शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

छोटी सी बात




26 नवम्बर 2011
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समय के द्रुतगामी रथ पर सवार जिन्दगी कब कितने पडाव पार कर जाती है पता ही नही चलता । पर लगता है कि माँ के लिये समय ठहर जाता है । देखिये न ,आज प्रशान्त (बडा बेटा) तेतीस वर्ष पूरे कर चुका है ।पर मेरे लिये आज भी वैसा ही है जैसा बचपन में था । इस बार कुछ नया नही लिखा । इसलिये दो कहानियाँ पोस्ट कर रही हूँ ।एक यहाँ ''छोटी सी बात'' । और दूसरी--"पहली रचना" कथा-कहानी ब्लाग पर । पन्द्रह-बीस साल पहले लिखी गईं ये दोनों कहानियाँ पूरी तरह तो नही पर अधिकांशतः प्रशान्त (गुल्लू) पर ही केन्द्रित हैं । आप कृपया दोनों कहानियाँ पढें । हालाँकि ये दोनों ही कहानियाँ प्रकाशित हो चुकीं हैं लेकिन आप सबके पढने पर अधिक सार्थक होंगी ।
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"मम्मी !... मम्मी मेरी बात सुनो न ।"--गुल्लू ने मुझे फिर पुकारा ।
यह उसकी आदत है । चाहे कोई काम हो या न हो वह जब तब मुझे पुकारता रहता है--"मम्मी कहाँ हो मम्मी मेरी बात सुनो ..जरा यहाँ आओ न मम्मी । पढते समय भी बीच-बीच में भी वह मानो आस्वस्त होनेके लिये ही कि मैं घर में ही हूँ मुझे पुकार लेता है तभी निश्चिन्त होकर पढता है । अगर उसे लगता है कि मैं घर में नही हूँ तो पढाई छोड मुझे तलाशना शुरु कर देता है । किचन बाथरूम छत पडोस और जहाँ भी मेरी संभावना होती है तलाश करता है ।यहाँ तक कि लैट्रिन के दरवाजे पर जाकर भी एक--दो आवाजें लगा ही देता है ।
"यह भी कोई तरीका है ।" मैं उसे डाँटती हूँ । उसकी इस आदत से मुझ पर एक अनावश्यक सा बन्धन तो रहता ही है उसकी बात का महत्त्व भी कम होता है ।हाल यह कि वह पुकारता रहता है और मैं उसे अनसुना कर अपने काम में लगी रहती हूँ । उस समय भी जब वह मुझे जल्दी आने की रट लगाए था मैं रसोई में काम निपटाने में लगी थी ।
इस बात को आगे बढाने से पहले मैं वे बातें जरूर बताना चाहूँगी जिनके कारण मुझे उसके प्रति काफी असंवेदनशील होना पडा है । वह छुटपन से ही मनमौजी रहा है । मुझे याद है कि उसे दूध पीना जरा भी पसन्द नही था । निपल से तो बिल्कुल नही । चम्मच से पिलाना एक बडा और मुश्किल अभियान हुआ करता था ।पहले तो वह मुँह ही नही खोलता था । होठों को कस कर बन्द कर लेता था । जैसे तैसे करके दूध मुँह में डाल भी दिया जाता तो वह झटके से गर्दन मोड कर सारा दूध बाहर निकाल देता था । जब तक वह दूसरी चीजें खाने लायक नही हुआ अक्सर भूखा रहता था इसलिये कमजोर व चिडचिडा भी । पर जब सब कुछ खाने लगा तब भी उसके नखरे कम नही थे । एक चीज को वह दिन में सिर्फ एक बार ही खाता था । जैसे कि एक बार दाल-चावल खा लिये तो दूसरी बार कुछ और ही खाना होता था ।
वह अक्सर रूठ जाया करता था और उसे मनाने के लिये भी हर बार नया तरीका अपनाना होता था । जैसे एक बार कहानी सुनादी तो दूसरी बार कोई चित्र या खिलौना देना पडता था । फिर गीत या कविता ऐसे ही फिर कोई और तरीका...। चूँकि गुल्लू घर का पहला छोटा बच्चा था । खूबसूरत और प्यारा भी इसलिये घर का हर सदस्य उसके नाज़ उठाने तैयार रहता था । पर कभी--कभी सबका दिमाग जबाब देजाता था । एक बार ऐसा ही हुआ कि गुल्लू किसी बात पर रूठ गया । और ऐसा रूठा कि मनाने के सारे उपाय बेकार साबित हुए । मैंने तंग आकर दो-तीन तमाचे जड दिये । बस यह तो आग में मिट्टी का तेल डालना होगया । वह जोर से चीखने लगा और मैं खीज व ग्लानि-बोध से भरी निरुपाय सी उसे रोता हुआ देखती रही तभी उसके पापा आगे आए ।
हटो सब लोग--उन्होंने अपना रंग जमाने की कोशिश करते हुए कहा --"हमारे गुल्लू से बात करने की किसी को तमीज ही नही है ।" लेकिन उनकी इस बात का उस पर कोई अच्छा असर नही हुआ बल्कि वह और भी कोने में खिसक गया और रो रोकर आँख--नाक एक करता रहा ।
"भैया ,एक बार की बात है "---अचानक उसके पापा सबको चौंकाते हुए नाटकीय अन्दाज में बोले----"सब ध्यान से सुनना-टिल्लू ,पिल्लू, चीकू,मीकू, ..और हाँ बीना तुम भी..।" उन्होंने गुल्लू का नाम छोड कर हम सबका नाम लिया और रहस्यमय तरीके से सुनाने लगे---"हाँ तो भैया ..एक बार हम एक सुनसान जंगल से गुजर रहे थे । वह ऊँटों से भरा जंगल था । अचानक एक ऊँट चिघाडता हुआ हमारी ओर आया । "...
इतना कह कर वे कुछ रुके क्योंकि 'चिघाडता' शब्द सुनकर गुल्लू ने अचानक पलट कर ऐसे देखा मानो उसके पापा ने कोई गलत बात कह दी हो । पर तुरन्त ही उसने पहले की तरह मुँह फेर लिया । तब वे आगे सुनाने लगे----"हाँ तो भैया वह ऊँट हमारी ओर दौडा ..। उसके सूप जैसे कान थे । खम्बे जैसे पैर और एक लम्बी जमीन को छूती हुई सूँड...उस ऊँट को देखकर..."
"वह तो हाथी था ।"---गुल्लू अचानक चिल्लाया । हमने अपनी हँसी को जैसे-तैसे दबाए रखा । उसके पापा चहककर बोले---"देखा ,मैंने कहा था न कि हमसे ज्यादा नालेज हमारे गुल्लू को है । हाँ तो बेटा फिर ऊँट कैसा होता है ?"
"ऊँट की टाँगें तो लम्बी और पतली होतीं हैं ,टेढी-मेढी भी । पीठ पर बडा सा कूबड होता है । गर्दन खूब लम्बी होती है ।मुँह बैल जैसा और होठ लटके से रहते हैं यों "..उसने होंठ लटका कर दिखाए । और फिर हिलते हुए बताया कि ऊँट ऐसे चलता है । अब गुल्लू जिस तरह किलक-किलक कर बात कर रहा था कौन कह सकता था कि बच्चा रोता भी है ।
