शनिवार, 26 सितंबर 2026

गणपति बप्पा अगले बरस आना ज़रूर पर ...

दस-बारह दिनों की धूम धाम के बाद अगले वर्ष फिर इसी तरह आने की गुहार लगाते हुए शिव पार्वती के लाड़ले गणेश जी की , विदाई हो गई है । मैं भी दिल से कहती हूँ कि अगले साल फिर आना । पर्व और त्यौहार हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग हैं । आस्था व भक्तिभाव के साथ ऐसे आयोजन जीवन की एकरसता को मिटाकर नया उत्साह व ऊर्जा का संचार करते हैं । गीत-संगीत ,भजन तनाव दूर करते हैं । हे प्रथम पूज्य विनायक , आप तो वैसे भी मंगल, मोद और मोदक के देव हैं ।
मुझे याद है हमारे गाँव में केवल एक ही जगह पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती थी । सारा गाँव एक जगह इकट्ठा होकर आरती में शामिल होता । परस्पर सौहार्द्र बढ़ता था । बहुत ही सुन्दर झाँकियाँ , भजन , नाटक ,नकल आदि कलापूर्ण कार्यक्रम होते थे । बच्चे बड़े सब मनोयोग से इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेते थे । 
लेकिन अब जबसे घर ,गली ,मोहल्ला और बाजार की तरह धर्म में भी राजनीति का दखल हुआ है , ये आयोजन या तो प्रदर्शन और गुटबाजी का हिस्सा बन गए हैं या अमर्यादित मौजमस्ती का । चार चार कदम पर प्रतिमा स्थापित करके धर्म के नाम पर नियमों , दायित्त्वबोध और नैतिकता को ताक पर रख दिया जाता है । भजनों के नाम पर लाउडस्पीकर पर पैरोडियाँ बजाना शराब पीना ,हुल्लड़बाजी करना इन आयोजनों का सबसे खराब पक्ष है । वास्तव में लाउडस्पीकर का उपयोग जब तक बहुत ज़रूरी न हो ,नहीं होना चाहिये । आप आराधना या इबादत अपने लिये कर रहे हैं दूसरों को सुनाने के लिये नहीं । लेकिन हमारे यहाँ इस बात का ध्यान रखा ही नहीं जाता । सुबह से दोपहर तक और शाम से देर रात तक तेज आवाज में सस्ती पैरोडियाँ बजाते हैं ज़रा भी परवाह नहीं करते कि किसी की नीद खराब हो रही है , कोई बीमार है ,किसी का अध्ययन अध्यापन , लिखना पढ़ना प्रभावित हो रहा है । शराब डांस बीच बीच में गाली गलौज भी । क्या यह भक्ति है ?

संस्कृति का यह रूप तो हमारा नहीं है । पर बना दिया गया है । चन्दा इकट्ठा करके हर चार कदम पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करने के बाद भक्ति कम उच्छ्रंखलता अधिक दिखाई देती है ।  गणेश उत्सव हो या दुर्गा उत्सव ,जन्मदिन की पार्टी हो , शादी या फिर अन्य कोई आयोजन हो  लाउडस्पीकर पर तेज गीत बजाकर  रात रात भर गीत चलाए जाते हैं । अगर कोई आपत्ति करे तो “खुशी बर्दाश्त नहीं होती” या “धर्म विरोधी हो ” जैसे आरोप लग जाते हैं । मोहल्ले में एक आयोजक को कहा कि गीत बजाओ पर धीमी आवाज में , बच्चे पढ़ रहे हैं तब एक महिला तन कर आगई -–“थोड़ा धर्म को भी माना करो मैडम , तुम बच्चों को क्या सिखाती होगी ..”

यह अफसोस की बात है कि ऐसे कथित धार्मिकों ने हमारे धर्म को बदनाम कर रखा है । विडम्बना यह है कि समझदार लोग ऐसे में निरपेक्ष रहते हैं । इसलिये ये आयोजन प्रायः उन हाथों आ गए है जिनके लिये इन आयोजनों का अर्थ केवल मौजमस्ती करना है । मौज मस्ती गलत नहीं पर मौज में कई तरह के व्यवधान व अशान्ति अखरती है ।   

। हे मंगल दाता ,बुद्धि-विधाता , गणपति बप्पा आप अगले साल भी आएं और आते रहें लेकिन अब जब आएं तो अपने भक्तों को समझाएं ज़रूर कि रात रात भर ( दिन में भी ) तेज आवाज में गाने बजाना , कार्यक्रमों के लिये रास्तों का अतिक्रमण करना , दिन-रात मुफ्त बिजली जलाना ,शराब पीकर हुल्लड़ करना . खाने के बाद दोना पत्तल गलियों सड़कों पर फेक देना .. सब नियम विरुद्ध आचरण है ,भक्ति का आडम्बर है ,हिन्दू धर्म और संस्कृति की विकृति है । इन्हें समझएं कि धार्मिक आयोजन सबको एक साथ जोड़ने , धार्मिक और सामाजिक सौहार्द्र बढ़ाने और अपनी सुन्दर परम्पराओं को याद रखने के लिये होते हैं । नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति के सौन्दर्य व धर्म की व्यापकता समझाने के लिये होते हैं । देवी दुर्गा ,भगवान शिव, मर्यादा पुरषोत्तम राम , लीलाधर कृष्ण , विघ्नेश्वर भगवान गणेश ...सभी हमें जीने की राह बताते हैं , आस्था और विश्वास देते हैं । हे विनायक, उन्हें यह भी बताना कि शोर शराबा और हुल्लड़बाजी भक्ति आराधना नहीं धर्म को बदनाम करना है । और यह भी कि इन आयोजनों के साथ सबसे पहले ज़रूरी है आयोजकों का जिम्मेदार नागरिक होना । अपने साथ दूरों का ख्याल रखना ,अपने आसपास सफाई रखना ..यह सब बच्चों को भी सिखाना हे गणनायक तब हम गर्व से कह सकेंगे कि ऐसे होते हैं हमारे धार्मिक आयोजन ।  

शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

एक गज़ल

 

जालों से उलझनों के ,जैसे हो उबर जाएं

चौराहे से निकलकर , कोई तो डगर पाएं ।

 

थामे रहें न छोड़ें कभी हौसलों का दामन ।

चाहे भले ही कितनी चलती रहें हवाएं ।

 

गुज़री हो उम्र यूँ ही जिनको तलाशते ही ।

कुछ कीजिये वो लमहे ,कुछ देर ठहर जाएं ।

 

इल्ज़ाम ही लगालो, लेकिन यूँ चुप न बैठो

बेकार ग़लतफहमी ,मासूम न मर जाएं ।

 

 तूफान ले गया है सामान जिनका सारा

कैसे करें गुजारा कहदो कि किधर जाएं ।

 

आँखों में नींद थी जब  ,वह बात रात की थी ,

अब भोर को जगाने , चिडियों सा चहचहाएं ।

 

अरसे से रुकी देखो राहों में तमन्नाएं

कहना है जो भी कहदो ,जिससे कि वे घर जाएं ।

रविवार, 13 सितंबर 2026

अपनी खड़ी बोली

 मिसरी की गोली

अपनी  खडी बोली ।

माँ ने दूध में है घोली

अपनी खडी बोली ।

 

सरस है ,सक्षम है

सरल और शुद्ध है

अनुभूतियों का सागर

अभिव्यक्ति में प्रबुद्ध है

संस्कृति के द्वार पर

जैसे रंगोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

झरना ज्यों झरता है

पवन जैसे बहता है

धरती में नमी पाकर

बीज जैसे उगता है

आता वसन्त भरे

फूलों की झोली .

मिसरी की गोली

अपनी खडी बोली ।

 

शिशु की है किलकारी .

अलकें ज्यों गभुआरी .

अन्तर की बातों सी

हिन्दी मनोहारी .

इससे ही सजती है

सपनों की डोली .

मिसरी की गोली

अपनी खड़ी बोली .

सोमवार, 11 मई 2026

गीत

 अर्थहीन हैं गीत

लिखे ये किसको तूने री?

भावों के तो साथ जुड़े हैं ,

दुख भी दूने री ।

 

किसको फुरसत कौन सुनेगा !

सुन भी ले पर कौन गुनेगा !

उनकी जेबों में मेवे हैं,

चना चबैना कौन चुनेगा !

दरवाजे पर दस्तक क्या ,

घर तो हैं सूने री ।

 

सम्बल पाने जब जब जिनका ।

दामन थामा जब जब जिनका।

नीड़ बनाने जैसे भी ,दिन रात

जुटाया तिनका तिनका ।

उनके पास बहुत हैं ऐसे

और नमूने री ।

 

दिल को दिल से राह !

अरे सब झूठी बातें हैं ।

चिन्तन में केवल छल बल

और मन में घातें हैं ।

नेह वचन विश्वास कि जैसे

माट-मटूने री ।

 

गीत नहीं संगीत नहीं ,

अन्तर से सच्चे मीत नहीं ।

उनको क्यों दें आमंत्रण ,

जिनको गर्मी या शीत नहीं ।

जुड़े असंगत तार ,

नहीं होते हैं छूने री ।

 

 

 

 

शनिवार, 21 मार्च 2026

एक नाम एक दरिया

 

