत साम्य पाती हूँ .

वैचारिक स्तर पर जब बात दूसरों की खुशी में खुश होने की हो , दूसरों की संवेदना को महसूस करने की हो ,हमेशा सकारात्मक सोचने की हो , किसी को ना न कह पाने की हो , छल , घात ,झूठ , बेईमानी , दिखावा जैसी बातों से दूर रहने की हो ,इधर उधर कहीं ध्यान बाँटकर अपनी उलझनों को अनदेखा करने की हो , कड़वाहट और चुभन से परे आत्मीयता की जरा सी झलक पाकर अपने विरोधी के साथ भी सहज और स्नेहमय होने की बात हो , तो यकीनन मैं माँ जैसी ही हूँ .

माँ की प्रवृत्ति में कछुआ-धर्म था ,जो उनमें नानी से आया था . कछुआ--धर्म यानी जब आपको कोई चोट पहुँचाना चाहे . अहित की दृष्टि से पास आए तब आप पीछे हट जाएं . इस प्रवृत्ति को लोग भले ही पलायनवादी कहें लेकिन वह खुद को बचाए रखने का एक कारगर तरीका है . इस अर्थ में माँ पलायनवादी थीं . उन्हें झगड़ा करना नहीं आता था . जीवन के प्रति उनमें गहरी आस्था थी .हर कलाप्रिय व्यक्ति की तरह खुश व सन्तुष्ट रहने के तरीके उन्हें बखूबी आते थे . उन्हें गाना बजाना प्रिय था . वे भजन खुद लिखा करती थीं . ढोलक बजाने में उनका कोई मुकाबला आज तक नहीं है . वे कटु यथार्थ पर विचार करने की बजाय उसे समय के हवाले कर भविष्य की कल्पनाओं से खुद को सम्बल दिया करती थीं . खुद से ज्यादा वे दूसरों की परवाह किया करती थीं .यही नहीं खुद का आकलन दूसरों की नजर से करके वे खुद में ही गलतियाँ देखतीं और स्वीकार कर लेती थीं . लेकिन गलत को कभी स्वीकार नहीं कर पाती थीं . अगर करना पड़ ही जाता तो एक लड़ाई उनके अन्दर भी चलती रहती थी . जब व्यक्ति खुद से लड़ता है तब बाहर की लड़ाई में अक्सर हार जाता है . माँ बाहर की लड़ाइयाँ प्रायः हारती रहीं . ये सारी बातें सदा मेरे साथ भी रही हैं .

माँ घोर आस्थावादी थीं . गीताप्रेस की किताबों का उन पर गहरा प्रभाव रहा . सामाजिक सम्बन्धों को महत्त्वपूर्ण मानती थीं . समाज के छोटे व निम्न माने जाते रहे लोगों के प्रति भी स्नेह आदर और सम्मान भाव रखती थीं . उन्हें पिता ( मेरे नाना) या पति (मेरे पिता) का कभी कोई सम्बल नहीं मिला . पिता तो जब वे दो तीन साल की थीं तभी चले गए और पति  घर परिवार के सदस्यों के ही नही माँ के साथ भी एक कठोर शिक्षक ही रहे . कठोर गुरु जो शिष्यों की सिर्फ परीक्षाएं लेता है ,पर उत्तीर्ण होने पर कभी पीठ नहीं थपथपाता . उनका धर्म कर्म पूजा आराधना केवल स्कूल था . घर में सब्जी राशन ईँधन से लेकर किवाड़ ,पलंग , छत आँगन आदि की मरम्म्त तक माँ के ही जिम्मे थी . परिवार में स्नेह बनाए रखना भी उनके लिये बहुत ज़रूरी था . अपनी बड़ी बहिन ( बड़ी जिया) और जीजाजी का ,जो काकाजी के बड़े भाई भी थे , बहुत सम्मान करती थीं ,उनके सभी बच्चों को हमसे ज्यादा प्यार करती थीं . हालाँकि काकाजी स्वयं अपने भाई ( ताऊजी) और बच्चों से स्नेह रखते थे पर उन्हें माँ का उनके प्रति गहरा लगाव पसन्द नहीं था . ये सारी बातें माँ के लिये हमेशा अशान्तिकारक रहीं क्योंकि काकाजी का बर्ताव ही हर जगह रिश्तों का निर्धारक रहा इसलिये माँ का स्नेह और त्याग ऐसे ही चलते फिरते मिल जाने वाली मूल्यहीन वस्तु जैसा रहा . ये सभी बातें किसी न किसी रूप में मेरे साथ भी रहीं है . माँ की तरह ही एक विस्थापन सा मेरे विचारों में भी रहा है .