ऐसा ही एक और मजेदार वाकया हुआ । हम गुल्लू को मेला दिखाने लेगए । मेले में घूमते हुए गुल्लू बहुत खुश था । उसने अपनी कई मनपसन्द चीजें खरीदवाईं । आइसक्रीम खाई । नाव में झूले । अप्पूघर और डिज़नीलैंड की सैर की ।गुब्बारों पर निशाने लगाए और भी बहुत कुछ...।
पर शाम को जैसे ही लौटने लगे वह मचल गया ।
"आपने मेला तो दिखाया नही ।"
"मेला ?.. अरे बेटा दिन भर हम मेला ही तो देखते रहे ,जहाँ तुमने खिलौने खरीदे ,आइसक्रीम खाई ...।"
"वे तो दुकानें थीं । मुझे तो मेला देखना है ।"
मेरी अक्ल तो ऐसे मौकों पर टका सा जबाब दे जाती है । उसके पापा ही सोचते रहे कि कैसे अपने अक्लमन्द लाडले को मेले की परिभाषा समझाएं । कुछ सोच कर वे उसे ओवरब्रिज पर लेगए । वहाँ से पूरा मेला दिखरहा था । शाम के धुँधलके में रंग-बिरंगी रोशनी से जगमगाता हुआ मेले का विहंगम दृश्य।
"देखो बेटा मेला वो है । है न खूबसूरत !"
और तब गुल्लू महाशय सन्तुष्ट हुए ।
गुल्लू अक्सर ऐसे काम करता जो मेरी समझ से बाहर होते हैं । एक दिन मैंने देखा कि वह अकेला एकटक दीवार को देखे जा रहा था । जब मैंने टोका तो बडा उत्तेजित होकर बोला --"मम्मी ! क्या आपने कभी चींटियों को गौर से देखा है ?"
"चींटियों को ??"--मेरा दिमाग भन्ना गया --"लडका है कि अजूबा ! पढने में जरा दिमाग नही लगाता ।" मैंने उसे झिडकते हुए कहा ---"मेरे पास इन बेसिरपैर की बातों के लिये वक्त नही है । चलो बस्ता उठाओ और स्कूल का काम करो ।"
बस हमेशा काम काम--वह पैर पटकता हुआ बडबडाता रहा---"मेरी बात तो कभी ध्यान से सुनती ही नही । मेरे लिये किसी को फुरसत ही नही है ।"
इसकी बातें जब नही सुनी जाएंगी तभी यह आदत छूटेगी हर वक्त कुछ न कुछ फालतू करते रहने की । मैंने सोचा था । पर मेरा सोचा क्या पूरा हुआ । मैं सुनूँ या न सुनूँ उसे मुझे पुकारना ही है ।
मैंने अपनी बात यही छोडी थी कि तब भी मैं रसोईघर में अपना काम निपटा रही थी और गुल्लू मुझे पुकारे जारहा था---"मम्मी ! सुनो ना ...बस एक मिनट के लिये बाहर तो आओ । मम्मी..!"
"मुझे इस समय तंग मत कर गुल्लू । दूध गरम हो रहा है । मुझे ऑफिस भी जाना है ।"---मैंने तीखे और निर्णायक स्वर में कहा । मेरे मन में कही यह भय भी था कि यह जरा सा बच्चा जब अभी से मुझे अपने इशारों पर चला रहा है । यहाँ आओ ..वहाँ मत जाओ ..यह करो .वह मत करो ..यह सुनो वह सुनाओ .--हद होगई ।"-- इसलिये वह बुलाता रहा ,मैं नही गई । इससे मुझे एक सन्तुष्टि मिली ।
थोडी देर बाद जब मेरा काम पूरा होगया मैं उसे देखने गई । उसका यों चुप होजाना भी असहज लग रहा था । वह दोनों हाथों से घुटनों को बाँधे सीढियों पर अकेला बैठा था । उसकी गर्दन तनी हुई थी मोर की तरह । उसने मुझे देखा तक नही । बल्कि मुझे देख कर मुँह फुला लिया । होठों के किनारों से बुलबुले फूट रहे थे । गोरा चेहरा सुर्ख होगया था और आँखें पनीली । मुझे कुछ खेद हुआ । उसके पास बैठ कर उसके बालों में हाथ फेरते हुए पूछा---
"अब बता बेटा । क्या कह रहा था । क्यों बुला रहा था मुझे ?"
उसने मेरी बात जबाब नही दिया और मेरा हाथ झटक दिया ।
"अब मैं आगई हूँ न !"--मैंने उसे मनाते हुए कहा तो वह चिल्ला कर बोला---अब आने से क्या होता है । इतनी देर से बुला रहा था तब तो आई नही । यह कहते कहते उसकी आवाज भर्रा गई । गले की नसें फूल गईं होंठ काँप रहे थे और आँखें ,लगता था कि अभी निकल पडेंगी । मुझे लगा कि मझसे बडी भूल होगई है । मैंने उसे कन्धे से लगाया और पीठ सहलाते हुए यह जानने की कोशिश करने लगी कि वह क्या कहना चाहता था । कुछ देर बाद जब वह कुछ सहज हुआ तो बोला ---"पता है ,अमरूद के पेड पर एक बहुत सुन्दर चिडिया बैठी थी । मम्मी तुम देखतीं तो खुश होजातीं।"
चिडिया..। मुझे धक्का सा लगा । एक चिडिया के पीछे इतना हंगामा । पर मैं अब उसे नाराज नही करना चाहती थी इसलिये बोली---"मुझे क्या मालूम था कि तू इतनी सुन्दर चिडिया दिखाने वाला है । अच्छा कहाँ है वह ?"
"अब क्या हमारे लिये बैठी ही रहेगी !" ---वह कुछ ताव में बोला पर जल्दी ही दूसरी बातों में खोगया कि "मम्मी मिट्ठू है न वह जब गुस्सा होता है तो पत्तों को नोंच-नोंच कर गिराता है । और कौए हैं न कपडों से अपने दुश्मन की पहचान करते हैं । पता है मिंकू ने कौए का घोंसला गिरा दिया तो कौए मिंकू के पीछे तो पडे ही रहते हैं एक दिन उसके भाई ने मिंकू की शर्ट पहन ली तो कौए उसके पीछे भी पडगए । कितने बुद्धिमान होते हैं न पक्षी !"
हम बडों को तो इन बातों का पता ही नही रहता । बच्चों की अनुभूति कितनी गहरी व सूक्ष्म होती है ।---मैं यही सोचती हुई उस चिडिया को तलाशने लगी ।
"देखो ,गुल्लू कही वह तो नही है तुम्हारी वाली चिडिया ?" मैंने अनार की टहनियों में फुदकती हुई एक सुन्दर व चंचल चिडिया को देख कर पूछा ।
"हाँ..हाँ मम्मी ! वही तो है "---गुल्लू एकदम चीख कर बोला---"देखो न कितनी सुन्दर है ! चोंच कितनी नुकीली है ! और आँखें कितनी बडी और काली ! देखो पूँछ कैसे मटका रही है नटखट कहीं की ।"
वह चिडिया को देख मुग्ध हुआ जारहा था । पर मैं उसे देख रही थी उसकी आँखों को ,जिनसे खुशी झरने की तरह फूट चली थी । खुशी एक छोटी सी चिडिया को देख पाने की । और उससे भी ज्यादा मुझे दिखा पाने की खुशी । अपनी खुशी को मेरे साथ बाँट पाने की खुशी । इन छोटी-छोटी बातों में इतनी बडी खुशियाँ छुपी होतीं हैं मैंने तो सोचा भी नही था ।
"मम्मी ! यह चिडिया है न बहुत खबसूरत ?" उसने किलक कर पूछा तो मैं कहे बिना न रह सकी कि," हाँ सचमुच इतनी खूबसूरत चिडिया मैंने पहली बार देखी है ।"