संस्मरण पुनःप्रसारित
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आज गनगौर(गणगौर) पूजा है।
अब केवल अपने परिवेश की बात करूँ तो दूसरे त्यौहारों की तरह गणगौर--पूजा भी अब काफी संक्षिप्त ,औपचारिक और अकेली होगई है खासतौर पर मेरे लिये जिसने बचपन में इस पर्व को काफी बड़े रूप में देखा हो । यहाँ बचपन के उन्हीं दिनों की यादें हैं । 
तब गनगौर के पर्व की तैयारियाँ आठ दस दिन पहले से शुरु हो जातीं थीं जब ताऊजी गणगौर पूजा के लिये मूर्तियों की माटी तैयार  करते थे ।  इधर माँ और मौसी ( जैसा कि मैंने  होली ....संस्मरण में लिखा है कि मौसी ही मेरी ताई भी हैं ) भर-भर डलिया 'गुना' बनातीं थीं  
क्योंकि पूरे गाँव में बाँटने होते थे । गुना गोल पहिया जैसी आकृति के मीठे नमकीन पकवान होते हैं .मीठे गुना घी ,गुड़ आटा और मैदा घी शक्कर के बनते थे और नमकीन गुना  बेसन और मैदा अजवाइन के बनाए जाते थे ( हैं)। घर घर से घी और तेल की महक गणगौर की तैयारियाँ बताती 
उधर ताऊजी मिट्टी से गणगौर  शिव पार्वती) की सुन्दर मूर्तियाँ बनाने जुट जाते थे । तृतीया की सुबह तक ताऊजी गौरा-ईसुर को पूरे साज-सिंगार के साथ तैयार कर देते थे ।  हमारा आँगन इतना बड़ा है कि उसमें  पचास-साठ महिलाएं आराम से बैठ जातीं थीं । पूजा सम्पन्न कराने का दायित्त्व दादी का होता था । छोटे कद की साँवली और दुबली-पतली मेरी दादी बहुत गुणी थीं । उनके हाथों में गजब की कलाकारी थी । मिट्टी के घर को उन्होंने इतना सुन्दर रूप दे रखा था कि लोग देखते रह जाते थे ।उनके पास कहावतों गीतों और कहानियों का अपार भण्डार था । वे बहुत मधुर गातीं थीं । वे जितनी गुणी थीं उतनी ही तेज और अनुशासन प्रिय थीं । उनकी अवज्ञा करने का साहस किसी में नहीं था  इसलिये भी और अपने पद के हिसाब से भी हर व्रत-पूजा में कथा-वाचक की भूमिका वे ही निभाती थीं । सो गनगौर की  तीन-चार कहानियों ( कभी लिखूँगी) और मधुर गीतों के साथ पूरे विधि-विधान से पूजा सम्पन्न करवातीं थीं ।
मिटटी से इन्हें मैंने ही बनाया और सजाया है 
शाम को गौर का चीर लेने के साथ देर रात तक नाच-गाने की जमकर धूम  होती थी . नाच के कारण आँगन की लीपन तक उखड़ जाती थी . लेकिन इस पर्व का सबसे रोचक प्रसंग था शाम को गौरा का चीर प्राप्त करना ।
 कथानुसार गौरी से प्राप्त वह चीर सुहाग के दीर्घायु होने का प्रतीक होता है. उसे पाए बिना व्रत अधूरा ही होता है । लेकिन चीर के उस टुकड़े को पाना क्या आसान था ?
उस चीर को पाने के लिये सुहागिनों को अपने पति का नाम लेना होता था और यह कार्य मकर-संक्रान्ति के दिन सुबह-सुबह कड़कती सर्दी में नदी में डुबकी लगाने से कम दुष्कर नही होता था । अगर आपने कभी जनवरी की बर्फीली सुबह ऐसा किया हो तो आप जानते होंगे कि नदी में उतरने से पहले कितना हौसला जुटाना होता है । पति का नाम लेने से पहले सुहागनों का हौसला जुटाना देखने लायक तमाशा हुआ करता था .
वन-गमन प्रसंग में वनवासिनें सीताजी से पूछतीं हैं कि "करोडों कामदेवों को लज्जित कर देने वाले ये साँवरे सलौने तुम्हारे कौन हैं ?" तब सीताजी अपने व राम के सम्बन्ध तक को मुँह से नही बतातीं ( नाम लेना तो दूर ) सिर्फ संकेत कर देतीं हैं ---
"बहुरि बदनु बिधु आँचर ढाँकी, पिय तन चितहि भौंह करि बाँकी ।
खंजन मंजु तिरीछे नयननि, निज पति कहेउ तिन्हउ सिय सयननि ।"
उल्लेखनीय है कि तब (गाँवों में तथा शहर की पुरानी पीढ़ी में तो अब भी ) पति का नाम तो क्या पत्नी का भी नाम नही लिया जाता था । पुरुष की तरह महिला को भी या तो किसी रिश्ते के साथ ( मानू की माँ ,विमला की भाभी आदि) पुकारा जाता था या मायके के नाम के साथ ( जौरावाली ,रामपुरवाली ) । मुझे याद है , जब 1976 में मेरा विवाह हुआ था और पति शादी के बाद पहली बार मेरे मायके आए थे ,कार्यवश उन्होंने सबके सामने मुझे नाम लेकर पुकारा तो दादी ने होठों पर उँगलियाँ रख कर आँखें फैलाईं और अपने आपसे ही बोलीं--"अरे राम ! घोर कलजुग आगया । देखो तो कैसे तडाक् से सबके सामने लड़की का नाम ले रहा है !"
खैर...बात सुहागिनों द्वारा पति का नाम लेने और  नाम लेकर चीर पाने की दुर्गम राह पर ठहरी हुई है  तो सीन यह होता था कि एक महिला हाथ में गौरी का चीर लिये किसी निर्णायक की तरह सामने बैठी होती थी और चीर की उम्मीदवारिन सुहागिन को ललचाते शरमाते और पति का नाम लेने की  कोशिश करते देखती थी पर नाम था कि अन्दर से निकल कर जुबान पर आते--आते फिसल जाता था  .जैसे कुए में गिरी बाल्टी निकालते समय ऐन घाट तक आते बाल्टी फिर छूट कर गिर जाती है । यह ऐसी मुश्किल होती थी जैसी अँधेरे में माचिस ढूँढते में होती है । ऐसी झिझक होती थी जैसी नया-नया तैरना सीखे व्यक्ति को नदी पार करने से पहले होती है । ऐसी लज्जा जो पहली बार प्रिय के साक्षात्कार के समय होती है । नव वधुएं ही नही प्रौढाएं भी अपने प्रिय का नाम लेते हुए स्नेह और लाज से लाल होजातीं थीं । उस पर चारों ओर तमाशाबीनों का शोर । कई पल इसी कशमकश में गुजर जाते कि आखिर बीच रास्ते में आए उस गहरे नाले को कैसे लाँघा  जाए । जैसे वह दो-चार अक्षरों का नाम न हुआ दुर्गम पहाड़ की चोटी होगया । साठिया कुआ से खींचा एक बाल्टी पानी होगया ।  बहुत ऊँचे छींके पर रखी दही की हाँडी होगया । या मठा में ही ( दही में गलत तरीके से गरम या ठण्डा पानी मिलाने पर ) बिला गया माखन होगया । 
"अरी लुगाइयो ! क्या यहीं बैठी सबेरा करोगी ? साल में एक बार आज के दिन नाम लेने से तो पति की उमर बढ़ती है । जल्दी करो 'भैनाओ' ।"
दादी चिल्लातीं तब किसी तुकबन्दी से सहारे अटकते झिझकते हुए पति नाम लेते हुए वे चीर प्राप्त करतीं थीं , जी तोड़ मेहनत कर कमाए हुए रुपयों जैसा चीर । उस समय उन्हें ऐसा महसूस होता था जैसा किसी कवि को एक अच्छी कविता पूरी कर लेने पर होता है । लोकगीतों की तरह ही ये तुकबन्दियाँ किसने बनाईँ ,पता नही पर इन्हें नाव बना कर सुहागिनें एक गहरी और चौड़े पाट वाली नदी को पार कर सकतीं थीं( हैं ) । पढ़े-लिखे आधुनिक समाज में भले ही इनका कोई महत्त्व न हो पर अनपढ़ ग्रामीणाओं के लिये आज भी ये तुकबन्दियाँ किसी सरस कविता से कम नहीं हैं । उनमें से कुछ आप भी देखें ( कोष्ठक में पति का नाम )----
"चम्मच भरा घी ,मेरा (....) का एक ही जी ।"
"थाली में रोरी ,मैं (...) की गोरी ।"
"औलाती से टपके पानी ,दूध पिये (...) की रानी ।"
"कच्चा पान लाती नईं हूँ ,पक्का पान खाती नईँ हूँ "
(...) की सेज पर बिना बुलाए जाती नईं हूँ ।"
"तराजू की तीन तनी ,मेरी (...) की जोड़ी खूब बनी ।"
"कहूँ पक्के अनार कहूँ कच्चे अनार
ए सखी (...) गए हैं कन्हार ।"
"रोज करै सलाम ,(..) मेरौ गुलाम ।"
"थाली भरे बतासे ,(...) दिखावै तमासे"
"चन्दा की चाँदनी में तरसे जिया
बाती हूँ मैं (.....) मेरा दिया ।" ...
ऐसी तुकबन्दियाँ और भी हैं पर अभी मुझे इतनी ही याद हैं ।
कपड़ा, जेवर, शान-शौक और सुविधाओं से वंचित, जीवन की गाड़ी को मरुस्थल में भी हँस कर खींचने वाली ये ग्रामीणाएं जिस सहिष्णुता से जीवन की विसंगतियों से जूझती हैं ,सम्बन्धों का उत्सव भी उतने ही उल्लास से मनातीं है । स्नेह का ऐसा उदार और गहरा रूप अन्यत्र मिलना दुर्लभ है । हालाँकि उनके स्नेह व उदारता की कभी कोई कहानी नही बनती । इतिहास बनता है तो उसके प्रति कठोर उपेक्षा व असंवेदना का । लेकिन वे थामे रहतीं हैं सिर्फ और सिर्फ जीवन की खुशियों को और इसका  प्रतीक है गनगौर का यह उत्सव जब एक नाम लेने में स्नेह और लज्जा की नदी को पार करते-करते वे  उसमें डूब जाती है और निकलतीं हैं सारा विषाद ,निराशा और मालिन्य धोकर । निर्मल ,उज्ज्वल,शीतल ।

