गुरुवार, 25 नवंबर 2010

क्या लिखूँ





26 नवम्बर 2010---ग्वालियर
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प्रशान्त



अगर कोई तीस-बत्तीस साल का सुन्दर युवक चिडियों--गिलहरियों ,पिल्लों या छोटे बच्चों की हरकतों पर मुग्ध होता हो, खुद से ज्यादा दूसरों की परेशानी से परेशान होता हो ,दूसरों की भावनाओं का खास ख्याल रखता हो , आक्रोश व आरोपों को शान्त रह कर सुनता हो ,झूठ ,छल, बेईमानी व भ्रष्टाचार के प्रसंग पर बेहद संजीदा हो जाता हो , जो परिवार से आगे समाज राष्ट्र विश्व और फिर ब्रह्माण्ड तक सोचता हो पर माँ से वांछित स्नेह न मिलने की शिकायत छोटे बच्चे की तरह करता हो तो वह निस्सन्देह गुल्लू ही होगा । गुल्लू यानी प्रशान्त, बडा बेटा ,भारतीय अन्तरिक्ष अनुसन्धान केन्द्र( इसरो) बैंगलुरु में एक वैज्ञानिक । मेरे लिये वह केवल एक बेटा ही नही है । मेरे खाने-पीने , दवा लेने ,समय से सोने जागने के लिये एक पिता की तरह निर्देश देता है ,मेरी अनियमितताओं पर नाराज होता है । और मेरे सिरदर्द तक की बात सुन कर एक माँ की तरह ही चिन्तित भी होता है । और अपनी बहुत सारी बातें मैं उसे मित्र की तरह ही सुना सकती हूँ ।सन् 1978 के नवम्बर की 26 तारीख को सुबह 5.45 पर गुल्लू का जन्म सचमुच सूरज उगने जैसा ही हुआ था । गर्भ में उम्मीदों के सूरज को सहेजे दो-रातों की पीडा के पश्चात् हुई सुबह कई अर्थों में जीवन की एक अपूर्व-अनौखी सुबह थी ।
गुल्लू के बारे में लिखने को बहुत कुछ है ।पहली सन्तान होने के नाते स्नेह के साथ--साथ उससे कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं और आकाँक्षाएं, और इसीलिये पाबन्दियाँ भी खूब रहीं हैं ।पर इन सबसे जकडे उसके बचपन के लिये वेदना भी अपेक्षाकृत अधिक रही है। कई बातों के लिये उसके प्रति मन में एक अपराध-बोध सा आज भी है । पलाश ( शैक्षिक पत्रिका राज्य शिक्षा केन्द्र भोपाल) के फरवरी 2002 अंक तथा जनवरी 2007 के अंक में प्रकाशित दो कहानियाँ--छोटी सी बात तथा पहली रचना --विशुद्ध रूप से गुल्लू पर ही केन्द्रित हैं ।
आज गुल्लू ने बत्तीस वर्ष पूरे कर लिये हैं । वह --सुन्दर समझदार और सी.डॅाट में इंजीनियर--सुलक्षणा का पति ही नही ,चार साल की मान्या का पिता भी है ,पर मेरे लिये वह अभी तक गुल्लू बना हुआ है । बच्चों सा ही निश्छल , सच्चा , संवेदनशील । मैं कभी उसे प्रशान्त कहती हूँ तो टोक देता है----क्या मम्मी ... । रोज फोन पर भी सबसे पहले यही सुनाई देता है --मम्मी मैं गुल्लू बोल रहा हूँ ।
और तब मुझे लगता है , ...लगता है .....पर कैसे लिखूँ कि क्या लगता है क्यों कि इस अहसास के लिये तो मेरे पास कोई उपमा ही नही है ।बस है तो उसके दीर्घायु , प्रसन्न ,ऊर्जावान्, स्वस्थ व सक्रिय बने रहने की कामना व प्रार्थना । यहाँ उसके लिये बहुत पहले लिखी गईं दो कविताएं हैं ।