शनिवार, 12 नवंबर 2011

मान्या मेरी टीचर






14 नवम्बर--2011

हमारी मान्या जी आज पूरे पाँच साल की होगईँ हैं । मजे की बात यह कि समझ में वे इससे ज्यादा बड़ी हो चुकीं है । सुलक्षणा ने एक दिन उसे बता दिया कि दादी भी टीचर हैं । उसका उद्देश्य निश्चित ही यह रहा होगा कि टीचर के नाम से मान्या जी कुछ 'डिसिप्लेन्ड' रहें जिसकी जरूरत माँओं को कुछ ज्यादा रहती है (दादी नानी की अपेक्षा ) पर अपनी तो आफत ही आगई ।
देखिये कि वे अब मेरी कैसी-कैसी परीक्षाएं लेतीं हैं ।
"दादी आपको सिन्ड्रेला की स्टोरी तो आती होगी क्यों नहीं आती ? आप तो टीचर हैं ?"
"दादी मम्मी से कहो कि मुझे भी मार्केट ले जाएं । आपकी बात तो मान लेंगीं ।...क्यों ? क्यों नही मानेंगी ? आप तो टीचर हैं न !"
"दादी ! आप टीचर हैं तब आप को तो पता होगा कि मम्मी ने मेरी सारी चाकलेट्स कहाँ रखदी हैं ।"
"अरे दादी , आप मम्मी से क्यों पूछ रही हैं कि पिज्जा कैसे बनता है । आपको तो सब आता है । आप तो टीचर हैं न !"
"दादी ! मेरी खिलौने वाली बकेट उतार दो न । पापा आपसे कुछ नही कहेंगे आप तो टीचर हैं न ?"
"ओ हो दादी ! टीचर होकर भी आपको नही पता कि कार्टून नेटवर्क कहाँ आता है ।"
"अरे दादी !आपको क्यों नही पता कि मेरी बेस्ट फ्रेंड का नाम क्या है । टीचर को तो सब पता होता है । है न ?"
दादी आप आज मम्मी को कहदो ऑफिस नही जाएं .आपकी बात तो मानेंगी । आप तो टीचर हैं न ।
तो टीचर यानी एक सर्वज्ञाता, सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हस्ती । होगई न अपनी आफत ।


और अब,
मान्या की टिप्पणी
यहाँ कविता के रूप में ।
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बडी भुलक्कड़ मेरी दादी ।
वैसे तो हैं सीधी--सादी
जैसे हो बापू की खादी
पर अक्खड़ लगती हैं दादी ।
बडी भुलक्कड़ मेरी दादी ।


कहते-कहते बात भूलती
चलते-चलते राह भूलती
दवा समय पर कभी न लेतीं
गैस चढ़ाकर चाय भूलतीं


चश्मा--चाबी अक्सर भूलें
सबसे फिर ढुँढ़वातीं हैं
पेन हाथ में लिये-लिये ही
पेन कहाँ है चिल्लाती है ।


मन्नू को छुन्नू कह देतीं
छुन्नू को कहतीं हैं गुल्लू ।
मम्मी को बेटा कहती हैं
दादी बन जातीं हैं उल्लू ।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

एक नदी

मुझे क्या पता कि
किधर है ढाल
और किस बनावट की
यह धरती है
मैं तो इतना ही जानती हूँ कि
एक नदी है जो
सिर्फ तुम्हारी ओर
बहती है ।
किनारों को छूती हुई
एक सदानीरा नदी ।
ढाल बदला नही जा सकता
इसलिये नदी का प्रवाह भी
बदला नही जासकता ।
तुम भी मत कोशिश करो
उसे बदलने या रोकने की ।
रोकने से बाढ के हालात बनते हैं
बस्तियाँ डूबतीं हैं ।
सिमट जाती है जिन्दगी एक ही जगह
वर्षों तक पानी ,सीलन और सडन में
कुलबुलाते है कीडे--मकोडे ।
नदी को बहने दो ।
बहेगी तो साफ रहेगी
धरती को सींचेगी ।
बुनेगी हरियाली के कालीन
नदी को मत रोको हठात् ही
उसे बहने दो ।
सृजन की कथाएं कहने दो ।
हो सके तो तुम भी बहो
इस नदी के साथ
नही तो किनारों के साथ
चलो जहाँ तक चल सको ।
नदी तुम्हें भी सिखा देगी
बहना , उछलना , मचलना
और निरन्तर सींचना धरती को ।