लेकिन जब बात सेवा साहस और परमार्थ की आती है तो माँ की तुलना में मैं खुद को तिनका बराबर भी नहीं मानती हूँ . जिस तरह नानी को उन्होंने छह महीने बिस्तर पर ही सम्हाले रखा था कि मक्खी तक नहीं बैठने दी . शैया-व्रण तो दूर ,शरीर पर एक दाग तक नहीं लगा . बिना किसी खीज या घृणा के बिस्तर पर ही मल मूत्र समेटती रहीं जबकि गाँव में बिजली तक की सुविधा नहीं थी . हर समय हाथ से पंखा झलती रहती थीं .वह एक प्रेरक और अनुकरणीय उदाहरण है . सेवा करना अच्छी ,लेकिन एक सामान्य बात है . समय आने पर अधिकाँश लोग करते ही हैं पर बिना खीज या घृणा के पूरे दायित्त्व व आत्मीय भाव से इस तरह सेवा करना बड़ा दुर्लभ है . माँ जब जीवन के अन्तिम दौर में थीं , ( कारण जो भी रहे हों ) उनकी सेवा मैं उतने स्नेह और दायित्वभाव से कहाँ कर पाई ! 

यह तो हुई अपने घर की बात . वे दूसरों की सेवा सहायता से भी कभी पीछे नहीं हटती थीं . मुझे याद है जब यक्ष्मा से पीड़ित कलुआ खवास का इकलौता बेटा जीवन की आस छोड़ चुका था . घर में वृद्ध माता पिता के अलावा कोई न था . माँ असहाय रोती रहती . एक वैद ने आखिरी कोशिश के लिये कुछ जड़ी बूटियों का चूर्ण और केले के पत्तों का रस बताया . ऐसे में माँ ने खुद जड़ी-बूटियों को कूट छानकर चूर्ण बनाया और एक हफ्ते तक केले के पत्तों का रस मरीज को पिलाया था . उस इलाज का सचमुच असर हुआ भले ही कुछ समय के लिये हुआ ,पर यहाँ महत्त्वपूर्ण थी माँ की पर-सेवा भावना .घर के काम छोड़कर केले के पत्ते लाना ,कूट पीस कर रस निकालना और मरीज तक बिना संक्रमण का डर किये पहुँचाना कितनी बड़ी बात थी . किसी भाई भाभी या बच्चे (मायका होने के कारण गाँवभर के स्त्री पुरुष उनके भाई भाभी थे) की परेशानियों में वे सदा साथ रहती थीं . ऐसे कई उदाहरणों से माँ का जीवन भरा रहा . 

माँ के अन्य गुणों में धैर्य और साहस सबसे विलक्षण गुण थे . एक बार नदी में नहाते समय माँ के पैरों से साँप लिपट गया . जिया ने कुछ देर हट्.. हुश् श करते हुए साँप को झटक दिया पर इतनी देर में उसने माँ की पिंडलियों में कई जगह काट लिया था .खून निकल रहा था . हम लोग रोए जा रहे थे पर वे बिना किसी डर या तनाव के कह रही थीं –--"अरे कुछ नहीं पनिहा था ." 

अरे पनिहा हो या करैत साँप का स्पर्श क्या कम भयावह होता है फिर उसने तो दाँत गढ़ा दिये थे . साँप के जहर की आशंका भी जहर जैसी ही होती है पर माँ जरा भी आशंकित नहीं थीं . मैं उस दिन सचमुच चकित रह गई माँ का धैर्य व साहस देखकर . ठीक है कि वह जहरीला नहीं था लेकिन साँप का तो नाम ही डरावना होता है फिर वह जिया के तो पैरों से लिपट गया था . उनकी जगह कोई महिला होती तो बेहोश होकर गिर पड़ती . इसी तरह घर में दो बार निकले दो बहुत जहरीले साँपों को जिया ने गंगाघाट उतार ही दिया था .

खाना बनाने और खिलाने का मुझे चाव है लेकिन परोसने में माँ के स्तर पर मैं शायद नहीं पहुँची हूँ अभी तक . फैली जाटव ,जिन्हें माँ फैली भैया कहा करती थीं और हम फैली मामा , ने हमारा मकान बनाया था . उस दौरान माँ उन्हें खाना भी खिलाती थीं और रोटियों में उसी तरह दबा दबा कर घी लगाती थीं जिस तरह वे हमारी व काकाजी की रोटियों में लगातीं थीं . फैली कारीगर सिर झुकाए माँ के स्नेह से कृतकृत्य होते रहते . माँ ने सम्मान देने में कभी किसी के साथ जातिगत भेदभाव नहीं किया .झाड़ू लगाने वाली वसन्ती को वे बड़े अपनेपन से बसन्ती भौजी कहती थीं .