क्या लिखूँ --1
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क्या लिखूँ आज तेरे लिये
मेरे प्रथम कोमल गीत
मेरे वत्स
मेरे मीत ।
अवाक् है ह्रदय
फिसल रहे हैं शब्द
पारे की बूँदों की तरह
मेरी उँगलियों से ।
व्यक्त करना चाहती हूं
वह अहसास
जो होता है
तेरी सस्मित आँखों को देख कर
लौटाऊँ तुझे वे सारी खुशियाँ
जो मुझे दी हैं तूने
अनवरत,अविकल
हर दिन, हर पल
पर, कितनी अकिंचन मैं,
दे न सकी आज तक तुझे
एक शब्द भी .
शब्द ,जो बन जाता
तेरे पाँव तले एक ठोस धरातल ।
शब्द , जो बन जाता
एक स्नेहमय हाथ
तेरे सिर पर
करता तुझे आश्वस्त ..निश्चिन्त
तू ही तो देता रहा मुझे
कितना कुछ
अकथ्य, असीम ...
छलक कर जो
ह्रदय की गहराइयों से
सींचता रहा है
एक रेगिस्तान को
मेरे वत्स , मेरे मीत
मैं भला क्या दूँ तुझे
मेरे प्रथम कोमल गीत ।
( 26 नवम्बर 1996 को रचित)






तुझसे दूर --2
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भूल गई हूँ मैं
जैसे रख कर कहीं
अपना चश्मा
मेरी नजरों के नूर
तुझसे दूर .
उतर आतीं थीं शाखों से
कितनी गिलहरियाँ..
खुशियाँ---इस आँगन में
उठाने मूँगफली के दाने
मेरी हथेली से ।
फिरतीं थीं आगे--पीछे
ऊपर-नीचे
अब चलीं गईं हैं जाने कहाँ
जैसे हवा में जैसे कपूर
तुझसे दूर ।


मयंक, प्रशान्त और विवेक





नीम अमरूद की टहनियों पर
छत की मुँडेर पर
आँगन में ..हर कहीं
चहकती--फुदकती रहती थी
गौरैया--तेरी मुस्कान
नही दिखाई देती अब
कही भी अभिराम
सुबह,दोपहर, शाम ।
और ताव खाकर
कच्चे अमरूद कुतरता
नोंच-नोंच कर पत्ते गिराता
मिट्ठू--तेरा गुस्सा
ठहर कर नही रहता था कभी
एक जगह देर तक
अब हैं सूनी शाखें
खाली आँखें
रहीं हैं बस
आसमान को घूर
तुझसे दूर ।
झाडू लगे आँगन में
बार--बार सूखे पत्ते बिखरात
हवा का शरारती झौंका--तेरा तरीका
नहीं आता किसी खिडकी--दरवाजे से
हर चीज ठहरी है अपनी जगह
अब क्या सँवारूँ..
क्या समेटूँ ।
कुछ भी तो नहीं है करने को
फिर भी हाथ--पाँव
थक कर हैं चूर
तुझसे दूर ।
रातों--रात गुलाब की टहनियों पर
जब खिलते जाते थे
कितने फूल---मेरे गीत
दिखाती थी तुझे सुबह--सुबह
अब तो जाने कबसे
खिला नही एक भी फूल
नही निकली एक कली तक
सूना पौधा खामोश खडा है
करके जैसे कोई कसूर ।
तुझसे दूर ।
26 नवम्बर 2002
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रविवार, 14 नवंबर 2010

मान्या का जन्मदिन

बैंगलोर--14 नवम्बर


मान्या होगई चार साल की ।
बातें करती है कमाल की ।
साँसों को ताजी बयार सी ,
खुशबू है मेरे रूमाल की

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बाल-दिवस यानी 14 नवम्बर को नेहरू जी के जन्मदिन के रूप में ही जाना जाता है । पर मेरे लिये आज का दिन और भी बहुत खास दिन है । क्यों न हो आज के दिन
ही तो मान्या हमारे जीवन में आई और प्रशान्त--सुलक्षणा को पिता--माता के साथ मुझे भी एक नई पदवी मिली---दादी । यहाँ (बैंगलोर ) के सेन्ट फिलोमिना हास्पिटल में रात-भर की प्रतीक्षा के बाद एक नर्स ने कोमल और आत्मीय मुस्कराहट के सा
थ जब यह नन्ही परी मेरी गोद में दी थी तब मुझे लगा कि मैं अचानक काफी बडी और
ज्यादा खास होगई हूँ । मान्या को पाकर ही महसूस हुआ कि दादी बनने का सुख सचमुच जीवन की प्यारी और खूबसूरत उपलब्धि है । उसके लिये मैंने समय--समय पर कई कविताएं लिखी हैं जिनमें कुछ गुल्लक, पलाश व चकमक में छपीं भी हैं। इसी ब्लाग में 15 जून को प्रकाशित-- मान्या को लिखना तो देखो--कविता आप पढ ही चुके हैं । नही , तो अवश्य पढें । भाई रवि ने अपने ब्लाग -सरस पायस में भी दो कविताएं लीं हैं । उन्ही में से कुछ कविताएं आप यहाँ भी पढें और मान्या को अपना आशीर्वाद दें---