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

चकमक और मैं


आप सबको दीपावली की हार्दिक शुभ-कामनाएं ।
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22 अक्टूबर को चकमक के तीन सौ वें अंक का विमोचन भारत-भवन( भोपाल) में श्री गुलजा़र जी द्वारा किया गया । इस अवसर पर उनके अलावा और भी अनेक प्रख्यात साहित्यकार थे । प्रयाग शुक्ल जी  और वरुण ग्रोवर से  काफी बातें हुई . वरुण ग्रोवर  और सुशील शुक्ल  कभी चकमक के बाल पाठक हुआ करते थे . आज आसमान छू रहे हैं . वरुण फिल्म लाइन  में  चले गए हैं और सुशील  चकमक  को नया रूप देने की कोशिश कर रहे हैं . सुशील बहुत अच्छे  रचना कार भी हैं . उत्साही जी  और उनकी श्रीमती  निर्मला से भी भेंट हुई .  चकमक से जुडे सभी लोगों के लिये यह काफी महत्त्वपूर्ण अवसर था । मेरे लिये भी ।
गुलज़ार जी व सुशील शुक्ल के साथ 


सन् 1986 में चकमक से मेरा परिचय अँधेरे कमरे में टार्च हाथ लग जाने जैसा हुआ था । उन दिनों में उसी गाँव के उसी स्कूल में पढाया करती थी जहाँ कुछ साल पहले मैं खुद पढी थी । मुख्य सड़क से काफी दूर हमारा गाँव तब हर सुविधा से वंचित था .आठवीं व ग्यारहवीं कक्षा तो सात-आठ कि. मी.पैदल जा जाकर पास करलीं थी और बी. ए. एम.ए. के प्रमाण-पत्र बच्चों को पालते-सम्हालते हुए स्वाध्याय द्वारा हासिल कर लिये थे ।मतलब कि बाहर की दुनिया से कोई खास परिचय नही था । खास तौर पर पत्र-पत्रिकाओं व साहित्य से ।(आज भी मैं कूप-मण्डूक ही हूँ) जो कुछ भी पाठ्यक्रम में आया ,ज्ञान वहीं तक सीमित रहा । यों लिखने का शौक तो ग्यरहवीं कक्षा से ही शुरु होगया था । और सात-आठ कहानियाँ व कविताएं व गीत तभी लिख डाले थे । यही नही एक बाल उपन्यास भी लिख डाला जिसका एकमात्र पाठक मेरा छोटा भाई ही रहा । खैर वह उपन्यास व कहानियाँ तो नष्ट हो गईँ पर कविताएं अभी भी हैं लगभग दो सौ गीत ---जाने कौन जिन्दगी में यह नव-परिवर्तन लाया ..या मैं तुमको पहचान न पाई ..आदि । पर वे सब अप्रकाशित रचनाएं आत्म-केन्द्रित सी हैं और उन्हें साहित्य की श्रेणी में रखने का दुस्साहस नही करूँगी ।

चकमक का आना एक नयी राह  , नयी  दिशा मिलने जैसा था । हालाँकि उसके बाद मैंने कोई सृजन के कीर्तिमान नही बनाए फिर भी पहली बार हुई हर घटना अविस्मरणीय होती ही है । यह चकमक ही है जिसमें पहली बार मेरी कोई रचना प्रकाशित हुई । वह रचना एक कविता थी--मेरी शाला चिडिया घर है ..। इस कविता के प्रकाशन विषयक एक रोचक प्रसंग है जिसे फिर कभी लिखूँगी । हाँ इसके बाद चकमक का हर अंक मेरे लिये कुछ न कुछ लाता रहा और मुझसे खींच कर रचनाएं भी लेजाता रहा । एक शिक्षिका होने के नाते चकमक से मैंने बहुत कुछ सीखा । बहुत अधिक तो नही पर अब तक चकमक में मेरी लगभग पचास रचनाएं आ चुकीं हैं । मैं मानती हूँ कि अगर चकमक से न जुडी होती तो शायद ये रचनाएं भी न बन पातीं । इस अर्थ में अच्छी पत्रिकाओं से वंचित रहना एक बडी हानि है पाठक व लेखक दोनों की ।
कलेवर की दृष्टि से चकमक अब सचमुच चकमक होगई है । शानदार रंगीन पृष्ठ ,चित्र आकर्षक आवरण और प्रख्यात देशी-विदेशी रचनाकारों की रचनाएं । सम्पादक भाई सुशील शुक्ल अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग करते प्रतीत होते हैं । मैं जब चकमक से जुडी थी तब चकमक के सम्पादक श्री राजेश उत्साही थे । उस समय क्योंकि पत्रिका का आरम्भकाल था सो भले ही इतना बाह्याकर्षण नही था लेकिन सामग्री का स्तर किसी भी स्तर पर कम नहीं था ।,बल्कि कहीं अधिक ऊँचा था .  श्री राजेश उत्साही  बहुत ही कुशल व अनुभवी सम्पादक रहे . रचनाओं का चयन सम्पादन गज़ब था ... खैर ,यहाँ उस पहली रचना को पुनः दे रही हूँ ---