( चित्र की मूर्तियाँ---- मैंने ही कोशिश की है बनाने व सजाने की  । हालांकि वांछित मिट्टी व रंग उपलब्ध न हो सके  )

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

प्रेम एक अलग दृष्टि से

 (1)

प्रेम है  ‘एनस्थीसिया’ 

निष्क्रिय कर देता मस्तिष्क को ।

ज़िन्दगी कितनी ही बेरहमी से

चीरती कुरेदती रहे

देती रहे ज़ख्म ।

महसूस नहीं होता किंचित भी दर्द

पता ही नहीं चलता कि ,

चुपचाप निकाला जा चुका है ,

हृदय ,

लीवर ,किडनी ,फेफड़े ..

(2)

प्रेम, 

स्वानुभूति किसी 

हड्डी खखोरते हुए, श्वान की

अपने ही जबड़े से निकलते रक्त का

स्वाद लेते हुए

टीस सहते हुए भी

तृप्त होता रहता है

(3)

 प्रेम

अन्न मन 

लग जाता है जैसे घुन

नहीं छोड़ता उसे

उसके खोखला होने तक .

कहाँ रहता है अन्न फिर

किसी काम का .

(4)

प्रेम 

महज एक इन्द्रजाल  

एक कुहासा  

जिसमें विमुग्ध पथिक 

विलुप्त हुआ अपने आप से

खिंचा चला जाता है कहीं दू...र 

अनजान ,अपना सब कुछ छिन जाने की ,

एक साजिश से  

एक
स्कैम है प्रेम ।

शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

माँ ऐसे स्वर दे


 अँधियारे का त्रास बहुत है ।

उजियारे की आस बहुत है ।

ज्योतिर्मयी शारदे माँ ,

बस रिक्त हृदय भरदे

मन जगमग जग करदे ।

 

दुर्गम पथ सूना सूना है ।

उस पर भय दूना दूना है ।

दृढ़ आशा विश्वास रहे ,

पथ यों गुंजित करदे

अन्तर निर्भय करदे ।                

बस जगमग जग करदे ।

 

जंजालों में मन अटके ना ।

चौराहों पर अब भटके ना ।

गीत नेह के गाती जाऊँ ,

माँ ऐसे स्वर दे ।

मन जगमग जग करदे ।

 