( 1 )
नाजुक चंचल है
नन्ही कोंपल है
पत्तों पर शबनम सी निर्मल
झिलमिल-झिलमिल है
फुलबगिया सी मेरी गुडिया
कोमल--कोमल है ।

रेशम सी गभुआरी अलकें
पलकें हैं पंखुडियाँ
कोई आहट सुनती है तो
झँपकाती है अँखियाँ ।
विहगों के कलरव जैसी वह
हँसती खिलखिल है ।
फुलबगिया सी ...।

किलक-किलक कर पाँव चलाती
चप्पू दोनों हाथ चलाती
पंखुडियों से होंठ खोल कर
आ.आ..ऊँ..ऊँ..ऊँ बतियाती ।
नदिया की धारा बहती ज्यों
कलकल कुलकुल है ।
फुलबगिया सी...।

नन्हे नाजुक हाथ
हथेली नरम नवेले पत्ते
शहतूती सी हैं अँगुलियाँ
गाल शहद के छत्ते ।
फूलों की टहनी पर जैसे
चहके बुलबुल है । 
फुलबगिया सी .मेरी गुड़िया 
कोमल कोमल है ।
( 2 )
मान्या होगई कितनी खब्बड.
लोहा लक्कड माटी मक्कड
रोटी बिस्किट कागज कक्कड
जो कुछ भी हाथों में आए,
सीधा मुँह में जाए ।

कितने नखरे हैं हमसे
खाती--पीती थोडा ही ।
अपने हाथों से खाना चाहे
हाथी--घोडा भी ।

पेन सम्हालो छुन्नू जी
अखबार किताब उठालो ।
अपना चश्मा ,घडी बचाना चाहो
अभी बचालो ।

लगती है हर चीज उसे तो
टॅाफी रंग-बिरंगी ।
जैसे हनुमान ने समझा
सूरज को नारंगी ।
(3)
जाग गई है नन्ही मान्या,
गहरी निंदिया सोकर ।
जैसे हवा अभी आई है,
अपनी आँखें धोकर ।

नींद होगई है पूरी
अब जीभर कर खेलेगी ।
फुर्ती से हर चीज तुम्हारे
हाथों से ले लेगी ।
(4)
डु्ड्..डू...डुड्.ड्...आहा..
होगई अपने आप खडी
हुई पहले से जरा बडी ।

रुपहली बाल बाजरा की
दूधिया दानों से है जडी
मटर की बेल सजाए खडी
श्वेत पुष्पों की जैसे लडी ।

खींचती पल्लू ,पकडे हाथ
छुडाएगी अब मेरी घडी ।
हुई पहले से जरा बड़ी ।
(5)

मान्या स्कूल चली
गुंजा सी खिली--खिली ।
सजधज दरवाजे पर
ज्यों भोर खडी उजली।

बस ढाई साल की है यह
नटखट कमाल की है यह
चंचल है मनमौजी है
अपने खयाल की है यह ।

बस्ता में भर कर सपने
मन में ले जिज्ञासाएं ।
चलती है उँगली पकडे
कल खुद खोजेगी राहें ।

जो पाठ आज सीखेगी
कल हमको सिखलाएगी
खुद अपना गीत रचेगी
अपनी लय में गाएगी ।

गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

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लघुकथा --बचत

लंच-टाइम था ।स्टाफ की सभी महिलाएं चाय-नाश्ते के साथ अपने परिजनों ,रिश्तेदारों, तथा घर की बातों द्वारा अपनी ,प्रोग्रेस और ,स्टेटस ,जताने में बढ-चढ कर हिस्सा ले रही थीं ।यह समय आपस की महत्त्वपूर्ण सूचनाओं के आदान-प्रदान का होता है ।---पूनम की