"मेरी शाला है चिडिया-घर ।

हँसते खिलते प्यारे बच्चे ,
लगते हैं कितने सुन्दर ...।
(1)फुदक-फुदक गौरैया से ,
कुर्सी तक बार-बार आते ।
कुछ ना कुछ बतियाते रहते,
हरदम शोर मचाते ।
धमकाती ,---डर जाते ,
हँसती,------ तो हँसते हैं,
मुँह बिचका कर .। मेरी शाला .....
(2)तोतों सा मुँह चलता रहता,
गिलहरियों से चंचल हैं ।
कुछ भालू से रूखे मैले ,
कुछ खरहा से कोमल हैं ।
दिन भर खाते उछल-कूदते ,
मानो वे हैं नटखट बन्दर ।
मेरी शाला ........
(3)हिरण बने चौकडियाँ भरते ,
ऊधम करते जरा न थकते ।
सबक याद करते मुश्किल से ,
बात-बात पर लडते --मनते ।
पंख लगा उडते से लगते ,
आसमान में सोन -कबूतर ।
मेरी शाला.....।
(4)पल्लू पकड खींच ले जाते ,
मुझको उल्टा पाठ पढाते ।
बत्ती खोई...धक्का मारा ...,
शिकायतों में ही उलझाते ।
और नचाते रहते मुझको ,
रखना काबू कठिन सभी पर ।
मेरी शाला ....।
(5)पथ में कहीं दीख जाती हूँ ,
पहले तो गायब हो जाते ,
कहीं ओट से दीदी--दीदी----
चिल्लाते हैं ,फिर छुप जाते ।
कान पकड लाती हूँ तो ,
अपराधी से होजाते नतसिर ।
मेरी शाला .....
(6)जरा प्यार से समझाती हूँ ,
तो बुजुर्ग से हामी भरते ।
पर वे ऐसे मनमौजी ,
अगले पल अपने पथ पर चलते ।
बातें मेरी भी सुनते हैं ,
पर लगवाते कितने चक्कर ।
मेरी शाला ....
(7)गोरे ,काले ,मोटे पतले ,
लम्बे ,नाटे ,मैले ,उजले ।
कोमल ,रूखे ,सीधे ,चंचल,
अनगढ पत्थर से भी कितने ।
पर जितने ,जैसे भी हैं ,
मुझको लगते प्राणों से बढकर ।
मेरी शाला है चिडियाघर ।
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बुधवार, 28 सितंबर 2011