कूल-किनारे हरियाली हो ।

अन्तर कोश नहीं खाली हो ।

नदिया का अविरल प्रवाह ,

निर्मल , कल कल स्वर दे

मन जगमग जग करदे ।

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026

माँ



 पौष-माघ की ठिठुरन में

है गरम रजाई माँ

तपती जेठ दुपहरी में

ठंडी अमराई माँ ।

 

तिमिर हटाती सरस प्रभाती

पूरब की लाली

बूँद-बूँद अमृत बरसाती

शरद जुन्हाई माँ ।

 

छलका है वात्सल्य

सूर के छन्दों में इसका

गिरधर की कुण्डलियाँ

तुलसी की चौपाई माँ ।

 

'हरि' की मोहक मधुर बाँसुरी

'रवि' का सरस सितार

पावन अनुपम 'बिस्मिल्ला खाँ' की

शहनाई माँ ।

 

रोते शिशु तो मीठा--मीठा

दूध मिले भरपेट

रूखी रोटी पर है

मक्खन और मलाई माँ

 

स्वार्थ नही सन्देह नही

बस प्यार भरा विश्वास

झूठे चेहरों की दुनिया में

एक सच्चाई माँ ।

( 'कुछ ठहरले और मेरी ज़िन्दगी ' गीत संग्रह से )

गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बिरबा सींचें आशा के


 नया वर्ष ले हर्ष आगया 

बिरबा रोपें आशा के ।

जो व्यतीत अब है अतीत 

छोड़ें भी ठांव  निराशा के 


सुबह सुबह सूरज की पाती 

हरकारा दे जाता है 

कोई पाखी आ मुँडेर पर 

पढ़कर रोज सुनाता है ।

सुनो उसे समझो ,समझाओ 

शब्द अर्थ उस भाषा के । 


बीत गया, घट रीत गया 

मनमीत उसे फिर से भरलो 

जो अबतक सोचा है केवल ,

अब उसको पूरा करलो ।

लिखलो मीत ,गीत जो 

अब तक लिखे नहीं अभिलाषा के 


समय साथ देता उनका ही ,

लक्ष्य बाँध चल देते जो ।

अर्थ आज के दिन को देकर  

दीप्तिमान कल लेते जो । 

पल पल को मुट्ठी में करलो 

काटो बन्ध दुराशा के ।


छोड़ो उनको जो तिनकों से 

धारा में बह जाते हैं ।

जिधर हवा का रुख होता है , 

अपनी राह बनाते हैं ।

अर्थ अनर्थ स्वार्थ में करते

सीधी सच्ची भाषा के 

जो अतीत अब है व्यतीत 

छोड़ें भी ठांव निराशा के

सोमवार, 15 दिसंबर 2025

मन पाए विश्राम जहाँ

 जीवन में हमारे साथ कुछ लोग ऐसे अवश्य होते हैं जिनसे मिलकर मन विश्राम पाता है । आज अनीता निहलानी जी जिनके ब्लॉग से ही यह शीर्षक लिया है , ग्वालियर भ्रमण पर हैं और मेरा सौभाग्य के उनके साथ तीन चार घंटे बिताने का अवसर मिला है । मैं सौभाग्य जैसा शब्द केवल उनके लिये ही लिखती हूँ जिनके विचार ,व्यवहार और कृतित्त्व से उजाला पाती हूँ क्योंकि यह शब्द मेरे लिये महज औपचारिक नहीं है । ब्लॉग के माध्यम से मेरा अनीता जी से परिचय पुराना है । वे ब्लॉग पर मेरी हर रचना को अनिवार्यतः पढ़ती ही हैं यदि कहूँ कि मेरे ब्लॉग उनके कारण भी ऊर्जा पा रहे हैं तो असत्य कथन न होगा ।

आज उनसे मिलना किसी अपनी आत्मीया से मिलना था । उनके आध्यात्मिक विचार पावन संयमित जीवनशैली का ओज उनके चेहरे पर है । इसका श्रेय उनके पति श्री एम.सी. निहलानी जी को भी है । दोनों ही बड़े प्रसन्नचित्त , मिलनसार व स्नेह से परिपूर्ण हैं । दोनों ही बड़े सहज सरल हैं । भ्रमण-प्रिय हैं । शायद ही कोई प्रान्त देखने से छूटा हो यह तथ्य सचमुच बड़ा प्रेरक और अनुकरणीय है । दोनों से ही मिलना बड़ा आनन्द और उत्साह मय रहा । ऐसी मुलाकातें ऐसे अपनों से होती रहें । 

अनीता जी के चार ब्लॉग हैं। लेखन उन्ही की तरह आध्यात्म से आप्लावित और उत्कृष्ट है ।   

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

अन्धा विश्वास

आँखों पर पट्टी बाँध लेना

यानी सच को अनदेखा करना ।

यह नहीं है केवल बाह्य दृश्यों 

नज़र बचाना,

बल्कि अक्षम होजाना है

ज्ञान-चक्षुओं का भी ।

मुँह मोड़ लेना है यथार्थ से ।

यों बचकर निकलजाना  ,

जड़ है बहुत से अनर्थों , विवादों की

कलह -क्लेश और अपवादों की ।

 यथार्थ से बचना ,

पलायन है 'कछुआ-धर्म' 

 समझो इसका मर्म कुरुक्षेत्र से ।

आँखों पर पट्टी बाँधकर

गांधारी ने मुँह मोड़ लिया था

अन्याय और दुराचार से ।

महल में होरहे षड़यंत्रों

और अत्याचार से

झोंक दिया था पूरे कुटुम्ब को

एक भीषण संग्राम में ।

 