माँ जैसा उदार भाव , और सशरीर सेवा भाव मुझमें नहीं है . मेरी सहायता प्रायः आर्थिक स्तर पर रही है . माँ की बराबरी मैं कभी नहीं कर सकती , काश कर पाती . 

वे अतुलनीया थीं ,हैं और सदा रहेंगी . 

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मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

सिडनी डायरी -2

 ब्लू माउंटेन और थ्री सिस्टर्स

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ब्लू माउंटेन सिडनी के पश्चिमी भाग में लगभग 100 कि.मी. दूर है . यह ऑस्ट्रेलिया की सबसे लम्बी पर्वत श्रंखला 'ग्रेट डिवाइडिंग रेंज' का ही कम ऊँचाई वाला हिस्सा है .इसकी अधिकतम ऊँचाई 1189 मीटर है . ब्लू माउंटेन में प्रकृति का व्यापक और सुरम्य संसार बसा हुआ है . कटूम्बा टाउन ,खड़ी ऊँची चट्टानें ,झरने ,सघन वन , गार्डन , नेशनल पार्क , अद्भुत रेलमार्ग आदि दर्शनीय स्थल हैं .थ्री सिस्टर्स भी यहाँ का एक बहुत ही प्रसिद्ध और अद्भुत स्थल है . कहा जाय तो ब्लू माउंटेन का सबसे खास लैण्डमार्क .आज हमारी योजना केवल थ्री सिस्टर्स और वाटर फॉल  देखने की थी .जेमसन वैली में सुदूर तक फैला विशाल प्राकृतिक वैभव ही लोगों को आकर्षित नहीं करता बल्कि 'थ्री सिस्टर्स' की रोमांचक कहानियाँ भी उन्हें खींचकर लाती हैं .  

थ्री सिस्टर्स

हम लोग और मयंक के तीन मित्र सपरिवार लगभग ग्यारह बजे पैरामेटा से ब्लू माउंटेन की ओर चल पड़े थे. पहुँचने में लगभग डेढ़ घंटा लगा . रास्ते में बहुरंगी वृक्षावलियों का आकर्षण भी कम नहीं था . कटूम्बा ऊंची नीची सड़कों वाला सुन्दर कस्बा है .पर्यटकों की भीड़ के कारण कार पार्किंग में खासी मुश्किल हुई . वह भी मात्र एक घंटा के लिये .

जैमसन वैली में सुदूर तक फैले सघन वनों के बीच स्थित 'थ्री सिस्टर्स' , बलुआ पत्थर से निर्मित बराबर खड़ी तीन चट्टानों की विलक्षण सृष्टि है .  वास्तव में इनका निर्माण हजारों लाखों वर्ष पहले पृथ्वी में होरहे व्यापक परिवर्तनों के प्रभाव से हुआ और धीरे धीरे ठोस चट्टानों में बदल गई . इनका यह भौगौलिक तथ्य है . लेकिन इन तीन चट्टानों को तीन बहिनें मानने के पीछे एक स्वप्निल सी पौराणिक कथा या जनश्रुति भी है जो जनजातीय इतिहास का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है . Glitter Gold against velvet backdrop .

कहा जाता है ये तीन बहिनें मीहनी ,विमलाह, और गन्नेडु कटूम्बा ट्राइब की सुन्दर आदिवासी कन्याएं थीं . इनकी ऊँचाई क्रमशः 922 , 918, तथा 906 मीटर है जो चमत्कारिक रूप से इस कथा की सत्यता को पुष्ट करती प्रतीत होती है . वे तीनों बहिनें एक अन्य नेपियन जनजाति के तीन य़ुवकों से प्रेम करती थीं . तीनों युवक भी भाई थे और तीनों बहिनों से विवाह करना चाहते थे लेकिन जनजातीय नियमों के अनुसार उनका विवाह निषिद्ध



था .पर वे नियम तोड़कर विवाह करना चाहते थे, इसलिये दोनों जनजातियों के समूहों में युद्ध छिड़ गया . एक ओझा ने अपने कुटुम्बा समूह की इन 
तीनों बहिनों को बचाने के लिये जादू के बल से  चट्टान बना दिया . उसने सोचा कि जब सब कुछ शान्त होजाएगा तो फिर से उन्हें मानवी के रूप में वापस ले आएगा लेकिन दुर्भाग्यवश वह ओझा युद्ध में मारा गया परिणाम स्वरूप चट्टान बनी वे तीनों बहिनें कभी अपने मौलिक (मानवी) रूप में नहीं आ सकीं .द थ्री सिस्टर्स जैसे उसी करुण कथा को सुनाती प्रतीत होती हैं .