हम संझा साँझी खेलते

क्वार माह यानी शरद ऋतु का प्रारम्भ । यानी एक रमणीय और सुहानी ऋतु का आगमन । इस ऋतु के सुहानेपन को कवि-शरोमणि तुलसीदास जी ने अनेक अनूठी उक्तियों द्वारा व्यक्त किया है ।
कवि सेनापति ने शरद-वर्णन जिस सजीवता से किया है, दर्शनीय है---
"पावस निकास याते पायौ अवकास ,भयौ जोन्ह कौ प्रकास सोभा ससि रमनीय कौं । विमल आकास होत वारिज विकास ,
सेनापति फूले कास हित हंसन के जीय कों । छिति न गरद,मानो रंगे हैं हरद सालि, 
सोहत जरद को मिलावै प्रान पीय कौं ।
 मत्त हैं दुरद मिट्यौ खंजन दरद ,
रितु आई है सरद सुखदाई सब जीव कौं ।"
ऐसी सुखदाई ऋतु में जब वर्षा रानी की छमछम ठहर जाती है, बिजली की सुनहरी पायलें उतार दी जातीं हैं ,बादलों के नगाडे उठा कर रख दिये जाते हैं ,किसी धुले-पुछे दर्पण जैसे निरभ्र आसमान की नीलिमा गहरा जाती है ,चाँदनी निखर कर चमक उठती है , ताजा नहाई सी धरती हरी चूनर ओढ कर मुस्करा उठती है, कास फूल उठता है , नदियाँ पारदर्शी हो जातीं हैं , तब तारों की छाँव में किशोरियों की तानें गूँज उठतीं हैं --"हम संझा साँझी खेलते ,हम जाहि बिरियाँ तन खेलते...
म्हारे उतते ही आए बाबुला ,बाबुल ने लई पहचानि .संझा साँझी..."
फूलों के रूप और गन्ध से गमकता ,लोक कला के सौन्दर्य से दमकता यह उत्सव गँवई--किशोरियों का सबसे उल्लासमय त्यौहार होता है । कनागतों (श्राद्ध-पक्ष) के साथ शुरु हुआ यह उत्सव सर्व-पितृ अमावस्या तक चलता है । मुझे याद है कि किस तरह हमारी हर शाम गीतों से गूँजती थी । पन्द्रह दिन हँसते-गाते बीत जाते थे एक नई ऊर्जा व उल्लास देकर ।
त्यौहार ऊर्जा व उल्लास तो देते ही है पर साथ ही हमें लगता है कि समय सिकुड कर छोटा होगया है धोने पर सिकुडे सूती कपडे की तरह । सावन बीता कि जन्माष्टमी आई । फिर साँझी ,नौदेवी ,दशहरा, दिवाली फिर देवठान....त्यौहार किस तरह जिन्दगी को गति देते हैं कि दौड उठती है फास्ट ट्रेन की तरह । दिन महीने पेडों की तरह पीछे भागते लगते हैं ,इस तरह कि उन्हें गिन भी नही पाते ।
हाँ अभी बात है केवल साँझी की .
क्वार में प्रतिपदा को प्रतीक्षा का उल्लासमय अन्त एक लुभावनी सी प्रतिस्पर्धा के आरम्भ के रूप में हो जाता था । प्रतिस्पर्धा यह कि एकदिन पहले पूर्णिमा  के दिन ही तय होजाता था कि इस साल साँझी किसके द्वार की दीवार पर सजेगी ,कि कौन सबसे ज्यादा सुन्दर और रंग-बिरंगे फूल लाएगी और कौनसे दिन किसके घर से साँझी का भोग लगेगा । 
साँझी के लिये सबसे पहला और सबसे प्यारा व रोचक काम होता था फूल इकट्ठे करना . धरती पर साँझ के उतरते--उतरते फूलों का ढेर लग जाता था -लाल, पीले, नीले गुलाबी, सफेद, जोगिया ..तमाम रंग के बेशुमार फूल जो खेतों, बाडों और बगीचों से चुन कर लाए जाते हैं । उधर कुछ कला-चतुर किशोरियाँ दीवार को गोबर से लीप कर गोबर से ही सुन्दर आकृतियाँ बनातीं थी । वे आकृतियाँ अनेक तरह की होतीं थीं--चन्दा--तारे, सूरज,मोर ,गूजरी , पनिहारिन, वृक्ष ,फूल-पत्ती और साँतिये आदि विभिन्न तरह की रचनाएं जो फूलों से सज्जित होकर जगर-मगर खिल उठतीं  थीं । रचनाकाराएं खुद ही मुग्ध होकर गा उठतीं थीं---
"मेरी साँझुलदे के आसो-पासो फूलि रही फुलवारी ।
तुम पहरौ साँझुलदे रानी नौ तोले का हरवा ।
त्यारे बाबुल ने गढायौ ,मैया रानी ने दै घाल्यौ ..."
फिर दिया बाती की बेला पर जब मन्दिर में घंटा घड़ियाल के साथ भगवान की आरती होती थी इधर सभी लडकियाँ साँझुल रानी को भोग लगातीं थीं । भोग हर तरह का होता था- हलवा पूरी खीर लड्डू ,कच्चा दूध जो बडे 'जतन' से 'अछूता' रखा जाता था ,उसी तरह जिस तरह भगवान का भोग रखा जाता है । बड़ी श्रद्धा व भक्ति और उल्लास के साथ साँझी को भोग लगाया जाता था . लड़कियाँ गातीं भी जातीं थीं ---
"मेरी साँझी भोग ले, भोग ले ।
और की साँझी रोग ले रोग ले ।