आँखों पर पट्टी बाँधना  

मुँह मोड़ना है समय से

समय की गंभीरता

और जीवन में अपनी भूमिका से ।

अपने दायित्त्व से मुँह मोड़ना भयानक है सभी का

किन्तु स्त्री का सबसे अधिक ।

वह धुरी है परिवार की ,समाज की ,

जब जब जहाँ भी आँखों पर पट्टी बाँधी है स्त्री ने

ठोकर खाई है

न केवल स्त्री ने बल्कि

पूरे परिवार समाज परिवेश

और जीवन मूल्यों ने भी ।  

गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

ताना-बाना --मेरी दृष्टि में

रचनाकार --ऊषा किरण 

मन की उधेड़बुन का खूबसूरत ‘ताना-बाना’ -जब कोई आँचल मैं चाँद सितारे भरकर अँधेरे को नकारने लगे , तूफानों को ललकारे , मुट्ठी में आसमान को भरने के स्वप्न देखने लगे ,जब कल्पना वक्त की निर्मम लहरों से चुराई रेत ,बन्द सीप ,शंख आदि बटोर कर अनुभूतियों का घर सजाने लगे, वेदना के पाखी शब्दों के नीड़ तलाशने लगें, लहरों और बादलों से बातें करे और कल्पनाओं की हीर अभिव्यक्ति के राँझे की तलाश में यहाँ वहाँ भटकने लगे , हृदय के शून्य को भरने की व्यग्रता वेदना बन जाये तब ताना-बाना जैसी कृति हमारे सामने आती है .

डा. ऊषाकिरण को जितना मैंने जाना है , इस पुस्तक से वह परिचय और प्रगाढ़ हुआ है . उनके सरल तरल स्नेहमय सुकोमल व्यक्त्तित्त्व का दर्पण है तानाबाना . यों तो वे मेरी आत्मीया हैं , मुझे बड़े स्नेह के साथ यह सुन्दर उपहार भेजा . इसलिये इसे पढ़ना और पढ़कर इसके विषय में कुछ कहना मेरा तो एक कर्त्तव्य भी है और एक जरूरी काम भी लेकिन वास्तव में यह किताब ही ऐसी है कि कोई अनजान भी इसे देख-पढ़कर मुग्ध हुए बिना न रहेगा . लगभग सौ कविताओं और इतने ही सुन्दर उनके खुद के रचे गए सुन्दर चित्रों से सजी यह ऐसी कृति नहीं कि जल्दी से पढ़ो और थोड़ा बहुत लिखकर मुक्त हो जाओ . इसमें गहरे पैठकर ही मोतियों का सौन्दर्य दिखाई देता है . कुमार विश्वास जी ने शुरु में ही लिखा है कि ऊषा जी कविता को चित्रात्मक नजरिया से देखतीं हैं और चित्रों कवितामय नजरिया से . यही बात उन्हें अन्य समकालीन लेखकों से अलग करती है .

संग्रह की पहली कविता ‘परिचय’ पढ़कर ही ऊषा जी के कद का पता चल जाता है जिसमें अनूठी उपमा और बिम्ब के साथ विविधवर्णी भाव हैं .’तुम होते तो’ एक बहुत प्यारी कविता है जिसमें हर भाव और सौन्दर्य-बोध किसी के होने न होने पर आधारित हैं . बहुत कोमल भाव . देखिये— .”..जब छा जाते हैं/ बादल घाटियों में / मन पाखी फड़फड़ता है/ ...पहुँचती नहीं कोई एक भी किरण /वहाँ घना कुहासा छाया है.....सारी किरणें जो ले गए तुम/ अपनी बन्द मुट्ठी में .”

हर रचना कवि के मन का दर्पण होती है . ऊषा जी अपनी हर रचना में पूरी ईमानदारी और सादगी के साथ मौजूद हैं .उनका भाव-संसार कोमल , अछूता , उदार और संवेदना से भरा हुआ है . वे कभी परछाइयों’ को पकड़कर कभी ‘पारिजात’ की गन्ध को बाँधकर और कभी ‘चाँद को थाली ‘ में उतारकर खुद को बहलाने की बात कहती हैं . यह बात कहने में जितनी सुन्दर है समझने में उतनी ही मर्मस्पर्शी है .वे शिकवे शिकायतों का बोझ लादे रहने की पक्षधर नहीं हैं . ‘मुक्ति’ कविता में बड़े प्रभावशाली तरीके से यह बात कही है –“आओ सब /,..करने बैठी हूँ हिसाब/ कब किसने दंश दिया/ किसने किया दगा/.... किसने ताने मारे /सताया किसने /...जब मन छीजा /तब किसका कंधा नहीं था पास/.. फाड़ रही हूँ पन्ना पन्ना /यह इसका /यह उसका./..आओ सब ले जाओ/ अपना अपना /मुक्त हुई मैं /...जाते जाते बन्द कर जाना दरवाजा /.....बहुत सादा सी लगने वाली यह कविता असाधारण है .दरवाजा बन्द करने में एक सुन्दर व्यंजना है . वे नदिया के साथ बहना चाहती हैं ( नदिया कविता ),मुट्ठी में आसमान भर लेना चाहती है ( एक टुकड़ा आसमान) हवाओं में गुम होना चाहतीं हैं खुशबू की तरह ...कहीँ सूफियाना रंग है तो कहीं शाश्वत जीवन-दर्शन .सुख और दुख का स्रोत हम स्वयं हैं ( हम कविता) क्षमताएं हमारे भीतर हैं . कस्तूरी कविता में यही बात है--- “हरसिंगार ,जूही /...महकती है सारी रात/ ....मेरे आँगन में/ ..या तकिये चादर में /...अरे यह खुशबू तो झर रही है /इसी तन-उपवन से/ ..दूर कबीर गा रहे हैं काहे री नलिनी....”