बेटी हनीमून के लिये बैंकाक गई है ।अरुणा के बेटे ने इनोवा खरीद ली है ।नीतू के मिस्टर ने मैरिज-ऐनिवर्सरी पर डायमण्ड का सेट दिया है ।तो निर्मला साडी के नाम पर शिफॅान, काँजीवरम् ,या मैसूर-सिल्क से नीचे बात ही नही करती । सरोज जी सफर के लिये सेकण्ड ए.सी. या फ्लाइट से नीचे बात नही करती तो नीलम की शॅापिंग मॅाल या सुपर-मार्केट में ही हो सकती है । अगर उमा जैसी निम्न-मध्यम वर्ग की महिला कह बैठे कि ,मॅाल में चीजें मँहगी भी मिलतीं हैं और उतनी वैरायटीज भी नही मिलतीं , तो फिर नीलम शुरु होजाती है---फिर शायद तुम कभी गई ही नही हो वहाँ । सब बडे और पढे-लिखे लोग मॅाल से ही खरीददारी करते हैं ।...हर चीज ए-वन जो होती है । हाँ पैसा तो लगता है पर हम क्वालिटी के नाम पर कम्प्रोमाइज नही करते ..आज कल हजार-पाँच सौ की कीमत ही क्या है ।

उस दिन भी बहस व तनाव के साथ इसी तरह की बातें चल रहीं थीं । तभी वहाँ एक महिला आई ।कई थैलों से लदी-फदी ,पसीने से नहाई, और हाँफती हुई सी ।चेहरे से कुलीन, सुशिक्षित और सौम्य दिखती थी ।स्टाफ की महिलाएं उसे ऐसे देख ही रहीं थी जैसे वातानुकूलित डिब्बे में बैठे यात्री गीत गाकर पैसा माँगने वाले बच्चे को देखते हैं, वह बोल पडी---

नमस्ते मेम, मेरे पास आपके लायक सेवइयों, नूडल्स, पास्ता, मैक्रोनी, और पापडों की अच्छी वैराइटीज हैं।

अच्छा , दिखाओ --अरुणा जी ने उत्सुकता दिखाई तो अन्य शिक्षिकाएँ भी पैकेटों को उलट-पलट कर देखने लगीं ।

बेम्बिनो की हैं मेम, आपको पसन्द आएंगीं ---अच्छी बिक्री की सम्भावना देख कर वह महिला उत्साहित होकर बोली ।और थैले में से और सामान दिखाने लगी ।

एक-दो पैकेट सेवइयों के लेने तो थे----चल, पास्ता के भी दो पैकेट ले लूँगी --अरुणा जी ने ऐसे कहा मानो सामान लेकर वे उस महिला पर अहसान कर रहीं हों । फिर तो एक साथ कई माँगें उठी---मेरे लिये एक नूडल्स का पैकेट...मेरे लिये पापड का , और मेर लिये मैक्रोनी....।

पहले कीमत तो तय करवा लो---नीलिमा ने कहा तो महिला चतुराई से मुस्कराई---

आपसे ज्यादा थोडी लूँगी मे,म ।

फिर भी तय करना ठीक रहता है --पूनम ने समर्थन किया तो उसने सेवइयों के पैकेट उठा कर कहा---मेम रोस्टेड पैकेट तास का है और सादा पच्चीसका ..।

और, फिर भी कह रही है कि आपसे ज्यादा न लूँगी -नीलम व्यंग्य से मुस्कराई ।पूनम अनुभवी चातुर्य के बोली---मार्केट में रोस्टेड सत्ताइस का और सादा बाईस का मिल रहा है । कितने लादूँ ।

अर् रे यार ये तो बेचने वालों के हथकण्डे हैं । तुझे लेना है तो ले नही तो....।

मेम, ये सारी चीजें कम्पनी की हैं ।--महिला कुछ परास्त स्वर में बोली पर उसके आगे बोलने से पहले ही अरुणा जी ने उसे आडे हाथों लिया ---तो तुझे पता नही , कि हम हमेशा ब्राण्डेड चीजें ही खरीदते हैं हमारे घर आकर देख....।हमारे यहाँ लोकल नही चलता ।

लो यह तो शुरु होगई----सरोज नीलम के कानों में फुसफुसाई फिर जोर से बोली ---अरे जाने दे... हाँ ,बहन तू बता सही-सही दाम क्या लेगी ।या कि सारा मुनाफा हमी से कमाएगी ।

इस बात पर एक ठहाका बुलन्द हुआ ।वह महिला कुछ आहत हुई । आँखों में नमी सी आगई ।

मेम, ऐसे तो कोई भी ज्यादा नही देता । मैं ऐसे ही सामन बेचने नही निकली । मैं भी अच्छे घर की हूँ ।पर मजबूरी है । मिल बन्द होगया । एकदम से कोई काम-धन्धा नही है सो...अब एक-दो रुपया भी न मिले तो कोई काहे दर-दर भटके...।