 मेरी साँझी रानी और की साँझी..."
पता नही क्यों !'और' की साँझी के लिये की गई ऐसी अमंगल कामना ! यह मानवीय कमजोरी का सहज उद्घाटन है जिसके कारण वह अपनी वस्तु की श्रेष्ठता व कुशलता चाहता है । कोई छल नही ,कोई दुराव नहीं ।
भोग लगाने के बाद शुरु होता था गीतों का सिलसिला । गीत कई तरह के थे -चन्दा के ,भैया के , मायके की सहेलियों के और साँझी के सौन्दर्य के ।
किन्तु दूसरे लोकगीतों की तरह साँझी के गीतों में भी उस नारी की व्यथा-कथा के ही स्वर प्रमुख रूप से उभरते हैं जो माता-पिता की लाडली है । ससुराल में सास--ननद से प्रताडित है । वह मायके की गलियों के लिये तरसती है । चन्दा या बटोही द्वारा अपना मार्मिक सन्देश मायके को सन्देश भेजती है ----
"चन्दा रे तू चन्द बिरियां तन ठाड्यौ ही रहियो , 
हेला मारियो ही रहियो ।
सासु बोलनि मारै ,
ननदी ठोलनि मारै ।
मेरे बाहुल से कहियो ,
उन्हें हरवा गढावैं ,
उन्हें पाट पुरावें...। 
मोहि बेगि बुलावें...।"
शायद हरवा कंगन पाकर लालची सास--ननदें उनकी बेटी के प्रति सदय हो जावें ।
कभी कोई मायके से आया राहगीर उसे पहचान कर पूछ लेता है । गाँव की बेटी उसकी अपनी बेटी जैसी ही तो है--
"तुम काहे के दुख दूबरी ,और काहेनि मैलौ भेस ...?"--उत्तर मिलता है --
"हम सासु के दुख दूबरी और ननदी रे मैलौ भेस ।"
ऐसा सुना जाता है कि साँझी किसी जुलाहे की लाडली और रूपसी बेटी थी । उसे ससुराल में झाडू व पौंछा की तरह इस्तेमाल किया जाता था । वह दूसरों का अनाज कूटती फटकती थी । तब कही उसे दो रोटियाँ मिल पातीँ थी । 
साँझी की व्यथा जैसे हर लडकी की व्यथा है । पराए घर जाकर उसे जाने कैसा वातावरण मिलेगा । सो भविष्य की सोच छोडकर बचपन को भरपूर जीने की सलाह देती है---
"खेलि लै बिटिया खेलि लै तू माई बाबुल के राज ।"
तेरहवें दिन कोट (साँझी का बडा रूप ) बनाया जाता है । इसमें वे सारी चीजें बनाई जातीं हैं जो पिछले बारह दिनों में बनाई गईँ थीं । मुझे याद है कि कोट की तैयारियाँ बडे जोर-शोर से की जाती थी जिसे सजाने में हमारे ताऊजी पूरा सहयोग करते थे । अपने निर्देश में ही हमसे मिट्टी की कौडियाँ बनवाते थे । सफेद रंग से रँगी और बीच में काली लकीर से सजी  वे कौडियाँ एकदम असली लगतीं थीं । सुनहरी--रुपहली पन्नियों के मुकुट, झुमके ,हार ,कंगनों से साँझी को सजाते थे । कोट में 'मुड़फोरा' का बडा महत्त्व होता था । यह मिट्टी से ही बना होता था इसे बडी चतुराई व गोपनीयता के साथ कोट में कहीं इस तरह फिट किया जाता कि कोई जान न सके । जान भी ले तो हरगिज ले जा न सके । इसलिये लडकियाँ रात भर जाग कर मुड़फोरा की रखवाली करती थी । सुबह उसे सलामत पाकर गा उठतीं थी ---"ऐ, रे मुडफोरा बामन !
मेरी साँझुलदे रानी कौं हरवा क्यों नहि लायौ "
संभवतः मुडफोरा को साँझी का सुहाग माना जाता होगा । उसे चुराने की रीति वर के अपहरण से जुडी होगी । किसी भी त्यौहार के पीछे कोई एक कहानी नही होती । समय और स्थान के अनुसार उसमें अनेक कथा-किवदंतियाँ जुड जातीं हैं । कोई समय होगा जब दूल्हे को चुराकर बेटी ब्याहना गौरव तथा मान की बात समझा जाता होगा । वधू-अपहरण तो इतिहास की जानीमानी घटना है ही ।
अमावस्या की शाम को भारी मन से साँझी को दीवार से उतार कर नदी में सिरा दिया जाता था । शाम को गोठ (दावत) होती थीं ।
उन दिनों को याद कर महसूस होता है कि खुशी न तो सुविधा-साधनों की मोहताज होती है न ही सम्पन्नता की । हमने सुविधाएं जुटाते-जुटाते उस खुशी को कहीं खो दिया है जो जीवन की सबसे बडी उपलब्धि होती है । ये प्रकृति के आँगन में जीवन से जुडे ये गीत ,ये पर्व हालाँकि गाँवों तक ही सीमित रहे हैं या कि अब गाँवों में भी टी.वी. ने इन लोक-उत्सवों का कुहुक फीका कर दिया है पर इनमें छुपी मानव की जिजीविषा और संवेदना से हम ,चाहे कही भी रहें, आज भी अलग नही है ।