‘ताना-बाना’ में प्रेम और संवेदना के रंग सबसे गहरे हैं . ‘चौबीस-बरस’ और ‘क्यूँ’ कविताओं में प्रेम की वेदना बहुत प्रभावी ढंग से व्यक्त हुई है . रहस्यवाद से रची बसी ‘क्यूँ’ कविता की कुछ पंक्तियाँ देखें—--“.....मैंने कहा था / क्या दोगे मुझे /...तुमने एक लरजता मोरपंख/ रख दिया मेरे होठों पर/ एक धूप बिखेर दी गालों पर /..एक स्पन्दन टाँक दिया वक्ष पर/ एक अर्थ बाँध दिया आँचल में /..तब से तुम्हें पुकार रही हूँ /..तुम कहीं नजर नहीं आते/... या कि हर कहीं नजर आते हो .”.

भाई को याद करते हुए लिखी ‘पतंग’ कविता बरबस ही आँखें सजल कर देती है—

“आज तुम नहीं /पर तुम्हारा स्पर्श हर कहीं है/ तुम्हारी खुशबू हवाओं में /.....तुम्हारी स्मृतियों की डोर आज भी मेरे हाथों में है /पर तुम्हारी पतंग /....कहीं दूर../ बहुत दूर निकल गई है भाई ..”

‘ताना-बाना’ का फलक बहुत व्यापक है .उसे कुछ शब्दों में नहीं समेटा जा सकता . उसमें यादें हैं फरियादें हैं , माँ का वात्सल्य है , बेटियों की उड़ानें हैं .शहीदों के लिये भावों के पुष्प हैं ,प्रेम की पीड़ा है , मुक्ति की प्रबल आकांक्षा है . ‘बहुत बिगड़ गई हूँ मैं’ और ‘पाप’ कविता में मुक्ति का सुखद अनुभव पाठकों को भी कुछ पलों के लिये जैसे मुक्त कर देता है . नारी के दमन शोषण की व्यथा-कथा के साथ उसे उठकर संघर्ष करने की प्रेरणा ‘तुम सुन रही हो ? और ‘सभ्य औरतें’ कविताओं में बोल नही रही , चीख रही है . ‘यूँ भी’ कविता अपने अस्तित्त्व को दबाने और उस पर पर प्रश्न लगाने वाली व्यवस्था को सिरे से नकारती है . गान्धारी के माध्यम से ऊषा जी ने व्यभिचारियों ,अत्याचारियों की माताओं को सही ललकारा है .

ऊषा जी की कल्पनाएं और बिम्ब मोहक हैं . कुछ उदाहरण देखें–-(1) “रात में /जुगनुओं को हाथ में लेकर /खुद को साथ लिये /..सात समुद्र तैर कर /धरती को पार कर / दूर चमकते मोती को/ मुट्ठी में बन्द कर लौटना .....”

(2) “सूरज को तकती/ सारे दिन महकती नीलकुँई/ साँझ ढले सूरज के वक्ष पर /...आँख मूँद सोगई ..”

(3) “तारों ने होठों पर /उँगली रख /हवा से कहा /धीरे बहो / उजली चादर ओढ़ अभी अभी/ सोई है सुकुमारी रात ..”

(4) “धूप –सुनहरी लटों को झटक/ पेड़ों से उछली/ खिड़की पर पंजे रख /सोफे पर कूदी /छन्न से पसर गई कार्पेट पर /...ऊधम नहीं ..मैं बरजती हूँ पर वह जीभ चिढ़ा खिलखिलाती है /..शैतान की नानी धूप ..”

(5) “थका-माँदा सूरज/ दिन ढले /टुकड़े टुकड़े /लहरों में डूब गया जब/ सब्र को पीते /सागर के होठ और भी नीले होगए .”

(6) “ हाथ में दिया लिये / जुगनू की सूरत में / गुपचुप / धरती पर आकर.../ किसे ढूँढ़ते हैं ये तारे  / मतवाले /”

ऊषा जी की स्वभावानुरूप ही भाषा कोमल और ताजगी भरी है . कहीं ‘नए नकोर प्रेम की डोर ‘ जैसे खूबसूरत प्रयोग भी हैं .

कुल मिलाकर ऊषा जी की यह पुस्तक अनूठी है . बार बार पढ़ने लायक . आधुनिक चित्रकला में हालांकि मेरी समझ कम है फिर भी इतना तो समझ सकी हूँ कि हर चित्र कविता का ही सुन्दर चित्रांकन हैं . हाँ एक बात विशेष रूप से कही जानी चाहिये कि पुस्तक का कलेवर बेहद खूबसूरत है . आवरण , पृष्ठ ,निर्दोष छपाई ..यह सब उत्कृष्ट है . जिसने कृति को अधिक सुन्दर और आकर्षक बना दिया  है . . शिवना प्रकाशन को इसके लिये बहुत बधाई . और ऊषा जी को तो क्या कहूँ . खुद को भगवान का गढ़ा हुआ डिफेक्टिव पीस कहने वाली डा. ऊषाकिरण को ईश्वर ने खूब तराशा है . बस यही कामना कि वे स्वस्थ रहें और सुन्दर कविताएं कहानियाँ लिखती रहें .