अब काम तो सभी कर रहे हैं बहन ।-पूनम निस्संगता से बोली ।पर इतना फालतू पैसा किसके पास है कि, कही भी डालदे ।सारी दुनिया सयानी है ।

चलिये ,आपके लिये रोस्टेड अट्ठाइस का और सादा तेईस का लगा देती हूँ । ले लो मेम । बोनी हो जाएगी ।--महिला ने जैसे पूरी सामर्थ्य लगा कर आग्रह किया । हालाँकि कीमत कम करने की खींचतान उसके चेहरे पर दिख रही थी ।

हाँ...बडे कम लगा रही है ---रमा व्यंग्य भरी हँसी के साथ बोली---अरी ,सयानी बहन दूसरे लोग भी तो कुछ अक्कल रखते होंगे ...।

तुझे देना ही है तो बाजार के भाव में दे जा नही तो .....। हाल यह कि लाखों-करोडों की बातें बहसें करने वाली वे सभ्रान्त, कुलीन महिलाएं दो-तीन रुपए कम करवाने उसी तरह एकमत थीं जैसे संसद में वेतन-भत्तों के मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष एकमत हो जाता है ।

कोई बात नही मेम--पूरी तरह नाउम्मीद होने पर वह महिला अपना सामान समेट कर चली गई ।कुछ पल को वहाँ सन्नाटा सा रहा जिसे नीलम ने तोडा---

वो समझती है कि हम तो बुद्धू हैं ।जो माँगेगी दे देंगी ।

और क्या रोज का वास्ता पडता है इन चीजों से ।मार्केट में देखो एक से बढ कर एक चीज है ।

और नही तो क्या....।

सबके चेहरों पर कुछ पैसे बचा लेने का सन्तोष चिपका था ।

मंगलवार, 19 अक्टूबर 2010

एक गीत

बरसों हुए मिटे, अब
जागी कराह क्यूँ है ।
जर्जर हुए वसन में ,
पैबन्द आह क्यूँ है ।

अब भूलना ही बेहतर
अपना कि क्या पराया ।
जो भी करीब आया,
प्रतिरूप साथ लाया ।
विश्वास और छल में ,
ऐसी सलाह क्यूँ है ।
बरसों हुए......
कुछ और जो ठहरता ,
मौसम हरा-भरा सा ।
हर पेड यूँ न लगता ,
सहमा डरा-डरा सा ।
बेवक्त ही हवा की
बदली निगाह क्यूँ है ।
बरसों हुए.....
गिर गिर सम्हाला खुद को
कैसे भी जब डगर में ।
टुकडे सम्हाल मन के ,
अनजान इस शहर में ।
गुजरे भी हम जिधर से ,
यह वाह--वाह क्यूँ है ।
बरसों हुए......

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010





शिवम् है कि मानता नही ।


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शिवsss म्.....।

माँ पुकारती है ।

दिनभर बैठे--बैठे ,बीडी बनाते

झाडू-पौंछा या चौका--बर्तन करते,

थकी हुई माँ ..।

हाथ से बहुत पीछे छूट गए सपनों की याद में ,

कहीं रुकी ह्ई माँ

और बैठे-ठाले, शराबी , दस साल बडे ,

खाँसते--खखारते पति की मर्दाना माँगों से

ऊबी--छकी माँ,

सारा गुस्सा उतारती है अक्सर,

आठ साल के शिवम् पर ।

जो उग आया है शायद

जिन्दगी की जमीन पर ।

अपने आप उग आई घास की तरह

जमीन को हरियाली से मढ रहा है ।

बिना पानी--खाद के बढ रहा है ।

माँ कोसती रहती है उसकी हँसी को ।

खेलने की खुशी को ।

अरे , शिवsssम् ---मर जा तू,

ठठरी बँधे , आग जले ,

मेरी जान न खा तू ।

खेलता रहता है दिन भर ।

खेलना बन्द कर , आ...