सन् 1990 में चकमक में प्रकाशित
चित्र भी चकमक से ही लिये गए हैं।

बुधवार, 14 सितंबर 2011

शहर में बरसात

उसके स्वागत में कहीं
मोर नाचा नहीं
पपीहे ने गाया नहीं
उसके आने का सन्देश
हवा ने भी दिया नही
उमंगित होकर
लहर-लहर कर
बस आसमान का.
छोटा सा टुकडा
धुँधला हुआ,
गहरा हुआ ।
गडगडाहट हुई ।
बिजली चमकी।
बूँदें टपकीं
सीमेन्ट ,और कंकरीट की छत पर
मुँडेर पर रखे गमलों में
कोलतार की सडकों पर ।
नालियाँ उमडी
गीला हुआ।
फिर वर्षा थमी
सडकें सूखीं
मकान सूखे ।
आसमान साफ होगया
अक्सर ऐसा ही हुआ ।
और एक दिन यूँहीं
वर्षा गुजर भी गई,
किसी रजिस्टर में
अपने हस्ताक्षर किये बिना ही
अपना नाम आखिर ,वह,
लिखती भी कहाँ ..!

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

जन्म दिन पर मन्नू के लिये






सुबह-सुबह की पहली धूप
मुबारक़ हो ।
पार किये उनतीस अनूप
मुबारक़ हो ।
बाँहों में कोमल
विहान सा ही उजला
अपना यह प्यारा प्रतिरूप
मुबारक़ हो ।

9 सितम्बर