                                                                                     

शुक्रवार, 26 सितंबर 2025

बाली यात्रा---4

बाली यात्रा--3 से आगे

 'गरुड़, विष्णु कुन्चाना पार्क

और सेम्यीनाक बीच'

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चार दिन हरे भरे ‘रिवर सोंग’ में नदी के मधुर गीत सुनने के बाद 11 अगस्त तक हम लोग ‘समीनियक बीच’ के पास एक विला में रुके । यह बाली के दक्षिण पश्चिम में एक तटीय क्षेत्र है जो अपने सुदूर फैले मनोरम समुद्रतट , पैलेस ,बाजार तथा अन्य कई विशेषताओं के लिये जाना जाता है । विला रिवर सोंग जैसे मोहक वातावरण में तो नहीं था लेकिन काफी साफ सुन्दर और सुविधायुक्त था । दो भागों में तीन तीन कमरे थे । एक भाग में पत्नी बच्चों सहित मयंक शिवम् और सौरभ थे और दूसरे तीन कमरों में हम माताएं । यहाँ रहते हुए हमने बाली के कुछ और दर्शनीय स्थल देखे ।

गरुड़ विष्णु कुन्चाना पार्क

1-गरुड़ विष्णु कुंचाना पार्क— ( kencana का उच्चारण कई जगह केनकाना और केंचना भी है इन्डोनेशियन भाषा में इसका अर्थ है सोना )     बाली की समृद्ध संस्कृति, कला और पौराणिक कथाओं का एक अद्भुत मिश्रण यह पार्क गरुड़ की शानदार प्रतिमा के लिये जाना जाता है जो 122 मीटर ऊँची है ।

यह चित्र गूगल से साभार

आकाश में उड़ान भरते हुए से गरुड़ और उसपर सवार भगवान् विष्णु को दोखकर एक पुलक और रोमांच का अनुभव होता है । यह समान आकार के 754 खण्डों (मॉड्यूल) से बनाई गई है जो अपने आप में विशेष है। दुनिया की ऊँची प्रतिमाओं में मान्य यह प्रतिमा बीस किमी दूर से भी दिखाई देती है । इसे देखे बिना बाली-दर्शन अधूरा है ।  

2-सरस्वती मन्दिर( pura taman kemuda sarswati) —उबुद में स्थित सरस्वती मन्दिर जिसे वाटर पैलेस भी कहा जाता है । सुन्दर कमलों से भरे तालाब , फव्वारे और अत्यन्त आकर्षक और कलात्मक शिल्प वाला , कला की देवी सरस्वती को समर्पित यह मन्दिर इन्डोनेशिया का सबसे सुन्दर मन्दिर माना जाता है । 

सरस्वती मन्दिर का ही एक भाग
यहाँ भी अन्दर जाने से पहले टिकिट लेना और  एक सुनिश्चित परिधान पहनना होता है ।

सरस्वती मन्दिर
वहाँ पाँच पाण्डवों की बहुत ही सुन्दर प्रतिमाएं देखना एक आनन्दमय अनुभव था । उबुद पैलेस सरस्वती मन्दिर आदि स्थानों का कोई न कोई सम्बन्ध मार्कण्डेय ऋषि से रहा है यह कहीं पढ़ा है । इसीलिये बाली में पग पग पर आत्मीयता का अनुभव होता है ।3--उबुद पैलेस –बाली की उत्कृष्ट वास्तुकला का शानदार उदाहरण है उबुद पैलेस । यह शाही परिवार का आधिकारिक निवास था । महल के पत्थरों की अद्भुत नक्काशी चकित करने वाली है । अगर पत्थर बोलते तो वैभव और संघर्ष की जाने कितनी रोचक कहानियाँ सुनाते । इतनी सुन्दर अनूठी नक्काशी के कलाकार को ('आई गुस्ती न्यूमन लेम्पाड' --1862 –1978) हदय से नमन है । 


उबुद पैलेस का मुख्य द्वार
यह पैलेस का आकर्षण ही था कि चिलचिलाती धूप में भी देखने की जिज्ञासा बनी हुई थी । वहाँ भी हमने कई फोटो लिये ।  

4-सेमिन्याक बीच—बाली जाएं और बीच पर न जाएं ऐसा नहीं हो सकता । खासतौर पर जिन्हें लहरों की बाहों में झूलने का शौक हो । बीच पर जाने से पहले बाँस का बना एक बहुत ही सुन्दर दरवाजा और बाँस से ही बनी लम्बी गैलरी पार करनी होती है । वहाँ सामान देखा जाता है कि कोई प्लास्टिक का या अवांछनीय सामान तो नहीं है । समुद्र-तट को साफ सुथरा रखने के लिये यह बड़ी प्रेरक पहल है। बीच पर उतरने से पहले एक खुला क्लब , स्वीमिंग पूल और रेस्टोरेंट है जहाँ आराम कुर्सियों पर अर्धनग्न लेटे विदेशी पर्यटक , कनफोड़ शोर करते ड्रम के साथ पाश्चात्य संगीत और तली जा रही मछली की गन्ध आपका स्वागत करती है । मेरे जैसे लोगों के लिये एकमात्र यही अप्रिय अनुभव था लेकिन तट पर पहुँचते ही सारी क्लान्ति विलीन होगई । 

सागर की नीलिमा में सुनहरे सितारे टाँकती साँझ धीरे धीरे उतर रही थी । आसमान में चतुर्दशी का बड़ा सा चाँद भी झाँकने लगा तो लहरें जैसे उल्लास से भर गई । और तेजी से उमड़कर मानो वे चाँद को छूना चाहती हों । आसमान में रंगबिरंगी पतंगें लहरों की अधीरता पर मुस्कराती हुई लहरा रहीं थीं