चल मेरे साथ बीडी बनवा ।

पत्ते काट , तम्बाकू भर ।

हजार बीडियों का कोटा पूरा करवा ।

चुलबुला शिवम् बैठ जाता है,

बीडी बनबाता है ।

झूठे गुस्से से तनी हुई ।

सायास गम्भीर बनी हुई

माँ को देख खिलखिलाता है ।

माँ दाँत पीसती है ---अरे , मरे, होंठ बन्द कर ।

थोडा तो डर ,कि निकाल कर दे दूँगी ,

पूरी बत्तीसी तेरे हाथ में ।

ही..ही..ही..---शिवम् फिर खिलखिलाता है ।

माँ की इन धमकियों को मानता नही ।

बुत बन कर रहना वह जानता नही ।

और कुछ ही देर बाद ,

खो जाता है

अपने साथियों में ।

माँ चिल्लाती है ,गालियाँ देती है ।

शिवम् खिलखिलाता रहता है ,

अक्सर यूँ ही


सोमवार, 13 सितंबर 2010

मातृभाषा


( हिन्दी ) माँ

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मातृभाषा माँ है ।
माँ ही समझ सकती है
औरों को भी समझा सकती है
ह्रदय की हर बात
आसानी से ।
माँ ,जो दुलारती है अपने बच्चे को ।
रोने पर ....सोने पर--- जगाती है ,
दिखाती है राह , कही खोने पर ।
छोटा नही होने देती अपने वश भर
अपनी सन्तान को-कभी ,... कहीं भी ।

मातृभाषा, धरती है ।
धरती के उर्वरांचल में ही
उगती हैं, लहलहाती हैं
सपनों की फसल ।
वन-उपवन, पहाड--नदियाँ
समुद्र और खाइयाँ
टिके हैं आराम से ।
धरती के वक्ष पर ।
धरती पर ही तो टिका सकता है कोई भी
अपने पाँव मजबूती से ।
और तय कर सकता है लम्बी दूरी

मातृभाषा, अपने घर का आँगन
जहां कोने--कोने में रची-बसी है
गभुआरे बालों की खुशबू ।
दूधिया हँसी की चमक
अपना आँगन , जहाँ सीखते हैं सब , 
सर्वप्रथम, बोलना , किलकना
चलना , थिरकना ।
दूसरी भाषा के आकाश में
पंछी उडतो सकता है,लेकिन खाने--पीने के लिये 
बैठने--सोने के लिये
उसे उतरना होता है जमीन पर ही ।

हिन्दी हमारी मातृभाषा, 
हमारी अस्मिता और सम्मान 
सही पता और पहचान ।
पत्र मिला करते हैं हमेशा
सही पते पर ही



सोनू के लिये


15 अक्टूबर 1974----12 अगस्त २०१०---


सोनू ,मेरी जेठानी जी का मँझला बेटा ,जो एक माह पहले सबको छोड कर, अन्तहीन पीडा देकर हमेशा के लिये चला गया ।

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सुबह ने अभी-अभी ही तो ,

तेरे नाम लिखी थी ---

आसमां भर धूप...।

जागती आँखों में सजाए थे ,

पंखुडियों से ख्बाब. ।

फिर क्यों चुन लिया तूने,

धूप में नहाया ...

अपना शहर छोड कर ।

एक अनजान गुफा का

अन्तहीन अँधेरा ।


भूल गया ---अपने बूढे पिता की ,

धुँधलाई आँखों की बेवशी ।

तूने एक बार ,सोचा भी नहीं ,

कि,उनके थके--झुके कन्धे ,

कैसे ढोएंगे उम्मीदों का मलबा ।

कैसे पढेंगे , अनन्त- पेजों वाला

तेरे बिछोह का अखबार ,

उनका चश्मा तो खोगया ,

तेरी यादों के ढेर में ही ...।

वक्त गुजरेगा कैसे ...

ताकते सिर्फ , सूना आसमान ...।


काश तू आकर देख लेता कि,

माटी की पुरानी दीवार सी ,

भरभरा कर गिर पडी है तेरी माँ ।

बैठी रहती थी थाली परसे ,

देर रात ...तेरे आने तक ।

तूने देखा नहीं कि ,

तुझे रोकने के लिये ,

दूर तक ....तुझसे ,

लिपटा चला गया है

उसकी आँतों का जाल ।

पेट से निकल कर

कलेजा थामे पडी है वह

लहूलुहान ।


पीडा के गहरे सागर में ,

हाथ पाँव मारती तेरी संगिनी ,

हैरान है ......।

भला इतनी जल्दी

कोई कैसे भूल सकता है ,

प्रथम-मिलन के समय किये गए,

तमाम वादों को

चाँद को छूने के इरादों को

तूने तो कहा था कि ,

तैरना आता है तुझे अच्छी तरह ।

भला, .... जिन्दगी से ,

कोई रूठता है इस तरह ...।

और नाराज होता है इस तरह...

कोई अपनों से ,

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