कटूम्बा फॉल
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एक अन्य कथा के अनुसार मीहनी ,विमलाह और गन्नेडु कटूम्बा ट्राइब के ओझा त्यावान की रूपवती बेटियाँ थीं . उसके पास जादुई शक्तियाँ थीं . जब वह भोजन की तलाश में जाता तो तीनों बेटियों को एक टीले पर चट्टान बना जाता क्योंकि वहाँ गहरे अँधेरे में एक विशाल भयानक मेमल रहता था जो धरती का सबसे डरावना प्राणी था .एक दिन त्यावान जब भोजन की तलाश में निकल गया एक बड़ा सेंटीपीड ( कनखजूरा ,जोंक ,शतपद) रेंगता हुआ मीहनी की तरफ आय़ा . मीहनी ने डरकर उसकी तरफ एक बड़ा पत्थर फेंका जो लुढ़ककर उस विशाल भयानक मेमल को लगा .वह नाराज होकर मीहनी का तरफ दौड़ा यह देख दूर से देख रहे त्यावान ने जादुई छड़ी से तीनों बेटियों को मेमल से बचाने के लिये पत्थर बना दिया . यह देख मेमल त्यावान की ओर झपटा तो त्यावान ने खुद को लायर पक्षी के रूप में बदल लिया . यहाँ तक सब ठीक था लेकिन उसी खींचतान में त्यावान के हाथ से झादुई छड़ी कहीं गिर गई . इस तरह त्यावान पक्षी के रूप में और उसकी बेटियाँ चट्टानों के रूप में बनी ही रह गईं .

आज भी इन्हें देखकर लगता है कि उदासी में डूबी हुई सी तीनों बहिनें मानों अपने सौन्दर्य और आकर्षण को बचाए रखने और फिर से मानवी होने की लालसाओं के साथ खड़ी हैं ,जो कभी नहीं बन सकेंगी . कहा जाता है कि त्यावान आज तक अपनी खोई हुई जादुई छड़ी की तलाश में है इसीलिये लायर पक्षी की पुकार आज भी जब तब जहाँ तहाँ सुनी जा सकती है. यहाँ तक कि जो लोग इस मिथक पर विश्वास नहीं करते वे भी 'द थ्री सिस्टर्स' की त्रासद कथा से हदय में एक टीस अनुभव करते हैं  . 

इस प्रसंग से मुझे बचपन में सुनी राजकुमार और दानव कन्या की एक रोमांचक कहानी याद आ गई है जिसमें एक दानव और उसकी बेटी घने जंगल की एक बड़ी गुफा में रहते हैं . उसे अपनी खूबसूरत बेटी की सुरक्षा की चिन्ता रहती थी खासतौर पर मानुस जाति से . इसलिये जब वह भोजन की तलाश में बाहर जाता है तो बेटी का सिर काटकर छत से टाँग जाया करता था . फिर लौटकर जादू के प्रभाव से सिर को धड़ से जोड़कर जीवित कर लिया करता था .    

यह बड़ी ही रोचक बात है और शोध का विषय भी मिथक कि जनश्रुतियाँ और परी-कथाएं हर देश-प्रदेश और हर जाति धर्म में होती हैं जो परस्पर किसी न किसी रूप में मिलती हैं और एक होने का संकेत देती हैं . हजरत नूह और मनु की जलप्लावन की घटना , मानव और आदमी की उत्पत्ति , हजरत इब्राहीम और राजा मोरध्वज की कथा और भी कितनी कथाएं , मिथक और जनश्रुतियाँ हैं जो न केवल किसी समय एक ही एक ही स्रोत से निकली प्रतीत होती हैं बल्कि हमें कभी तो किसी स्वप्नलोक की सैर कराती हैं और कभी हदय को एक वेदना से भर देती हैं . यह भी कि प्रेम , ईर्ष्या , संवेदना , मोह आदि मानव के स्वभाव में है, और प्रेम सदा विरोध का सामना करता रहा है चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने में रहता हो . 

शाम सात बजे जब शहर बिजली की रोशनी में जगमगा रहा था हम लौट आए थे . लौटते हुए हमेशा की तरह रास्ता छोटा लग रहा था .